भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
तुष्टाव देवदेवेशं शङ्करं वृषभध्वजम्।<br>स्तुतस्तेन महातेजाः प्रदाय विविधान् वरान्॥ ४८<br>गाणपत्यं ददौ तस्मै दक्षायक्लिष्टकर्मणे।<br>देवाश्च सर्वे देवेशं तुष्टुवुः परमेश्वरम्॥ ४९<br>नारायणश्च भगवान् तुष्टाव च कृताञ्जलिः।<br>ब्रह्मा च मुनयः सर्वे पृथक्पृथग्जोद्भवम्॥ ५०<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं नीलकण्ठं वृषध्वजम्।<br>तान् देवाननुगृह्यैव भवोऽप्यन्तरधीयत॥ ५१देवदेवेश वृषभध्वज शंकरकी स्तुति की। उनके द्वारा स्तुत होकर महातेजस्वी शिवने उत्तम कर्मवाले उन दक्षको विविध वर प्रदान करके उन्हें गाणपत्य [पद] प्रदान किया॥ ४७-४८१/२॥<br>तब सभी देवताओंने देवेश परमेश्वरकी स्तुति की। भगवान् नारायणने भी हाथ जोड़कर उनकी स्तुति की। ब्रह्मा तथा सभी मुनियोंने भी ब्रह्माकी सृष्टि करनेवाले देवदेवेश नीलकण्ठ वृषभध्वजकी पृथक्-पृथक् स्तुति की। इसके बाद उन देवताओंपर अनुग्रह करके शिवजी भी अन्तर्धान हो गये॥ ४९-५१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवकृकदक्षयज्ञविध्वंसनो नाम शततमोऽध्यायः॥ १००॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवकृत दक्षयज्ञविध्वंसन' नामक सौवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १००॥


एक सौ एकवाँ अध्याय

सतीका हिमवान्‌की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य, शिवकी प्राप्तिके लिये उनका कठोर तप, तारकासुरद्वारा देवताओंको पराजित करना, शिवद्वारा कामदेवका दहन तथा पुनः जीवित करना

ऋषय ऊचुः<br>कथं हिमवतः पुत्री बभूवाम्बा सती शुभा।<br>कथं वा देवदेवेशमवाप पतीमीश्वरम्॥ १ऋषिगण बोले—कल्याणमयी अम्बा सती हिमवान्‌की पुत्री कैसे हुईं और उन्होंने देवदेवेश महेश्वरको पतिके रूपमें कैसे प्राप्त किया?॥ १॥
सूत उवाच<br>सा मेनातनुमाश्रित्य स्वेच्छयैव वराङ्गना।<br>तदा हैमवती जज्ञे तपसा च द्विजोत्तमाः॥ २<br>जातकर्मादिकाः सर्वाश्चकार च गिरीश्वरः।<br>द्वादशे च तदा वर्षे पूर्णे हैमवती शुभा॥ ३<br>तपस्तेपे तया सार्धमनुजा च शुभानना।<br>अन्या च देवी ह्यनुजा सर्वलोकनमस्कृता॥ ४सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ द्विजो! उस श्रेष्ठ अंगनाने तपस्याके द्वारा अपनी इच्छासे मेनाके शरीरका आश्रय लेकर हिमालयकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया। पर्वतराजने उसके जातकर्म आदि समस्त संस्कार सम्पन्न किये। तब बारहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर हिमवान्‌की वह सुन्दर पुत्री तपस्या करने लगी; उसके साथ सुन्दर मुखवाली उसकी छोटी बहन और सर्वलोकनमस्कृत एक दूसरी छोटी बहन भी थी॥ २-४॥
ऋषयश्च तदा सर्वे सर्वलोकमहेश्वरीम्।<br>तुष्टुवुस्तपसा देवीं समावृत्य समन्ततः॥ ५तब सभी ऋषि सभी लोकोंकी महेश्वरी उस देवीको चारों ओरसे घेरकर तपके लिये उसकी स्तुति करने लगे॥ ५॥
ज्येष्ठा ह्यपर्णा ह्यनुजा चैकपर्णा शुभानना।<br>तृतीया च वरारोहा तथा चैवैकपाटला॥ ६उनमें सबसे बड़ी अपर्णा थी, उससे छोटी सुन्दर मुखवाली एकपर्णा थी और तीसरी परम सुन्दरी एकपाटला [नामवाली] थी। महादेवी पार्वतीकी तपस्यासे
तपसा च महादेव्याः पार्वत्याः परमेश्वरः।<br>वशीकृतो महादेवः सर्वभूतपतिर्भवः॥ ७
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