श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१००- वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ५३० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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सौवाँ अध्याय
वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह
| ऋषय ऊचुः<br>विजित्य विष्णुना सार्धं भगवान् परमेश्वरः।<br>सर्वान् दधीचवचनात्कथं भेजे महेश्वरः॥ १ | ऋषिगण बोले— [ हे सूतजी!] परमेश्वर भगवान् महेश्वरने दधीचके कहनेसे विष्णुसहित सबको जीतकर पुनः यज्ञका सेवन कैसे किया ? ॥ १ ॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>दक्षयज्ञे सुविपुले देवान् विष्णुपुरोगमान्।<br>ददाह भगवान् रुद्रः सर्वान् मुनिगणानपि॥ २<br><br>भद्रो नाम गणस्तेन प्रेषितः परमेष्ठिना।<br>विप्रयोगेन देव्या वै दुःसहेनैव सुव्रताः॥ ३<br><br>सोऽसृजद्वीरभद्रश्च गणेशान् रोमजाञ्छुभान्।<br>गणेश्वरैः समारुह्य रथं भद्रः प्रतापवान्॥ ४<br><br>गन्तुं चक्रे मतिं यस्य सारथिर्भगवानजः।<br>गणेश्वराश्च ते सर्वे विविधायुधपाणयः॥ ५<br><br>विमानैर्विश्वतो भद्रैस्तमन्वयुरथो सुराः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये हेमशृङ्गे सुशोभने॥ ६<br><br>यज्ञवाटस्तथा तस्य गङ्गाद्वारसमीपतः।<br>तद्देशे चैव विख्यातं शुभं कनखलं द्विजाः॥ ७ | सूतजी बोले— [ हे ऋषियो!] भगवान् रुद्रने दक्षके अति महान् यज्ञमें विष्णु आदि प्रमुख देवताओं तथा सभी मुनियोंको जला दिया। हे सुव्रतो! देवीके असहनीय वियोगके कारण उन शिवजीने [अपने] भद्र नामक गणको भेजा। उस वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्तम गणेश्वरोंको उत्पन्न किया। तब गणेश्वरोंके साथ रथपर सवार होकर प्रतापशाली वीरभद्रने प्रस्थान करनेका निश्चय किया; जिनके सारथि भगवान् ब्रह्मा थे। हाथोंमें विविध आयुध लिये हुए वे सभी गणेश्वर तथा देवता शुभ विमानोंपर आरूढ़ होकर सभी ओरसे उन वीरभद्रके पीछे-पीछे चले। हे द्विजो! हिमवान्के रमणीय तथा परम सुन्दर सुवर्णमय शिखरपर गंगाद्वारके समीप कनखल नामक शुभ तथा विख्यात स्थान है; उसी स्थानमें उन दक्षकी यज्ञशाला थी ॥ २–७ ॥<br><br>जब शिवजीने भगवान् वीरभद्रको [यज्ञको] दग्ध<br><br>(चित्र)<br><br>करनेके लिये भेजा, उस समय लोकोंको भयभीत |
| दग्धुं वै प्रेषितश्चासौ भगवान् परमेष्ठिना।<br>तदोत्पातो बभूवाथ लोकानां भयशंसनः॥ ८ |
अध्याय १००] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पर्वताश्च व्यशीर्यन्त प्रचकम्पे वसुन्धरा।<br>मरुतश्चाप्यघूर्णन्त चुक्षुभे मकरालयः॥ ९<br>अग्नयो नैव दीप्यन्ति न च दीप्यति भास्करः।<br>ग्रहाश्च न प्रकाशन्ते न देवा न च दानवाः॥ १० | करनेवाला उत्पात होने लगा। पर्वत फटने लगे, पृथ्वी काँप उठी, वायु घूर्णित हो गये, समुद्र क्षुब्ध हो गया, अग्निने जलना बन्द कर दिया, सूर्य दीप्तिरहित हो गया, ग्रह प्रकाशहीन हो गये और देवता तथा दानव कोई भी प्रसन्न नहीं थे॥ ८—१०॥ |
| ततः क्षणात् प्रविश्यैव यज्ञवाटं महात्मनः।<br>रोमजैः सहितो भद्रः कालाग्निरिव चापरः॥ ११<br>उवाच भद्रो भगवान् दक्षं चामिततेजसम्।<br>सम्पर्कादेव दक्षाद्य मुनीन् देवान् पिनाकिना॥ १२<br>दग्धुं सम्प्रेषितश्चाहं भवन्तं समुनीश्वरैः।<br>इत्युक्त्वा यज्ञशालां तां ददाह गणपुङ्गवः॥ १३ | उसी क्षण दूसरी कालाग्निके समान भगवान् वीरभद्रने अपने रोमोंसे उत्पन्न किये गये गणेश्वरोंके साथ महात्मा [दक्ष]-के यज्ञस्थलमें प्रवेश करके अमित तेजवाले दक्षसे कहा—‘हे दक्ष! आज पिनाकधारी शिवने मुनियों, देवताओं तथा मुनीश्वरोंसहित आपको केवल स्पर्शमात्रसे दग्ध करनेके लिये मुझको भेजा है।’—ऐसा कहकर उस श्रेष्ठ गणने उस यज्ञशालाको जला डाला॥ ११-१३॥ |
| गणेश्वराश्च सङ्क्रुद्धा यूपानुत्पाट्य चिक्षिपुः।<br>प्रस्तोत्रा सह होत्रा च दग्धं चैव गणेश्वरैः॥ १४<br>गृहीत्वा गणपाः सर्वान् गङ्गास्रोतसि चिक्षिपुः।<br>वीरभद्रो महातेजाः शक्रस्योद्यच्छतः करम्॥ १५<br>व्यष्टम्भयददीनात्मा तथान्येषां दिवौकसाम्।<br>भगस्य नेत्रे चोत्पाट्य करजाग्रेण लीलया॥ १६<br>निहत्य मुष्टिना दन्तान् पूष्णाश्चैवं न्यपातयत्।<br>तथा चन्द्रमसं देवं पादाङ्गुष्ठेन लीलया॥ १७ | अत्यन्त क्रुद्ध गणेश्वरोंने [यज्ञके] यूपों (स्तम्भों)-को उखाड़कर फेंक दिया। गणेश्वरोंने प्रस्तोता तथा होतासहित सबको जला दिया। उन गणेश्वरोंने सभीको पकड़कर गंगाकी धारामें फेंक दिया। महातेजस्वी तथा अदीन आत्मावाले वीरभद्रने उठे हुए इन्द्रके वज्र-युक्त हाथको स्तम्भित कर दिया और अन्य देवताओंके हाथोंको भी स्तम्भित कर दिया। उन्होंने लीलापूर्वक अपने नाखूनोंके अग्रभागसे भगके नेत्रोंको निकालकर पुनः मुष्टिकासे प्रहार करके पूषाके दाँतोंको तोड़कर गिरा दिया॥ १४-१६ १/२॥ |
| घर्षयामास भगवान् वीरभद्रः प्रतापवान्।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य शक्रस्य भगवान् प्रभोः॥ १८<br>वह्नेर्हस्तद्वयं छित्त्वा जिह्वामुत्पाट्य लीलया।<br>जघान मूर्ध्नि पादेन वीरभद्रो महाबलः॥ १९ | इसके बाद प्रतापी भगवान् वीरभद्रने [अपने] पैरके अँगूठेसे बिना प्रयासके चन्द्रदेवको घर्षित कर दिया और उन प्रभु इन्द्रके सिरको काट दिया। महाबली वीरभद्रने लीलापूर्वक अग्निदेवके दोनों हाथोंको काटकर तथा जीभ उखाड़कर पैरसे उनके सिरपर प्रहार किया॥ १७-१९॥ |
| यमस्य दण्डं भगवान् प्रचिच्छेद स्वयं प्रभुः।<br>जघान देवमीशानं त्रिशूलेन महाबलम्॥ २०<br>त्रयस्त्रिंशत्सुरानेवं विनिहत्याप्रयत्नतः।<br>त्रयश्च त्रिशतं तेषां त्रिसाहस्रं च लीलया॥ २१<br>त्रयं चैव सुरेन्द्राणां जघान च मुनीश्वरान्।<br>अन्यांश्च देवान् देवोऽसौ सर्वान् युद्धाय संस्थितान्॥ २२<br>जघान भगवान् रुद्रः खड्गमुष्ट्यादिसायकैः।<br>अथ विष्णुर्महातेजाश्चक्रमुद्यम्य मूर्च्छितः॥ २३ | तत्पश्चात् प्रभु भगवान् वीरभद्रने स्वयं यमके दण्डको काट दिया और महाबली ईशानदेवको त्रिशूलसे मारा। उन्होंने [वसु, रुद्रादित्यरूप] तैंतीस देवताओं तथा इन्हीं तीनोंके तीन सौ तथा तीन हजार भेदोंको लीलापूर्वक अनायास ही मार करके [इन्द्र, अग्नि, सोमरूप] तीन प्रधान देवों, मुनीश्वरों तथा युद्धके लिये सन्नद्ध अन्य सभी देवताओंको भी मार डाला॥ २०-२२ १/२॥ |
| ५३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| युयोध भगवांस्तेन रुद्रेण सह माधवः ।<br>तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ २४<br><br>विष्णोर्योगबलात्तस्य दिव्यदेहाः सुदारुणाः ॥ २५ | इसके बाद महातेजस्वी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु [अपना] चक्र उठाकर आवेशयुक्त होकर उन रुद्रके साथ युद्ध करने लगे; उन दोनोंके बीच अतिभयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उन विष्णुके योगबलसे हाथोंमें शंख-चक्र-गदा धारण किये हुए, दिव्य देहवाले तथा परम दारुण असंख्य योद्धा उत्पन्न हो गये॥ २३—२५ १/२ ॥ |
| शङ्खचक्रगदाहस्ता असंख्याताश्च जज्ञिरे ।<br>तान् सर्वानपि देवोऽसौ नारायणसमप्रभान् ॥ २६<br><br>निहत्य गदया विष्णुं ताडयामास मूर्धनि ।<br>ततश्चोरसि तं देवं लीलयैव रणाजिरे ॥ २७<br><br>पपात च तदा भूमौ विसंज्ञः पुरुषोत्तमः ।<br>पुनरुत्थाय तं हन्तुं चक्रमुद्यम्य स प्रभुः ॥ २८ | तब उन वीरभद्रदेवने नारायणके समान प्रभाववाले उन सबको भी मार करके रणभूमिमें ही गदासे लीलापूर्वक विष्णुदेवके सिरपर प्रहार किया; इसके बाद उनके वक्षःस्थलपर प्रहार किया, तब वे पुरुषोत्तम (विष्णु) अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इसके बाद उठ करके उन [वीरभद्र]-को मारनेके लिये चक्र उठाकर वे श्रीमान् पुरुषश्रेष्ठ प्रभु क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले होकर खड़े हो गये॥ २६—२८ १/२ ॥ |
| क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमानतिष्ठत्पुरुषर्षभः ।<br>तस्य चक्रं च यद्रौद्रं कालादित्यसमप्रभम् ॥ २९<br><br>व्यष्टम्भयददीनात्मा करस्थं न चचाल सः ।<br>अतिष्ठत्स्तम्भितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः ॥ ३० | उन [विष्णु]-का भयानक तथा कालादित्यके समान तेजवाला जो चक्र था, उसको अदीन आत्मावाले वीरभद्रने स्तम्भित कर दिया; वह हाथमें पड़ा ही रह गया और हिलातक नहीं और वीरभद्रके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये वे विष्णु भी पर्वतकी भाँति स्थिर होकर खड़े रहे॥ २९-३०॥ |
| त्रिभिश्च धर्षितं शार्ङ्गं त्रिधाभूतं प्रभोस्तदा ।<br>शार्ङ्गकोटिप्रसङ्गाद्वै चिच्छेद च शिरः प्रभोः ॥ ३१<br><br>छिन्नं च निपपातासु शिरस्तस्य रसातले ।<br>वायुना प्रेरितं चैव प्राणजेन पिनाकिना ॥ ३२<br><br>प्रविवेश तदा चैव तदीयाहवनीयकम् ।<br>तत्प्रविध्वस्तकलशं भग्नयूपं सतोरणम् ॥ ३३<br><br>प्रदीपितमहाशालं दृष्ट्वा यज्ञोऽपि दुद्रुवे ।<br>तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति ॥ ३४<br><br>वीरभद्रः समाधाय विशिरस्कमथाकरोत् ।<br>ततः प्रजापतिं धर्मं कश्यपं च जगद्गुरुम् ॥ ३५<br><br>अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम् ।<br>मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महाबलः ॥ ३६<br><br>जघान मूर्ध्नि पादेन दक्षं चैव यशस्विनम् ।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य ददाहाग्नौ द्विजोत्तमाः ॥ ३७ | इसके बाद वीरभद्रने तीन बाणोंसे विष्णुके शार्ङ्ग [नामक] धनुषको काट दिया और वह तीन टुकड़ोंमें हो गया एवं शार्ङ्ग धनुषके सिरेसे लग जानेके कारण विष्णुका सिर कट गया। उनका कटा हुआ सिर शीघ्र ही [भगवान्] शंकरकी निःश्वास वायुसे प्रेरित होकर रसातलमें चला गया। तत्पश्चात् वहाँ उनकी आहवनीय अग्निने प्रवेश किया। ध्वस्त कलशवाले तथा तोरणों-सहित टूटे हुए यूपवाले उस जलते हुए यज्ञवाटको देखकर यज्ञदेव भी भाग गये। तब मृगके रूपसे आकाशकी ओर भागते हुए उस यज्ञदेवको पकड़कर वीरभद्रने उसे सिरविहीन कर दिया। तत्पश्चात् महाबली वीरभद्रने प्रजापति, धर्म, जगद्गुरु कश्यप, अरिष्टनेमि, मुनीश्वर बहुपुत्र, मुनि अंगिरा और कृशाश्वके सिरपर पैरसे प्रहार किया; हे श्रेष्ठ द्विजो! उसने यशस्वी दक्षके सिरपर भी पैरसे प्रहार किया और उनके सिरको काट लिया तथा उसे अग्निमें जला दिया। |
अध्याय १०० ] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३३
| संस्कृत | हिन्दी |
|---|---|
| सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च।<br>निकृत्य करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान्॥ ३८<br><br>तस्थौ श्रिया वृतो मध्ये प्रेतस्थाने यथा भवः। | तदनन्तर प्रतापी वीरभद्र अपने नाखूनके अग्रभागसे देवमाता सरस्वतीकी नासिकाका अग्रभाग काटकर ऐश्वर्ययुक्त होकर सबके बीच उसी तरह स्थित हुए जैसे श्मशानमें [भगवान्] भव॥ ३१—३८ १/२॥ |
| एतस्मिन्नेव काले तु भगवान् पद्मसंभवः॥ ३९<br><br>भद्रमाह महातेजाः प्रार्थयन् प्रणतः प्रभुः।<br>अलं क्रोधेन वै भद्र नष्टाश्चैव दिवौकसः॥ ४०<br><br>प्रसीद क्षम्यतां सर्वं रोमजैः सह सुव्रत। | इसी समय महातेजस्वी प्रभु ब्रह्माजी प्रार्थना करते हुए प्रणत होकर वीरभद्रसे बोले—'हे भद्र! क्रोध मत कीजिये, देवतागण नष्ट हो गये हैं, हे सुव्रत! प्रसन्न होइये और अपने रोमोंसे उत्पन्न गणेश्वरोंसहित सबको क्षमा कीजिये'॥ ३९-४० १/२॥ |
| सोऽपि भद्रः प्रभावेण ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ४१<br><br>शमं जगाम शनकैः शान्तस्तस्थौ तदाज्ञया।<br>देवोऽपि तत्र भगवानन्तरिक्षे वृषध्वजः॥ ४२<br><br>सगणः सर्वदः शर्वः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>प्रार्थितश्चैव देवेन ब्रह्मणा भगवान् भवः॥ ४३<br><br>हतानां च तदा तेषां प्रददौ पूर्ववत्तनुम्।<br>इन्द्रस्य च शिरस्तस्य विष्णोश्चैव महात्मनः॥ ४४<br><br>दक्षस्य च मुनीन्द्रस्य तथान्येषां महेश्वरः।<br>वागीश्याश्चैव नासाग्रं देवमातुस्तथैव च॥ ४५<br><br>नष्टानां जीवितं चैव वराणि विविधानि च।<br>दक्षस्य ध्वस्तवक्त्रस्य शिरसा भगवान् प्रभुः॥ ४६<br><br>कल्पयामास वै वक्त्रं लीलया च महान् भवः। | तब वे वीरभद्र भी परमेष्ठी ब्रह्माके प्रभावसे धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हुए; उनकी आज्ञासे शान्त होकर वे खड़े हो गये। उस समय भगवान् महादेव वृषभध्वज अन्तरिक्षमें स्थित थे; देव ब्रह्माने गणोंसहित उन सर्वदाता, शर्व, सभी लोकोंके स्वामी भगवान् भवसे प्रार्थना की। तब उन्होंने मारे गये उन सभीको पूर्वकी भाँति शरीर प्रदान कर दिया। महेश्वरने इन्द्र, महात्मा विष्णु, दक्ष, मुनीन्द्र तथा अन्य लोगोंको सिर प्रदान कर दिया, देवमाता सरस्वतीको नासिका प्रदान कर दी, नष्ट हुए लोगोंको जीवन प्रदान कर दिया; साथ ही उन्होंने विविध वर भी प्रदान किये। भगवान् महाप्रभु भवने लीलापूर्वक ध्वस्तमुखवाले दक्षका सिरसहित मुख बना दिया॥ ४१—४६ १/२॥ |
| दक्षोऽपि लब्धसंज्ञश्च समुत्थाय कृताञ्जलिः॥ ४७ | तब चेतनाप्राप्त दक्षने भी उठकर हाथ जोड़ करके |
१०१- सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना
| ५३४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| तुष्टाव देवदेवेशं शङ्करं वृषभध्वजम्।<br>स्तुतस्तेन महातेजाः प्रदाय विविधान् वरान्॥ ४८<br>गाणपत्यं ददौ तस्मै दक्षायक्लिष्टकर्मणे।<br>देवाश्च सर्वे देवेशं तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ४९<br>नारायणश्च भगवान् तुष्टाव च कृताञ्जलिः।<br>ब्रह्मा च मुनयः सर्वे पृथक्पृथग्जोद्भवम्॥ ५०<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं नीलकण्ठं वृषध्वजम्।<br>तान् देवाननुगृह्यैव भवोऽप्यन्तरधीयत॥ ५१ | देवदेवेश वृषभध्वज शंकरकी स्तुति की। उनके द्वारा स्तुत होकर महातेजस्वी शिवने उत्तम कर्मवाले उन दक्षको विविध वर प्रदान करके उन्हें गाणपत्य [पद] प्रदान किया॥ ४७-४८१/२॥<br>तब सभी देवताओंने देवेश परमेश्वरकी स्तुति की। भगवान् नारायणने भी हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। ब्रह्मा तथा सभी मुनियोंने भी ब्रह्माकी सृष्टि करनेवाले देवदेवेश नीलकण्ठ वृषभध्वजकी पृथक्-पृथक् स्तुति की। इसके बाद उन देवताओंपर अनुग्रह करके शिवजी भी अन्तर्धान हो गये॥ ४९-५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवकृकदक्षयज्ञविध्वंसनो नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवकृत दक्षयज्ञविध्वंसन' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १००॥
एक सौ एकवाँ अध्याय
सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना
| ऋषय ऊचुः<br>कथं हिमवतः पुत्री बभूवाम्बा सती शुभा।<br>कथं वा देवदेवेशमवाप पतीमीश्वरम्॥ १ | ऋषिगण बोले—कल्याणमयी अम्बा सती हिमवान्की पुत्री कैसे हुईं और उन्होंने देवदेवेश महेश्वरको पतिके रूपमें कैसे प्राप्त किया?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>सा मेनातनुमाश्रित्य स्वेच्छयैव वराङ्गना।<br>तदा हैमवती जज्ञे तपसा च द्विजोत्तमाः॥ २<br>जातकर्मादिकाः सर्वाश्चकार च गिरीश्वरः।<br>द्वादशे च तदा वर्षे पूर्णे हैमवती शुभा॥ ३<br>तपस्तेपे तया सार्धमनुजा च शुभानना।<br>अन्या च देवी ह्यनुजा सर्वलोकनमस्कृता॥ ४ | सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजो! उस श्रेष्ठ अंगनाने तपस्याके द्वारा अपनी इच्छासे मेनाके शरीरका आश्रय लेकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया। पर्वतराजने उसके जातकर्म आदि समस्त संस्कार सम्पन्न किये। तब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हिमवान्की वह सुन्दर पुत्री तपस्या करने लगी; उसके साथ सुन्दर मुखवाली उसकी छोटी बहन और सर्वलोकनमस्कृत एक दूसरी छोटी बहन भी थी॥ २-४॥ |
| ऋषयश्च तदा सर्वे सर्वलोकमहेश्वरीम्।<br>तुष्टुवुस्तपसा देवीं समावृत्य समन्ततः॥ ५ | तब सभी ऋषि सभी लोकोंकी महेश्वरी उस देवीको चारों ओरसे घेरकर तपके लिये उसकी स्तुति करने लगे॥ ५॥ |
| ज्येष्ठा ह्यपर्णा ह्यनुजा चैकपर्णा शुभानना।<br>तृतीया च वरारोहा तथा चैवैकपाटला॥ ६ | उनमें सबसे बड़ी अपर्णा थी, उससे छोटी सुन्दर मुखवाली एकपर्णा थी और तीसरी परम सुन्दरी एकपाटला [नामवाली] थी। महादेवी पार्वतीकी तपस्यासे |
| तपसा च महादेव्याः पार्वत्याः परमेश्वरः।<br>वशीकृतो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः॥ ७ |
अध्याय १०१] सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य ५३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सभी प्राणियोंके स्वामी परमेश्वर महादेव शिव [उनके] वशमें हो गये॥ ६-७॥ | |
| एतस्मिन्नेव काले तु तारको नाम दानवः।<br>तारात्मजो महातेजा बभूव दितिनन्दनः॥ ८<br><br>तस्य पुत्रास्त्रयश्चापि तारकाक्षो महासुरः।<br>विद्युन्माली च भगवान् कमलाक्षश्च वीर्यवान्॥ ९<br><br>पितामहस्तथा चैषां तारो नाम महाबलः।<br>तपसा लब्धवीर्यश्च प्रसादाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १०<br><br>सोऽपि तारो महातेजास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>विजित्य समरे पूर्वं विष्णुं च जितवानसौ॥ ११ | इसी समय तारक नामवाला एक दानव हुआ; दितिको आनन्दित करनेवाला वह तारपुत्र (तारक) महातेजस्वी था। उसके तीन पुत्र थे—महान् असुर तारकाक्ष, भाग्यशाली विद्युन्माली और पराक्रमी कमलाक्ष। तार नामक इनके महाबली पितामहने प्रभु ब्रह्माकी कृपासे [अपनी] तपस्याके द्वारा [अतुलनीय] पराक्रम प्राप्त कर लिया था। उस महातेजस्वी तारने चराचरसहित तीनों लोकोंको जीतकर संग्राममें विष्णुको भी जीत लिया था॥ ८–११॥ |
| तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दिवारात्रमविश्रमम्॥ १२<br><br>सरथं विष्णुमादाय चिक्षेप शतयोजनम्।<br>तारेण विजितः संख्ये दुद्राव गरुडध्वजः॥ १३<br><br>तारो वराञ्छतगुणं लब्ध्वा शतगुणं बलम्।<br>पितामहाज्जगत्सर्वमवाप दितिनन्दनः॥ १४<br><br>देवेन्द्रप्रमुखाञ्जित्वा देवान् देवेश्वरेश्वरः।<br>वारयामास तैर्देवान् सर्वलोकेषु मायया॥ १५ | उन दोनोंमें दिन-रात बिना विश्रामके (निरन्तर) एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त भयानक तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उसने रथसहित विष्णुको पकड़कर सौ योजन दूर फेंक दिया। तारके द्वारा युद्धमें पराजित होकर विष्णु भाग गये। ब्रह्मासे एक सौ वर तथा सैकड़ों गुना बल प्राप्त करके दितिनन्दन तारने सम्पूर्ण जगत्पर अधिकार कर लिया। देवेन्द्र आदि देवताओंको जीतकर देवेश्वरेश्वरके रूपमें होकर उसने अपनी मायासे देवताओंको सभी लोकोंमें उनके कार्योंसे वंचित कर दिया॥ १२–१५॥ |
| देवताश्च सहेन्द्रेण तारकाद्यपीडिताः।<br>न शान्तिं लेभिरे शूराः शरणं वा भयार्दिताः॥ १६<br><br>तदामरपतिः श्रीमान् सन्निपत्यामरप्रभुः।<br>उवाचाङ्गिरसं देवो देवानार्माप सन्निधौ॥ १७ | इन्द्रसहित देवतागण तारकासुरके भयसे पीड़ित हो गये; वीर होते हुए भी वे भयग्रस्त होनेके कारण [कहीं भी] शान्ति अथवा शरण प्राप्त नहीं कर सके। तब देवताओंके स्वामी श्रीमान् प्रभु इन्द्र बृहस्पतिकी शरणमें जाकर देवताओंकी उपस्थितिमें उनसे कहने लगे॥ १६-१७॥ |
| भगवंस्तारको नाम तारजो दानवोत्तमः।<br>तेन सन्निहता युद्धे वत्सा गोपत्तिना यथा॥ १८<br><br>भयात्तस्मान्महाभाग बृहद्युद्धे बृहस्पते।<br>अनिकेता भ्रमन्त्येते शकुन्ता इव पञ्जरे॥ १९ | हे भगवन्! तारसे उत्पन्न तारक नामक एक महादानव है; उसने युद्धमें हमलोगोंको उसी तरह आहत किया है, जैसे बैल बछड़ोंको आहत कर देता है। अतः हे महाभाग! हे बृहस्पते! भयके कारण इस विशाल युद्धमें देवतालोग आश्रयविहीन होकर उसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं, जैसे पिँजरेमें पक्षी। हे अंगिरोवर! हमलोगोंके जो अस्त्र पहले |
५३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्माकं यान्यमोघानि आयुधान्यङ्गिरोवर।<br>तानि मोघानि जायन्ते प्रभावादमरद्विषः॥ २०<br><br>दशवर्षसहस्राणि द्विगुणानि बृहस्पते।<br>विष्णुना योधितो युद्धे तेनापि न च सूदितः॥ २१<br><br>यस्तेनानिर्जितो युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>कथमस्मद्विधस्तस्य स्थास्यते समरेऽग्रतः॥ २२ | अमोघ थे, वे उस देवशत्रुके प्रभावके कारण निष्फल हो गये हैं। हे बृहस्पते ! विष्णुने बीस हजार वर्षोंतक उसके साथ युद्ध किया; किंतु वह उनके भी द्वारा युद्धमें नहीं मारा गया। महाशक्तिसम्पन्न विष्णुके द्वारा भी युद्धमें जो जीता नहीं जा सका, तब हम-जैसे लोग युद्धमें उसके समक्ष कैसे टिक सकते हैं ?॥ १८-२२॥ |
| एवमुक्तस्तु शक्रेण जीवः सार्धं सुराधिपैः।<br>सहस्राक्षेण च विभुं सम्प्राप्याह कुशध्वजम्॥ २३ | इन्द्रके ऐसा कहनेपर श्रेष्ठ देवताओं तथा इन्द्रको साथ लेकर बृहस्पतिने विभु ब्रह्माके पास पहुँचकर [सब कुछ] बताया॥ २३॥ |
| सोऽपि तस्य मुखाच्छ्रुत्वा प्रणयात्प्रणतार्तिहा।<br>देवैरशेषैः सेन्द्रैस्तु जीवमाह पितामहः॥ २४ | उनके मुखसे [सारा वृत्तान्त] सुनकर शरणागतोंका कष्ट दूर करनेवाले उन पितामहने इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ आये हुए बृहस्पतिसे प्रेमपूर्वक कहा— |
| जाने वोऽर्तिं सुरेन्द्राणां तथापि शृणु साम्प्रतम्।<br>विनिन्द्य दक्षं या देवी सती रुद्राङ्गसम्भवा॥ २५ | मैं आप सब देवताओंकी विपत्तिको जानता हूँ; फिर भी इस समय सुनिये। रुद्रके अंगसे उत्पन्न जो देवी सती हैं, वे दक्षकी निन्दा करके |
| उमा हैमवती जज्ञे सर्वलोकनमस्कृता।<br>तस्याश्चैवेह रूपेण यूयं देवाः सुरोत्तमाः॥ २६ | समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत उमाके रूपमें हिमवान्की पुत्री होकर उत्पन्न हुई हैं। हे उत्तम देवताओं! आप देवतागण उन्हींके रूपके द्वारा |
| विभोर्यतध्वमाक्रष्टुं रुद्रस्यास्य मनो महत्।<br>तयोर्योगेन सम्भूतः स्कन्दः शक्तिधरः प्रभुः॥ २७ | इन विभु रुद्रके महान् मनको आकृष्ट करानेका प्रयत्न कीजिये। उन दोनोंके संयोगसे शक्तिधर प्रभु स्कन्द उत्पन्न होंगे; वे षडास्य (छः मुखवाले), |
| अध्याय १०१ ] | सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य | ५३७ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| षडास्यो द्वादशभुजः सेनानीः पावकिः प्रभुः।<br>स्वाहेयः कार्तिकेयश्च गाङ्गेयः शरधामजः॥ २८<br><br>देवः शाखो विशाखश्च नैगमेशश्च वीर्यवान्।<br>सेनापतिः कुमाराख्यः सर्वलोकनमस्कृतः॥ २९<br><br>लीलयैव महासेनः प्रबलं तारकासुरम्।<br>बालोऽपि विनिहत्यैको देवान् सन्तारयिष्यति॥ ३० | द्वादशभुज (बारह भुजाओंवाले), सेनानी, पावकि, प्रभु, स्वाहेय, कार्तिकेय, गांगेय, शरधामज, देव, शाख, विशाख, नैगमेश, वीर्यवान्, सेनापति और कुमार नामवाले होकर सभी लोकोंसे नमस्कृत होंगे। वे महासेन बालक होते हुए भी बिना प्रयासके अकेले ही [उस] महाबली तारकासुरका वध करके देवताओंका उद्धार करेंगे॥ २४—३०॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>बृहस्पतिस्तथा सेन्द्रैर्देवैर्देवं प्रणम्य तम्॥ ३१<br><br>मेरोः शिखरमासाद्य स्मरं सस्मार सुव्रतः।<br>स्मरणाद्देवदेवस्य स्मरोऽपि सह भार्यया॥ ३२<br><br>रत्या समं समागम्य नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>सशक्रमह तं जीवं जगज्जीवो द्विजोत्तमाः॥ ३३<br><br>स्मृतो यद्भवता जीव सम्प्राप्तोऽहं तवान्तिकम्।<br>ब्रूहि यन्मे विधातव्यं तमाह सुरपूजितः॥ ३४<br><br>तमाह भगवान् शक्रः सम्भाव्य मकरध्वजम्।<br>शङ्करेणाम्बिकामद्य संयोजय यथासुखम्॥ ३५<br><br>तया स रमते येन भगवान् वृषभध्वजः।<br>तेन मार्गेण मार्गस्व पत्न्या रत्यानया सह॥ ३६<br><br>सोऽपि तुष्टो महादेवः प्रदास्यति शुभां गतिम्।<br>विप्रयुक्तस्तया पूर्वं लब्ध्वा तां गिरिजामुमाम्॥ ३७ | तब उन परमेष्ठी ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ सुव्रत बृहस्पतिने देवदेव उन ब्रह्माको प्रणाम करके मेरुके शिखरपर पहुँचकर कामदेवका स्मरण किया। हे श्रेष्ठ द्विजो! देवगुरु ब्रह्माके स्मरण करनेसे जगत्का जीवस्वरूप कामदेव भी [अपनी] भार्या रतिके साथ वहाँ आकर हाथ जोड़कर नमस्कार करके इन्द्रसहित उन बृहस्पतिसे बोला—‘हे बृहस्पते! आपने मेरा स्मरण किया है, अतः मैं आपके पास आया हूँ; मुझे जो करना हो, उसे बताइये।’ तब देवपूजित बृहस्पति उससे कुछ बोलने ही वाले थे कि उत्सुकतावश भगवान् इन्द्रने कामदेवकी प्रशंसा करके उससे कहा—‘अब आप सुखपूर्वक शंकरके साथ अम्बिकाका संयोग कराइये। वे भगवान् वृषभध्वज जिस भी उपायसे उनके साथ रमण करें; अपनी पत्नी रतिके साथ आप उस उपायको खोजिये। पहलेसे ही उन [अम्बिका]-से वियुक्त हुए वे महादेव भी उन पार्वती उमाको [पुनः] प्राप्त करके प्रसन्न होकर आपको शुभ गति प्रदान करेंगे’॥ ३१—३७॥ |
| एवमुक्तो नमस्कृत्य देवदेवं शचीपतिम्।<br>देवदेवाश्रमं गन्तुं मतिं चक्रे तया सह॥ ३८<br><br>गत्वा तदाश्रमे शम्भोः सह रत्या महाबलः।<br>वसन्तेन सहायेन देवं योक्तुमनाभवत्॥ ३९ | उनके ऐसा कहनेपर देवदेव इन्द्रको नमस्कार करके कामदेवने उस [रति]-के साथ शंकरजीके आश्रममें जानेका निश्चय किया। तब रति तथा अपने सहायक वसन्तके साथ शिवजीके आश्रममें जाकर महाबली कामदेवने पार्वतीके साथ महादेवका संयोग करानेका मन बनाया॥ ३८-३९॥ |
| ततः सम्प्रेक्ष्य मदनं हसन् देवस्त्रियम्बकः।<br>नयनेन तृतीयेन सावज्ञं तमवैक्षत॥ ४०<br><br>ततोऽस्य नेत्रजो वह्निर्मदनं पार्श्वतः स्थितम्।<br>अदहत्तत्क्षणादेव ललाप करुणं रतिः॥ ४१ | तत्पश्चात् कामदेवको देखकर हँसते हुए त्रिनेत्र शिवने अवज्ञापूर्वक उसे [अपने] तीसरे नेत्रसे देखा। इसके बाद उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने पासमें ही खड़े कामदेवको उसी क्षण जला दिया। तब रति करुण |
१०२- पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| ५३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रत्याः प्रलापमाकर्ण्य देवदेवो वृषध्वजः।<br>कृपया परया प्राह कामपत्नीं निरीक्ष्य च॥ ४२<br><br>अमूर्तोऽपि ध्रुवं भद्रे कार्यं सर्वं पतिस्तव।<br>रतिकाले ध्रुवं भद्रे करिष्यति न संशयः॥ ४३<br><br>यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशाः।<br>शापाद् भृगोर्महातेजाः सर्वलोकहिताय वै॥ ४४<br><br>तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति।<br>सा प्रणम्य तदा रुद्रं कामपत्नी शुचिस्मिता॥ ४५<br><br>जगाम मदनं लब्ध्वा वसन्तेन समन्विता॥ ४६ | विलाप करने लगी। रतिके विलापको सुनकर देवदेव वृषध्वजने परम कृपासे कामदेवकी पत्नीकी ओर देखकर उससे कहा—'हे भद्रे! तुम्हारा पति देहरहित होते हुए भी रतिकालमें निश्चित रूपसे सम्पूर्ण कार्य करेगा; हे भद्रे! इसमें सन्देह नहीं है। जब [भगवान्] विष्णु भृगुके शापसे सभी लोकोंके हितके लिये महायशस्वी तथा महातेजस्वी वासुदेव (वसुदेवपुत्र)-के रूपमें अवतीर्ण होंगे, तब उनका [प्रद्युम्न नामक] जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुम्हारा पति होगा'॥ ४०—४४¹/₂॥<br><br>इसके बाद रुद्रको प्रणाम करके पवित्र मुसकानवाली वह कामपत्नी अनंगको प्राप्त करके वसन्तके साथ चली गयी॥ ४५-४६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मदनदाहो नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मदनदाह' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तपसा च महादेव्याः पार्वत्या वृषभध्वजः।<br>प्रीतश्च भगवान् शर्वो वचनाद् ब्रह्मणस्तदा॥ १<br><br>हिताय चाश्रमाणां च क्रीडार्थं भगवान् भवः।<br>तदा हैमवतीं देवीमुपयेमे यथाविधि॥ २<br><br>जगाम स स्वयं ब्रह्मा मरीच्याद्यैर्महर्षिभिः।<br>तपोवनं महादेव्याः पार्वत्याः पद्मसम्भवः॥ ३<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तां देवीं स जगतोऽरणीम्।<br>किमर्थं तपसा लोकान् सन्तापयसि शैलजे॥ ४<br><br>त्वया सृष्टं जगत्सर्वं मातस्त्वं मा विनाशय।<br>त्वं हि सन्धारये लोकानिमान् सर्वान् स्वतेजसा॥ ५<br><br>सर्वदेवेश्वरः श्रीमान् सर्वलोकपतिर्भवः।<br>यस्य वै देवदेवस्य वयं किङ्करवादिनः॥ ६ | [हे ऋषियो!] भगवान् वृषभध्वज शर्व पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो गये। इसके बाद ब्रह्माजीके कहनेसे भगवान् भवने सभी आश्रमोंके हितके लिये और क्रीड़ा करनेके लिये विधिपूर्वक पार्वतीके साथ विवाह किया॥ १-२॥<br><br>उस समय कमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी स्वयं मरीचि आदि महर्षियोंके साथ महादेवी पार्वतीके तपोवनमें गये थे। उन्होंने जगत्की निमित्तकारणस्वरूपा उन देवीकी प्रदक्षिणा करके कहा—'हे शैलजे! आप तपस्यासे लोकोंको किसलिये संतप्त कर रही हैं? हे मातः! आपने ही सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया है, अतः आप इसका विनाश मत कीजिये; आप अपने तेजसे इन समस्त लोकोंको धारण कीजिये। श्रीमान् शिवजी सभी देवताओंके ईश्वर तथा सभी लोकोंके स्वामी हैं। |
| अध्याय १०२] | पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना | ५३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स एवं परमेशानः स्वयं च वरयिष्यति।<br>वरदे येन सृष्टासि न विना यस्त्वयाम्बिके॥ ७<br><br>वर्तते नात्र सन्देहस्तव भर्ता भविष्यति। | हमलोग जिन देवाधिदेवके सेवक कहे जाते हैं, वे परमेश्वर ही स्वयं आपका वरण करेंगे। हे वरदे! जिन्होंने आपका सृजन किया है और हे अम्बिके! जो आपके बिना रह नहीं सकते; वे [शिवजी] आपके पति होंगे; इसमें सन्देह नहीं है'॥ ३—७½॥ |
| इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य मुहुः सम्प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ ८<br><br>गते पितामहे देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुं द्विजरूपेण चाश्रमम्॥ ९ | ऐसा कहकर उन पार्वतीको नमस्कार करके बार-बार उनकी ओर देखकर पितामह (ब्रह्मा)-के चले जानेपर भगवान् परमेश्वर [शिव] अनुग्रह करनेके लिये ब्राह्मणके रूपमें उस आश्रममें गये॥ ८-९॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवं द्विजरूपेण संस्थितम्।<br>प्रतिभाद्यैः प्रभुं ज्ञात्वा ननाम वृषभध्वजम्॥ १०<br><br>सम्पूज्य वरदं देवं ब्राह्मणं छद्मनागतम्।<br>तुष्टाव परमेशानं पार्वती परमेश्वरम्॥ ११ | द्विजरूपसे उपस्थित महादेवको देखकर उन पार्वतीने उनकी दीप्ति आदिके द्वारा उन्हें भगवान् वृषभध्वज जानकर प्रणाम किया। ब्राह्मणके छद्मरूपमें आये हुए वरदाता महादेवकी पूजा करके पार्वतीने उन परमेशान परमेश्वरकी स्तुति की॥ १०-११॥ |
| अनुगृह्य तदा देवीमुवाच प्रहसन्निव।<br>कुलधर्माश्रयं रक्षन् भूधरस्य महात्मनः॥ १२<br><br>क्रीडार्थं च सतां मध्ये सर्वदेवपतिर्भवः।<br>स्वयंवरे महादेवि तव दिव्यसुशोभने॥ १३<br><br>आस्थाय रूपं यत्सौम्यं समेष्येऽहं सह त्वया। | तदनन्तर देवीपर अनुग्रह करके शिवजी हँसते हुए बोले—'हे महादेवि! सभी देवताओंका स्वामी मैं शिव महात्मा हिमालयके कुलधर्मकी परम्पराकी रक्षा करता हुआ क्रीड़ा करनेके लिये सज्जनोंके मध्य तुम्हारे दिव्य तथा अतिसुन्दर स्वयंवरमें सौम्य रूप धारण करके तुमसे मिलूँगा'॥ १२-१३½॥ |
| इत्युक्त्वा तां समालोक्य देवो दिव्येन चक्षुषा॥ १४<br><br>जगामेष्टं तदा दिव्यं स्वपुरं प्रययौ च सा।<br>दृष्ट्वा हृष्टस्तदा देवीं मेनया तुहिनाचलः॥ १५ | ऐसा कह करके उन्हें दिव्य दृष्टिसे देखकर शिवजी अपने अभीष्ट (प्रिय) दिव्य लोकको चले गये |
| ५४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आलिङ्ग्याघ्राय सम्पूज्य पुत्रीं साक्षात्तपस्विनीम्।<br>दुहितुर्देवदेवेन न जानन्नभिमन्त्रितम्॥ १६<br>स्वयंवरं तदा देव्याः सर्वलोकेष्वघोषयत्।<br>अथ ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः साक्षाज्जनार्दनः॥ १७ | और इसके बाद वे भी चली गयीं। तब देवीको देखकर मैनासहित हिमालय साक्षात् तपस्विनी अपनी पुत्रीका आलिंगन करके, उनका मस्तक सूंघकर और उनकी पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् देवाधिदेव [शिव]-द्वारा अपनी पुत्रीको दिये गये संकेतको न जानते हुए भी हिमालयने सभी लोकोंमें देवीके स्वयंवरकी घोषणा कर दी॥ १४-१६१/२॥ |
| शक्रश्च भगवान् वह्निर्भास्करो भग एव च।<br>त्वष्टार्यमा विवस्वांश्च यमो वरुण एव च॥ १८<br>वायुः सोमस्तथेशानो रुद्राश्च मुनयस्तथा।<br>अश्विनौ द्वादशादित्या गन्धर्वा गरुडस्तथा॥ १९<br>यक्षाः सिद्धास्तथा साध्या दैत्याः किंपुरुषोरगाः।<br>समुद्राश्च नदा वेदा मन्त्राः स्तोत्रादयः क्षणाः॥ २०<br>नागाश्च पर्वताः सर्वे यज्ञाः सूर्यादयो ग्रहाः।<br>त्रयस्त्रिंशच्च देवानां त्रयश्च त्रिशतं तथा॥ २१<br>त्रयश्च त्रिसहस्रं च तथान्ये बहवः सुराः।<br>जग्मुर्गिरीन्द्रपुत्र्यास्तु स्वयंवरमनुत्तमम्॥ २२ | इसके अनन्तर ब्रह्मा, साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु, ऐश्वर्यशाली इन्द्र, अग्निदेव, सूर्य, भग, त्वष्टा, अर्यमा, विवस्वान्, यम, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सभी रुद्र, मुनिगण, दोनों अश्विनीकुमार, बारहों आदित्य, समस्त गन्धर्व, गरुड़, यक्ष, सिद्ध, साध्य, दैत्य, किंपुरुष, उरग, समुद्र, नद, वेद, मन्त्र, स्तोत्र आदि, क्षण, नाग, पर्वत, सभी यज्ञ, सूर्य आदि ग्रह, वसु, रुद्र तथा आदित्य आदि तैंतीस देवताओंके भेद-प्रभेदरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन, तीन सौ तथा तीन हजार तीन देवता तथा अन्य बहुत-से देवता पर्वतराजकी पुत्रीके अत्युत्तम स्वयंवरमें पहुँचे॥ १७-२२॥ |
| अथ शैलसुता देवी हैममारुह्य शोभनम्।<br>विमानं सर्वतोभद्रं सर्वरत्नैरलङ्कृतम्॥ २३<br>अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिः सर्वाभरणभूषितैः।<br>गन्धर्वैःसिद्धैर्विविधैः किन्नरैश्च सुशोभनैः॥ २४<br>वन्दिभिः स्तूयमाना च स्थिता शैलसुता तदा।<br>सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं चावहत्तथा॥ २५<br>मालिनी गिरिपुत्र्यास्तु सन्ध्यापूर्णेन्दुमण्डलम्।<br>चामरासक्तहस्ताभिर्दिव्यस्त्रीभिश्च संवृता॥ २६<br>मालां गृह्य जया तस्थौ सुरद्रुमसमुद्भवाम्।<br>विजया व्यजनं गृह्य स्थिता देव्याः समीपगा॥ २७ | तदनन्तर पार्वती देवी स्वर्णनिर्मित तथा सभी रत्नोंसे अलंकृत सर्वतोभद्र नामक उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर नृत्य करती हुई अप्सराओं, सभी आभूषणोंसे विभूषित विविध गन्धर्वों, सिद्धों तथा परम सुन्दर किन्नरोंके साथ और बन्दीजनोंद्वारा स्तुत होती हुई वहाँ उपस्थित हुईं। [उनकी सखी] मालिनी रत्नकिरणोंसे मिश्रित श्वेत वर्णका सन्ध्याकालीन चन्द्रमण्डलसदृश छत्र [उन] पार्वतीके ऊपर लगाये हुए थी। वे पार्वती हाथोंमें चँवर लिये हुई दिव्य स्त्रियोंसे घिरी हुई थीं। कल्पवृक्षके पुष्पोंसे निर्मित माला [हाथमें] लेकर जया [नामक सखी] खड़ी थी और विजया व्यजन (पंखा) लेकर देवीके समीप खड़ी थी॥ २३-२७॥ |
| मालां प्रगृह्य देव्यां तु स्थितायां देवसंसदि।<br>शिशुर्भूत्वा महादेवः क्रीडार्थं वृषभध्वजः॥ २८<br>उत्सङ्गतलसंसुप्तो बभूव भगवान् भवः।<br>अथ दृष्ट्वा शिशुं देवास्तस्या उत्सङ्गवर्तिनम्॥ २९<br>कोऽयमत्रेति सम्मन्त्र्य चुक्षुभुश्च समागताः।<br>वज्रमाहारयत्तस्य बाहुमुद्यम्य वृत्रहा॥ ३० | देवताओंकी सभामें [अपने हाथमें] माला लेकर देवी पार्वतीके स्थित होनेपर भगवान् वृषभध्वज भव महादेव क्रीड़ा करनेके लिये एक शिशुके रूपमें होकर देवीकी गोदमें सोये हुएकी भाँति स्थित हो गये। तब उनकी गोदमें स्थित शिशुको देखकर 'यहाँपर यह कौन है'—ऐसा विचार करके [वहाँ] उपस्थित देवतागण |
अध्याय १०२] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४१
| स बाहुरुद्यमस्तस्य तथैव समुपस्थितः।<br>स्तम्भितः शिशुरूपेण देवदेवेन लीलया ॥ ३१<br><br>वज्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहुं चालयितुं तथा।<br>वह्निः शक्तिं तथा क्षेप्तुं न शशाक तथा स्थितः ॥ ३२ | क्षुब्ध हो उठे॥ २८-२९ १/२ ॥<br><br>वृत्रासुरका संहार करनेवाले इन्द्रने भुजा उठाकर उस [शिशु]-के ऊपर वज्र चलाना चाहा, किंतु उनका उठा हुआ वह बाहु वैसा ही रह गया। शिशुरूपधारी देवदेव [शिव]-के द्वारा लीलापूर्वक स्तम्भित कर दिये गये वे इन्द्र वज्र फेंकने तथा अपनी भुजा चलानेमें समर्थ नहीं हुए। [इसी प्रकार] अग्निदेव भी अपनी शक्ति चलानेमें समर्थ नहीं हुए और वैसे ही खड़े रह गये॥ ३०-३२॥ |
| यमोऽपि दण्डं खड्गं च निर्ऋतिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>वरुणो नागपाशं च ध्वजयष्टिं समीरणः ॥ ३३<br><br>सोमो गदां धनेशश्च दण्डं दण्डभृतां वरः।<br>ईशानश्च तथा शूलं तीव्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३४<br><br>रुद्राश्च शूलमादित्या मुशलं वसवस्तथा।<br>मुद्गरं स्तम्भिताः सर्वे देवेनाशु दिवौकसः ॥ ३५<br><br>स्तम्भिता देवदेवेन तथान्ये च दिवौकसः। | हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार यम अपने दण्डको, निर्ऋति अपने खड्गको, वरुण अपने नागपाशको, वायुदेव अपने ध्वजदण्डको, सोम अपनी गदाको, दण्डधारियोंमें श्रेष्ठ कुबेर अपने दण्डको तथा ईशान अपने तीक्ष्ण त्रिशूलको उठाकर खड़े ही रह गये। सभी रुद्र शूलको, सभी आदित्य मुसलको तथा वसुगण मुद्गरको उठाये ही रह गये; सभी देवता शीघ्र ही महादेवके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये। [इसी प्रकार] देवाधिदेवने अन्य देवताओंको भी स्तम्भित कर दिया॥ ३३-३५ १/२॥ |
| शिरः प्रकम्पयन् विष्णुश्चक्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३६<br><br>तस्यापि शिरसो बालः स्थिरत्वं प्रचकार ह।<br>चक्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहूंचालयितुं न च ॥ ३७<br><br>पूषा दन्तान् दशन् दन्तैर्बालमैक्षत मोहितः।<br>तस्यापि दशनाः पेतुर्दृष्टमात्रस्य शम्भुना ॥ ३८ | विष्णु [अपने] सिरको हिलाते हुए चक्र उठाकर खड़े रहे। उस बालकने उनके भी सिरको स्थिर कर दिया। वे [विष्णु] अपना चक्र फेंकने तथा बाहुओंको चलानेमें समर्थ नहीं हुए। पूषाने मोहित होकर अपने दाँतोंसे दाँतोंको किटकिटाते हुए उस बालककी ओर देखा। शिवके देखनेमात्रसे ही उसके दाँत गिर गये। |
| ५४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बलं तेजश्च योगं च तथैवास्तम्भयद्विभुः।<br>अथ तेषु स्थितेष्वेव मन्युमत्सु सुरेष्वपि ॥ ३९ | उसी प्रकार विभु शिवने सबके बल, तेज तथा योगको स्तम्भित कर दिया॥ ३६–३८ १/२॥ |
| ब्रह्मापरमसंविग्नो ध्यानमास्थाय शङ्करम्।<br>बुबुधे देवमीशानमुमोत्सङ्गे तमास्थितम्॥ ४०<br>स बुद्ध्वा देवमीशानं शीघ्रमुत्थाय विस्मितः।<br>ववन्दे चरणौ शम्भोरस्तुवच्च पितामहः॥ ४१<br>पुराणैः सामसङ्गीतैः पुण्याख्यैर्गुह्यनामभिः। | इसके बाद क्रोधमें भरे हुए उन समस्त देवताओंके स्तम्भित हो जानेपर अत्यन्त व्याकुल ब्रह्माने शंकरका ध्यान करके यह जान लिया कि उमाकी गोदमें वे भगवान् ईशान ही विराजमान हैं। ईशानदेवको पहचानकर शीघ्र उन्हें उठाकर विस्मित हुए पितामहने शम्भुके चरणोंकी वन्दना की और प्राचीन सामगानों, उनके पवित्र नामों तथा गुप्त नामोंके द्वारा उनकी स्तुति की॥ ३९–४१ १/२॥ |
| स्रष्टा त्वं सर्वलोकानां प्रकृतेश्च प्रवर्तकः॥ ४२<br>बुद्धिस्त्वं सर्वलोकानामहङ्कारस्त्वमीश्वरः।<br>भूतानामिन्द्रियाणां च त्वमेवेश प्रवर्तकः॥ ४३<br>तवाहं दक्षिणादङ्गात्सृष्टः पूर्वं पुरातनः।<br>वामहस्तान्महाबाहो देवो नारायणः प्रभुः॥ ४४<br>इयं च प्रकृतिर्देवी सदा ते सृष्टिकारण।<br>पत्नीरूपं समास्थाय जगत्कारणमागता॥ ४५<br>नमस्तुभ्यं महादेव महादेव्यै नमो नमः।<br>प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः॥ ४६<br>देवाद्यास्तु इमाः सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः।<br>कुरु प्रसादमैतेषां यथापूर्वं भवन्त्विमे॥ ४७ | [ब्रह्माने कहा—] आप समस्त लोकोंके स्रष्टा तथा प्रकृतिके प्रवर्तक हैं। आप सभी लोकोंकी बुद्धि एवं अहंकार हैं। आप ईश्वर हैं। हे ईश! आप ही सभी प्राणियोंकी इन्द्रियोंके प्रवर्तक हैं। हे महाबाहो! सर्वप्रथम आपके दाहिने हाथसे पुरातन मैं [ब्रह्मा] उत्पन्न हुआ हूँ और बायें हाथसे भगवान् प्रभु नारायण उत्पन्न हुए हैं। हे सृष्टिकारण! ये देवी प्रकृति सर्वदा आपकी पत्नीका रूप धारणकर जगत्की कारणभूता बनी हैं। हे महादेव! आपको नमस्कार है; महादेवीको बार-बार नमस्कार है। हे देवेश! मैंने आपकी कृपासे तथा आपके आदेशसे इन प्रजाओं तथा देवता आदिका सृजन किया है। आपके योगसे मोहित होकर ये देवगण अब मूढ़ताको प्राप्त हो गये हैं। अब आप इनपर अनुग्रह कीजिये, जिससे ये पूर्वकी भाँति हो जायँ॥ ४२–४७॥ |
| सूत उवाच<br>विज्ञाप्यैवं तदा ब्रह्मा देवदेवं महेश्वरम्।<br>संस्तम्भितांस्तदा तेन भगवानाह पद्मजः॥ ४८<br>मूढास्थ देवताः सर्वा नैव बुध्यत शङ्करम्।<br>देवदेवमिहायान्तं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ४९<br>गच्छध्वं शरणं शीघ्रं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>सनारायणकाः सर्वे मुनिभिः शङ्करं प्रभुम्॥ ५०<br>सार्धं मयैव देवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>अनया हैमवत्या च प्रकृत्या सह सत्तमम्॥ ५१ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इस प्रकार देवदेव महेश्वरका स्तवन करके पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने उन [शिव]-के द्वारा स्तम्भित किये गये देवताओंसे कहा— मूढ़ताको प्राप्त आप सभी देवताओंने सभी देवोंसे नमस्कृत होनेवाले यहाँ आये हुए देवदेव शंकरको नहीं पहचाना। हे देवताओ! इन्द्र आदि आप सभी देवगण नारायणको, सभी मुनियोंको तथा मुझको साथ लेकर इन प्रकृतिस्वरूपा पार्वतीके साथ विराजमान सर्वश्रेष्ठ, प्रभु, देवेश, परमात्मा, ईश्वर शंकरकी शरणमें शीघ्र चलिये॥ ४८–५१॥ |
| तत्र ते स्तम्भितास्तेन तथैव सुरसत्तमाः।<br>प्रणेमुर्मनसा सर्वे सनारायणकाः प्रभुम्॥ ५२ | तब उन शिवके द्वारा वहाँपर स्तम्भित किये गये नारायणसहित उन सभी श्रेष्ठ देवताओंने प्रभु [शिव]-को मनसे प्रणाम किया॥ ५२॥ |
| अथ तेषां प्रसन्नोऽभूद्देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>यथापूर्वं चकाराशु वचनाद् ब्रह्मणः प्रभुः॥ ५३ | इसके बाद देवदेव त्रिलोचन [शिव] उनपर |
अध्याय १०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत एवं प्रसन्ने तु सर्वदेवनिवारणम्।<br>वपुश्चकार देवेशो दिव्यं परममद्भुतम्॥ ५४॥ | प्रसन्न हो गये और उन प्रभुने ब्रह्माके वचनानुसार सबको पूर्वकी भाँति कर दिया॥ ५३॥<br>इस प्रकार प्रसन्न हो जानेपर उन देवेश्वरने सभी देवताओंके द्वारा न देखे जा सकनेवाला, दिव्य तथा परम अद्भुत शरीर धारण किया॥ ५४॥ |
| तेजसा तस्य देवास्ते सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सनारायणकास्तथा॥ ५५॥<br><br>सयमाश्र्च सरुद्राश्च चक्षुरप्रार्थयन् विभुम्।<br>तेभ्यश्च परमं चक्षुः सर्वदृष्टौ च शक्तिमत्॥ ५६॥ | तब उनके तेजसे इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, साध्यगण, नारायण, यम, सभी रुद्र आदिके सहित वे देवता प्रतिहत (नष्ट) दृष्टिवाले हो गये। तब उन लोगोंने प्रभुसे [दिव्य] दृष्टिके लिये प्रार्थना की। इसपर उमापति शर्वने उन्हें सब कुछ देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टि प्रदान की; साथ ही उन्होंने भवानी तथा हिमालयको भी दिव्य दृष्टि दी॥ ५५-५६ १/२॥ |
| ददावम्बापतिः शर्वो भवान्याश्च चलस्य च।<br>लब्ध्वा चक्षुस्तदा देवा इन्द्रविष्णुपुरोगमाः॥ ५७॥<br><br>सब्रह्मकाः सशक्राश्च तमपश्यन् महेश्वरम्।<br>ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्णं भवानी च गिरीश्वरः॥ ५८॥<br><br>मुनयश्च महादेवं गणेशाः शिवसम्मताः।<br>ससृजुः पुष्पवृष्टिं च खेचराः सिद्धचारणाः॥ ५९॥<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुर्मुनयः प्रभुम्।<br>जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६०॥<br><br>मुमुहुर्गणपाः सर्वे मुमोदाम्बा च पार्वती।<br>तस्य देवी तदा हृष्टा समक्षं त्रिदिवौकसाम्॥ ६१॥ | तब दिव्य दृष्टि प्राप्त करके ब्रह्मा तथा शक्र-सहित इन्द्र, विष्णु आदि प्रधान देवताओंने उन महेश्वरका दर्शन किया। ब्रह्मा आदि देवताओं, भवानी (पार्वती), गिरीश्वर [हिमालय], मुनियों तथा शिवप्रिय गणेश्वरोंने शीघ्र ही महादेवको प्रणाम किया। आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने [उनपर] पुष्पवृष्टि की, देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, मुनिगण प्रभुकी स्तुति करने लगे, प्रधान गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं, सभी गणेश्वर आनन्दित हो उठे और अम्बा पार्वती भी आनन्दविभोर हो गयीं॥ ५७-६० १/२॥<br><br>उस समय आह्लादित देवी [पार्वती]-ने त्रिदेवोंके |
| पादयोः स्थापयामास मालां दिव्यां सुगन्धिनीम्।<br>साधु साध्विति सम्प्रोच्य तया तत्रैव चार्चितम्॥ ६२॥ | समक्ष उन शिवके चरणोंमें दिव्य तथा सुगन्धित माला |
१०३- भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना
| सहदेव्या नमश्चक्रुः शिरोभिर्भूतलाश्रितैः ।<br>सर्वे सब्रह्मका देवाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ६३ । | समर्पित कर दी। ब्रह्मा-यक्ष-उरग-राक्षसोंसहित सभी देवताओंने 'साधु-साधु' कहकर वहाँपर उन पार्वतीके द्वारा पूजित शिवको उन देवीसमेत पृथ्वीतलपर मस्तक टेककर प्रणाम किया॥ ६१–६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमास्वयंवरो नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमास्वयंवर' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०२॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अथ ब्रह्मा महादेवमभिवन्द्य कृताञ्जलिः।<br>उद्वाहः क्रियतां देव इत्युवाच महेश्वरम् ॥ १ | [हे ऋषियो!] इसके बाद ब्रह्माने हाथ जोड़कर महादेव महेश्वरको प्रणाम करके यह कहा—'हे देव! अब विवाह कीजिये'॥ १॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>यथेष्टमिति लोकेशं प्राह भूतपतिः प्रभुः ॥ २ | उन परमेष्ठी ब्रह्माका वह वचन सुनकर भूतपति शिवने लोकेश [ब्रह्मा]-से कहा—'जो आपकी इच्छा हो'॥ २॥ |
| उद्वाहार्थं महेशस्य तत्क्षणादेव सुव्रताः।<br>ब्रह्मणा कल्पितं दिव्यं पुरं रत्नमयं शुभम् ॥ ३ | हे सुव्रतो! ब्रह्माने महेशके विवाहके लिये उसी क्षण रत्नमय, दिव्य तथा सुन्दर नगरका निर्माण किया॥ ३॥ |
| अथादितिर्दितिः साक्षाद्दनुः कद्रूः सुकालिका।<br>पुलोमा सुरसा चैव सिंहिका विनता तथा ॥ ४<br>सिद्धिर्माया क्रिया दुर्गा देवी साक्षात्सुधा स्वधा।<br>सावित्री वेदमाता च रजनी दक्षिणा द्युतिः ॥ ५<br>स्वाहा स्वधा मतिर्बुद्धिर्ऋद्धिर्वृद्धिः सरस्वती।<br>राका कुहूः सिनीवाली देवी अनुमती तथा ॥ ६<br>धरणी धारणी चेला शची नारायणी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवानां मातरः पत्नयस्तथा ॥ ७<br>उद्वाहः शङ्करस्येति जग्मुः सर्वा मुदान्विताः।<br>उरगा गरुडा यक्षा गन्धर्वाः किन्नरा गणाः ॥ ८<br>सागरा गिरयो मेघा मासाः संवत्सरास्तथा।<br>वेदा मन्त्रास्तथा यज्ञाः स्तोमा धर्माश्च सर्वशः ॥ ९<br>हुङ्कारः प्रणवश्चैव प्रतिहाराः सहस्रशः।<br>कोटिरप्सरसो दिव्यास्तासां च परिचारिकाः ॥ १०<br>याश्च सर्वेषु द्वीपेषु देवलोकेषु निम्नगाः।<br>ताश्च स्त्रीविग्रहाः सर्वाः सज्जग्मुर्हृष्टमानसाः ॥ ११<br>गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः।<br>उद्वाहः शङ्करस्येति तत्राजग्मुर्मुदान्विताः ॥ १२ | इसके बाद अदिति, दिति, साक्षात् दनु, कद्रू, सुकालिका, पुलोमा, सुरसा, सिंहिका, विनता, सिद्धि, माया, क्रिया, साक्षात् देवी दुर्गा, सुधा, स्वधा, वेदमाता सावित्री, रजनी, दक्षिणा, द्युति, स्वाहा, स्वधा, मति, बुद्धि, ऋद्धि, वृद्धि, सरस्वती, राका, कुहू, सिनीवाली, देवी अनुमती, धरणी, धारणी, इला, शची, नारायणी—ये सब एवं अन्य सभी देवमाताएँ तथा देवपत्नयाँ 'शंकरका विवाह हो रहा है'—ऐसा सोचकर आनन्दमग्न होकर [वहाँ] गयीं। सभी उरग, गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, गण, समुद्र, पर्वत, मेघ, मास, संवत्सर, वेद, मन्त्र, यज्ञ, स्तोम, धर्म, हुंकार, प्रणव, हजारों प्रतिहार, करोड़ों दिव्य अप्सराएँ तथा उनकी परिचारिकाएँ और समस्त द्वीपों तथा देवलोकोंमें जो भी नदियाँ हैं, वे सब स्त्रीका रूप धारण करके प्रसन्नचित्त होकर वहाँ गयीं। सभी लोकोंसे नमस्कृत महाभाग गणेश्वर भी 'यह शंकरका विवाह है'—यह सोचकर प्रसन्नतासे युक्त हो वहाँ आये॥ ४–१२॥ |
| अध्याय १०३ ] | भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा | ५४५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अभ्ययुः शङ्खवर्णाश्च गणकोट्यो गणेश्वराः।<br>दशभिः केकराक्षश्च विद्युतोऽष्टाभिरेव च॥ १३<br><br>चतुःषष्ट्या विशाखाश्च नवभिः पारयात्रिकः।<br>षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान् तथैव विकृताननः ॥ १४<br><br>ज्वालाकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः।<br>सप्तभिः समदः श्रीमान् दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च ॥ १५<br><br>पञ्चभिश्च कपालीशः षड्भिः सन्दारकः शुभः।<br>कोटिकोटिभिरेवेह गण्डकः कुम्भकस्तथा ॥ १६ | शंखके समान वर्णवाले गणेश्वर [अपने] करोड़ों गणोंके साथ पहुँचे। केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ, विद्युत आठ करोड़ गणोंके साथ, विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारयात्रिक नौ करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् सर्वान्तक छः करोड़ गणोंके साथ, विकृतानन भी छः करोड़ गणोंके साथ, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालाकेश बारह करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् समद सात करोड़ गणोंके साथ, दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ, कपालीश पाँच करोड़ गणोंके साथ, उत्तम संदारक छः करोड़ गणोंके साथ और गण्डक तथा कुम्भक करोड़ों-करोड़ों गणोंके साथ आये ॥ १३-१६॥ |
| विष्टम्भोऽष्टाभिरेवेह गणपः सर्वसत्तमः।<br>पिप्पलश्च सहस्रेण सन्नादश्च तथा द्विजाः ॥ १७<br><br>आवेष्टनस्तथाष्टाभिः सप्तभिश्चन्द्रतापनः।<br>महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः ॥ १८ | हे द्विजो ! सर्वश्रेष्ठ गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ गणोंके साथ और पिप्पल तथा सन्नाद एक-एक हजार करोड़ गणोंके साथ आये। आवेष्टन [नामक गणेश्वर] आठ करोड़ गणोंके साथ, चन्द्रतापन सात करोड़ गणोंके साथ और गणेश्वर महाकेश हजार करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १७-१८॥ |
| कुण्डी द्वादशभिर्वीरस्तथा पर्वतकः शुभः।<br>कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै ॥ १९<br><br>आग्निकः शतकोट्या वै कोट्याग्निमुख एव च।<br>आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः॥ २० | पराक्रमशाली [गणेश्वर] कुण्डी तथा शुभ पर्वतक बारह करोड़ गणोंके साथ और काल, कालक तथा महाकाल सौ करोड़ गणोंके साथ आये। आग्निक सौ करोड़ गणोंके साथ तथा अग्निमुख एक करोड़ गणोंके साथ आये। उसी प्रकार आदित्यमूर्धा तथा धनावह [नामक गणेश्वर] भी एक करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १९-२०॥ |
| सन्नामश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा।<br>अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमन्त्रकः ॥ २१<br><br>काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः।<br>महाबलश्च नवभिर्मधुपिङ्गश्च पिङ्गलः ॥ २२<br><br>नीलो नवत्या देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव च।<br>कोटीनां चैव सप्तत्या चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥ २३<br><br>कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृताः।<br>तत्राजग्मुस्तथा देवास्ते सर्वे शङ्करं भवम् ॥ २४ | सन्नाम तथा कुमुद सौ करोड़ गणोंके साथ आये। अमोघ, कोकिल तथा सुमन्त्रक करोड़-करोड़ गणोंके साथ आये। दूसरे गणेश्वर काकपाद साठ करोड़ गणोंके साथ, प्रभुतासम्पन्न सन्तानक साठ करोड़ गणोंके साथ और महाबल, मधु, पिंग तथा पिंगल नौ करोड़ गणोंके साथ आये। नील, देवेश तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंके साथ और महाबलशाली चतुर्वक्त्र सत्तर करोड़ गणोंके साथ आये। वे सभी देव अपने बीस सौ हजार करोड़ गणोंसे घिरे हुए वहाँ भगवान् शंकरके पास पहुँचे ॥ २१-२४॥ |
| ५४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भूतकोटिसहस्रेण प्रमथः कोटिभिस्त्रिभिः।<br>वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या रोमजाश्चैव कोटिभिः ॥ २५<br>करणश्चैव विंशत्या नवत्या केवलः शुभः।<br>पञ्चाक्षः शतमम्युश्च मेघमन्युस्तथैव च ॥ २६<br>काष्ठकूटश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा।<br>विरूपाक्षश्च भगवान् चतुःषष्ट्या सनातनः ॥ २७<br>तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च सनातनः।<br>संवर्तकस्तथा चैत्रो लकुलीशः स्वयं प्रभुः ॥ २८<br>लोकान्तकश्च दीप्तास्यो तथा दैत्यान्तकः प्रभुः।<br>मृत्युहृत्कालहा कालो मृत्युञ्जयकरस्तथा ॥ २९<br>विषादो विषदश्चैव विद्युतः कान्तकः प्रभुः।<br>देवो भृङ्गी रिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा ॥ ३०<br>अशनिर्भासकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रपात्।<br>एते चान्ये च गणपा असंख्यता महाबलाः ॥ ३१<br>सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः।<br>चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः ॥ ३२<br>हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशा अणिमादिगुणैर्वृताः ॥ ३३<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजग्मुर्गणेश्वराः ।<br>पातालचारिणश्चैव सर्वलोकनिवासिनः ॥ ३४<br>तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूश्चैव तु सामगाः।<br>रत्नान्यादाय वाद्यांश्च तत्राजग्मुस्तदा पुरम् ॥ ३५ | प्रमथ [अपने] हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ गणोंके साथ आये। वीरभद्र चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और रोमज करोड़ों गणोंके साथ आये। करण बीस करोड़ गणोंके साथ और केवल, शुभ, पंचाक्ष, शतमम्यु तथा मेघमन्यु भी नब्बे करोड़ गणोंके साथ आये। काष्ठकूट, सुकेश तथा वृषभ चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और भगवान् सनातन विरूपाक्ष भी चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। इसी प्रकार तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, सनातन, संवर्तक, चैत्र, साक्षात् प्रभु लकुलीश, लोकान्तक, दीप्तास्य, प्रभु दैत्यान्तक, मृत्युहृत्, कालहा, काल, मृत्युंजयकर, विषाद, विषद, विद्युत, प्रभु कान्तक, देव, भृंगी, रिटि, श्रीमान् देवदेवप्रिय, अशनि, भासक तथा सहस्रपात् चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। ये सब तथा अन्य असंख्य महाबली गणेश्वर भी वहाँ आये। वे सभी हजार हाथोंवाले, जटा-मुकुट धारण किये हुए, मस्तकपर चन्द्ररेखासे विभूषित, नीलकण्ठवाले, तीन नेत्रोंवाले, हार-कुण्डल-केयूर-मुकुट आदिसे अलंकृत, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके समान प्रतीत होनेवाले, अणिमा आदि सिद्धियोंसे युक्त थे; करोड़ों सूर्योंके सदृश आभावाले पाताललोकमें विचरण करनेवाले तथा सभी लोकोंमें निवास करनेवाले वे गणेश्वर वहाँ आये। तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू एवं साम गान करनेवाले भी रत्नों तथा वाद्ययन्त्रोंको लेकर उस पुरमें आये॥ २५-३५॥ |
| ऋषयः कृत्स्नशस्तत्र देवगीतास्तपोधनाः।<br>पुण्यान् वैवाहिकान् मन्त्रानजपुर्हृष्टमानसाः ॥ ३६ | देवताओंद्वारा स्तुत तथा तपोधन बहुत-से ऋषिगण प्रसन्नचित्त होकर विवाहसम्बन्धी पवित्र मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे ॥ ३६ ॥ |
| तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वतश्च समागमे।<br>गिरिजां तामलङ्कृत्य स्वयमेव शुचिस्मिताम् ॥ ३७<br>पुरं प्रवेशयामास स्वयमादाय केशवः।<br>सदस्याह च देवेशं नारायणमजो हरिम् ॥ ३८ | इस प्रकार पूर्णरूपसे सबके उपस्थित हो जानेपर विष्णुने स्वयं पवित्र मुसकानवाली पार्वतीको अलंकृत करके तथा स्वयं उन्हें ला करके पुरमें प्रवेश कराया। तदनन्तर ब्रह्माने देवताओंके स्वामी नारायण विष्णुसे सभामें कहा— |
| भवानग्रे समुत्पन्नो भवान्या सह दैवतैः।<br>वामाङ्गादस्य रुद्रस्य दक्षिणाङ्गादहं प्रभो ॥ ३९<br>मन्मूर्तिस्तुहिनाद्रीशो यज्ञार्थं सृष्ट एव हि।<br>एषा हैमवती जज्ञे मायया परमेष्ठिनः ॥ ४० | ‘हे प्रभो! पहले आप इन रुद्रके बाएँ अंगसे भवानी तथा देवताओंके साथ उत्पन्न हुए और मैं इनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ। मेरे अंशस्वरूप पर्वतराज हिमालय वास्तवमें इस यज्ञके लिये ही उत्पन्न |
अध्याय १०३] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४७
| श्रौतस्मार्तप्रवृत्त्यर्थमुद्वाहार्थमिहागतः ।<br>अतोऽसौ जगतां धात्री धाता तव ममापि च ॥ ४१<br><br>अस्य देवस्य रुद्रस्य मूर्तिभिर्विहितं जगत्।<br>क्ष्माबग्निखेन्दुसूर्यात्मपवनात्मा यतो भवः ॥ ४२<br><br>तथापि तस्मै दातव्या वचनाच्च गिरेर्मम।<br>एषा ह्यजा शुक्लकृष्णा लोहिता प्रकृतिर्भवान् ॥ ४३<br><br>श्रेयोऽपि शैलराजेन सम्बन्धोऽयं तवापि च।<br>तव पाद्मे समुद्भूतः कल्पे नाभ्यम्बुजादहम् ॥ ४४<br><br>मदंशस्यास्य शैलस्य ममापि च गुरुर्भवान्। | किये गये हैं। इन पार्वतीने परमेष्ठी [शिव]-की मायासे हिमवान्की पुत्रीके रूपमें जन्म लिया है। अतः ये सभी लोकोंकी, आपकी तथा मेरी भी धात्री (जननी) हैं और श्रौत-स्मार्त प्रवृत्तिके लिये विवाहके उद्देश्यसे यहाँ आये हुए ये रुद्र सबके धाता (जनक) हैं। चूँकि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चन्द्र, सूर्य, आत्मा तथा पवन शिवके ही विग्रहस्वरूप हैं, अतः इन रुद्रदेवकी [इन्हीं] मूर्तियोंसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है। तथापि हिमवान्के तथा मेरे वचनसे शुक्ल-कृष्ण-लोहित वर्णवाली मायारूपा इन पार्वतीको उन शिवके निमित्त प्रदान कर देना चाहिये; [हे विष्णो!] आप भी प्रकृतिरूप हैं। पर्वतराजके साथ यह सम्बन्ध आपके लिये भी कल्याणप्रद है। मैं पद्मकल्पमें आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ था; अतः आप मेरे अंशस्वरूप इन हिमालयके तथा मेरे भी गुरु हैं'॥ ३७-४४ १/२ ॥ |
| <div align="center">सूत उवाच</div>बाढमित्यजमाहासौ देवदेवो जनार्दनः ॥ ४५<br><br>देवाश्च मुनयः सर्वे देवदेवश्च शङ्करः।<br>ततश्चोत्थाय विद्वान् सः पद्मनाभः प्रणम्य ताम् ॥ ४६<br><br>पादौ प्रक्षाल्य देवस्य कराभ्यां कमलेक्षणः।<br>अभ्युक्षदात्मनो मूर्ध्नि ब्रह्मणश्च गिरेस्तथा ॥ ४७<br><br>त्वदीयेषा विवाहार्थं मेनजा ह्यनुजा मम।<br>इत्युक्त्वा सोदकं दत्त्वा देवीं देवेश्वराय ताम् ॥ ४८<br><br>स्वात्मानमपि देवाय सोदकं प्रददौ हरिः। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उन देवदेव जनार्दनने ब्रह्मासे कहा—'ठीक है।' तब देवतागण, सभी मुनि तथा देवदेव शिव प्रसन्न हो गये। तदनन्तर कमलके समान नेत्रवाले उन विद्वान् पद्मनाभ विष्णुने उठकर उन [पार्वती]-को प्रणाम करके अपने हाथोंसे शिवके दोनों चरणोंको धोकर अपने, ब्रह्माके तथा हिमालयके सिरपर जल छिड़का। '[हे शिव!] आपकी नित्यसम्बन्धिनी ये [पार्वती] विवाहविधिकी सिद्धिके लिये ही मेनासे उत्पन्न हुई हैं; ये मेरी छोटी बहन हैं'—ऐसा कहकर विष्णुने उन पार्वतीको देवेश्वरके लिये जलसहित समर्पित करके स्वयं अपनेको भी उन देवके लिये जलसहित समर्पित कर दिया॥ ४५-४८ १/२ ॥ |
| अथ सर्वे मुनिश्रेष्ठाः सर्ववेदार्थपारगाः ॥ ४९<br><br>ऊचुर्दाता गृहीता च फलं द्रव्यं विचारतः।<br>एष देवो हरो नूनं मायया हि ततो जगत् ॥ ५० | इसके बाद सभी वेदोंके अर्थोंमें पारंगत श्रेष्ठ मुनियोंने कहा—'विचार करनेपर वस्तुतः ये महादेव शिव ही दाता, गृहीता, द्रव्य तथा फल सब कुछ हैं और इन्हींकी मायासे यह जगत् स्थित है'—ऐसा कहकर प्रसन्नतासे रोमांचित उन सभीने शिवजीको प्रणाम किया॥ ४९-५० १/२ ॥ |
| इत्युक्त्वा तं प्रणेमुश्च प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ॥ ५१<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः।<br>वेदाश्च मूर्तिमन्तस्ते प्रणेमुस्तं महेश्वरम् ॥ ५२ | उस समय आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवृष्टि की, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और |
1985 Lingamahapuran_Section_19_2_Front
| ५४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणा मुनिभिः सार्धं देवदेवमुमापतिम्। | अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी वेदोंने शरीर धारण करके ब्रह्मा तथा मुनियोंके साथ उन देवदेव उमापति महेश्वरको प्रणाम किया॥ ५१-५२ १/२ ॥ |
| देवोऽपि देवीमालोक्य सलज्जां हिमशैलजाम् ॥ ५३ <br><br> न तृप्यत्यनवद्याङ्गी सा च देवं वृषध्वजम्। <br> वरदोऽस्मीति तं प्राह हरिं सोऽप्याह शङ्करम् ॥ ५४ <br><br> त्वयि भक्तिः प्रसीदेति ब्रह्माख्यां च ददौ तु सः। <br> ततस्तु पुनरेवाह ब्रह्मा विज्ञापयन् प्रभुम् ॥ ५५ <br><br> हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः। <br> ददासि मम यद्याज्ञां कर्तव्यो ह्यकृतो विधिः ॥ ५६ | लज्जासे भरी हुई देवी पार्वतीको देखकर शिव तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीरवाली वे [पार्वती] भी देवदेव वृषभध्वजको देखकर तृप्त नहीं होती थीं। तब शिवने विष्णुसे कहा—'मैं वरदाता हूँ।' इसपर उन्होंने भी शंकरसे कहा—'आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये।' तब शिवने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया। इसके बाद ब्रह्माने पुनः प्रभुसे प्रार्थना करते हुए कहा—'मैं उपाध्याय (आचार्य)-के पदपर स्थित होकर अग्निमें हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे सम्पन्न करूँ'॥ ५३—५६ ॥ |
| तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः। <br> यद्यदिष्टं सुरश्रेष्ठ तत्कुरुष्व यथेप्सितम् ॥ ५७ <br><br> कर्तास्मि वचनं सर्वं देवदेव पितामह। | तब जगत्के स्वामी देवदेव शंकरने उन देव ब्रह्मासे कहा—'हे सुरश्रेष्ठ! जो-जो अभीष्ट हो, उसे आप इच्छानुसार कीजिये। हे देवदेव! हे पितामह! मैं [आपके] समस्त वचनका पालन करूँगा'॥ ५७ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५८ <br><br> हस्तं देवस्य देव्याश्च युयोज परमं प्रभुः। <br> ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ ५९ <br><br> श्रौतैस्तैर्महामन्त्रैमूर्तिमद्भिरुपस्थितैः । <br> यथोक्तविधिना हुत्वा लाजानपि यथाक्रमम् ॥ ६० <br><br> आनीतान् विष्णुना विप्रान् सम्पूज्य विविधैर्वरैः। <br> त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम् ॥ ६१ <br><br> मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितैः सर्वदैवतैः। <br> सुरैश्च मानवैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ६२ <br><br> ननाम भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्। | तदनन्तर [उन्हें] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम प्रभु लोकपितामह ब्रह्माने शिव तथा देवी [पार्वती]-के हाथोंको [परस्पर] मिला दिया। स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए। [साक्षात्] मूर्त्तिमान् होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रोंके द्वारा यथोक्त विधिसे हवन करनेके अनन्तर विष्णुके द्वारा लाये गये लाजा (धानका लावा)-का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानोंसे विप्रोंकी पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेवकी प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले हुए हाथको मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्न मनसे सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंके साथ देवदेव उमापतिको प्रणाम किया॥ ५८—६२ १/२ ॥ |
| ततः पाद्यं तयोर्दत्वा शम्भोराचमनं तथा ॥ ६३ <br><br> मधुपर्कं तथा गां च प्रणम्य च पुनः शिवम्। <br> अतिष्ठद्भगवान् ब्रह्मा देवैरिन्द्रपुरोगमैः ॥ ६४ | तत्पश्चात् उन दोनोंको पाद्य जल देकर और शम्भुको आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः शिवको प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंके साथ स्थित हो बैठ गये॥ ६३-६४॥ |
अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४९
| भृग्वाद्या मुनयः सर्वे चाक्षतैस्तिलतण्डुलैः।<br>सूर्यादयः समभ्यर्च्य तुष्टुवुर्वृषभध्वजम्॥ ६५ | समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहोंने अक्षतों तथा तिल-तण्डुलोंसे वृषभध्वजका अर्चन करके उनकी स्तुति की॥ ६५॥ |
| शिवः समाप्य देवोक्तं वह्निमारोप्य चात्मनि।<br>तया समागतो रुद्रः सर्वलोकहिताय वै॥ ६६ | तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [वैवाहिक] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्निको अपनेमें आरोपित करके सभी लोकोंके हितके लिये उन पार्वतीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६६॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि भवोद्वाहं शुचिस्मितः।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् शुद्धान् वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ६७ | जो [व्यक्ति] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिवके विवाह-आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद-वेदांगमें पारंगत शुद्ध द्विजोंको सुनाता है, वह गणपति-पद प्राप्त करके शिवके साथ आनन्दित होता है। जहाँ भी ब्राह्मणोंद्वारा इस विवाह-प्रसंगको कहा जाता है, वहाँपर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यानको अवश्य कहना चाहिये। हे उत्तम ब्राह्मणो! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियोंके विवाहमें इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंगका कीर्तन करना चाहिये॥ ६७-६९^{१}/_२॥ |
| स लब्ध्वा गाणपत्यं च भवेन सह मोदते।<br>यत्रायं कीर्त्यते विप्रैस्तावदास्ते तदा भवः॥ ६८ | |
| तस्मात्सम्पूज्य विधिवत्कीर्तयेनान्यथा द्विजाः।<br>उद्वाहे च द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः॥ ६९ | |
| कीर्तनीयमिदं सर्वं भवोद्वाहमनुत्तमम्। | |
| कृतोद्वाहस्तदा देव्या हैमवत्या वृषभध्वजः॥ ७०<br>सगणो नन्दिना सार्धं सर्वदेवगणैर्वृतः।<br>पुरीं वाराणसीं दिव्यामाजगाम महाद्युतिः॥ ७१ | तब विवाह कर लेनेके उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [अपने] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वतीके साथ दिव्य वाराणसीपुरीमें आये॥ ७०-७१॥ |
| अविमुक्ते सुखासीनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>अपृच्छत् क्षेत्रमाहात्म्यं भवानी हर्षितानना॥ ७२ | इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डलवाली भवानी अविमुक्त (वाराणसी)-में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वजको प्रणाम करके [उस] क्षेत्रका माहात्म्य पूछने लगीं॥ ७२॥ |
| अथाहार्धेन्दुतिलकः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं विस्तराच्छक्यते नहि॥ ७३ | तब अर्धचन्द्रको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवजी उत्तम क्षेत्रमाहात्म्यका वर्णन करने लगे—'हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियोंद्वारा पूजित है। हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्रमें होनेवाले पुण्यफलका वर्णन कैसे करूँ, जहाँपर मरनेवाले पापियोंकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। [लोगोंद्वारा] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसीमें नष्ट हो जाता है और वाराणसीमें किया गया पाप पिशाचयोनिरूपी नरककी प्राप्ति करानेवाला होता है। हजारों पाप करके मनुष्योंके लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ है, किंतु काशीपुरीके बिना स्वर्गमें हजार बार इन्द्रपद |
| वक्तुं मया सुरेशानि ऋषिसङ्घाभिपूजितम्।<br>किं मया वर्ण्यते देवि ह्यविमुक्तफलोदयः॥ ७४ | |
| पापिनां यत्र मुक्तिः स्यान्मृतानामेकजन्मना।<br>अन्यत्र तु कृतं पापं वाराणस्यां व्यपोहति॥ ७५ | |
| वाराणस्यां कृतं पापं पैशाच्यनरकावहम्।<br>कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्॥ ७६ | |
| न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना।<br>यत्र त्रिविष्टपो देवो यत्र विश्वेश्वरो विभुः॥ ७७ |