श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६२ ] उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन | २५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितुरङ्के समासीनं माता मां सुरुचिर्मुने।<br>व्यधूनयत्तस् तां राजा पिता नोवाच किञ्चन॥ १३<br><br>एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मंस्त्रस्तोऽहं मातरं गतः।<br>सुनीतिराह मे माता मा कृथाः शोकमृत्तमम्॥ १४<br><br>स्वकर्मणा परं स्थानं प्राप्तुमर्हसि पुत्रक।<br>तस्या हि वचनं श्रुत्वा स्थानं तव महामुने॥ १५<br><br>प्राप्तो वनमिदं ब्रह्मन्नद्य त्वां दृष्टवान् प्रभो।<br>तव प्रसादात्प्राप्स्येऽहं स्थानमद्भुतमुत्तमम्॥ १६ | भगवन्! हे सत्तम! आप कृपा करके मुझे बतायें कि मैं किस उपायसे सबके ऊपर स्थान प्राप्त करूँगा? हे मुने! माता सुरुचिने पिताकी गोदमें बैठे हुए मुझको [गोदसे] उतार दिया और उन राजाने उन्हें कुछ नहीं कहा। हे ब्रह्मन्! इस कारणसे दुःखी होकर मैं माताके पास गया। तब मेरी माता सुनीतिने कहा—हे पुत्र! शोक मत करो, तुम अपने कर्मसे उत्तम तथा परम स्थान प्राप्त कर सकते हो। हे महामुने! उनका वचन सुनकर मैं इस वनमें आपके स्थानपर आया हूँ। हे ब्रह्मन्! आज मैंने आपका दर्शन किया, अतः हे प्रभो! आपकी कृपासे मैं अद्भुत तथा उत्तम स्थान [अवश्य] प्राप्त करूँगा॥ ११—१६॥ |
| इत्युक्तः स मुनिः श्रीमान् प्रहसन्निदमब्रवीत्।<br>राजपुत्र शृणुष्वेदं स्थानमुत्तममाप्स्यसि॥ १७<br><br>आराध्य जगतामीशं केशवं क्लेशनाशनम्।<br>दक्षिणाङ्गभवं शम्भोर्महादेवस्य धीमतः॥ १८<br><br>जप नित्यं महाप्राज्ञ सर्वपापविनाशनम्।<br>इष्टदं परमं शुद्धं पवित्रममलं परम्॥ १९<br><br>ब्रूहि मन्त्रमिमं दिव्यं प्रणवेन समन्वितम्।<br>नमोऽस्तु वासुदेवाय इत्येवं नियतेन्द्रियः॥ २०<br><br>ध्यायन् सनातनं विष्णुं जपहोमपरायणः।<br>इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं विश्वामित्रं महायशाः॥ २१ | [ध्रुवके द्वारा] इस प्रकार कहे गये श्रीमान् मुनिने हँसते हुए यह कहा—हे राजपुत्र! सुनो, तुम जगत्के स्वामी, कष्टोंका नाश करनेवाले तथा बुद्धिमान् महादेव शम्भुके दक्षिण* अंगसे उत्पन्न केशव (विष्णु)-की आराधना करके इस श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त कर सकोगे। हे महाप्राज्ञ! तुम सभी पापोंका नाश करनेवाले, अभीष्ट प्रदान करनेवाले, परम शुद्ध, पवित्र, दोषरहित तथा श्रेष्ठ मन्त्रका नित्य जप करो। तुम इन्द्रियोंको वशमें करके प्रणवसहित नमोऽस्तु वासुदेवाय [अर्थात् ॐ नमोऽस्तु वासुदेवाय] इस दिव्य मन्त्रको जपो और सनातन विष्णुका ध्यान करते हुए जप-होममें संलग्न रहो॥ १७—२० १/२॥ |
| प्राङ्मुखो नियतो भूत्वा जजाप प्रीतमानसः।<br>शाकमूलफलाहारः संवत्सरमतन्द्रितः॥ २२<br><br>जजाप मन्त्रमनिशमजस्रं स पुनः पुनः।<br>वेताला राक्षसा घोराः सिंहाद्याश्च महामृगाः॥ २३<br><br>तमभ्ययुर्महात्मानं बुद्धिमोहाय भीषणाः।<br>जपन् स वासुदेवेति न किञ्चित्प्रत्यपद्यत॥ २४ | उनके ऐसा कहनेपर महान् यशवाले ध्रुवने उन विश्वामित्रको प्रणाम करके पूर्वकी ओर मुख करके ध्यानमग्न होकर प्रसन्नचित्त हो जप आरम्भ किया। शाक, मूल तथा फलका आहार करते हुए उसने आलस्यरहित होकर दिन-रात निरन्तर एक वर्षतक मन्त्रका बार-बार जप किया। वेताल, भयंकर राक्षस तथा भयानक सिंह आदि बड़े जानवर बुद्धिको मोहित करनेके लिये उस महात्माके पास आये, किंतु वासुदेवका जप करता हुआ वह तनिक |
* यहाँ मूलमें विष्णुको भगवान् शंकरके दक्षिणांग से उत्पन्न बताया गया है, किंतु इसी लिङ्गपुराणके ३८वें अध्यायमें भगवान् विष्णुने स्वयंको भगवान् शिवके वामांगसे और ब्रह्माजीको दक्षिणांगसे प्रादुर्भूत बताया है—'अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः। भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयंम् ॥' अतः यहाँ दक्षिणांगसे 'वामांग' अर्थ लेना चाहिये।