श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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५३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अस्माकं यान्यमोघानि आयुधान्यङ्गिरोवर।<br>तानि मोघानि जायन्ते प्रभावादमरद्विषः॥ २०<br><br>दशवर्षसहस्राणि द्विगुणानि बृहस्पते।<br>विष्णुना योधितो युद्धे तेनापि न च सूदितः॥ २१<br><br>यस्तेनानिर्जितो युद्धे विष्णुना प्रभविष्णुना।<br>कथमस्मद्विधस्तस्य स्थास्यते समरेऽग्रतः॥ २२ | अमोघ थे, वे उस देवशत्रुके प्रभावके कारण निष्फल हो गये हैं। हे बृहस्पते ! विष्णुने बीस हजार वर्षोंतक उसके साथ युद्ध किया; किंतु वह उनके भी द्वारा युद्धमें नहीं मारा गया। महाशक्तिसम्पन्न विष्णुके द्वारा भी युद्धमें जो जीता नहीं जा सका, तब हम-जैसे लोग युद्धमें उसके समक्ष कैसे टिक सकते हैं ?॥ १८-२२॥ |
| एवमुक्तस्तु शक्रेण जीवः सार्धं सुराधिपैः।<br>सहस्राक्षेण च विभुं सम्प्राप्याह कुशध्वजम्॥ २३ | इन्द्रके ऐसा कहनेपर श्रेष्ठ देवताओं तथा इन्द्रको साथ लेकर बृहस्पतिने विभु ब्रह्माके पास पहुँचकर [सब कुछ] बताया॥ २३॥ |
| सोऽपि तस्य मुखाच्छ्रुत्वा प्रणयात्प्रणतार्तिहा।<br>देवैरशेषैः सेन्द्रैस्तु जीवमाह पितामहः॥ २४ | उनके मुखसे [सारा वृत्तान्त] सुनकर शरणागतोंका कष्ट दूर करनेवाले उन पितामहने इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ आये हुए बृहस्पतिसे प्रेमपूर्वक कहा— |
| जाने वोऽर्तिं सुरेन्द्राणां तथापि शृणु साम्प्रतम्।<br>विनिन्द्य दक्षं या देवी सती रुद्राङ्गसम्भवा॥ २५ | मैं आप सब देवताओंकी विपत्तिको जानता हूँ; फिर भी इस समय सुनिये। रुद्रके अंगसे उत्पन्न जो देवी सती हैं, वे दक्षकी निन्दा करके |
| उमा हैमवती जज्ञे सर्वलोकनमस्कृता।<br>तस्याश्चैवेह रूपेण यूयं देवाः सुरोत्तमाः॥ २६ | समस्त लोकोंद्वारा नमस्कृत उमाके रूपमें हिमवान्की पुत्री होकर उत्पन्न हुई हैं। हे उत्तम देवताओं! आप देवतागण उन्हींके रूपके द्वारा |
| विभोर्यतध्वमाक्रष्टुं रुद्रस्यास्य मनो महत्।<br>तयोर्योगेन सम्भूतः स्कन्दः शक्तिधरः प्रभुः॥ २७ | इन विभु रुद्रके महान् मनको आकृष्ट करानेका प्रयत्न कीजिये। उन दोनोंके संयोगसे शक्तिधर प्रभु स्कन्द उत्पन्न होंगे; वे षडास्य (छः मुखवाले), |