भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 539
अध्याय १०१ ]सतीका हिमवान्‌की पुत्री पार्वतीके रूपमें प्राकट्य५३७
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
षडास्यो द्वादशभुजः सेनानीः पावकिः प्रभुः।<br>स्वाहेयः कार्तिकेयश्च गाङ्गेयः शरधामजः॥ २८<br><br>देवः शाखो विशाखश्च नैगमेशश्च वीर्यवान्।<br>सेनापतिः कुमाराख्यः सर्वलोकनमस्कृतः॥ २९<br><br>लीलयैव महासेनः प्रबलं तारकासुरम्।<br>बालोऽपि विनिहत्यैको देवान् सन्तारयिष्यति॥ ३०द्वादशभुज (बारह भुजाओंवाले), सेनानी, पावकि, प्रभु, स्वाहेय, कार्तिकेय, गांगेय, शरधामज, देव, शाख, विशाख, नैगमेश, वीर्यवान्, सेनापति और कुमार नामवाले होकर सभी लोकोंसे नमस्कृत होंगे। वे महासेन बालक होते हुए भी बिना प्रयासके अकेले ही [उस] महाबली तारकासुरका वध करके देवताओंका उद्धार करेंगे॥ २४—३०॥
एवमुक्तस्तदा तेन ब्रह्मणा परमेष्ठिना।<br>बृहस्पतिस्तथा सेन्द्रैर्देवैर्देवं प्रणम्य तम्॥ ३१<br><br>मेरोः शिखरमासाद्य स्मरं सस्मार सुव्रतः।<br>स्मरणाद्देवदेवस्य स्मरोऽपि सह भार्यया॥ ३२<br><br>रत्या समं समागम्य नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>सशक्रमह तं जीवं जगज्जीवो द्विजोत्तमाः॥ ३३<br><br>स्मृतो यद्भवता जीव सम्प्राप्तोऽहं तवान्तिकम्।<br>ब्रूहि यन्मे विधातव्यं तमाह सुरपूजितः॥ ३४<br><br>तमाह भगवान् शक्रः सम्भाव्य मकरध्वजम्।<br>शङ्करेणाम्बिकामद्य संयोजय यथासुखम्॥ ३५<br><br>तया स रमते येन भगवान् वृषभध्वजः।<br>तेन मार्गेण मार्गस्व पत्न्या रत्यानया सह॥ ३६<br><br>सोऽपि तुष्टो महादेवः प्रदास्यति शुभां गतिम्।<br>विप्रयुक्तस्तया पूर्वं लब्ध्वा तां गिरिजामुमाम्॥ ३७तब उन परमेष्ठी ब्रह्माके इस प्रकार कहनेपर इन्द्रसहित सभी देवताओंके साथ सुव्रत बृहस्पतिने देवदेव उन ब्रह्माको प्रणाम करके मेरुके शिखरपर पहुँचकर कामदेवका स्मरण किया। हे श्रेष्ठ द्विजो! देवगुरु ब्रह्माके स्मरण करनेसे जगत्‌का जीवस्वरूप कामदेव भी [अपनी] भार्या रतिके साथ वहाँ आकर हाथ जोड़कर नमस्कार करके इन्द्रसहित उन बृहस्पतिसे बोला—‘हे बृहस्पते! आपने मेरा स्मरण किया है, अतः मैं आपके पास आया हूँ; मुझे जो करना हो, उसे बताइये।’ तब देवपूजित बृहस्पति उससे कुछ बोलने ही वाले थे कि उत्सुकतावश भगवान् इन्द्रने कामदेवकी प्रशंसा करके उससे कहा—‘अब आप सुखपूर्वक शंकरके साथ अम्बिकाका संयोग कराइये। वे भगवान् वृषभध्वज जिस भी उपायसे उनके साथ रमण करें; अपनी पत्नी रतिके साथ आप उस उपायको खोजिये। पहलेसे ही उन [अम्बिका]-से वियुक्त हुए वे महादेव भी उन पार्वती उमाको [पुनः] प्राप्त करके प्रसन्न होकर आपको शुभ गति प्रदान करेंगे’॥ ३१—३७॥
एवमुक्तो नमस्कृत्य देवदेवं शचीपतिम्।<br>देवदेवाश्रमं गन्तुं मतिं चक्रे तया सह॥ ३८<br><br>गत्वा तदाश्रमे शम्भोः सह रत्या महाबलः।<br>वसन्तेन सहायेन देवं योक्तुमनाभवत्॥ ३९उनके ऐसा कहनेपर देवदेव इन्द्रको नमस्कार करके कामदेवने उस [रति]-के साथ शंकरजीके आश्रममें जानेका निश्चय किया। तब रति तथा अपने सहायक वसन्तके साथ शिवजीके आश्रममें जाकर महाबली कामदेवने पार्वतीके साथ महादेवका संयोग करानेका मन बनाया॥ ३८-३९॥
ततः सम्प्रेक्ष्य मदनं हसन् देवस्त्रियम्बकः।<br>नयनेन तृतीयेन सावज्ञं तमवैक्षत॥ ४०<br><br>ततोऽस्य नेत्रजो वह्निर्मदनं पार्श्वतः स्थितम्।<br>अदहत्तत्क्षणादेव ललाप करुणं रतिः॥ ४१तत्पश्चात् कामदेवको देखकर हँसते हुए त्रिनेत्र शिवने अवज्ञापूर्वक उसे [अपने] तीसरे नेत्रसे देखा। इसके बाद उनके नेत्रसे उत्पन्न अग्निने पासमें ही खड़े कामदेवको उसी क्षण जला दिया। तब रति करुण