भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 534, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 534
५३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
युयोध भगवांस्तेन रुद्रेण सह माधवः ।<br>तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम् ॥ २४<br><br>विष्णोर्योगबलात्तस्य दिव्यदेहाः सुदारुणाः ॥ २५इसके बाद महातेजस्वी लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु [अपना] चक्र उठाकर आवेशयुक्त होकर उन रुद्रके साथ युद्ध करने लगे; उन दोनोंके बीच अतिभयंकर तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उन विष्णुके योगबलसे हाथोंमें शंख-चक्र-गदा धारण किये हुए, दिव्य देहवाले तथा परम दारुण असंख्य योद्धा उत्पन्न हो गये॥ २३—२५ १/२ ॥
शङ्खचक्रगदाहस्ता असंख्याताश्च जज्ञिरे ।<br>तान् सर्वानपि देवोऽसौ नारायणसमप्रभान् ॥ २६<br><br>निहत्य गदया विष्णुं ताडयामास मूर्धनि ।<br>ततश्चोरसि तं देवं लीलयैव रणाजिरे ॥ २७<br><br>पपात च तदा भूमौ विसंज्ञः पुरुषोत्तमः ।<br>पुनरुत्थाय तं हन्तुं चक्रमुद्यम्य स प्रभुः ॥ २८तब उन वीरभद्रदेवने नारायणके समान प्रभाववाले उन सबको भी मार करके रणभूमिमें ही गदासे लीलापूर्वक विष्णुदेवके सिरपर प्रहार किया; इसके बाद उनके वक्षःस्थलपर प्रहार किया, तब वे पुरुषोत्तम (विष्णु) अचेत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इसके बाद उठ करके उन [वीरभद्र]-को मारनेके लिये चक्र उठाकर वे श्रीमान् पुरुषश्रेष्ठ प्रभु क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले होकर खड़े हो गये॥ २६—२८ १/२ ॥
क्रोधरक्तेक्षणः श्रीमानतिष्ठत्पुरुषर्षभः ।<br>तस्य चक्रं च यद्रौद्रं कालादित्यसमप्रभम् ॥ २९<br><br>व्यष्टम्भयददीनात्मा करस्थं न चचाल सः ।<br>अतिष्ठत्स्तम्भितस्तेन शृङ्गवानिव निश्चलः ॥ ३०उन [विष्णु]-का भयानक तथा कालादित्यके समान तेजवाला जो चक्र था, उसको अदीन आत्मावाले वीरभद्रने स्तम्भित कर दिया; वह हाथमें पड़ा ही रह गया और हिलातक नहीं और वीरभद्रके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये वे विष्णु भी पर्वतकी भाँति स्थिर होकर खड़े रहे॥ २९-३०॥
त्रिभिश्च धर्षितं शार्ङ्गं त्रिधाभूतं प्रभोस्तदा ।<br>शार्ङ्गकोटिप्रसङ्गाद्वै चिच्छेद च शिरः प्रभोः ॥ ३१<br><br>छिन्नं च निपपातासु शिरस्तस्य रसातले ।<br>वायुना प्रेरितं चैव प्राणजेन पिनाकिना ॥ ३२<br><br>प्रविवेश तदा चैव तदीयाहवनीयकम् ।<br>तत्प्रविध्वस्तकलशं भग्नयूपं सतोरणम् ॥ ३३<br><br>प्रदीपितमहाशालं दृष्ट्वा यज्ञोऽपि दुद्रुवे ।<br>तं तदा मृगरूपेण धावन्तं गगनं प्रति ॥ ३४<br><br>वीरभद्रः समाधाय विशिरस्कमथाकरोत् ।<br>ततः प्रजापतिं धर्मं कश्यपं च जगद्गुरुम् ॥ ३५<br><br>अरिष्टनेमिनं वीरो बहुपुत्रं मुनीश्वरम् ।<br>मुनिमङ्गिरसं चैव कृशाश्वं च महाबलः ॥ ३६<br><br>जघान मूर्ध्नि पादेन दक्षं चैव यशस्विनम् ।<br>चिच्छेद च शिरस्तस्य ददाहाग्नौ द्विजोत्तमाः ॥ ३७इसके बाद वीरभद्रने तीन बाणोंसे विष्णुके शार्ङ्ग [नामक] धनुषको काट दिया और वह तीन टुकड़ोंमें हो गया एवं शार्ङ्ग धनुषके सिरेसे लग जानेके कारण विष्णुका सिर कट गया। उनका कटा हुआ सिर शीघ्र ही [भगवान्] शंकरकी निःश्वास वायुसे प्रेरित होकर रसातलमें चला गया। तत्पश्चात् वहाँ उनकी आहवनीय अग्निने प्रवेश किया। ध्वस्त कलशवाले तथा तोरणों-सहित टूटे हुए यूपवाले उस जलते हुए यज्ञवाटको देखकर यज्ञदेव भी भाग गये। तब मृगके रूपसे आकाशकी ओर भागते हुए उस यज्ञदेवको पकड़कर वीरभद्रने उसे सिरविहीन कर दिया। तत्पश्चात् महाबली वीरभद्रने प्रजापति, धर्म, जगद्गुरु कश्यप, अरिष्टनेमि, मुनीश्वर बहुपुत्र, मुनि अंगिरा और कृशाश्वके सिरपर पैरसे प्रहार किया; हे श्रेष्ठ द्विजो! उसने यशस्वी दक्षके सिरपर भी पैरसे प्रहार किया और उनके सिरको काट लिया तथा उसे अग्निमें जला दिया।