श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०१] सतीका हिमवान्की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य ५३५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सभी प्राणियोंके स्वामी परमेश्वर महादेव शिव [उनके] वशमें हो गये॥ ६-७॥ | |
| एतस्मिन्नेव काले तु तारको नाम दानवः।<br>तारात्मजो महातेजा बभूव दितिनन्दनः॥ ८<br><br>तस्य पुत्रास्त्रयश्चापि तारकाक्षो महासुरः।<br>विद्युन्माली च भगवान् कमलाक्षश्च वीर्यवान्॥ ९<br><br>पितामहस्तथा चैषां तारो नाम महाबलः।<br>तपसा लब्धवीर्यश्च प्रसादाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १०<br><br>सोऽपि तारो महातेजास्त्रैलोक्यं सचराचरम्।<br>विजित्य समरे पूर्वं विष्णुं च जितवानसौ॥ ११ | इसी समय तारक नामवाला एक दानव हुआ; दितिको आनन्दित करनेवाला वह तारपुत्र (तारक) महातेजस्वी था। उसके तीन पुत्र थे—महान् असुर तारकाक्ष, भाग्यशाली विद्युन्माली और पराक्रमी कमलाक्ष। तार नामक इनके महाबली पितामहने प्रभु ब्रह्माकी कृपासे [अपनी] तपस्याके द्वारा [अतुलनीय] पराक्रम प्राप्त कर लिया था। उस महातेजस्वी तारने चराचरसहित तीनों लोकोंको जीतकर संग्राममें विष्णुको भी जीत लिया था॥ ८–११॥ |
| तयोः समभवद्युद्धं सुघोरं रोमहर्षणम्।<br>दिव्यं वर्षसहस्रं तु दिवारात्रमविश्रमम्॥ १२<br><br>सरथं विष्णुमादाय चिक्षेप शतयोजनम्।<br>तारेण विजितः संख्ये दुद्राव गरुडध्वजः॥ १३<br><br>तारो वराञ्छतगुणं लब्ध्वा शतगुणं बलम्।<br>पितामहाज्जगत्सर्वमवाप दितिनन्दनः॥ १४<br><br>देवेन्द्रप्रमुखाञ्जित्वा देवान् देवेश्वरेश्वरः।<br>वारयामास तैर्देवान् सर्वलोकेषु मायया॥ १५ | उन दोनोंमें दिन-रात बिना विश्रामके (निरन्तर) एक हजार दिव्य वर्षोंतक अत्यन्त भयानक तथा रोमांचकारी युद्ध हुआ। उसने रथसहित विष्णुको पकड़कर सौ योजन दूर फेंक दिया। तारके द्वारा युद्धमें पराजित होकर विष्णु भाग गये। ब्रह्मासे एक सौ वर तथा सैकड़ों गुना बल प्राप्त करके दितिनन्दन तारने सम्पूर्ण जगत्पर अधिकार कर लिया। देवेन्द्र आदि देवताओंको जीतकर देवेश्वरेश्वरके रूपमें होकर उसने अपनी मायासे देवताओंको सभी लोकोंमें उनके कार्योंसे वंचित कर दिया॥ १२–१५॥ |
| देवताश्च सहेन्द्रेण तारकाद्यपीडिताः।<br>न शान्तिं लेभिरे शूराः शरणं वा भयार्दिताः॥ १६<br><br>तदामरपतिः श्रीमान् सन्निपत्यामरप्रभुः।<br>उवाचाङ्गिरसं देवो देवानार्माप सन्निधौ॥ १७ | इन्द्रसहित देवतागण तारकासुरके भयसे पीड़ित हो गये; वीर होते हुए भी वे भयग्रस्त होनेके कारण [कहीं भी] शान्ति अथवा शरण प्राप्त नहीं कर सके। तब देवताओंके स्वामी श्रीमान् प्रभु इन्द्र बृहस्पतिकी शरणमें जाकर देवताओंकी उपस्थितिमें उनसे कहने लगे॥ १६-१७॥ |
| भगवंस्तारको नाम तारजो दानवोत्तमः।<br>तेन सन्निहता युद्धे वत्सा गोपत्तिना यथा॥ १८<br><br>भयात्तस्मान्महाभाग बृहद्युद्धे बृहस्पते।<br>अनिकेता भ्रमन्त्येते शकुन्ता इव पञ्जरे॥ १९ | हे भगवन्! तारसे उत्पन्न तारक नामक एक महादानव है; उसने युद्धमें हमलोगोंको उसी तरह आहत किया है, जैसे बैल बछड़ोंको आहत कर देता है। अतः हे महाभाग! हे बृहस्पते! भयके कारण इस विशाल युद्धमें देवतालोग आश्रयविहीन होकर उसी प्रकार भ्रमण कर रहे हैं, जैसे पिँजरेमें पक्षी। हे अंगिरोवर! हमलोगोंके जो अस्त्र पहले |