भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
शङ्खलोमा च नहुषो वामनः फणितस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृतः॥ ३७महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंखलोमा, नहुष, वामन, फणित, कपिल, दुर्मुख तथा पतंजलि [नामवाले] कहे गये हैं॥ ३२-३७॥
रक्षोगणं क्रोधवशा महामायं व्यजीजनत्।<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यौ वराङ्गना॥ ३८<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा॥ ३९<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्।<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिला सर्वमजीजनत्॥ ४०<br>त्विषा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः।<br>एते तु काश्यपेयाश्च सङ्क्षेपात्परिकीर्तिताः॥ ४१क्रोधवशाने महामायावी राक्षसों तथा रुद्रगणोंको जन्म दिया और सुन्दर स्त्री सुरभिने कश्यपसे गायों तथा भैंसोंको जन्म दिया; ऐसा हमने सुना है। मुनि [नामक कश्यपभार्या]-ने मुनियों एवं अप्सराओंको और अरिष्टाने बहुत-से किन्नरों तथा गन्धर्वोंको जन्म दिया। इलाने समस्त तृणों, वृक्षों, लताओं तथा गुल्मोंको जन्म दिया। त्विषाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया। मैंने कश्यपकी इन सन्तानोंका संक्षेपमें वर्णन कर दिया। इन सबके बहुत-से पुत्र-पौत्र आदि वंश कहे गये हैं॥ ३८-४१ १/२॥
एतेषां पुत्रपौत्रादिवंशाश्च बहवः स्मृताः।<br>एवं प्रजासु सृष्टासु कश्यपेन महात्मना॥ ४२<br>प्रतिष्ठितासु सर्वासु चरासु स्थावरासु च।<br>अभिषिच्याधिपत्येषु तेषां मुख्यान् प्रजापतिः॥ ४३<br>ततो मनुष्याधिपतिं चक्रे वैवस्वतं मनुम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वं ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः॥ ४४<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>यथोपदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते॥ ४५<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वे ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः।<br>ते होते चाभिषिच्यन्ते मनवश्च भवन्ति ते॥ ४६<br>मन्वन्तरेष्वतीतेषु गता होतेषु पार्थिवाः।<br>एवमन्येऽभिषिच्यन्ते प्राप्ते मन्वन्तर ततः॥ ४७<br>अतीतानागताः सर्वे नृपा मन्वन्तरे स्मृताः।इस प्रकार महात्मा कश्यपके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि कर लिये जानेपर तथा उन सभी चर-अचर प्रजाओंके प्रतिष्ठित हो जानेपर प्रजापतिने उनमेंसे मुख्योंको अधिपतिके पदपर अभिषिक्त करके वैवस्वत मनुको मनुष्योंका अधिपति बनाया। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें पहले ब्रह्माने जिन्हें अभिषिक्त किया था, उन्हींके द्वारा पर्वतोंसहित सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वी आज भी आदेशके अनुसार धर्मपूर्वक पालित की जा रही है। ब्रह्माने पूर्व स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जिनका अभिषेक किया था, वे ही यहाँ अभिषिक्त किये जाते हैं और मनु होते हैं। इन मन्वन्तरोंके बीत जानेपर राजा भी चले जाते हैं; इस प्रकार इनके बाद मन्वन्तर आनेपर अन्य [राजा] अभिषिक्त किये जाते हैं। अतीत तथा अनागत सभी राजा मन्वन्तरमें कहे गये हैं॥ ४२-४७ १/२॥
एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासन्तानकारणात्॥ ४८<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार स पुनस्तपः।<br>पुत्रो गोत्रकरो मह्यं भवतादिति चिन्तयन्॥ ४९<br>तस्यैवं ध्यायमानस्य कश्यपस्य महात्मनः।<br>ब्रह्मयोगात्सुतौ पश्चात्प्रादुर्भूतौ महौजसौ॥ ५०<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ।<br>वत्सरान्नैध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहायशाः॥ ५१प्रजा-संतानके कारण इन पुत्रोंको उत्पन्न करके अपने वंशकी कामना रखनेवाले उन कश्यपने 'वंशको बढ़ानेवाला पुत्र मुझे उत्पन्न हो'—ऐसा सोचते हुए पुनः तप करना आरम्भ किया। इस प्रकार ध्यान करते हुए उन महात्मा कश्यपके ब्रह्मयोगसे पुनः महान् ओजस्वी दो पुत्र उत्पन्न हुए। वत्सर तथा असित [नामवाले] वे दोनों ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे महान् यशवाले नैध्रुव तथा रैभ्य उत्पन्न हुए। रैभ्यके पुत्रोंको