श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
अध्याय ६२ ] उत्तानपादके पुत्र ध्रुवका आख्यान, ध्रुवकी तपस्या तथा ध्रुवलोकसंस्थानका वर्णन | २५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पितुरङ्के समासीनं माता मां सुरुचिर्मुने।<br>व्यधूनयत्तस् तां राजा पिता नोवाच किञ्चन॥ १३<br><br>एतस्मात्कारणाद् ब्रह्मंस्त्रस्तोऽहं मातरं गतः।<br>सुनीतिराह मे माता मा कृथाः शोकमृत्तमम्॥ १४<br><br>स्वकर्मणा परं स्थानं प्राप्तुमर्हसि पुत्रक।<br>तस्या हि वचनं श्रुत्वा स्थानं तव महामुने॥ १५<br><br>प्राप्तो वनमिदं ब्रह्मन्नद्य त्वां दृष्टवान् प्रभो।<br>तव प्रसादात्प्राप्स्येऽहं स्थानमद्भुतमुत्तमम्॥ १६ | भगवन्! हे सत्तम! आप कृपा करके मुझे बतायें कि मैं किस उपायसे सबके ऊपर स्थान प्राप्त करूँगा? हे मुने! माता सुरुचिने पिताकी गोदमें बैठे हुए मुझको [गोदसे] उतार दिया और उन राजाने उन्हें कुछ नहीं कहा। हे ब्रह्मन्! इस कारणसे दुःखी होकर मैं माताके पास गया। तब मेरी माता सुनीतिने कहा—हे पुत्र! शोक मत करो, तुम अपने कर्मसे उत्तम तथा परम स्थान प्राप्त कर सकते हो। हे महामुने! उनका वचन सुनकर मैं इस वनमें आपके स्थानपर आया हूँ। हे ब्रह्मन्! आज मैंने आपका दर्शन किया, अतः हे प्रभो! आपकी कृपासे मैं अद्भुत तथा उत्तम स्थान [अवश्य] प्राप्त करूँगा॥ ११—१६॥ |
| इत्युक्तः स मुनिः श्रीमान् प्रहसन्निदमब्रवीत्।<br>राजपुत्र शृणुष्वेदं स्थानमुत्तममाप्स्यसि॥ १७<br><br>आराध्य जगतामीशं केशवं क्लेशनाशनम्।<br>दक्षिणाङ्गभवं शम्भोर्महादेवस्य धीमतः॥ १८<br><br>जप नित्यं महाप्राज्ञ सर्वपापविनाशनम्।<br>इष्टदं परमं शुद्धं पवित्रममलं परम्॥ १९<br><br>ब्रूहि मन्त्रमिमं दिव्यं प्रणवेन समन्वितम्।<br>नमोऽस्तु वासुदेवाय इत्येवं नियतेन्द्रियः॥ २०<br><br>ध्यायन् सनातनं विष्णुं जपहोमपरायणः।<br>इत्युक्तः प्रणिपत्यैनं विश्वामित्रं महायशाः॥ २१ | [ध्रुवके द्वारा] इस प्रकार कहे गये श्रीमान् मुनिने हँसते हुए यह कहा—हे राजपुत्र! सुनो, तुम जगत्के स्वामी, कष्टोंका नाश करनेवाले तथा बुद्धिमान् महादेव शम्भुके दक्षिण* अंगसे उत्पन्न केशव (विष्णु)-की आराधना करके इस श्रेष्ठ स्थानको प्राप्त कर सकोगे। हे महाप्राज्ञ! तुम सभी पापोंका नाश करनेवाले, अभीष्ट प्रदान करनेवाले, परम शुद्ध, पवित्र, दोषरहित तथा श्रेष्ठ मन्त्रका नित्य जप करो। तुम इन्द्रियोंको वशमें करके प्रणवसहित नमोऽस्तु वासुदेवाय [अर्थात् ॐ नमोऽस्तु वासुदेवाय] इस दिव्य मन्त्रको जपो और सनातन विष्णुका ध्यान करते हुए जप-होममें संलग्न रहो॥ १७—२० १/२॥ |
| प्राङ्मुखो नियतो भूत्वा जजाप प्रीतमानसः।<br>शाकमूलफलाहारः संवत्सरमतन्द्रितः॥ २२<br><br>जजाप मन्त्रमनिशमजस्रं स पुनः पुनः।<br>वेताला राक्षसा घोराः सिंहाद्याश्च महामृगाः॥ २३<br><br>तमभ्ययुर्महात्मानं बुद्धिमोहाय भीषणाः।<br>जपन् स वासुदेवेति न किञ्चित्प्रत्यपद्यत॥ २४ | उनके ऐसा कहनेपर महान् यशवाले ध्रुवने उन विश्वामित्रको प्रणाम करके पूर्वकी ओर मुख करके ध्यानमग्न होकर प्रसन्नचित्त हो जप आरम्भ किया। शाक, मूल तथा फलका आहार करते हुए उसने आलस्यरहित होकर दिन-रात निरन्तर एक वर्षतक मन्त्रका बार-बार जप किया। वेताल, भयंकर राक्षस तथा भयानक सिंह आदि बड़े जानवर बुद्धिको मोहित करनेके लिये उस महात्माके पास आये, किंतु वासुदेवका जप करता हुआ वह तनिक |
* यहाँ मूलमें विष्णुको भगवान् शंकरके दक्षिणांग से उत्पन्न बताया गया है, किंतु इसी लिङ्गपुराणके ३८वें अध्यायमें भगवान् विष्णुने स्वयंको भगवान् शिवके वामांगसे और ब्रह्माजीको दक्षिणांगसे प्रादुर्भूत बताया है—'अहं वामाङ्गजो ब्रह्मन् शङ्करस्य महात्मनः। भवान् भवस्य देवस्य दक्षिणाङ्गभवः स्वयंम् ॥' अतः यहाँ दक्षिणांगसे 'वामांग' अर्थ लेना चाहिये।
| २५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| भी विचलित नहीं हुआ॥ २१—२४॥ | |
| सुनीतिरस्य या माता तस्या रूपेण संवृता।<br>पिशाची समनुप्राप्ता रुरोद भृशदुःखिता॥ २५<br><br>मम त्वमेकः पुत्रोऽसि किमर्थं क्लिश्यते भवान्।<br>मामनाथामपहाय तप आस्थितवानसि॥ २६<br><br>एवमादीनि वाक्यानि भाषमाणां महातपाः।<br>अनिरीक्ष्यैव हृष्टात्मा हरेर्नाम जजाप सः॥ २७ | इसकी माता जो सुनीति थी, उसका रूप धारण करके एक पिशाची उसके पास आयी और अत्यन्त दुःखित होकर रोने लगी—तुम मेरे एकमात्र पुत्र हो, तुम कष्ट क्यों सह रहे हो, मुझे अनाथ छोड़कर तुम तपमें लग गये हो—इस प्रकारके वचन बोलती हुई उस स्त्रीकी ओर बिलकुल न देखकर वह महातपस्वी प्रसन्नचित्त होकर हरिका नाम जपता रहा॥ २५—२७॥ |
| ततः प्रशेमुः सर्वत्र विघ्नरूपाणि तत्र वै।<br>ततो गरुडमारुह्य कालमेघसमद्युतिः॥ २८<br><br>सर्वदेवैः परिवृतः स्तूयमानो महर्षिभिः।<br>आययौ भगवान् विष्णुः ध्रुवान्तिकमरातिहा॥ २९ | तदनन्तर वहाँ सर्वत्र विघ्नोंके स्वरूप शान्त हो गये। तब गरुड़पर सवार होकर कालमेघके समान (श्याम) कान्तिवाले, समस्त देवताओंसे घिरे हुए तथा महर्षियोंके द्वारा स्तुति किये जाते हुए शत्रुसंहारक भगवान् विष्णु ध्रुवके पास आये॥ २८—२९॥ |
| समागतं विलोक्याथ कोसावित्येव चिन्तयन्।<br>पिबन्निव हृषीकेशं नयनाभ्यां जगत्पतिम्॥ ३०<br><br>जपन् स वासुदेवेति ध्रुवस्तस्थौ महाद्युतिः।<br>शङ्खप्रान्तेन गोविन्दः पस्पर्शास्यं हि तस्य वै॥ ३१ | उनको आया हुआ देखकर यह कौन है—ऐसा सोचता हुआ तथा अपने नेत्रोंसे जगत्पति हृषीकेशका पान करता हुआ-सा वह महान् प्रभाववाला ध्रुव 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'—इस मन्त्रका जप करता रहा। तब गोविन्दने [अपने] शंखके अग्रभागसे उसके मुखका स्पर्श किया॥ ३०—३१॥ |
| ततः स परमं ज्ञानमवाप्य पुरुषोत्तमम्।<br>तुष्टाव प्राञ्जलिर्भूत्वा सर्वलोकेश्वरं हरिम्॥ ३२<br><br>प्रसीद देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर।<br>लोकात्मन् वेदगुह्यात्मन् त्वां प्रपन्नोऽस्मि केशव॥ ३३<br><br>न विदुस्त्वां महात्मानं सनकाद्या महर्षयः।<br>तत्कथं त्वामहं विद्यां नमस्ते भुवनेश्वर॥ ३४ | उसके बाद वह [ध्रुव] परम ज्ञान प्राप्त करके हाथ जोड़कर सभी लोकोंके स्वामी पुरुषोत्तम हरिकी [इस प्रकार] स्तुति करने लगा—हे देवदेवेश! हे शंख, चक्र, गदा धारण करनेवाले! हे लोकात्मन्! हे वेदगुह्यात्मन् (वेदोंके द्वारा अज्ञातस्वरूपवाले)! प्रसन्न होइये। हे केशव! मैं आपकी शरणमें आया हूँ। सनक आदि महर्षि भी आप महात्माको नहीं जान सके, तब मैं आपको कैसे जान सकता हूँ। हे भुवनेश्वर! आपको नमस्कार है॥ ३२—३४॥ |
| तमाह प्रहसन् विष्णुरेहि वत्स ध्रुवो भवान्।<br>स्थानं ध्रुवं समासाद्य ज्योतिषामग्रभुग्भव॥ ३५<br><br>मात्रा त्वं सहितस्तत्र ज्योतिषां स्थानमाप्नुहि।<br>मत्स्थानमेतत्परमं ध्रुवं नित्यं सुशोभनम्॥ ३६<br><br>तपसाराध्य देवेशं पुरा लब्धं हि शङ्करात्।<br>वासुदेवेति यो नित्यं प्रणवेन समन्वितम्॥ ३७ | तत्पश्चात् भगवान् विष्णुने उससे हँसते हुए कहा—हे वत्स! आओ, तुम ध्रुव हो, तुम ध्रुव (अटल) स्थान प्राप्त करके ज्योतिर्गणोंमें अग्रणी हो जाओ। तुम अपनी मातासहित वहाँ ग्रहोंमें स्थान प्राप्त करो, यह मेरा स्थान है, जो उत्कृष्ट, अचल, शाश्वत तथा अत्यन्त सुन्दर है। पूर्वकालमें मैंने तपस्याके द्वारा देवेशकी आराधना करके शंकरसे इसे (मन्त्रको) प्राप्त |
६३- दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंश-वर्णन
अध्याय ६३] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव…ऋषिवंशवर्णन २५९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नमस्कारसमायुक्तं भगवच्छब्दसंयुक्तम्।<br>जपेदेवं हि यो विद्वान् ध्रुवं स्थानं प्रपद्यते॥ ३८<br><br>ततो देवाः सगन्धर्वाः सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>मात्रा सह ध्रुवं सर्वे तस्मिन् स्थाने न्यवेशयन्॥ ३९<br><br>विष्णोराज्ञां पुरस्कृत्य ज्योतिषां स्थानमाप्तवान्।<br>एवं ध्रुवो महातेजा द्वादशाक्षरविद्यया॥ ४०<br><br>अवाप महतीं सिद्धिमेतत्ते कथितं मया॥ ४१ | किया था। प्रणव (ॐ) तथा नमःसे युक्त और भगवत्—इस शब्दसे संयुक्त वासुदेव मन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-को जो विद्वान् जपता है, वह ध्रुवस्थान प्राप्त करता है॥ ३५-३८॥<br>तदनन्तर सभी देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों तथा महर्षियोंने मातासहित ध्रुवको उस स्थानपर स्थापित किया। इस प्रकार महातेजस्वी ध्रुवने विष्णुकी आज्ञा स्वीकार करके द्वादशाक्षरमन्त्र (ॐ नमो भगवते वासुदेवाय)-के द्वारा ज्योतिर्गणोंमें स्थान प्राप्त किया तथा महती सिद्धि प्राप्त की। मैंने यह [वृत्तान्त] आपलोगोंसे कह दिया॥ ३९-४१॥ |
| सूत उवाच<br>तस्माद्यो वासुदेवाय प्रणामं कुरुते नरः।<br>स याति ध्रुवसालोक्यं ध्रुवत्वं तस्य तत्तथा॥ ४२ | **सूतजी बोले—**अतः जो मनुष्य वासुदेवको प्रणाम करता है, वह ध्रुवलोकको जाता है और उसे भी वह ध्रुवत्व प्राप्त हो जाता है॥ ४२॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशे ध्रुवसंस्थानवर्णनं नाम द्विषष्टितमोऽध्यायः॥ ६२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशमें ध्रुवसंस्थानवर्णन' नामक बासठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६२॥
तिरसठवाँ अध्याय
दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव, दक्षकन्याओंकी वंश-परम्परा तथा ऋषिवंशवर्णन
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्।<br>उत्पत्तिं ब्रूहि सूताद्य यथाक्रममनुत्तमम्॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! अब आप देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, उरगों और राक्षसोंकी उत्पत्तिका उत्तम विधिसे यथाक्रम वर्णन कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>सङ्कल्पाद्दर्शनात्स्पर्शात्पूर्वेषां सृष्टिरुच्यते।<br>दक्षात्प्राचेतसादूर्ध्वं सृष्टिर्मैथुनसम्भवा॥ २<br>यदा तु सृजतस्तस्य देवर्षिगणपन्नगान्।<br>न वृद्धिमगमल्लोकस्तदा मैथुनयोगतः॥ ३<br>दक्षः पुत्रसहस्राणि पञ्च सूत्यामजीजनत्।<br>तांस्तु दृष्ट्वा महाभागान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः॥ ४ | **सूतजी बोले—**पूर्व पुरुषोंकी सृष्टि संकल्पसे, दर्शनसे तथा स्पर्शसे कही जाती है। प्रचेतसके पुत्र दक्षके बाद [स्त्री-पुरुषके] संयोगसे सृष्टि प्रारम्भ हुई। जब देवताओं, ऋषियों और पन्नगोंका सृजन करते हुए उन प्रजापतिसे लोक वृद्धिको प्राप्त नहीं हुआ, तब दक्षने मैथुनयोगसे [अपनी भार्या] सूतिसे पाँच हजार पुत्र उत्पन्न किये। तत्पश्चात् उन महाभाग्यवालोंको देखकर वे अनेक प्रकारकी प्रजाओंकी सृष्टिके इच्छुक हो गये॥ २-४॥ |
| नारदः प्राह हर्यश्वान् दक्षपुत्रान् समागतान्।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वोर्ध्वमध एव च॥ ५ | तब नारदजीने उत्पन्न हुए [उन] हर्यश्व नामवाले दक्ष-पुत्रोंसे कहा—ऊपर तथा नीचे पृथ्वीका प्रमाण |
| २६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ततः सृष्टिं विशेषेण कुरुध्वं मुनिसत्तमाः।<br>ते तु तद्वचनं श्रुत्वा प्रयाताः सर्वतोदिशम्॥ ६ | जानकर आपलोग विशेष रूपसे सृष्टि कीजिये। हे मुनिश्रेष्ठो! उनका वचन सुनकर वे सभी दिशाओंमें चले गये। वे आजतक नहीं लौटे, जैसे नदियाँ [समुद्रमें मिलकर] समुद्रसे वापस नहीं लौटतीं॥ ५-६^{१}/_{२}॥ |
| अद्यापि न निवर्तन्ते समुद्रादिव सिन्धवः।<br>हर्यश्वेषु च नष्टेषु पुनर्दक्षः प्रजापतिः॥ ७<br>सूत्यामेव च पुत्राणां सहस्रमसृजत्प्रभुः।<br>शबला नाम ते विप्राः समेताः सृष्टिहेतवः॥ ८<br>नारदोऽनुगतान् प्राह पुनस्तान् सूर्यवर्चसः।<br>भुवः प्रमाणं सर्वं तु ज्ञात्वा भ्रातॄन् पुनः पुनः॥ ९<br>आगत्य वाथ सृष्टिं वै करिष्यथ विशेषतः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण जग्मुर्भ्रातृगतिं तथा॥ १० | हर्यश्वसंज्ञक पुत्रोंके नष्ट हो जानेपर प्रजापति प्रभु दक्षने सूतिसे पुनः एक हजार पुत्रोंको उत्पन्न किया। हे विप्रो! जब शबल नामवाले वे पुत्र सृष्टि करनेके लिये एकत्रित हुए, तब नारदने सूर्यके समान तेजवाले उन आये हुए पुत्रोंसे पुनः कहा—'पृथ्वीका सम्पूर्ण विस्तार जानकर तथा अपने भाइयोंका बार-बार पता लगाकर यहाँ आकरके आपलोग विशेषरूपसे सृष्टि कीजिये।' वे भी उसी मार्गसे [अपने] भाइयोंकी गतिको प्राप्त हुए॥ ७-१०॥ |
| ततस्तेष्वपि नष्टेषु षष्टिकन्याः प्रजापतिः।<br>वैरिण्यां जनयामास दक्षः प्राचेतसस्तदा॥ ११<br>प्रादात्स दशकं धर्मे कश्यपाय त्रयोदश।<br>विंशत्सप्त च सोमाय चतस्रोऽरिष्टनेमये॥ १२<br>द्वे चैव भृगुपुत्राय द्वे कृशाश्वाय धीमते।<br>द्वे चैवाङ्गिरसे तद्गत्तासां नामानि विस्तरात्॥ १३<br>शृणुध्वं देवमातॄणां प्रजाविस्तारमादितः। | तदनन्तर उनके भी नष्ट हो जानेपर प्रचेतसके पुत्र प्रजापति दक्षने वैरिणी [नामक भार्या]-से साठ कन्याएँ उत्पन्न कीं। उन्होंने दस [कन्याएँ] धर्मको, तेरह [कन्याएँ] कश्यपको, सत्ताईस [कन्याएँ] चन्द्रमाको, चार [कन्याएँ] अरिष्टनेमिको, दो [कन्याएँ] भृगु-पुत्रको, दो [कन्याएँ] बुद्धिमान् कृशाश्वको और दो [कन्याएँ] आंगिरसको प्रदान कीं। [हे विप्रो!] अब उन देवमाताओंके नाम तथा उनकी सन्तानोंके विस्तारको आरम्भसे सुनिये॥ ११-१३^{१}/_{२}॥ |
| मरुत्वती वसूय्यामिर्लम्बा भानुरुरुन्धती॥ १४<br>सङ्कल्पा च मुहूर्ता च साध्या विश्वा च भामिनी।<br>धर्मपत्न्यः समाख्यातास्तासां पुत्रान् वदामि वः॥ १५<br>विश्वेदेवास्तु विश्वायाः साध्या साध्यान्अजीजनत्।<br>मरुत्वत्यां मरुत्वन्तो वसोस्तु वसवस्तथा॥ १६<br>भानोस्तु भानवः प्रोक्ता मुहूर्ताया मुहूर्तकाः।<br>लम्बाया घोषणानामानो नागवीथीस्तु यामिजः॥ १७<br>सङ्कल्पायास्तु सङ्कल्पो वसुसर्गं वदामि वः। | मरुत्वती, वसु, यामि, लम्बा, भानु, अरुन्धती, संकल्पा, मुहूर्ता, साध्या और परम सुन्दरी विश्वा धर्मकी पत्नियाँ कही गयी हैं। [हे ऋषियो!] अब मैं उनके पुत्रोंको बताता हूँ—विश्वासे विश्वेदेव हुए। साध्याने साध्योंको जन्म दिया। मरुत्वतीसे मरुत्वान् हुए और वसुसे सभी वसु उत्पन्न हुए। भानुसे भानुगण तथा मुहूर्तासे मुहूर्तगण [उत्पन्न] बताये गये हैं। लम्बासे घोषनामवाले पुत्र हुए। यामिसे नागवीथि उत्पन्न हुआ। संकल्पासे संकल्प [नामक पुत्र] हुआ। अब मैं आपलोगोंको वसुओंकी सृष्टि बताता हूँ॥ १४-१७^{१}/_{२}॥ |
| ज्योतिष्मन्तस्तु ये देवा व्यापकाः सर्वतोदिशम्॥ १८ | जो देवता ज्योतिष्मान् तथा सभी दिशाओंमें |
अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन २६१
| संस्कृत (मूल श्लोक) | हिन्दी अनुवाद |
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| वसवस्ते समाख्याताः सर्वभूतहितैषिणः।<br>आपो ध्रुवश्च सोमश्च धरश्चैवानिलोऽनलः॥ १९<br>प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।<br>अजैकपादहिर्बुध्न्यो विरूपाक्षः सभैरवः॥ २०<br>हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः।<br>सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥ २१<br>एते रुद्राः समाख्याता एकादश गणेश्वराः। | व्यापक हैं, वे वसु कहे गये हैं; वे सभी प्राणियोंके हितैषी हैं। आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्यूष तथा प्रभास—ये आठ वसु कहे गये हैं। अजैकपाद्, अहिर्बुध्न्य, विरूपाक्ष, भैरव, हर, बहुरूप, सुरेश्वर त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी तथा अपराजित—ये गणेश्वर ग्यारह रुद्र कहे गये हैं॥ १८–२१ १/२॥ |
| कश्यपस्य प्रवक्ष्यामि पत्नीभ्यः पुत्रपौत्रकम्॥ २२<br>अदितिश्च दितिश्चैव अरिष्टा सुरसा मुनिः।<br>सुरभिर्विनता ताम्रा तद्वत् क्रोधवशा इला॥ २३<br>कद्रूस्त्विषा दनुस्तद्वत्तासां पुत्रान् वदामि वः।<br>तुषिता नाम ये देवाश्चाक्षुषस्यान्तरे मनोः॥ २४<br>वैवस्वतान्तरे ते वै आदित्या द्वादश स्मृताः।<br>इन्द्रो धाता भगस्त्वष्टा मित्रोऽथ वरुणोऽर्यमा॥ २५<br>विवस्वान् सविता पूषा अंशुमान् विष्णुरेव च।<br>एते सहस्रकिरणा आदित्या द्वादश स्मृताः॥ २६ | [हे ऋषियो!] अब मैं कश्यपकी पत्नियोंसे उत्पन्न पुत्रों तथा पौत्रोंको बताऊँगा। अदिति, दिति, अरिष्टा, सुरसा, मुनि, सुरभि, विनता, ताम्रा, क्रोधवशा, इला, कद्रू, त्विषा एवं दनु—ये कश्यपकी पत्नियाँ थीं। अब मैं आपलोगोंको उनके पुत्रोंको बताता हूँ। चाक्षुष मन्वन्तरमें जो तुषित नामवाले देवता थे, वे वैवस्वत मन्वन्तरमें बारह आदित्य कहे गये हैं। इन्द्र, धाता, भग, त्वष्टा, मित्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, सविता, पूषा, अंशुमान् तथा विष्णु—ये हजार किरणोंवाले बारह आदित्य कहे गये हैं॥ २२–२६॥ |
| दितिः पुत्रद्वयं लेभे कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>हिरण्यकशिपुं चैव हिरण्याक्षं तथैव च॥ २७<br>दनुः पुत्रशतं लेभे कश्यपाद् बलदर्पितम्।<br>विप्रचित्तिः प्रधानोऽभूत्तेषां मध्ये द्विजोत्तमाः॥ २८<br>ताम्रा च जनयामास षट् कन्या द्विजपुङ्गवाः।<br>शुकीं श्येनीं च भासीं च सुग्रीवीं गृध्रिकां शुचिम्॥ २९<br>शुकी शुकानुलूकांश्च जनयामास धर्मतः।<br>श्येनी श्येनांस्तथा भासी कुरङ्गांश्च व्यजीजनत्॥ ३०<br>गृध्री गृध्रान् कपोतांश्च पारावतविहङ्गमान्।<br>हंससारसकारण्डप्लवांश्छुचिरजीजनत् ॥ ३१<br>अजाश्वमेषोष्ट्रखरान् सुग्रीवी चाप्यजीजनत्। | दितिने कश्यपसे हिरण्यकशिपु तथा हिरण्याक्ष—इन दो पुत्रोंको प्राप्त किया था, ऐसा हमने सुना है। दनुने कश्यपसे बलके अभिमानवाले सौ पुत्र प्राप्त किये। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें विप्रचित्ति प्रधान था। हे श्रेष्ठ द्विजो! ताम्राने शुकी, श्येनी, भासी, सुग्रीवी, गृध्रिका तथा शुचि—इन छः कन्याओंको जन्म दिया। शुकीने धर्मसे शुकों तथा उलूकोंको उत्पन्न किया। श्येनीने श्येनों (बाज) तथा भासीने कुरंगोंको जन्म दिया। गृध्रीने गीधोंको, कपोतों तथा पारावत पक्षियोंको जन्म दिया। शुचिने हंस, सारस तथा कारण्ड पक्षियोंको जन्म दिया। सुग्रीवीने अजों, अश्वों, मेषों, ऊँटों तथा गर्दभोंको जन्म दिया॥ २७–३१ १/२॥ |
| विनता जनयामास गरुडं चारुणं शुभा॥ ३२<br>सौदामिनीं तथा कन्यां सर्वलोकभयङ्करीम्।<br>सुरसायाः सहस्रं तु सर्पाणामभवत्पुरा॥ ३३<br>कद्रूः सहस्रशिरसां सहस्रं प्राप सुव्रता।<br>प्रधानास्तेषु विख्याताः षड्विंशतिरुत्तमाः॥ ३४<br>शेषवासुकिकर्कोटशङ्खैरावतकम्बलाः। ।<br>धनञ्जयमहानीलपद्माश्वतरतक्षकाः ॥ ३५<br>एलापत्रमहापद्मधृतराष्ट्रबलाहकाः। ।<br>शङ्खपालमहाशङ्खपुष्पदंष्ट्रशुभाननाः ॥ ३६ | शुभ विनताने गरुड़ तथा अरुणको और सभी लोकोंको भय प्रदान करनेवाली सौदामिनी [नामक] कन्याको उत्पन्न किया। सुरसासे हजारों सर्प उत्पन्न हुए। उत्तम व्रतवाली कद्रूने हजार सिरवाले एक हजार सर्प उत्पन्न किये। उनमें छब्बीस [सर्प] उत्तम तथा प्रधान कहे गये हैं; वे शेष, वासुकि, कर्कोट, शंख, ऐरावत, कम्बल, धनंजय, महानील, पद्म, अश्वतर, तक्षक, एलापत्र, महापद्म, धृतराष्ट्र, बलाहक, शंखपाल, |
| २६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| शङ्खलोमा च नहुषो वामनः फणितस्तथा।<br>कपिलो दुर्मुखश्चापि पतञ्जलिरिति स्मृतः॥ ३७ | महाशंख, पुष्पदंष्ट्र, शुभानन, शंखलोमा, नहुष, वामन, फणित, कपिल, दुर्मुख तथा पतंजलि [नामवाले] कहे गये हैं॥ ३२-३७॥ |
| रक्षोगणं क्रोधवशा महामायं व्यजीजनत्।<br>रुद्राणां च गणं तद्वद् गोमहिष्यौ वराङ्गना॥ ३८<br>सुरभिर्जनयामास कश्यपादिति नः श्रुतम्।<br>मुनिर्मुनीनां च गणं गणमप्सरसां तथा॥ ३९<br>तथा किन्नरगन्धर्वानरिष्टाजनयद् बहून्।<br>तृणवृक्षलतागुल्ममिला सर्वमजीजनत्॥ ४०<br>त्विषा तु यक्षरक्षांसि जनयामास कोटिशः।<br>एते तु काश्यपेयाश्च सङ्क्षेपात्परिकीर्तिताः॥ ४१ | क्रोधवशाने महामायावी राक्षसों तथा रुद्रगणोंको जन्म दिया और सुन्दर स्त्री सुरभिने कश्यपसे गायों तथा भैंसोंको जन्म दिया; ऐसा हमने सुना है। मुनि [नामक कश्यपभार्या]-ने मुनियों एवं अप्सराओंको और अरिष्टाने बहुत-से किन्नरों तथा गन्धर्वोंको जन्म दिया। इलाने समस्त तृणों, वृक्षों, लताओं तथा गुल्मोंको जन्म दिया। त्विषाने करोड़ों यक्षों और राक्षसोंको पैदा किया। मैंने कश्यपकी इन सन्तानोंका संक्षेपमें वर्णन कर दिया। इन सबके बहुत-से पुत्र-पौत्र आदि वंश कहे गये हैं॥ ३८-४१ १/२॥ |
| एतेषां पुत्रपौत्रादिवंशाश्च बहवः स्मृताः।<br>एवं प्रजासु सृष्टासु कश्यपेन महात्मना॥ ४२<br>प्रतिष्ठितासु सर्वासु चरासु स्थावरासु च।<br>अभिषिच्याधिपत्येषु तेषां मुख्यान् प्रजापतिः॥ ४३<br>ततो मनुष्याधिपतिं चक्रे वैवस्वतं मनुम्।<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वं ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः॥ ४४<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता।<br>यथोपदेशमद्यापि धर्मेण प्रतिपाल्यते॥ ४५<br>स्वायम्भुवेऽन्तरे पूर्वे ब्रह्मणा येऽभिषेचिताः।<br>ते होते चाभिषिच्यन्ते मनवश्च भवन्ति ते॥ ४६<br>मन्वन्तरेष्वतीतेषु गता होतेषु पार्थिवाः।<br>एवमन्येऽभिषिच्यन्ते प्राप्ते मन्वन्तर ततः॥ ४७<br>अतीतानागताः सर्वे नृपा मन्वन्तरे स्मृताः। | इस प्रकार महात्मा कश्यपके द्वारा प्रजाओंकी सृष्टि कर लिये जानेपर तथा उन सभी चर-अचर प्रजाओंके प्रतिष्ठित हो जानेपर प्रजापतिने उनमेंसे मुख्योंको अधिपतिके पदपर अभिषिक्त करके वैवस्वत मनुको मनुष्योंका अधिपति बनाया। स्वायम्भुव मन्वन्तरमें पहले ब्रह्माने जिन्हें अभिषिक्त किया था, उन्हींके द्वारा पर्वतोंसहित सात द्वीपोंवाली सम्पूर्ण पृथ्वी आज भी आदेशके अनुसार धर्मपूर्वक पालित की जा रही है। ब्रह्माने पूर्व स्वायम्भुव मन्वन्तरमें जिनका अभिषेक किया था, वे ही यहाँ अभिषिक्त किये जाते हैं और मनु होते हैं। इन मन्वन्तरोंके बीत जानेपर राजा भी चले जाते हैं; इस प्रकार इनके बाद मन्वन्तर आनेपर अन्य [राजा] अभिषिक्त किये जाते हैं। अतीत तथा अनागत सभी राजा मन्वन्तरमें कहे गये हैं॥ ४२-४७ १/२॥ |
| एतानुत्पाद्य पुत्रांस्तु प्रजासन्तानकारणात्॥ ४८<br>कश्यपो गोत्रकामस्तु चचार स पुनस्तपः।<br>पुत्रो गोत्रकरो मह्यं भवतादिति चिन्तयन्॥ ४९<br>तस्यैवं ध्यायमानस्य कश्यपस्य महात्मनः।<br>ब्रह्मयोगात्सुतौ पश्चात्प्रादुर्भूतौ महौजसौ॥ ५०<br>वत्सरश्चासितश्चैव तावुभौ ब्रह्मवादिनौ।<br>वत्सरान्नैध्रुवो जज्ञे रैभ्यश्च सुमहायशाः॥ ५१ | प्रजा-संतानके कारण इन पुत्रोंको उत्पन्न करके अपने वंशकी कामना रखनेवाले उन कश्यपने 'वंशको बढ़ानेवाला पुत्र मुझे उत्पन्न हो'—ऐसा सोचते हुए पुनः तप करना आरम्भ किया। इस प्रकार ध्यान करते हुए उन महात्मा कश्यपके ब्रह्मयोगसे पुनः महान् ओजस्वी दो पुत्र उत्पन्न हुए। वत्सर तथा असित [नामवाले] वे दोनों ब्रह्मवादी थे। वत्सरसे महान् यशवाले नैध्रुव तथा रैभ्य उत्पन्न हुए। रैभ्यके पुत्रोंको |
| अध्याय ६३ ] | दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन | २६३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| रैभ्यस्य रैभ्या विज्ञेया नैध्रुवस्य वदामि वः।<br>च्यवनस्य तु कन्यायां सुमेधाः समजायत ॥ ५२<br>नैध्रुवस्य तु सा पत्नी माता वै कुण्डपायिनाम्।<br>असितस्यैकपर्णायां ब्रह्मिष्ठः समजायत ॥ ५३<br>शाण्डिल्यानां वरः श्रीमान् देवलः सुमहातपाः।<br>शाण्डिल्या नैध्रुवा रैभ्यास्त्रयः पक्षास्तु काश्यपाः ॥ ५४ | भी रैभ्य [नामवाला] जानना चाहिये। [हे ऋषियो!] अब मैं नैध्रुवके पुत्रोंके विषयमें बताता हूँ। च्यवनकी कन्यासे सुमेधा उत्पन्न हुई। वह नैध्रुवकी पत्नी तथा कुण्डपायियोंकी माता थी। असितकी एकपर्णासे शाण्डिल्योंमें श्रेष्ठ, ब्रह्मिष्ठ, श्रीमान् तथा महातपस्वी देवल उत्पन्न हुए। इस प्रकार शाण्डिल्य, नैध्रुव तथा रैभ्य—ये तीनों पक्ष काश्यप (कश्यपसे होनेवाले) हुए॥ ४८–५४॥ |
| नवप्रकृतयोऽदेवाः पुलस्त्यस्य वदामि वः।<br>चतुर्युगे ह्यतिक्रान्ते मनोरेकादशे प्रभोः ॥ ५५<br>अर्धावशिष्टे तस्मिंस्तु द्वापरे सम्प्रवर्तिते।<br>मानवस्य नरिष्यन्तः पुत्र आसीद्दमः किल ॥ ५६<br>दमस्य तस्य दायादस्तृणबिन्दुरिति स्मृतः।<br>त्रेतायुगमुखे राजा तृतीये सम्बभूव ह ॥ ५७<br>तस्य कन्या त्विलविला रूपेणाप्रतिमाभवत्।<br>पुलस्त्याय स राजर्षिस्तां कन्यां प्रत्यपादयत् ॥ ५८<br>ऋषीरैरविलो यस्यां विश्रवाः समजायत।<br>तस्य पत्न्यश्चतस्रस्तु पौलस्त्यकुलवर्धनाः ॥ ५९<br>बृहस्पतेः शुभा कन्या नाम्ना वै देववर्णिनी।<br>पुष्पोत्कटा बलाका च सुते माल्यवतः स्मृते ॥ ६० | अब मैं पुलस्त्यके नौ राक्षसवंशजोंका वर्णन करता हूँ—प्रभु मनुके ग्यारहवें चतुर्युगके अतिक्रान्त होनेपर उसका आधा अवशिष्ट रह जानेपर जब द्वापरका आरम्भ हुआ, तब मनुकी पीढ़ीमें नरिष्यन्तका दम नामक पुत्र हुआ। उस दमका उत्तराधिकारी तृणबिन्दु कहा गया है; वह त्रेतायुगके तीन-चौथाई भागमें राजा हुआ। उसकी कन्या इलविला रूपमें अप्रतिम थी। उस राजर्षिने वह कन्या पुलस्त्यको दे दी। उस इलविलासे ऋषि विश्रवा उत्पन्न हुए। पौलस्त्यकुलकी वृद्धि करनेवाली उनकी चार पत्नियाँ थीं। पहली देववर्णिनी नामवाली थी, जो बृहस्पतिकी सुन्दर कन्या थी। [अन्य दो] पुष्पोत्कटा तथा बलाका माल्यवान्की पुत्रियाँ कही गयी हैं। कैकसी मालीकी कन्या थी। [हे ऋषियो!] अब उनकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ५५–६० १/२ ॥ |
| कैकसी मालिनः कन्या तासां वै शृणुत प्रजाः।<br>ज्येष्ठं वैश्रवणं तस्मात्सुषुवे देववर्णिनी ॥ ६१<br>कैकसी चाप्यजनयद्रावणं राक्षसाधिपम्।<br>कुम्भकर्णं शूर्पणखां धीमन्तं च विभीषणम् ॥ ६२<br>पुष्पोत्कटा ह्यजनयत्पुत्रांस्तस्माद् द्विजोत्तमाः।<br>महोदरं प्रहस्तं च महापाश्र्वं खरं तथा ॥ ६३<br>कुम्भीनसीं तथा कन्यां बलायाः शृणुत प्रजाः।<br>त्रिशिरा दूषणश्चैव विद्युज्जिह्वश्च राक्षसः ॥ ६४<br>कन्या वै मालिका चापि बलायाः प्रसवः स्मृतः।<br>इत्येते क्रूरकर्माणः पौलस्त्या राक्षसा नव ॥ ६५<br>विभीषणोऽतिशुद्धात्मा धर्मज्ञः परिकीर्तितः।<br>पुलस्त्यस्य मृगाः पुत्राः सर्वे व्याघ्राश्च दंष्ट्रिणः ॥ ६६ | देववर्णिनीने उन [विश्रवा]-से ज्येष्ठ [पुत्र] वैश्रवणको उत्पन्न किया। कैकसीने राक्षसोंके राजा रावण, कुम्भकर्ण, शूर्पणखा तथा बुद्धिमान् विभीषणको जन्म दिया। हे द्विजश्रेष्ठो! पुष्पोत्कटाने उन [विश्रवा]-से महोदर, प्रहस्त, महापाश्र्व तथा खर [नामक] पुत्रोंको तथा कुम्भीनसी [नामक] कन्याको जन्म दिया। अब बलाकी सन्तानोंको सुनिये। त्रिशिरा, दूषण तथा विद्युज्जिह्व राक्षस और मालिका [नामक] कन्या—ये सब बलासे उत्पन्न कहे गये हैं। पुलस्त्यके ये नौ पौत्र क्रूर कर्मवाले राक्षस थे। विभीषण अत्यन्त शुद्ध आत्मावाले तथा धर्मज्ञ कहे गये हैं। मृग, व्याघ्र आदि दाढ़ोंवाले सभी पशु, भूत, पिशाच, सर्प, सूकर, हाथी, |
| २६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भूताः पिशाचाः सर्पांश्च सूकरा हस्तिनस्तथा।<br>वानराः किन्नराश्चैव ये च किम्पुरुषास्तथा॥ ६७ | वानर, किन्नर तथा किम्पुरुष—ये सब पुलस्त्यके पुत्र हुए॥ ६१–६७॥ |
| अनपत्यः क्रतुस्तस्मिन् स्मृतो वैवस्वतेऽन्तरे।<br>अत्रेः पत्न्यो दशैवासन् सुन्दर्यश्च पतिव्रताः॥ ६८<br>भद्राश्वस्य घृताच्यां वै दशाप्सरसि सूनवः।<br>भद्राभद्रा च जलदा मन्दा नन्दा तथैव च॥ ६९<br>बलाबला च विप्रेन्द्रा या च गोपाबला स्मृता।<br>तथा तामरसा चैव वरक्रीडा च वै दश॥ ७०<br>आत्रेयवंशप्रभवास्तासां भर्ता प्रभाकरः।<br>स्वर्भानुपिहिते सूर्ये पतितेऽस्मिन् दिवो महीम्॥ ७१<br>तमोऽभिभूते लोकेऽस्मिन् प्रभा येन प्रवर्तिता।<br>स्वस्त्यस्तु हि तवेत्युक्ते पतन्निह दिवाकरः॥ ७२<br>ब्रह्मर्षेर्वचनात्तस्य पपात न विभुर्दिवः।<br>ततः प्रभाकरेत्युक्तः प्रभुरत्रिर्महर्षिभिः॥ ७३ | उस वैवस्वत मन्वन्तरमें क्रतु निःसन्तान कहा गया है। अत्रीकी दस सुन्दर तथा पतिव्रता भार्याएँ थीं। घृताची अप्सरासे भद्राश्वकी दस पुत्रियाँ हुईं। हे विप्रेन्द्रो! वे भद्रा, अभद्रा, जलदा, मन्दा, नन्दा, बला, अबला, गोपाबला, तामरसा तथा वरक्रीड़ा—ये दस कही गयी हैं। ये सब आत्रेयवंशमें उत्पन्न हुईं; इनके पति प्रभाकर थे। जब राहुने सूर्यको ढक लिया और यह सूर्य स्वर्गसे पृथ्वीपर गिरने लगा; तब इस लोकके अन्धकारसे व्याप्त हो जानेपर अत्रि ऋषिने प्रभा फैलायी थी। 'तुम्हारा कल्याण हो' उनके ऐसा कहनेपर महर्षिके वचनसे उस समय गिरता हुआ विभु सूर्य स्वर्गलोकसे [पृथ्वीपर] नहीं गिरा। तब महर्षियोंने प्रभु अत्रिको 'प्रभाकर'—ऐसा कहा॥ ६८–७३॥ |
| भद्रायां जनयामास सोमं पुत्रं यशस्विनम्।<br>स तासु जनयामास पुनः पुत्रांस्तपोधनः॥ ७४<br>स्वस्त्यात्रेया इति ख्याता ऋषयो वेदपारगाः।<br>तेषां द्वौ ख्यातयशसौ ब्रह्मिष्ठौ च महौजसौ॥ ७५<br>दत्तो ह्यत्रिवरो ज्येष्ठो दुर्वासास्तस्य चानुजः।<br>यवीयसी स्वसा तेषाममला ब्रह्मवादिनी॥ ७६<br>तस्य गोत्रद्वये जाताश्चत्वारः प्रथिता भुवि।<br>श्यावश्च प्रत्वसश्चैव ववल्गुश्चाथ गह्नरः॥ ७७<br>आत्रेयाणां च चत्वारः स्मृताः पक्षा महात्मनाम्।<br>काश्यपो नारदश्चैव पर्वतोऽनुद्धतस्तथा॥ ७८<br>जज्ञिरे मानसा होते अरुन्धत्या निबोधत। | उन्होंने भद्रासे यशस्वी पुत्र 'सोम' को उत्पन्न किया। उन तपोधन [ऋषि]-ने उन पत्नियोंसे पुनः अन्य पुत्र भी उत्पन्न किये। वे सब स्वस्त्यात्रेय कहलाये और वेदोंके पारंगत ऋषि हुए। उनमें दो प्रसिद्ध यशवाले, ब्रह्मिष्ठ तथा महान् ओजस्वी हुए; दत्त अत्रिके ज्येष्ठ पुत्र थे और दुर्वासा उनके छोटे भाई थे। उनकी छोटी बहन अमला थी; वह ब्रह्मवादिनी थी। उनके दो गोत्रोंमें श्याव, प्रत्वस, ववल्गु तथा गह्नर—ये चार उत्पन्न हुए, जो भूलोकमें प्रसिद्ध हैं। महान् आत्मावाले आत्रेयोंके चार पक्ष कहे गये हैं—काश्यप, नारद, पर्वत और अनुद्धत। ये मानस पुत्रके रूपमें उत्पन्न हुए हैं। अब अरुन्धतीकी सन्तानोंके विषयमें सुनिये॥ ७४–७८ १/२॥ |
| नारदस्तु वसिष्ठायारुन्धतीं प्रत्यपादयत्॥ ७९<br>ऊर्ध्वरेता महातेजा दक्षशापात्तु नारदः।<br>पुरा देवासुरे युद्धे घोरे वै तारकामये॥ ८०<br>अनावृष्ट्या हते लोके ह्युग्रे लोकेश्वरैः सह।<br>वसिष्ठस्तपसा धीमान् धारयामास वै प्रजाः॥ ८१ | नारदजीने वसिष्ठके लिये अरुन्धतीको प्रदान किया। महातेजस्वी नारद दक्षके शापसे ब्रह्मचारी हो गये। पूर्वकालमें तारकासुरके कारण भयानक देवासुर-संग्राममें अनावृष्टिसे हत लोकके उग्र हो जानेपर बुद्धिमान् वसिष्ठजीने [अपनी] तपस्यासे अन्न, जल, मूल, फल तथा औषधियाँ उत्पन्न करते हुए लोकेश्वरोंके साथ प्राणियोंकी रक्षा की थी और दयापूर्वक उन्होंने औषधिसे उन सबको जीवित किया था। |
अध्याय ६३ ] दक्षप्रजापतिद्वारा मैथुनी सृष्टिका प्रादुर्भाव...ऋषिवंशवर्णन [ २६५
| अन्नोदकं मूलफलं ओषधीश्च प्रवर्तयन् ।<br>तानेताञ्जीवयामास कारुण्यादौषधेन च ॥ ८२<br>अरुन्धत्यां वसिष्ठस्तु सुतानुत्पादयाच्छतम् ।<br>ज्यायसोऽजनयच्छक्तेरदृश्यन्ती पराशरम् ॥ ८३ | वसिष्ठने अरून्धतीसे सौ पुत्र उत्पन्न किये। उनमें ज्येष्ठ पुत्र शक्तिसे अदृश्यन्तीने पराशरको जन्म दिया था॥ ७९-८३॥ |
| रक्षसा भक्षिते शक्तौ रुधिरेण तु वै तदा ।<br>काली पराशराज्जज्ञे कृष्णद्वैपायनं प्रभुम् ॥ ८४<br>द्वैपायनो ह्यरण्यां वै शुकमुत्पादयत्सुतम् ।<br>उपमन्युं च पीवर्यां विद्धीमे शुकसूनवः ॥ ८५<br>भूरिश्रवाः प्रभुः शम्भुः कृष्णो गौरस्तु पञ्चमः ।<br>कन्या कीर्तिमती चैव योगमाता धृतव्रता ॥ ८६<br>जननी ब्रह्मदत्तस्य पत्नी सा त्वनुहस्य च ।<br>श्वेतः कृष्णश्च गौरश्च श्यामो धूम्रस्तथारुणः ॥ ८७<br>नीलो बादरिकश्चैव सर्वे चैते पराशराः ।<br>पराशराणामष्टौ ते पक्षाः प्रोक्ता महात्मनाम् ॥ ८८ | राक्षस रुधिरके द्वारा शक्तिका भक्षण कर लिये जानेपर कालीने पराशरसे प्रभु कृष्णद्वैपायन (व्यासजी)-को जन्म दिया। तदनन्तर कृष्णद्वैपायनने अरणीसे शुक और उपमन्युको पुत्ररूपमें उत्पन्न किया और पीवरीसे उत्पन्न शुकदेवके इन पुत्रोंको जानिये— भूरिश्रवा, प्रभु, शम्भु, कृष्ण तथा पाँचवाँ गौर। उनकी कीर्तिमती [नामक] कन्या भी हुई, जो योगमाता तथा व्रत धारण करनेवाली थी। वह ब्रह्मदत्तकी माता एवं अनुहकी पत्नी थी। श्वेत, कृष्ण, गौर, श्याम, धूम्र, अरुण, नील तथा बादरिक—ये सब पराशरके वंशज थे। इस प्रकार महात्मा पराशरवंशजोंके वे आठ पक्ष कहे गये हैं॥ ८४-८८॥ |
| अत ऊर्ध्वं निबोधध्वमिन्द्रप्रमितिसम्भवम् ।<br>वसिष्ठस्य कपिञ्जल्यां घृताच्यामुदपद्यत ॥ ८९<br>त्रिमूर्तिर्यः समाख्यातः इन्द्रप्रमितिरुच्यते ।<br>पृथोः सुतायां सम्भूतो भद्रस्तस्याभवद्वसुः ॥ ९०<br>उपमन्युः सुतस्तस्य बहवो ह्यौपमन्यवः ।<br>मित्रावरुणयोश्चैव कौण्डिन्या ये परिश्रुताः ॥ ९१<br>एकार्षेयास्तथा चान्ये वासिष्ठा नाम विश्रुताः ।<br>एते पक्षा वसिष्ठानां स्मृता दश महात्मनाम् ॥ ९२ | [हे ऋषियो!] अब इसके आगे इन्द्रप्रमितिकी उत्पत्तिके विषयमें जानिये। वसिष्ठका पुत्र कपिंजल्य घृताचीसे उत्पन्न हुआ था, जो त्रिमूर्ति नामसे भी विख्यात हुआ; उसे इन्द्रप्रमिति कहा जाता है। पृथुकी पुत्रीसे भद्र उत्पन्न हुआ और उस [भद्र]-का पुत्र वसु हुआ। उसका पुत्र उपमन्यु और उपमन्युके बहुत पुत्र हुए। कौण्डिन्य नामसे जो प्रसिद्ध हैं, वे मित्र तथा वरुणकी सन्तानें हैं और जो अन्य एकार्षेय हैं, वे वासिष्ठ नामसे प्रसिद्ध हैं। महात्मा वसिष्ठवंशजोंके ये दस पक्ष कहे गये हैं॥ ८९-९२॥ |
| इत्येते ब्रह्मणः पुत्रा मानसा विश्रुता भुवि ।<br>भर्तारश्च महाभागा एषां वंशाः प्रकीर्तिताः ॥ ९३<br>त्रिलोकधारणे शक्ता देवर्षिकुलसम्भवाः ।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ९४<br>यैस्तु व्याप्तास्त्रयो लोकाः सूर्यस्येव गभस्तिभिः ॥ ९५ | ये सब ब्रह्माके मानस पुत्रके रूपमें पृथ्वीपर विख्यात हैं। ये महाभाग [सबका] भरण करनेवाले हैं। [हे विप्रो!] मैंने इनके वंशोंका वर्णन कर दिया। देवर्षिकुलमें उत्पन्न होनेवाले ये सब तीनों लोकोंको धारण करनेमें समर्थ हैं। उनके पुत्र-पौत्र सैकड़ों तथा हजारों हैं, जिनके द्वारा सूर्यकी किरणोंकी भाँति तीनों लोक व्याप्त हैं॥ ९३-९५॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवादिसृष्टिकथनं नाम त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवादिसृष्टिकथन' नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६३॥
६४- वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा
| २६६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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चौंसठवाँ अध्याय
वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>कथं हि राक्षसा शक्तिर्भक्षितः सोऽनुजैः सह।<br>वासिष्ठो वदतां श्रेष्ठ सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ | **ऋषिगण बोले—**हे वक्ताओंमें श्रेष्ठ सूतजी! राक्षस [रुधिर]-ने अनुजोंसहित वसिष्ठपुत्र शक्तिका भक्षण कैसे कर लिया; इसे आप कृपा करके बताइये॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>राक्षसो रुधिरो नाम वसिष्ठस्य सुतं पुरा।<br>शक्तिं स भक्षयामास शक्तेः शापात् सहानुजैः॥ २<br>वसिष्ठयाज्यं विप्रेन्द्रास्तदादिश्यैव भूपतिम्।<br>कल्माषपादं रुधिरो विश्वामित्रेण चोदितः॥ ३ | **सूतजी बोले—**रुधिर नामक राक्षस पूर्वकालमें [विश्वामित्रद्वारा दिये गये] शापके कारण वसिष्ठके पुत्र शक्तिको उनके छोटे भाइयोंसहित खा गया था। हे विप्रो! उस रुधिरने विश्वामित्रसे प्रेरित होकर वसिष्ठके यजमान राजा कल्माषपादके शरीरमें प्रवेश करके उसका भक्षण किया था॥ २-३॥ |
| भक्षितः स इति श्रुत्वा वसिष्ठस्तेन रक्षसा।<br>शक्तिः शक्तिमतां श्रेष्ठो भ्रातृभिः सह धर्मवित्॥ ४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति क्रन्दमानो मुहुर्मुहुः।<br>अरुन्धत्या सह मुनिः पपात भुवि दुःखितः॥ ५<br>नष्टं कुलमिति श्रुत्वा मर्तुं चक्रे मतिं तदा।<br>स्मरन् पुत्रशतं चैव शक्तिज्येष्ठं च शक्तिमान्॥ ६<br>न तं विनाहं जीविष्ये इति निश्चित्य दुःखितः॥ ७ | राक्षसने भाइयोंसहित शक्तिशालीयोंमें श्रेष्ठ शक्तिका भक्षण कर लिया—ऐसा सुनकर वसिष्ठजी अरुन्धतीके साथ दुःखित होकर 'हा पुत्र! पुत्र!'-बार-बार कहकर विलाप करते हुए पृथ्वीपर गिर पड़े। [मेरा] कुल नष्ट हो गया—यह सुनकर अपने सौ पुत्रों तथा ज्येष्ठ पुत्र शक्तिका स्मरण करते हुए उन शक्तिमान् वसिष्ठने 'अब मैं उसके बिना जीवित नहीं रहूँगा'—ऐसा निश्चय करके दुःखित होकर मरनेका विचार किया॥ ४-७॥ |
| आरुह्य मूर्धानमजात्मजोऽसौ<br>तयात्मवान् सर्वविदात्मविच्च।<br>धराधरस्यैव तदा धरायां<br>पपात पत्या सहसाश्रुदृष्टिः॥ ८ | नेत्रोंमें आँसू भरे हुए वे आत्मवान्, सर्वज्ञ तथा आत्मवेत्ता ब्रह्मापुत्र वसिष्ठजी पत्नी [अरुन्धती]-के साथ पर्वतके शिखरपर चढ़कर पृथ्वीपर गिर पड़े॥ ८॥ |
| धराधरात्तं पतितं धरा तदा<br>दधार तत्रापि विचित्रकण्ठी।<br>कराम्बुजाभ्यां करिखेलगामिनी<br>रुदन्तमादाय रुरोद सा च॥ ९ | तब विचित्र हार पहने हुए तथा हाथीके समान क्रीड़ायुक्त चालवाली पृथ्वीने पर्वतसे गिरे हुए उन वसिष्ठको धारण कर लिया और वह कमलके समान [अपने] हाथोंसे उन रोते हुए वसिष्ठको पकड़कर [स्वयं] रुदन करने लगी॥ ९॥ |
| तदा तस्य स्नुषा प्राह पत्नी शक्तेर्महामुनिम्।<br>वसिष्ठं वदतां श्रेष्ठं रुदन्ती भयविह्वला॥ १० | तदनन्तर उनकी पुत्रवधू तथा शक्तिकी पत्नी भयसे व्याकुल होकर रोती हुई वक्ताओंमें श्रेष्ठ महामुनि वसिष्ठसे कहने लगी— |
| भगवन् ब्राह्मणश्रेष्ठ तव देहमिदं शुभम्।<br>पालयस्व विभो द्रष्टुं तव पौत्रं ममात्मजम्॥ ११<br>न त्याज्यं तव विप्रेन्द्र देहमेतत्सुशोभनम्।<br>गर्भस्थो मम सर्वार्थसाधकः शक्तिजो यतः॥ १२ | 'हे भगवन्! हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! हे विभो! अपने पौत्र तथा मेरे पुत्रकी देखभाल करनेके लिये आप अपने इस पवित्र देहकी रक्षा कीजिये। हे विप्रेन्द्र! आपको अपने इस परम सुन्दर शरीरका त्याग |
अध्याय ६४ ] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा [ २६७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| नहीं करना चाहिये; क्योंकि सभी अर्थोंको सिद्ध करनेवाला शक्तिपुत्र मेरे गर्भमें स्थित है'॥ १०-१२॥ | |
| एवमुक्त्वाथ धर्मज्ञा कराभ्यां कमलेक्षणा।<br>उत्थाप्य श्वशुरं नत्वा नेत्रे सम्मृज्य वारिणा॥ १३<br>दुःखितापि परित्रातुं श्वशुरं दुःखितं तदा।<br>अरुन्धतीं च कल्याणीं प्रार्थयामास दुःखिताम्॥ १४ | ऐसा कहकर कमलके समान नेत्रोंवाली उस धर्मज्ञाने अपने हाथोंसे श्वशुरको उठाकर [उन्हें] प्रणाम करके जलसे [उनके] नेत्रोंको धोकर स्वयं दुःखित होनेपर भी दुःखी श्वशुरकी रक्षा करनेके लिये दुःखसे युक्त कल्याणी अरुन्धतीसे प्रार्थना की॥ १३-१४॥ |
| स्नुषावाक्यं ततः श्रुत्वा वसिष्ठोत्थाय भूतलात्।<br>संज्ञामवाप्य चालिङ्ग्य सा पपात सुदुःखिता॥ १५<br>अरुन्धती कराभ्यां तां संस्पृश्यास्त्राकुलेक्षणाम्।<br>रुरोद मुनिशार्दूलो भार्यया सुतवत्सलः॥ १६ | तदनन्तर पुत्रवधूका वचन सुनकर चैतन्य प्राप्तकर पुत्रवत्सल मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ भूमिसे उठकर अरुन्धतीका आश्रय ले अश्रुपूरित नेत्रोंवाली उस अदृश्यन्तीका हाथोंसे स्पर्श करके भार्यासहित रो पड़े। वह अदृश्यन्ती भी अत्यन्त दुःखित होकर भूमिपर गिर पड़ी॥ १५-१६॥ |
| अथ नाभ्यम्बुजे विष्णोर्यथा तस्याश्चतुर्मुखः।<br>आसीनो गर्भशय्यायां कुमार ऋचमाह सः॥ १७ | तदनन्तर विष्णुके नाभिकमलमें विराजमान ब्रह्माकी भाँति उसकी गर्भशय्यामें आसीन उस शिशुने एक ऋचाका उच्चारण किया॥ १७॥ |
| ततो निशम्य भगवान् वसिष्ठ ऋचमादरात्।<br>केनोक्तमिति सञ्चिन्त्य तदातिष्ठत्समाहितः॥ १८ | तब उस ऋचाको आदरपूर्वक सुनकर 'किसने इसका उच्चारण किया'—ऐसा सोचकर भगवान् वसिष्ठ एकाग्रचित्त होकर बैठ गये॥ १८॥ |
| व्योमाङ्गणस्थोऽथ हरिः पुण्डरीकनिभेक्षणः।<br>वसिष्ठमाह विश्वात्मा घृणया स घृणानिधिः॥ १९<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र वसिष्ठ सुतवत्सल।<br>तव पौत्रमुखाम्भोजादुद्गेषाद्य विनिःसृता॥ २०<br>मत्समस्तव पौत्रोऽसौ शक्तिजः शक्तिमान् मुने।<br>तस्मादुत्तिष्ठ सन्त्यज्य शोकं ब्रह्मसुतोत्तम॥ २१<br>रुद्रभक्तश्च गर्भस्थो रुद्रपूजापरायणः।<br>रुद्रदेवप्रभावेण कुलं ते सन्तरिष्यति॥ २२<br>एवमुक्त्वा घृणी विप्रं भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>वसिष्ठं मुनिशार्दूलं तत्रैवान्तरधीयत॥ २३ | उसके बाद कमलके समान नेत्रवाले, विश्वात्मा तथा कृपानिधि विष्णुने आकाशमें स्थित होकर कृपापूर्वक वसिष्ठसे कहा—'हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे वसिष्ठ! हे पुत्रवत्सल! आपके पौत्रके मुखकमलसे यह ऋचा निकली है। हे मुने! शक्तिका यह पुत्र तथा आपका पौत्र मेरे समान शक्तिशाली होगा, अतः हे ब्रह्मपुत्रोंमें श्रेष्ठ! शोकका त्याग करके उठिये। यह गर्भस्थ शिशु रुद्रका भक्त होगा और रुद्रकी पूजामें संलग्न रहेगा; यह रुद्रदेवकी कृपासे आपके कुलका उद्धार करेगा'। मुनिश्रेष्ठ विप्र वसिष्ठसे ऐसा कहकर दयालु भगवान् विष्णु वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १९-२३॥ |
| ततः प्रणम्य शिरसा वसिष्ठो वारिजेक्षणम्।<br>अदृश्यन्त्या महातेजाः पस्पर्शोदरमादरात्॥ २४<br>हा पुत्र पुत्र पुत्रेति पपात च सुदुःखितः।<br>ललापारुन्धतीं प्रेक्ष्य तदासौ रुदतीं द्विजाः॥ २५ | तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले विष्णुको सिर झुकाकर प्रणाम करके महातेजस्वी वसिष्ठने आदरपूर्वक अदृश्यन्तीके उदरका स्पर्श किया; और हा पुत्र! पुत्र! पुत्र!—ऐसा कहकर अत्यन्त दुःखित होकर वे गिर |
| २६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| स्वपुत्रं च स्मरन् दुःखात्पुनरेहोहि पुत्रक।<br>तव पुत्रमिमं दृष्ट्वा भो शक्ते कुलधारणम्॥ २६<br>तवान्तिकं गमिष्यामि तव मात्रा न संशयः। | पड़े। हे द्विजो! उस समय वे रोती हुई अरुन्धतीकी ओर देखकर विलाप करने लगे और अपने पुत्रका स्मरण करते हुए दुःखपूर्वक बोले—‘हे पुत्र! पुनः आ जाओ, आ जाओ। हे शक्ते! कुलको धारण करनेवाले तुम्हारे इस पुत्रको देखकर मैं तुम्हारी माताके साथ तुम्हारे पास आऊँगा; इसमें सन्देह नहीं है’॥ २४—२६ ½ ॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा रुदन् विप्र आलिङ्ग्यारुन्धतीं तदा॥ २७<br>पपात ताडयन्तीव स्वस्य कुक्षी करेण वै।<br>अदृश्यन्ती जघानाथ शक्तिजस्यालयं शुभा॥ २८<br>स्वोदरं दुःखिता भूमौ ललाप च पपात च।<br>अरुन्धती तदा भीता वसिष्ठश्च महामतिः॥ २९<br>समुत्थाप्य स्नुषां बालामूचतुर्भयविह्वलौ॥ ३० | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] ऐसा कहकर रोते हुए वे विप्र [वसिष्ठ] अरुन्धतीका आलिङ्गन करके गिर पड़े। शुभ अदृश्यन्ती भी [गर्भस्थ] शक्तिपुत्रके आश्रयरूप अपने उदरको पीटने लगी और दुःखित होकर विलाप करने लगी तथा [पृथ्वीपर] गिर पड़ी। तब डरी हुई अरुन्धती एवं महामति वसिष्ठ बाला पुत्रवधूको उठाकर भयसे विह्वल होकर [उससे] कहने लगे॥ २७–३०॥ | | विचारमुग्धे तव गर्भमण्डलं<br>कराम्बुजाभ्यां विनिहत्य दुर्लभम्।<br>कुलं वसिष्ठस्य समस्तमप्यहो<br>निहन्तुमार्ये कथमुद्यता वद॥ ३१<br>तवात्मजं शक्तिसुतं च दृष्ट्वा<br>चास्वाद्य वक्रामृतमार्यसूनोः।<br>त्रातुं यतो देहमिमं मुनीन्द्रः<br>सुनिश्चितः पाहि ततः शरीरम्॥ ३२ | हे विचारमुग्धे! हे आर्ये! कमलके समान हाथोंसे अपने दुर्लभ गर्भमण्डलको पीटकर तुम वसिष्ठके समस्त वंशको नष्ट करनेके लिये क्यों उद्यत हो? इसे बताओ। तुम्हारे पुत्र तथा शक्तिपुत्रको देखकर और उस आर्यपुत्रके मुखामृतका आस्वादन करके मुझ मुनीन्द्रने इस अपने शरीरको बचानेका निश्चय किया है, अतः तुम [अपने] शरीरकी रक्षा करो॥ ३१–३२॥ | | सूत उवाच<br>एवं स्नुषामुपालभ्य मुनिं चारुन्धती स्थिता।<br>अरुन्धती वसिष्ठस्य प्राह चार्तेति विह्वला॥ ३३<br>त्वय्येव जीवितं चास्य मुनेर्यत्सुव्रते मम।<br>जीवितं रक्ष देहस्य धात्री च कुरु यद्धितम्॥ ३४ | **सूतजी बोले—**इस प्रकार पुत्रवधू तथा मुनि वसिष्ठसे कहकर अरुन्धती स्थित हो गयी। पुनः दुःखी एवं व्याकुल अरुन्धतीने कहा—हे सुव्रते! अब इन मुनि वसिष्ठका तथा मेरा जीवन तुम्हारे ऊपर निर्भर है, अतः तुम धात्रीकी भाँति अपने देहकी रक्षा करो और जो हितकर हो, उसे करो॥ ३३–३४॥ | | अदृश्यन्ती उवाच<br>मया यदि मुनिश्रेष्ठो त्रातुं वै निश्चितं स्वकम्।<br>ममाशुभं शुभं देहं कथञ्चित् पालयाम्यहम्॥ ३५<br>प्रियदुःखमहं प्राप्ता ह्यसती नात्र संशयः।<br>मुने दुःखदहं दग्धा यतः पुत्री मुने तव॥ ३६<br>अहोऽद्भुतं मया दृष्टं दुःखपात्री ह्यहं विभो।<br>दुःखत्राता भव ब्रह्मन् ब्रह्मसूनो जगद्गुरो॥ ३७ | **अदृश्यन्ती बोली—**यदि मुनिश्रेष्ठने अपने जीवनकी रक्षा करनेका निश्चय किया है, तो मैं भी किसी रूपमें अपने शुभ या अशुभ देहकी रक्षा करूँगी। मुझ असतीको [अपने] पतिके वियोगका दुःख प्राप्त हुआ है; इसमें सन्देह नहीं है। हे मुने! मैं दुःखसे दग्ध हूँ। हे मुने! मैं आपकी पुत्री हूँ; मैंने अद्भुत बात देखी है। हे विभो! मैं दुःखकी पात्र हूँ। अतः हे ब्रह्मन्! हे |
अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तथापि भर्तृरहिता दीना नारी भवेदिह।<br>पाहि मां तत आर्येन्द्र परिभूता भविष्यति॥ ३८<br><br>पिता माता च पुत्राश्च पौत्राः श्वशुर एव च।<br>एते न बान्धवाः स्त्रीणां भर्ता बन्धुः परा गतिः॥ ३९ | ब्रह्मपुत्र! हे जगद्गुरो! इस दुःखसे मेरी रक्षा कीजिये। पतिरहित स्त्री इस लोकमें दीन तथा असहाय होती है, अतः हे आर्येन्द्र! मेरी रक्षा कीजिये। पिता, माता, पुत्र, पौत्र, श्वशुर—ये स्त्रियोंके बन्धु नहीं होते हैं; अर्थात् ये सब उसका सदाके लिये सम्पूर्ण हितसम्पादन करनेमें समर्थ नहीं होते, केवल पति ही उनका बन्धु तथा परम गति होता है॥ ३५-३९॥ |
| आत्मनो यद्धि कथितमप्यर्धमिति पण्डितैः।<br>तदप्यत्र मृषा ह्यासीद् गतः शक्तिरहं स्थिता॥ ४०<br><br>अहो ममात्र काठिन्यं मनसो मुनिपुङ्गव।<br>पतिं प्राणसमं त्यक्त्वा स्थिता यत्र क्षणं यतः॥ ४१<br><br>वसिष्ठाश्वत्थमाश्रित्य ह्यमृता तु यथा लता।<br>निर्मूलाप्यमृता भर्त्रा त्यक्ता दीना स्थिताप्यहम्॥ ४२ | विद्वानोंने जो कहा है कि पत्नी पतिका आधा अंग होती है, वह भी इसमें मिथ्या हो गया; [मेरे पति] शक्ति तो चले गये, किन्तु मैं [जीवित] रह गयी। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे मनकी यह कठोरता है, जो प्राणतुल्य [अपने] पतिको छोड़कर मैं क्षणभरके लिये भी जीवित हूँ। हे वसिष्ठ! जैसे पीपलके वृक्षपर चढ़ी हुई लता जड़को काट देनेपर भी जीवित रहती है, वैसे ही अपने पतिसे परित्यक्त हुई मैं भी दीन होकर जीवित हूँ॥ ४०-४२॥ |
| स्नुषावाक्यं निशम्यैव वसिष्ठो भार्यया सह।<br>तदा चक्रे मतिं धीमान् यातुं स्वाश्रममाश्रमी॥ ४३<br><br>कृच्छ्रात्सभार्यो भगवान् वसिष्ठः स्वाश्रमं क्षणात्।<br>अदृश्यन्त्या च पुण्यात्मा संविवेश स चिन्तयन्॥ ४४ | तब पुत्रवधूका वचन सुनकर गृहस्थाश्रमवाले बुद्धिमान् वसिष्ठने [अपनी] भार्याके साथ अपने आश्रमको जानेका विचार किया। चिन्ता करते हुए उन भगवान् वसिष्ठने बड़े कष्टसे अपनी भार्या तथा [पुत्रवधू] अदृश्यन्तीके साथ क्षणभरमें अपने आश्रममें प्रवेश किया॥ ४३-४४॥ |
| सा गर्भं पालयामास कथञ्चिन्मुनिपुङ्गवाः।<br>कुलसन्धारणार्थाय शक्तिपत्नी पतिव्रता॥ ४५<br><br>ततः सासूत तनयं दशमे मासि सुप्रभम्।<br>शक्तिपत्नी यथा शक्तिं शक्तिमन्तमरुन्धती॥ ४६<br><br>असूत सादितिर्विष्णुं यथा स्वाहा गुहं सुतम्।<br>अग्निं यथारणिः पत्नी शक्तेः साक्षात्पराशरम्॥ ४७ | हे श्रेष्ठ मुनियो! उस पतिव्रता शक्तिभार्याने [अपनी] वंशपरम्पराको सुरक्षित रखनेके लिये किसी प्रकार [अपने] गर्भकी रक्षा की। तदनन्तर दसवें महीनेमें उस शक्तिपत्नीने अत्यन्त तेजस्वी पुत्रको जन्म दिया, जैसे अरुन्धतीने शक्तिशाली शक्तिको जन्म दिया था। उस शक्तिपत्नीने साक्षात् पराशरको उसी तरह जन्म दिया, जैसे अदितिने विष्णुको, स्वाहाने गुहको और अरणिने अग्निको पुत्ररूपमें जन्म दिया था॥ ४५-४७॥ |
| यदा तदा शक्तिसूनुरवतीर्णो महीतले।<br>शक्तिस्त्यक्त्वा तदा दुःखं पितॄणां समतां ययौ॥ ४८<br><br>भ्रातृभिः सह पुण्यात्मा आदित्यैरिव भास्करः।<br>रराज पितृलोकस्थो वासिष्ठो मुनिपुङ्गवाः॥ ४९ | जब शक्तिके पुत्रने पृथ्वीतलपर अवतार लिया, तब शक्तिने दुःख त्यागकर पितरोंकी समताको प्राप्त किया। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे पुण्यात्मा वसिष्ठपुत्र [शक्ति] पितृलोकमें स्थित होकर [अपने] भाइयोंके साथ उसी प्रकार सुशोभित हुए, जैसे सूर्य आदित्योंके साथ सुशोभित होते हैं॥ ४८-४९॥ |
| श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|---|
| २७० |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जगूस्तदा च पितरो ननृतुश्च पितामहाः।<br>प्रपितामहाश्च विप्रेन्द्रा ह्यावतीर्णे पराशरे॥ ५०<br>ये ब्रह्मवादिनो भूमौ ननृतुर्दिवि देवताः।<br>पुष्कराद्याश्च ससृजुः पुष्पवर्षं च खेचराः॥ ५१<br>पुरेषु राक्षसानां च प्रणादं विषमं द्विजाः।<br>आश्रमस्थाश्च मुनयः समूहुर्हर्षसन्ततिम्॥ ५२ | हे विप्रेन्द्रो! पराशरके अवतार लेनेपर उस समय सभी पितामह-प्रपितामह आदि पितृगण नाचने तथा गाने लगे। जो ब्रह्मवादी लोग थे, वे पृथ्वीपर एवं देवता लोग स्वर्गमें नृत्य करने लगे। पुष्कर आदि मेघोंने जलकी तथा अन्य आकाशचारियोंने पुष्पोंकी वर्षा की। [उस समय] राक्षसोंके नगरोंमें गृध्रादि अमंगल ध्वनि करने लगे और आश्रममें स्थित मुनियोंने अपार हर्ष मनाया॥ ५०-५२॥ |
| अवतीर्णो यथा ह्यण्डाद्द्विजानुः सोऽपि पराशरः।<br>अदृश्यन्त्याश्चतुर्वक्त्रो मेघजालाद्दिवाकरः॥ ५३<br>सुखं च दुःखमभवददृश्यन्त्यास्तथा द्विजाः।<br>दृष्ट्वा पुत्रं पतिं स्मृत्वा अरुन्धत्या मुनेस्तथा॥ ५४<br>दृष्ट्वा च तनयं बाला पराशरमतिद्युतिम्।<br>ललाप विह्वला बाला सन्नकण्ठी पपात च॥ ५५ | जैसे अण्डसे चतुरानन (ब्रह्मा) और मेघसमूहोंसे सूर्य प्रकट होते हैं, उसी प्रकार वे पराशर भी अदृश्यन्तीसे अवतरित हुए। हे द्विजो! पुत्रको देखकर तथा पतिका स्मरण करके अदृश्यन्तीको सुख तथा दुःख दोनों ही हुआ और अरुन्धती तथा मुनि [वसिष्ठ]-को भी सुख-दुःख हुआ। अत्यधिक कान्तिवाले पुत्र पराशरको देखकर विह्वल तथा रुँधे कण्ठवाली वह बाला विलाप करने लगी और [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ५३-५५॥ |
| सा पराशरमहो महामतिं<br>देवदानवगणैश्च पूजितम्।<br>जातमात्रमनघं शुचिस्मिता<br>बुध्य साश्रुनयना ललाप च॥ ५६<br>हा वसिष्ठसुत कुत्रचिद् गतः<br>पश्य पुत्रमनघं तवात्मजम्।<br>त्यज्य दीनवदनां वनान्तरे<br>पुत्रदर्शनपरामिमां प्रभो॥ ५७<br>शक्ते स्वं च सुतं पश्य भ्रातृभिः सह षण्मुखम्।<br>यथा महेश्वरोऽपश्यत्सगणो हृष्टिताननः॥ ५८ | पवित्र मुसकानवाली वह [अदृश्यन्ती] उत्पन्न हुए उस पराशरको महाबुद्धिमान्, देवताओं तथा दानवोंसे पूजित और निष्पाप जानकर आँखोंमें आँसू भरकर विलाप करने लगी—'हे वसिष्ठसुत [शक्ति]! हे प्रभो! पुत्र-दर्शनकी इच्छावाली इस दीनवदनाको तथा अपने पुत्रको वनके बीचमें छोड़कर आप कहाँ चले गये? अपने निष्पाप पुत्रका दर्शन कीजिये। हे शक्ते! आप भाइयोंके साथ अपने पुत्रको देखिये, जैसे महेश्वरने प्रसन्नमुख होकर [अपने] गणोंके साथ षण्मुख (कार्तिकेय)-को देखा था'॥ ५६-५८॥ |
| अथ तस्यास्तदालापं वसिष्ठो मुनिसत्तमः।<br>श्रुत्वा स्नुषामुवाचेदं मा रोदीरिति दुःखितः॥ ५९ | तत्पश्चात् उसके विलापको सुनकर मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठने दुःखित होकर [अपनी] पुत्रवधूसे यह वचन कहा—'मत रोओ'॥ ५९॥ |
| आज्ञया तस्य सा शोकं वसिष्ठस्य कुलाङ्गना।<br>त्यक्त्वा ह्यापालयद् बालं बाला बालमृगेक्षणा॥ ६० | तब बालमृगके समान नेत्रोंवाली वह कुलीन बाला वसिष्ठकी आज्ञासे शोक त्याग करके [उस] बालकका पालन करने लगी॥ ६०॥ |
| दृष्ट्वा तामबलां प्राह मङ्गलाभरणैर्विना।<br>आसीनामाकुलां साध्वीं बाष्पपर्याकुलेक्षणाम्॥ ६१ | तदनन्तर आँसुओंसे भरे हुए नेत्रोंवाली तथा व्याकुल उस साध्वी अबलाको आभूषणोंसे रहित होकर बैठी देखकर पराशर यह कहने लगे॥ ६१॥ |
| अध्याय ६४ ] | वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा | २७१ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| शाकेय उवाच<br>अम्ब मङ्गलभूषणैर्विना<br>देहयष्टिरनघे न शोभते।<br>वक्तुमर्हसि तवाद्य कारणं<br>चन्द्रबिम्बरहितेव शर्वरी॥ ६२<br>मातर्मातः कथं त्यक्त्वा मङ्गलाभरणानि वै।<br>आसीना भर्तृहीनेव वक्तुमर्हसि शोभने॥ ६३ | शाक्तेय (शक्तिपुत्र पराशर) बोले— हे अम्ब! हे अनघे! जैसे चन्द्रमण्डलसे रहित रात्रि सुशोभित नहीं होती है, वैसे ही आपका यह शरीर मंगल आभूषणोंके बिना सुशोभित नहीं हो रहा है; कृपा करके आज इसका कारण बताइये। हे मात:! हे मात:! मंगल आभरणोंका त्याग करके पतिविहीनाकी भाँति आप क्यों बैठी हुई हैं? हे शोभने! कृपा करके बताइये॥ ६२-६३॥ |
| अदृश्यन्ती तदा वाक्यं श्रुत्वा तस्य सुतस्य सा।<br>न किञ्चिदब्रवीत्पुत्रं शुभं वा यदि वेतरत्॥ ६४ | तब उस पुत्रकी बात सुनकर उस अदृश्यन्तीने पुत्रसे अच्छा अथवा बुरा कुछ भी नहीं कहा॥ ६४॥ |
| अदृश्यन्तीं पुनः प्राह शाक्तेयो भगवान् मम।<br>मातः कुत्र महातेजाः पिता वद वदेति ताम्॥ ६५ | भगवान् शाक्तेय (पराशर)-ने उस अदृश्यन्तीसे पुनः कहा—‘हे मात:! मेरे महातेजस्वी पिता कहाँ हैं; इसे बताइये, बताइये'॥ ६५॥ |
| श्रुत्वा रुरोद सा वाक्यं पुत्रस्यातीव विह्वला।<br>भक्षितो रक्षसा तातस्तवेति निपपात च॥ ६६ | तब पुत्रका वचन सुनकर अत्यधिक व्याकुल होकर वह रोने लगी। 'हे तात! राक्षसने तुम्हारे पिताका भक्षण कर लिया'—ऐसा कहकर वह [भूमिपर] गिर पड़ी॥ ६६॥ |
| श्रुत्वा वसिष्ठोऽपि पपात भूमौ<br>पौत्रस्य वाक्यं स रुदन् दयालुः।<br>अरुन्धती चाश्रमवासिनस्तदा<br>मुनेर्वसिष्ठस्य मुनीश्वराश्च॥ ६७ | तब पौत्रकी बात सुनकर दयालु वसिष्ठ भी रोते हुए भूमिपर गिर पड़े। मुनि वसिष्ठके आश्रममें रहनेवाले श्रेष्ठ मुनिगण तथा अरुन्धती—ये सब भी गिर पड़े॥ ६७॥ |
| भक्षितो रक्षसा मातुः पिता तव मुखादिति।<br>श्रुत्वा पराशरो धीमान् प्राह चास्त्राविलेक्षणः॥ ६८ | 'तुम्हारे पिताको राक्षस खा गया'—माताके मुखसे ऐसा सुनकर अश्रुपूर्ण नेत्रवाले बुद्धिमान् पराशर कहने लगे॥ ६८॥ |
| पराशर उवाच<br>अभ्यर्च्य देवदेवेशं त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>क्षणेन मातः पितरं दर्शयामीति मे मतिः॥ ६९ | पराशर बोले— हे मात:! देवदेवेश्वर [शिव]-की पूजा करके तथा चराचरसहित तीनों लोकोंको दग्ध करके मैं क्षणभरमें पिताका दर्शन कराता हूँ—ऐसा मेरा विचार है॥ ६९॥ |
| सा निशम्य वचनं तदा शुभं<br>सस्मिता तनयमाह विस्मिता।<br>तथ्यमेतदिति तं निरीक्ष्य सा<br>पुत्र पुत्र भवमर्चयेति च॥ ७० | तब इस शुभ वचनको सुनकर वह आश्चर्यचकित हो गयी; उसकी ओर देखकर मुसकराकर उसने पुत्रसे कहा—हे पुत्र! हे पुत्र! यह सत्य है; तुम शिवकी पूजा करो॥ ७०॥ |
| ज्ञात्वा शक्तिसुतस्यास्य सङ्कल्पं मुनिपुङ्गवः।<br>वसिष्ठो भगवान् प्राह पौत्रं धीमान् घृणानिधिः॥ ७१ | तदनन्तर इस शक्तिपुत्र [पराशर]-के संकल्पको जानकर दयानिधि, बुद्धिमान् तथा मुनियोंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने पौत्रसे कहा— |
| स्थाने पौत्र मुनिश्रेष्ठ सङ्कल्पस्तव सुव्रत।<br>तथापि शृणु लोकस्य क्षयं कर्तुं न चार्हसि॥ ७२<br>राक्षसानामभावाय कुरु सर्वेश्वरार्चनम्।<br>त्रैलोक्यं शृणु शाक्तेय अपराध्यति किं तव॥ ७३ | हे पौत्र! हे मुनिश्रेष्ठ! हे सुव्रत! सुनो; तुम्हारा संकल्प उचित है, फिर भी तुम [सम्पूर्ण] लोकका विनाश मत करो। तुम राक्षसोंके नाशके लिये |
| २७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्वेश्वरका अर्चन करो। हे शक्तिपुत्र! सुनो, त्रैलोक्यने तुम्हारे प्रति क्या अपराध किया है?॥ ७१-७३॥ | |
| ततस्तस्य वसिष्ठस्य नियोगाच्छक्तिनन्दनः।<br>राक्षसानामभावाय मतिं चक्रे महामतिः॥ ७४<br>अदृश्यन्तीं वसिष्ठं च प्रणम्यारुन्धतीं ततः।<br>कृत्वैकलिङ्गं क्षणिकं पांसुना मुनिसन्निधौ॥ ७५<br>सम्पूज्य शिवसूक्तेन त्र्यम्बकेन शुभेन च।<br>जप्त्वा त्वरितरुद्रं च शिवसङ्कल्पमेव च॥ ७६<br>नीलरुद्रं च शाक्तेयस्तथा रुद्रं च शोभनम्।<br>वामीयं पवमानं च पञ्चब्रह्म तथैव च॥ ७७<br>होतारं लिङ्गसूक्तं च अथर्वशिर एव च।<br>अष्टाङ्गमर्घ्यं रुद्राय दत्त्वाभ्यर्च्य यथाविधि॥ ७८ | उसके बाद उन वसिष्ठकी आज्ञासे महाबुद्धिमान् शक्तिपुत्रने राक्षसोंके विनाशके लिये निश्चय किया। अदृश्यन्ती, वसिष्ठ तथा अरुन्धतीको प्रणाम करनेके अनन्तर मुनिके समीप मिट्टीका एक (पार्थिवेश्वर) क्षणिक लिङ्ग बनाकर शुभ शिवसूक्त तथा त्र्यम्बकमन्त्रसे विधिवत् पूजन करके त्वरितरुद्र, शिवसंकल्पसूक्त, नीलरुद्र, उत्तम रुद्र, वामीय, पवमान, पंचब्रह्म (सद्योजातादि पाँच मन्त्र), होतृसूक्त, लिङ्गसूक्त तथा अथर्वशीर्ष—इन मन्त्रोंका जप करके [भगवान्] रुद्रको अष्टांग अर्घ्य प्रदान करके यथाविधि अभ्यर्थनकर वे शाक्तेय (पराशर) प्रार्थना करने लगे॥ ७४-७८॥ |
| पराशर उवाच<br>भगवन् रक्षसा रुद्र भक्षितो रुधिरेण वै।<br>पिता मम महातेजा भ्रातृभिः सह शङ्कर॥ ७९<br>द्रष्टुमिच्छामि भगवन् पितरं भ्रातृभिः सह।<br>एवं विज्ञापयँल्लिङ्गं प्रणिपत्य मुहुर्मुहुः॥ ८०<br>हा रुद्र रुद्र रुद्रेति रुरोद निपपात च। | पराशर बोले—'हे भगवन्! हे रुद्र! हे शंकर! राक्षस रुधिरने भाइयोंसहित मेरे महातेजस्वी पिताका भक्षण कर लिया। हे भगवन्! मैं अपने पिताको उनके भाइयोंसहित देखना चाहता हूँ।' इस प्रकार प्रार्थना करते हुए उस लिङ्गको बार-बार प्रणामकर 'हा रुद्र! रुद्र! रुद्र!'—यह कहते हुए वे रोने लगे और गिर पड़े॥ ७९-८० १/२॥ |
| तं दृष्ट्वा भगवान् रुद्रो देवीमाह च शङ्करः॥ ८१<br>पश्य बालं महाभागे बाष्पपर्याकुलेक्षणम्।<br>ममानुस्मरणे युक्तं मदाराधनतत्परम्॥ ८२ | तब उन्हें देखकर कल्याणकारी भगवान् रुद्रने देवी [पार्वती]-से कहा—हे महाभागे! अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले, मेरे स्मरणमें लगे हुए तथा मेरी आराधनामें तत्पर [इस] बालकको देखो॥ ८१-८२॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवी पराशरमनिन्दिता।<br>दुःखात्संक्लिन्नसर्वाङ्गमस्त्राकुलविलोचनम् ॥ ८३<br>लिङ्गार्चनविधौ सक्तं हर रुद्रेति वादिनम्।<br>प्राह भर्तारमीशानं शङ्करं जगतामुमा॥ ८४ | तब निष्कलंक उन महादेवी उमाने दुःखसे दुर्बल अंगोंवाले, अश्रुपूरित नेत्रोंवाले, लिङ्गार्चनके कर्ममें संलग्न तथा 'हे हर! हे रुद्र'—ऐसा उच्चारण करनेवाले पराशरको देखकर सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी अपने पति शंकरसे कहा—हे परमेश्वर! आप प्रसन्न हो जाइये और इसे सम्पूर्ण अभीष्ट वर प्रदान कीजिये॥ ८३-८४ १/२॥ |
| ईप्सितं यच्छ सकलं प्रसीद परमेश्वर।<br>निशम्य वचनं तस्याः शङ्करः परमेश्वरः॥ ८५<br>भार्यामार्यामुमां प्राह ततो हालाहलाशनः।<br>रक्षाम्येनं द्विजं बालं फुल्लेन्दीवरलोचनम्॥ ८६<br>ददामि दृष्टिं मद्रूपदर्शनक्षम एष वै।<br>एवमुक्त्वा गणैर्दिव्यैर्भगवान्नीललोहितः॥ ८७ | तदनन्तर उनका वचन सुनकर विषपान करनेवाले परमेश्वर शंकरने [अपनी] भार्या साध्वी उमासे कहा—मैं खिले हुए कमलके समान नेत्रवाले इस ब्राह्मण बालककी रक्षा करूँगा। मैं इसे [दिव्य] दृष्टि दे रहा हूँ; [जिससे] यह मेरे रूपका दर्शन करनेमें समर्थ होगा॥ ८५-८६ १/२॥ |
अध्याय ६४] वसिष्ठपुत्र शक्तिका आख्यान तथा महर्षि पराशरकी कथा २७३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रहेन्द्रविष्णुरुद्राद्यैः संवृतः परमेश्वरः।<br>ददौ च दर्शनं तस्मै मुनिपुत्राय धीमते॥ ८८ | ऐसा कहकर [अपने] दिव्य गणों तथा ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, रुद्र आदिसे घिरे हुए भगवान् नीललोहित परमेश्वरने उन बुद्धिमान् मुनिपुत्र [पराशर]-को दर्शन दिया॥ ८७-८८॥ |
| सोऽपि दृष्ट्वा महादेवमानन्दास्त्राविलेक्षणः।<br>निपपात च हृष्टात्मा पादयोस्तस्य सादरम्॥ ८९<br><br>पुनर्भावान्याः पादौ च नन्दिनश्च महात्मनः।<br>सफलं जीवितं मेऽद्य ब्रह्माद्यांस्तांस्तदाह सः॥ ९०<br><br>रक्षार्थमागतस्त्वद्य मम बालेन्दुभूषणः।<br>कोऽन्यः समो मया लोके देवो वा दानवोऽपि वा॥ ९१ | महादेवजीको देखकर आनन्दके अश्रुसे भरे हुए नेत्रोंवाले वे [पराशर] भी प्रसन्नचित्त होकर आदरपूर्वक उनके चरणोंपर गिर पड़े और पुनः भवानी [पार्वती] और महात्मा नन्दीके चरणोंपर गिर पड़े। तत्पश्चात् उन्होंने उन ब्रह्मा आदिसे कहा—'मेरा जीवन आज सफल हो गया। बाल चन्द्रमाके आभूषणवाले [साक्षात् शिवजी] मेरी रक्षाके लिये आज उपस्थित हुए हैं; अतः देवता अथवा दानव—दूसरा कौन इस लोकमें मेरे समान [भाग्यशाली] है'॥ ८९-९१॥ |
| अथ तस्मिन् क्षणादेव ददर्श दिवि संस्थितम्।<br>पितरं भ्रातृभिः सार्धं शाक्तेयस्तु पराशरः॥ ९२<br><br>सूर्यमण्डलसङ्काशे विमाने विश्वतोमुखे।<br>भ्रातृभिः सहितं दृष्ट्वा ननाम च जहर्ष च॥ ९३ | तदनन्तर शक्तिपुत्र पराशरने उसी क्षण [अपने] पिताको भाइयोंसहित अन्तरिक्षमें खड़े देखा। सूर्यमण्डलके समान [तेजवाले] तथा सभी ओर मुखवाले विमानमें [अपने] भाइयोंसहित पिताको देखकर उन्होंने प्रणाम किया और वे बहुत हर्षित हुए॥ ९२-९३॥ |
| तदा वृषभध्वजो देवः सभार्यः सगणेश्वरः।<br>वसिष्ठपुत्रं प्राहेदं पुत्रदर्शनतत्परम्॥ ९४ | तब अपनी भार्या तथा गणेश्वरोंसहित विराजमान भगवान् वृषभध्वज (शिव) पुत्रको देखनेमें तत्पर वसिष्ठ-पुत्र [शक्ति]-से यह कहने लगे॥ ९४॥ |
| श्रीदेव उवाच<br>शक्ते पश्य सुतं बालमानन्दास्त्राविलेक्षणम्।<br>अदृश्यन्तीं च विप्रेन्द्र वसिष्ठं पितरं तव॥ ९५<br><br>अरुन्धतीं महाभागां कल्याणीं देवतोपमाम्।<br>मातरं पितरं चोभौ नमस्कुरु महामते॥ ९६ | **श्रीदेव बोले—**हे शक्ते! हे विप्रेन्द्र! आनन्दके आँसुओंसे सिक्त नेत्रोंवाले अपने पुत्र इस बालकको और अदृश्यन्ती, अपने पिता वसिष्ठ, महाभाग्यशालिनी-कल्याणमयी तथा देवतातुल्य [माता] अरुन्धतीको देखो। हे महामते! [अपने] माता तथा पिता—इन दोनोंको नमस्कार करो॥ ९५-९६॥ |
| तदा हरं प्रणम्याशु देवदेवमुमां तथा।<br>वसिष्ठं च तदा श्रेष्ठं शक्तिर्वै शङ्कराज्ञया॥ ९७<br><br>मातरं च महाभागां कल्याणीं पतिदेवताम्।<br>अरुन्धतीं जगन्नाथनियोगात्प्राह शक्तिमान्॥ ९८ | तदनन्तर शंकरजीकी आज्ञासे देवदेव हरको, उमाको, श्रेष्ठ वसिष्ठको तथा अपने पतिको देवता माननेवाली महाभाग्यवती कल्याणी माता अरुन्धतीको शीघ्र प्रणाम करके शक्तिमान् शक्तिने [पुनः] जगन्नाथ [शिव]-की आज्ञा पाकर कहा॥ ९७-९८॥ |
| वासिष्ठ उवाच<br>भो वत्स वत्स विप्रेन्द्र पराशर महाद्युते।<br>रक्षितोऽहं त्वया तात गर्भस्थेन महात्मना॥ ९९ | **वासिष्ठ (शक्ति) बोले—**हे वत्स! हे वत्स! हे विप्रेन्द्र! हे पराशर! हे महाद्युते! हे तात! गर्भमें स्थित रहते हुए तुम महात्माने मेरी रक्षा की। हे वत्स! हे |
| अणिमादिगुणैश्वर्यं मया वत्स पराशर।<br>लब्धमद्याननं दृष्टं तव बाल ममाज्ञया॥ १०० |
| २७४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अदृश्यन्तीं महाभागां रक्ष वत्स महामते।<br>अरुन्धतीं च पितरं वसिष्ठं मम सर्वदा॥ १०१<br><br>अन्वयः सकलो वत्स मम सन्तारितस्त्वया।<br>पुत्रेण लोकान् जयतीत्युक्तं सद्भिः सदैव हि॥ १०२<br><br>ईप्सितं वरयेशानं जगतां प्रभवं प्रभुम्।<br>गमिष्याम्यभिवन्द्येशं भ्रातृभिः सह शङ्करम्॥ १०३ | पराशर! हे बाल! मैंने अणिमा आदि सिद्धियों तथा ऐश्वर्यको प्राप्त कर लिया, जो कि तुम्हारे मुखका आज मुझे दर्शन हुआ। हे वत्स! हे महामते! अब तुम मेरी आज्ञासे महाभाग्यशालिनी अदृश्यन्ती, [माता] अरुन्धती तथा मेरे पिता वसिष्ठकी सर्वदा रक्षा करते रहो। हे वत्स! तुमने मेरे समस्त कुलका उद्धार कर दिया; सज्जनोंने सदा यही कहा है कि [मनुष्य अपने] पुत्रके द्वारा [सभी] लोकोंको जीत लेता है। अब तुम जगत्को उत्पन्न करनेवाले प्रभु महेश्वरसे अभीष्ट वर माँगो और मैं अब भगवान् शंकरको प्रणाम करके भाइयोंके साथ जाऊँगा॥ ९९-१०३॥ |
| एवं पुत्रमुपामन्त्र्य प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>निरीक्ष्य भार्या सदसि जगाम पितरं वशी॥ १०४ | इस प्रकार पुत्रको परामर्श देकर महेश्वर तथा पिता वसिष्ठको प्रणाम करके सभामें [अपनी] भार्याकी ओर देखकर वे जितेन्द्रिय शक्ति चले गये॥ १०४॥ |
| गतं दृष्ट्वाथ पितरं तदाभ्यर्च्यैव शङ्करम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः शाक्तेयः शशिभूषणम्॥ १०५ | तत्पश्चात् पिताको गया हुआ देखकर वे शक्तिपुत्र [पराशर] चन्द्रभूषण शंकरकी पूजा करके प्रिय शब्दोंद्वारा [उनकी] स्तुति करने लगे॥ १०५॥ |
| ततस्तुष्टो महादेवो मन्मथान्थकमर्दनः।<br>अनुगृह्याथ शाक्तेयं तत्रैवान्तरधीयत॥ १०६ | तदनन्तर कामदेव तथा अन्धकका नाश करनेवाले महादेव प्रसन्न हो गये और शक्तिपुत्र पराशरपर अनुग्रह करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १०६॥ |
| गते महेश्वरे साम्बे प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>ददाह राक्षसानां तु कुलं मन्त्रेण मन्त्रवित्॥ १०७ | तब पार्वतीसहित महेश्वरके चले जानेपर मन्त्रवेत्ता पराशर महेश्वरको प्रणाम करके मन्त्रके द्वारा राक्षसोंके कुलको जलाने लगे॥ १०७॥ |
| तदाह पौत्रं धर्मज्ञो वसिष्ठो मुनिभिर्वृतः।<br>अलमत्यन्तकोपेन तात मन्युमिमं जहि॥ १०८<br><br>राक्षसा नापराध्यन्ति पितुस्ते विहितं तथा।<br>मूढानामेव भवति क्रोधो बुद्धिमतां न हि॥ १०९<br><br>हन्यते तात कः केन यतः स्वकृतभुक्पुमान्।<br>सञ्चितस्यातिमहता वत्स क्लेशेन मानवैः॥ ११०<br><br>यशसस्तपसश्चैव क्रोधो नाशकरः स्मृतः।<br>अलं हि राक्षसैर्दग्धैर्दीनैरनपराधिभिः॥ १११<br><br>सत्रं ते विरमत्वेतत्क्षमासारा हि साधवः। | उस समय मुनियोंसे घिरे हुए धर्मज्ञ वसिष्ठने पौत्र [पराशर]–से कहा—'हे तात! ऐसा महाकोप मत करो; इस क्रोधका त्याग करो। राक्षसोंने अपराध नहीं किया है; तुम्हारे पिताके लिये वैसा ही विहित था। मूर्खोंको ही क्रोध होता है; बुद्धिमानोंको नहीं। हे तात! कौन किसे मारता है; मनुष्य तो अपने किये हुएका फल भोगता है। हे वत्स! क्रोध मनुष्योंके द्वारा अत्यधिक कष्टसे अर्जित किये गये यश तथा तपका नाश करनेवाला कहा गया है। अतः तुम दीन तथा निरपराध राक्षसोंको मत जलाओ और अपने इस यज्ञको बन्द करो; सज्जन लोग तो क्षमाशील होते हैं'॥ १०८-११११/२॥ |
| एवं वसिष्ठवाक्येन शाक्तेयो मुनिपुङ्गवः॥ ११२ | इस प्रकार वसिष्ठकी आज्ञासे तथा उनके वचनोंकी |
६५- सूर्यवंश तथा चंद्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम
अध्याय ६५ ] सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम २७५
| उपसंहृतवान् सत्रं सद्यस्तद्वाक्यगौरवात्।<br>ततः प्रीतश्च भगवान् वसिष्ठो मुनिसत्तमः ॥ ११३<br>सम्प्राप्तश्च तदा सत्रं पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः।<br>वसिष्ठेन तु दत्तार्घ्यः कृतासनपरिग्रहः ॥ ११४<br>पराशरमुवाचेदं प्रणिपत्य स्थितं मुनिः।<br>वैरे महति यद्वाक्याद् गुरोर्द्याश्रिता क्षमा ॥ ११५<br>त्वया तस्मात्समस्तानि भवाञ्छास्त्राणि वेत्स्यति।<br>सन्ततेर्मम न च्छेदः क्रुद्धेनापि यतः कृतः ॥ ११६<br>त्वया तस्मान्महाभाग ददाम्यन्यं महावरम्।<br>पुराणसंहिताकर्ता भवान् वत्स भविष्यति ॥ ११७<br>देवतापरमार्थं च यथावद्वेत्स्यते भवान्।<br>प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा कर्मणस्तेऽमला मतिः ॥ ११८<br>मत्प्रसादादसन्दिग्धा तव वत्स भविष्यति।<br>ततश्च प्राह भगवान् वसिष्ठो वदतां वरः ॥ ११९<br>पुलस्त्येन यदुक्तं ते सर्वमेतद्भविष्यति।<br>अथ तस्य पुलस्त्यस्य वसिष्ठस्य च धीमतः ॥ १२०<br>प्रसादाद्वैष्णवं चक्रे पुराणं वै पराशरः।<br>षट्प्रकारं समस्तार्थसाधकं ज्ञानसञ्चयम् ॥ १२१<br>षट्सहस्रमितं सर्वं वेदार्थेन च संयुतम्।<br>चतुर्थं हि पुराणानां संहितासु सुशोभनम् ॥ १२२<br>एष वः कथितः सर्वो वासिष्ठानां समासतः।<br>प्रभवः शक्तिसूनोश्च प्रभावो मुनिपुङ्गवाः ॥ १२३ | गरिमाके कारण मुनिश्रेष्ठ पराशरने शीघ्र ही यज्ञको बन्द कर दिया। तब मुनिश्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठ प्रसन्न हो गये ॥ ११२-११३ ॥<br>उसी समय ब्रह्माके पुत्र [ऋषि] पुलस्त्य यज्ञमें आये। वसिष्ठने उन्हें अर्घ्य प्रदान किया तथा आसन देकर बैठाया; तत्पश्चात् प्रणाम करके [सम्मुख] खड़े पराशरसे मुनि [पुलस्त्य]-ने कहा—'तुमने गुरुकी आज्ञासे आज महान् वैरमें क्षमाको आश्रित किया है, अतः तुम सभी शास्त्रोंको जान जाओगे और कुपित होनेपर भी तुमने मेरे वंशका नाश नहीं किया, अतः हे महाभाग! मैं तुम्हें अन्य महान् वर भी प्रदान करता हूँ—हे वत्स ! तुम पुराणसंहिताके कर्ता होओगे और देवताओंके परम रहस्यको वास्तविकरूपमें जानोगे। हे वत्स! मेरी कृपासे प्रवृत्ति तथा निवृत्तिके कर्मोंसे तुम्हारी बुद्धि विशुद्ध एवं सन्देहरहित होगी' ॥ ११४–११८ १/२ ॥<br>तदनन्तर वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् वसिष्ठने कहा—'[हे वत्स!] ऋषि पुलस्त्यने तुम्हारे लिये जो कुछ कहा है, यह सब होकर रहेगा।' तब उन पुलस्त्य तथा बुद्धिमान् वसिष्ठकी कृपासे पराशरने विष्णुपुराणकी रचना की। यह छः अंशोंवाला, सभी कामनाओंको सिद्ध करनेवाला, ज्ञानका भण्डार, छः हजार श्लोकोंसे युक्त, वेदार्थसे समन्वित, पुराण-संहिताओंमें चतुर्थ तथा परम सुन्दर है ॥ ११९–१२२ ॥<br>हे श्रेष्ठ मुनियो ! मैंने आपलोगोंसे संक्षेपमें वसिष्ठके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा शक्तिपुत्र [पराशर]-के सम्पूर्ण प्रभावका वर्णन कर दिया ॥ १२३ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वासिष्ठकथनं नाम चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वासिष्ठकथन' नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥
पैंसठवाँ अध्याय
सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशका वर्णन एवं शिवभक्त तण्डीप्रोक्त रुद्रसहस्रनाम *
| ऋषय ऊचुः<br>आदित्यवंशं सोमस्य वंशं वंशविदां वर।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं सङ्क्षेपाद्रोमहर्षण ॥ १<br><br>सूत उवाच<br>अदितिः सुषुवे पुत्रमादित्यं कश्यपाद् द्विजाः।<br>तस्यादित्यस्य चैवासीद्भार्यात्रयमथापरम् ॥ २<br>संज्ञा राज्ञी प्रभा छाया पुत्रांस्तासां वदामि वः।<br>संज्ञा त्वाष्ट्री च सुषुवे सूर्यान्मनुमनुत्तमम् ॥ ३ | ऋषिगण बोले—हे वंशविदोंमें श्रेष्ठ! हे रोमहर्षण! आप संक्षेपमें सूर्यवंश तथा चन्द्रवंशके विषयमें हमलोगोंको बतानेकी कृपा करें ॥ १ ॥<br><br>सूतजी बोले—हे द्विजो! अदितिने कश्यपसे आदित्य नामक पुत्रको उत्पन्न किया। उस आदित्यकी ज्येष्ठ भार्याके अतिरिक्त तीन और भार्याएँ थीं। वे संज्ञा, राज्ञी, प्रभा तथा छाया थीं—मैं उनके पुत्रोंके विषयमें |
* यहाँ जो रुद्रसहस्रनामस्तोत्र दिया है, वह महाभारतके अनुशासन पर्व अ० १७ के अन्तर्गत आये शिवसहस्रनामस्तोत्र से साम्य रखता है, वहाँ उसका विस्तृत माहात्म्य भी पूर्वमें वर्णित है।
| २७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यमं च यमुनाञ्चैव राज्ञी रेवतमेव च।<br>प्रभा प्रभातमादित्याच्छायां संज्ञाप्यकल्पयत् ॥ ४ | आप लोगोंको बताता हूँ। त्वष्टाकी पुत्री संज्ञाने सूर्यसे श्रेष्ठ मनुको उत्पन्न किया। राज्ञीने यम, यमुना तथा रेवतको जन्म दिया। प्रभाने सूर्यसे प्रभातको जन्म दिया। संज्ञाने ही छायाको अपने स्थानपर नियोजित किया॥ २-४॥ |
| छाया च तस्मात्सुषुवे सावर्णिं भास्कराद् द्विजाः।<br>ततः शनिं च तपतीं विष्टिं चैव यथाक्रमम् ॥ ५<br><br>छाया स्वपुत्राभ्यधिकं स्नेहं चक्रे मनौ तदा।<br>पूर्वो मनुर्न चक्षाम यमस्तु क्रोधमूर्च्छितः ॥ ६<br><br>सन्ताडयामास रुषा पादमुद्यम्य दक्षिणम्।<br>यमेन ताडिता सा तु छाया वै दुःखिताभवत् ॥ ७ | हे द्विजो! छायाने उन सूर्यसे सावर्णि मनु, शनि, तपती तथा विष्टिको यथाक्रम जन्म दिया। छाया अपने पुत्र सावर्णि मनुसे अधिक स्नेह करती थी। पूर्व मनु (वैवस्वत मनु) तो इसे सहन कर गये, पर क्रोधसे विक्षुब्ध यम इसे सहन न कर सका और उसने क्रोधसे [अपना] दाहिना पैर उठाकर छायापर प्रहार किया। [पैरसे] यमके द्वारा मारे जानेपर वह छाया दुःखित हुई॥ ५-७॥ |
| छायाशापात्पदं चैकं यमस्य क्लिन्नमुत्तमम्।<br>पूयशोणितसम्पूर्णं कृमीणां निचयान्वितम् ॥ ८<br><br>सोऽपि गोकर्णमाश्रित्य फलकेनानिलाशनः।<br>आराधयन् महादेवं यावद्वर्षायुतायुतम् ॥ ९<br><br>भवप्रसादादागत्य लोकपालत्वमुत्तमम्।<br>पितॄणामाधिपत्यं तु शापमोक्षं तथैव च ॥ १०<br><br>लब्धवान् देवदेवस्य प्रभावाच्छूलपाणिनः। | तब छायाके शापसे यमका वह सुन्दर पैर खराब हो गया, वह मवाद तथा रक्तसे भर गया और कीड़ोंके समूहसे युक्त हो गया। तदनन्तर वह [यम] गोकर्णमें रहकर एक फलक (पटरे)-पर बैठकर [केवल] वायु पीता हुआ दस हजार वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना करता रहा। शिवकी कृपासे श्रेष्ठ लोकपालत्व तथा पितरोंका स्वामित्व प्राप्त करके उसने देवदेव शूलपाणि (शिव)-के प्रभावसे शापसे मुक्ति प्राप्त की॥ ८-१० १/२॥ |
| असहन्ती पुरा भानोस्तेजोमयमनिन्दिता ॥ ११<br><br>रूपं त्वाष्ट्री स्वदेहात्तु छायाख्यां सा त्वकल्पयत्।<br>वडवारूपमास्थाय तपस्तेपे तु सुव्रता ॥ १२<br><br>कालात्प्रयत्नतो ज्ञात्वा छायां छायापतिः प्रभुः।<br>वडवामगमत्संज्ञामश्वरूपेण भास्करः ॥ १३<br><br>वडवा च तदा त्वाष्ट्री संज्ञा तस्माद्दिवाकरात्।<br>सुषुवे चाश्विनौ देवौ देवानां तु भिषग्वरौ ॥ १४ | पूर्वकालमें सूर्यके तेजोमय रूपको सहन न करती हुई त्वष्टाकी शुभ कन्या संज्ञाने अपने शरीरसे [दूसरी] छाया नामक स्त्रीकी रचना की और वह सुव्रता स्वयं वडवा (घोड़ी)-का रूप धारणकर तप करने लगी। कुछ समयके बाद प्रयत्नपूर्वक छायाको संज्ञाकी प्रतिकृति जानकर छायापति प्रभु सूर्यने घोड़ेका रूप धारणकर उस वडवारूपधारिणी संज्ञाके साथ रमण किया। तब घोड़ीके रूपवाली त्वष्टापुत्री संज्ञाने उन सूर्यसे देवस्वरूप दोनों अश्विनीकुमारोंको जन्म दिया; वे देवताओंके श्रेष्ठ वैद्य थे॥ ११-१४॥ |
| लिखितो भास्करः पश्चात्संज्ञा पित्रा महात्मना।<br>विष्णोश्चक्रं तु यद् घोरं मण्डलाद्भास्करस्य तु ॥ १५ | उसके बाद महान् आत्मावाले संज्ञापिता [त्वष्टा]-ने सूर्यको खरादा। भगवान् त्वष्टाने रुद्रकी कृपासे सूर्यके मण्डलसे विष्णुके चक्रका निर्माण किया, जो |