भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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२५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भी विचलित नहीं हुआ॥ २१—२४॥
सुनीतिरस्य या माता तस्या रूपेण संवृता।<br>पिशाची समनुप्राप्ता रुरोद भृशदुःखिता॥ २५<br><br>मम त्वमेकः पुत्रोऽसि किमर्थं क्लिश्यते भवान्।<br>मामनाथामपहाय तप आस्थितवानसि॥ २६<br><br>एवमादीनि वाक्यानि भाषमाणां महातपाः।<br>अनिरीक्ष्यैव हृष्टात्मा हरेर्नाम जजाप सः॥ २७इसकी माता जो सुनीति थी, उसका रूप धारण करके एक पिशाची उसके पास आयी और अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी—तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो, तुम कष्ट क्यों सह रहे हो, मुझे अनाथ छोड़कर तुम तपमें लग गये हो—इस प्रकारके वचन बोलती हुई उस स्त्रीकी ओर बिलकुल न देखकर वह महातपस्वी प्रसन्नचित्त होकर हरिका नाम जपता रहा॥ २५—२७॥
ततः प्रशेमुः सर्वत्र विघ्नरूपाणि तत्र वै।<br>ततो गरुडमारुह्य कालमेघसमद्युतिः॥ २८<br><br>सर्वदेवैः परिवृतः स्तूयमानो महर्षिभिः।<br>आययौ भगवान् विष्णुः ध्रुवान्तिकमरातिहा॥ २९तदनन्तर वहाँ सर्वत्र विघ्नोंके स्वरूप शान्त हो गये। तब गरुड़पर सवार होकर कालमेघके समान (श्याम) कान्तिवाले, समस्त देवताओंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए शत्रुसंहारक भगवान् विष्णु ध्रुवके पास आये॥ २८—२९॥
समागतं विलोक्याथ कोसावित्येव चिन्तयन्।<br>पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां जगत्पतिम्॥ ३०<br><br>जपन् स वासुदेवेति ध्रुवस्तस्थौ महाद्युतिः।<br>शङ्खप्रान्तेन गोविन्दः पस्पर्शास्यं हि तस्य वै॥ ३१उनको आया हुआ देखकर यह कौन है—ऐसा सोचता हुआ तथा अपने नेत्रोंसे जगत्पति हृषीकेशका पान करता हुआ-सा वह महान् प्रभाववाला ध्रुव 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस मन्त्रका जप करता रहा। तब गोविन्दने [अपने] शंखके अग्रभागसे उसके मुखका स्पर्श किया॥ ३०—३१॥
ततः स परमं ज्ञानमवाप्य पुरुषोत्तमम्।<br>तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकेश्वरं हरिम्॥ ३२<br><br>प्रसीद देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>लोकात्मन् वेदगुह्यात्मन् त्वां प्रपन्नोऽस्मि केशव॥ ३३<br><br>न विदुस्त्वां महात्मानं सनकाद्या महर्षयः।<br>तत्कथं त्वामहं विद्यां नमस्ते भुवनेश्वर॥ ३४उसके बाद वह [ध्रुव] परम ज्ञान प्राप्त करके हाथ जोड़कर सभी लोकोंके स्वामी पुरुषोत्तम हरिकी [इस प्रकार] स्तुति करने लगा—हे देवदेवेश! हे शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले! हे लोकात्मन्! हे वेदगुह्यात्मन् (वेदोंके द्वारा अज्ञातस्वरूपवाले)! प्रसन्न होइये। हे केशव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। सनक आदि महर्षि भी आप महात्माको नहीं जान सके, तब मैं आपको कैसे जान सकता हूँ। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ३२—३४॥
तमाह प्रहसन् विष्णुरेहि वत्स ध्रुवो भवान्।<br>स्थानं ध्रुवं समासाद्य ज्योतिषामग्रभुग्भव॥ ३५<br><br>मात्रा त्वं सहितस्तत्र ज्योतिषां स्थानमाप्नुहि।<br>मत्स्थानमेतत्परमं ध्रुवं नित्यं सुशोभनम्॥ ३६<br><br>तपसाराध्य देवेशं पुरा लब्धं हि शङ्करात्।<br>वासुदेवेति यो नित्यं प्रणवेन समन्वितम्॥ ३७तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने उससे हँसते हुए कहा—हे वत्स! आओ, तुम ध्रुव हो, तुम ध्रुव (अटल) स्थान प्राप्त करके ज्योतिर्गणोंमें अग्रणी हो जाओ। तुम अपनी मातासहित वहाँ ग्रहोंमें स्थान प्राप्त करो, यह मेरा स्थान है, जो उत्कृष्ट, अचल, शाश्वत तथा अत्यन्त सुन्दर है। पूर्वकालमें मैंने तपस्याके द्वारा देवेशकी आराधना करके शंकरसे इसे (मन्त्रको) प्राप्त