श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय १०० ] वीरभद्रद्वारा दक्षयज्ञभंग तथा भगवान् महेश्वरका दक्षप्रजापतिपर अनुग्रह ५३३
| संस्कृत | हिन्दी |
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| सरस्वत्याश्च नासाग्रं देवमातुस्तथैव च।<br>निकृत्य करजाग्रेण वीरभद्रः प्रतापवान्॥ ३८<br><br>तस्थौ श्रिया वृतो मध्ये प्रेतस्थाने यथा भवः। | तदनन्तर प्रतापी वीरभद्र अपने नाखूनके अग्रभागसे देवमाता सरस्वतीकी नासिकाका अग्रभाग काटकर ऐश्वर्ययुक्त होकर सबके बीच उसी तरह स्थित हुए जैसे श्मशानमें [भगवान्] भव॥ ३१—३८ १/२॥ |
| एतस्मिन्नेव काले तु भगवान् पद्मसंभवः॥ ३९<br><br>भद्रमाह महातेजाः प्रार्थयन् प्रणतः प्रभुः।<br>अलं क्रोधेन वै भद्र नष्टाश्चैव दिवौकसः॥ ४०<br><br>प्रसीद क्षम्यतां सर्वं रोमजैः सह सुव्रत। | इसी समय महातेजस्वी प्रभु ब्रह्माजी प्रार्थना करते हुए प्रणत होकर वीरभद्रसे बोले—'हे भद्र! क्रोध मत कीजिये, देवतागण नष्ट हो गये हैं, हे सुव्रत! प्रसन्न होइये और अपने रोमोंसे उत्पन्न गणेश्वरोंसहित सबको क्षमा कीजिये'॥ ३९-४० १/२॥ |
| सोऽपि भद्रः प्रभावेण ब्रह्मणः परमेष्ठिनः॥ ४१<br><br>शमं जगाम शनकैः शान्तस्तस्थौ तदाज्ञया।<br>देवोऽपि तत्र भगवानन्तरिक्षे वृषध्वजः॥ ४२<br><br>सगणः सर्वदः शर्वः सर्वलोकमहेश्वरः।<br>प्रार्थितश्चैव देवेन ब्रह्मणा भगवान् भवः॥ ४३<br><br>हतानां च तदा तेषां प्रददौ पूर्ववत्तनुम्।<br>इन्द्रस्य च शिरस्तस्य विष्णोश्चैव महात्मनः॥ ४४<br><br>दक्षस्य च मुनीन्द्रस्य तथान्येषां महेश्वरः।<br>वागीश्याश्चैव नासाग्रं देवमातुस्तथैव च॥ ४५<br><br>नष्टानां जीवितं चैव वराणि विविधानि च।<br>दक्षस्य ध्वस्तवक्त्रस्य शिरसा भगवान् प्रभुः॥ ४६<br><br>कल्पयामास वै वक्त्रं लीलया च महान् भवः। | तब वे वीरभद्र भी परमेष्ठी ब्रह्माके प्रभावसे धीरे-धीरे शान्तिको प्राप्त हुए; उनकी आज्ञासे शान्त होकर वे खड़े हो गये। उस समय भगवान् महादेव वृषभध्वज अन्तरिक्षमें स्थित थे; देव ब्रह्माने गणोंसहित उन सर्वदाता, शर्व, सभी लोकोंके स्वामी भगवान् भवसे प्रार्थना की। तब उन्होंने मारे गये उन सभीको पूर्वकी भाँति शरीर प्रदान कर दिया। महेश्वरने इन्द्र, महात्मा विष्णु, दक्ष, मुनीन्द्र तथा अन्य लोगोंको सिर प्रदान कर दिया, देवमाता सरस्वतीको नासिका प्रदान कर दी, नष्ट हुए लोगोंको जीवन प्रदान कर दिया; साथ ही उन्होंने विविध वर भी प्रदान किये। भगवान् महाप्रभु भवने लीलापूर्वक ध्वस्तमुखवाले दक्षका सिरसहित मुख बना दिया॥ ४१—४६ १/२॥ |
| दक्षोऽपि लब्धसंज्ञश्च समुत्थाय कृताञ्जलिः॥ ४७ | तब चेतनाप्राप्त दक्षने भी उठकर हाथ जोड़ करके |