श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 262, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 262
| २६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम्॥ ६ | जानकर आपलोग विशेष रूपसे सृष्टि कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठो! उनका वचन सुनकर वे सभी दिशाओंमें चले गये। वे आजतक नहीं लौटे, जैसे नदियाँ [समुद्रमें मिलकर] समुद्रसे वापस नहीं लौटतीं॥ ५-६^{१}/_{२}॥ |
| अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः।<br>हर्यश्वेषु च नष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः॥ ७<br>सूत्यामेव च पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः।<br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः॥ ८<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् सूर्यवर्चसः।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वा भ्रातॄन् पुनः पुनः॥ ९<br>आगत्य वाथ सृष्टिं वै करिष्यथ विशेषतः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृगतिं तथा॥ १० | हर्यश्वसंज्ञक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रजापति प्रभु दक्षने सूतिसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे विप्रो! जब शबल नामवाले वे पुत्र सृष्टि करनेके लिये एकत्रित हुए, तब नारदने सूर्यके समान तेजवाले उन आये हुए पुत्रोंसे पुनः कहा—'पृथ्वीका सम्पूर्ण विस्तार जानकर तथा अपने भाइयोंका बार-बार पता लगाकर यहाँ आकरके आपलोग विशेषरूपसे सृष्टि कीजिये।' वे भी उसी मार्गसे [अपने] भाइयोंकी गतिको प्राप्त हुए॥ ७-१०॥ |
| ततस्तेष्वपि नष्टेषु षष्टिकन्याः प्रजापतिः।<br>वैरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तदा॥ ११<br>प्रादात्स दशकं धर्मे कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत्सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १२<br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्गत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १३<br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तारमादितः। | तदनन्तर उनके भी नष्ट हो जानेपर प्रचेतसके पुत्र प्रजापति दक्षने वैरिणी [नामक भार्या]-से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उन्होंने दस [कन्याएँ] धर्मको, तेरह [कन्याएँ] कश्यपको, सत्ताईस [कन्याएँ] चन्द्रमाको, चार [कन्याएँ] अरिष्टनेमिको, दो [कन्याएँ] भृगु-पुत्रको, दो [कन्याएँ] बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो [कन्याएँ] आंगिरसको प्रदान कीं। [हे विप्रो!] अब उन देवमाताओंके नाम तथा उनकी सन्तानोंके विस्तारको आरम्भसे सुनिये॥ ११-१३^{१}/_{२}॥ |
| मरुत्वती वसूय्यामिर्लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १४<br>सङ्कल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् वदामि वः॥ १५<br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्अजीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १६<br>भानोस्तु भानवः प्रोक्ता मुहूर्ताया मुहूर्तकाः।<br>लम्बाया घोषणानामानो नागवीथीस्तु यामिजः॥ १७<br>सङ्कल्पायास्तु सङ्कल्पो वसुसर्गं वदामि वः। | मरुत्वती, वसु, यामि, लम्बा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और परम सुन्दरी विश्वा धर्मकी पत्नियाँ कही गयी हैं। [हे ऋषियो!] अब मैं उनके पुत्रोंको बताता हूँ—विश्वासे विश्वेदेव हुए। साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीसे मरुत्वान् हुए और वसुसे सभी वसु उत्पन्न हुए। भानुसे भानुगण तथा मुहूर्तासे मुहूर्तगण [उत्पन्न] बताये गये हैं। लम्बासे घोषनामवाले पुत्र हुए। यामिसे नागवीथि उत्पन्न हुआ। संकल्पासे संकल्प [नामक पुत्र] हुआ। अब मैं आपलोगोंको वसुओंकी सृष्टि बताता हूँ॥ १४-१७^{१}/_{२}॥ |
| ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतोदिशम्॥ १८ | जो देवता ज्योतिष्मान् तथा सभी दिशाओंमें |