भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 258
२५६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

बासठवाँ अध्याय

उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>कथं विष्णोः प्रसादाद्वै ध्रुवो बुद्धिमतां वरः।<br>मेढीभूतो ग्रहाणां वै वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भगवान् विष्णुकी कृपासे ग्रहोंके मेढ़ीभूत (मध्य स्थानवाले) किस प्रकार हुए, [हमलोगोंको] इस समय बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>एतमर्थं मया पृष्टो नानाशास्त्रविशारदः।<br>मार्कण्डेयः पुरा प्राह मह्यं शुश्रूषवे द्विजाः॥ २**सूतजी बोले—**हे द्विजो! मैंने पूर्वकालमें अनेक शास्त्रोंके ज्ञाता मार्कण्डेयजीसे इसी बातको पूछा था, तब उन्होंने सुननेकी इच्छावाले मुझको बताया था॥ २॥
मार्कण्डेय उवाच<br>सार्वभौमो महातेजाः सर्वशस्त्रभृतां वरः।<br>उत्तानपादो राजा वै पालयामास मेदिनीम्॥ ३<br>तस्य भार्याद्वयमभूत्सुनीतिः सुरुचिस्तथा।<br>अग्रजायामभूत्पुत्रः सुनीत्यां तु महायशाः॥ ४<br>ध्रुवो नाम महाप्राज्ञः कुलदीपो महामतिः।<br>कदाचित्सप्तवर्षोऽपि पितुरङ्कमुपाविशत्॥ ५<br>सुरुचिस्तं विनिर्धूय स्वपुत्रं प्रीतिमानसा।<br>निवेशयत्तं विप्रेन्द्रा ह्यङ्कं रूपेण मानिता॥ ६मार्कण्डेयजी बोले—[प्राचीन कालमें] सार्वभौम (चक्रवर्ती सम्राट्), महान् तेजस्वी तथा सभी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजा उत्तानपाद पृथ्वीका पालन करते थे। सुनीति तथा सुरुचि—ये उनकी दो भार्याएँ थीं। उनकी ज्येष्ठ भार्या सुनीतिसे ध्रुव नामक पुत्र उत्पन्न हुआ था; वह महायशस्वी, महाज्ञानी, कुलका दीपक तथा महाबुद्धिमान् था। जब वह सात वर्षका था, तब किसी समय अपने पिताकी गोदमें बैठ गया। हे विप्रेन्द्रो! उस समय अपने रूपपर गर्व करनेवाली सुरुचिने उसे [गोदसे] उतारकर प्रसन्नचित्त होकर अपने पुत्रको [राजाकी] गोदमें बैठा दिया॥ ३-६॥
अलब्ध्वा स पितुर्धीमानङ्कं दुःखितमानसः।<br>मातुः समीपमागम्य रुरोद स पुनः पुनः॥ ७तदनन्तर पिताकी गोद न पाकर उस बुद्धिमान् [ध्रुव]-के हृदयमें दुःख हुआ और वह [अपनी] माताके पास आकर बार-बार रोने लगा॥ ७॥
रुदन्तं पुत्रमाहेदं माता शोकपरिप्लुता।<br>सुरुचिर्दयिता भर्तुस्तस्याः पुत्रोऽपि तादृशः॥ ८<br>मम त्वं मन्दभाग्याया जातः पुत्रोऽप्यभाग्यवान्।<br>किं शोचसि किमर्थं त्वं रोदमानः पुनः पुनः॥ ९<br>सन्तप्तहृदयो भूत्वा मम शोकं करिष्यसि।<br>स्वस्थस्थानं ध्रुवं पुत्र स्वशक्त्या त्वं समाप्नुयाः॥ १०तब शोकमें डूबी हुई माताने रोते हुए पुत्रसे कहा—सुरुचि [अपने] पतिकी प्रिय पत्नी है और उसका पुत्र भी उसी प्रकार उन्हें प्रिय है। तुम मुझ अभागिनके अभागे पुत्र उत्पन्न हुए हो। तुम क्यों चिन्ता करते हो और बार-बार किसलिये रो रहे हो? तुम दुःखितचित्त होकर मेरे शोकको ही बढ़ाओगे। हे पुत्र! तुम्हें अपनी शक्तिसे शान्त तथा अटल स्थान प्राप्त करना चाहिये॥ ८-१०॥
इत्युक्तः स तु मात्रा वै निर्जगाम तदा वनम्।<br>विश्वामित्रं ततो दृष्ट्वा प्रणिपत्य यथाविधि॥ ११<br>उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा भगवन् वक्तुमर्हसि।<br>सर्वेषामुपरिस्थानं केन प्राप्स्यामि सत्तम॥ १२तब माताके इस प्रकार कहनेपर वह वनमें चला गया। वहाँ [ऋषि] विश्वामित्रको देखकर उन्हें विधिपूर्वक प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़कर उसने कहा—हे