श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन २६१
| संस्कृत (मूल श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वसवस्ते समाख्याताः सर्वभूतहितैषिणः।<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः॥ १९<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षः सभैरवः॥ २०<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः।<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥ २१<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः। | व्यापक हैं, वे वसु कहे गये हैं; वे सभी प्राणियोंके हितैषी हैं। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, सुरेश्वर त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित—ये गणेश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं॥ १८–२१ १/२॥ |
| कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकम्॥ २२<br>अदितिश्च दितिश्चैव अरिष्टा सुरसा मुनिः।<br>सुरभिर्विनता ताम्रा तद्वत् क्रोधवशा इला॥ २३<br>कद्रूस्त्विषा दनुस्तद्वत्तासां पुत्रान् वदामि वः।<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ २४<br>वैवस्वतान्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ २५<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च।<br>एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः॥ २६ | [हे ऋषियो!] अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न पुत्रों तथा पौत्रोंको बताऊँगा। अदिति, दिति, अरिष्टा, सुरसा, मुनि, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, कद्रू, त्विषा एवं दनु—ये कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब मैं आपलोगोंको उनके पुत्रोंको बताता हूँ। चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामवाले देवता थे, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें बारह आदित्य कहे गये हैं। इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये हजार किरणोंवाले बारह आदित्य कहे गये हैं॥ २२–२६॥ |
| दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च॥ २७<br>दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूत्तेषां मध्ये द्विजोत्तमाः॥ २८<br>ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुङ्गवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवीं गृध्रिकां शुचिम्॥ २९<br>शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुरङ्गांश्च व्यजीजनत्॥ ३०<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसकारण्डप्लवांश्छुचिरजीजनत् ॥ ३१<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्। | दितिने कश्यपसे हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष—इन दो पुत्रोंको प्राप्त किया था, ऐसा हमने सुना है। दनुने कश्यपसे बलके अभिमानवाले सौ पुत्र प्राप्त किये। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें विप्रचित्ति प्रधान था। हे श्रेष्ठ द्विजो! ताम्राने शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका तथा शुचि—इन छः कन्याओंको जन्म दिया। शुकीने धर्मसे शुकों तथा उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीने श्येनों (बाज) तथा भासीने कुरंगोंको जन्म दिया। गृध्रीने गीधोंको, कपोतों तथा पारावत पक्षियोंको जन्म दिया। शुचिने हंस, सारस तथा कारण्ड पक्षियोंको जन्म दिया। सुग्रीवीने अजों, अश्वों, मेषों, ऊँटों तथा गर्दभोंको जन्म दिया॥ २७–३१ १/२॥ |
| विनता जनयामास गरुडं चारुणं शुभा॥ ३२<br>सौदामिनीं तथा कन्यां सर्वलोकभयङ्करीम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत्पुरा॥ ३३<br>कद्रूः सहस्रशिरसां सहस्रं प्राप सुव्रता।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिरुत्तमाः॥ ३४<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः। ।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः ॥ ३५<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः। ।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः ॥ ३६ | शुभ विनताने गरुड़ तथा अरुणको और सभी लोकोंको भय प्रदान करनेवाली सौदामिनी [नामक] कन्याको उत्पन्न किया। सुरसासे हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उत्तम व्रतवाली कद्रूने हजार सिरवाले एक हजार सर्प उत्पन्न किये। उनमें छब्बीस [सर्प] उत्तम तथा प्रधान कहे गये हैं; वे शेष, वासुकि, कर्कोट, शंख, ऐरावत, कम्बल, धनंजय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, |