श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६३] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव…ऋषिवंशवर्णन २५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नमस्कारसमायुक्तं भगवच्छब्दसंयुक्तम्।<br>जपेदेवं हि यो विद्वान् ध्रुवं स्थानं प्रपद्यते॥ ३८<br><br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>मात्रा सह ध्रुवं सर्वे तस्मिन् स्थाने न्यवेशयन्॥ ३९<br><br>विष्णोराज्ञां पुरस्कृत्य ज्योतिषां स्थानमाप्तवान्।<br>एवं ध्रुवो महातेजा द्वादशाक्षरविद्यया॥ ४०<br><br>अवाप महतीं सिद्धिमेतत्ते कथितं मया॥ ४१ | किया था। प्रणव (ॐ) तथा नमःसे युक्त और भगवत्—इस शब्दसे संयुक्त वासुदेव मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-को जो विद्वान् जपता है, वह ध्रुवस्थान प्राप्त करता है॥ ३५-३८॥<br>तदनन्तर सभी देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा महर्षियोंने मातासहित ध्रुवको उस स्थानपर स्थापित किया। इस प्रकार महातेजस्वी ध्रुवने विष्णुकी आज्ञा स्वीकार करके द्वादशाक्षरमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-के द्वारा ज्योतिर्गणोंमें स्थान प्राप्त किया तथा महती सिद्धि प्राप्त की। मैंने यह [वृत्तान्त] आपलोगोंसे कह दिया॥ ३९-४१॥ |
| सूत उवाच<br>तस्माद्यो वासुदेवाय प्रणामं कुरुते नरः।<br>स याति ध्रुवसालोक्यं ध्रुवत्वं तस्य तत्तथा॥ ४२ | **सूतजी बोले—**अतः जो मनुष्य वासुदेवको प्रणाम करता है, वह ध्रुवलोकको जाता है और उसे भी वह ध्रुवत्व प्राप्त हो जाता है॥ ४२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे ध्रुवसंस्थानवर्णनं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें ध्रुवसंस्थानवर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंशवर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं ब्रूहि सूताद्य यथाक्रममनुत्तमम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! अब आप देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसोंकी उत्पत्तिका उत्तम विधिसे यथाक्रम वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात्प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः॥ ३<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पञ्च सूत्यामजीजनत्।<br>तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः॥ ४ | **सूतजी बोले—**पूर्व पुरुषोंकी सृष्टि संकल्पसे, दर्शनसे तथा स्पर्शसे कही जाती है। प्रचेतसके पुत्र दक्षके बाद [स्त्री-पुरुषके] संयोगसे सृष्टि प्रारम्भ हुई। जब देवताओं, ऋषियों और पन्नगोंका सृजन करते हुए उन प्रजापतिसे लोक वृद्धिको प्राप्त नहीं हुआ, तब दक्षने मैथुनयोगसे [अपनी भार्या] सूतिसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। तत्पश्चात् उन महाभाग्यवालोंको देखकर वे अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टिके इच्छुक हो गये॥ २-४॥ |
| नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च॥ ५ | तब नारदजीने उत्पन्न हुए [उन] हर्यश्व नामवाले दक्ष-पुत्रोंसे कहा—ऊपर तथा नीचे पृथ्वीका प्रमाण |