भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 540
५३८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| रत्याः प्रलापमाकर्ण्य देवदेवो वृषध्वजः।<br>कृपया परया प्राह कामपत्नीं निरीक्ष्य च॥ ४२<br><br>अमूर्तोऽपि ध्रुवं भद्रे कार्यं सर्वं पतिस्तव।<br>रतिकाले ध्रुवं भद्रे करिष्यति न संशयः॥ ४३<br><br>यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशाः।<br>शापाद् भृगोर्महातेजाः सर्वलोकहिताय वै॥ ४४<br><br>तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति।<br>सा प्रणम्य तदा रुद्रं कामपत्नी शुचिस्मिता॥ ४५<br><br>जगाम मदनं लब्ध्वा वसन्तेन समन्विता॥ ४६ | विलाप करने लगी। रतिके विलापको सुनकर देवदेव वृषध्वजने परम कृपासे कामदेवकी पत्नीकी ओर देखकर उससे कहा—'हे भद्रे! तुम्हारा पति देहरहित होते हुए भी रतिकालमें निश्चित रूपसे सम्पूर्ण कार्य करेगा; हे भद्रे! इसमें सन्देह नहीं है। जब [भगवान्] विष्णु भृगुके शापसे सभी लोकोंके हितके लिये महायशस्वी तथा महातेजस्वी वासुदेव (वसुदेवपुत्र)-के रूपमें अवतीर्ण होंगे, तब उनका [प्रद्युम्न नामक] जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुम्हारा पति होगा'॥ ४०—४४¹/₂॥<br><br>इसके बाद रुद्रको प्रणाम करके पवित्र मुसकानवाली वह कामपत्नी अनंगको प्राप्त करके वसन्तके साथ चली गयी॥ ४५-४६॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मदनदाहो नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मदनदाह' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०१॥


एक सौ दोवाँ अध्याय

पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना

सूत उवाचसूतजी बोले—
तपसा च महादेव्याः पार्वत्या वृषभध्वजः।<br>प्रीतश्च भगवान् शर्वो वचनाद् ब्रह्मणस्तदा॥ १<br><br>हिताय चाश्रमाणां च क्रीडार्थं भगवान् भवः।<br>तदा हैमवतीं देवीमुपयेमे यथाविधि॥ २<br><br>जगाम स स्वयं ब्रह्मा मरीच्याद्यैर्महर्षिभिः।<br>तपोवनं महादेव्याः पार्वत्याः पद्मसम्भवः॥ ३<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तां देवीं स जगतोऽरणीम्।<br>किमर्थं तपसा लोकान् सन्तापयसि शैलजे॥ ४<br><br>त्वया सृष्टं जगत्सर्वं मातस्त्वं मा विनाशय।<br>त्वं हि सन्धारये लोकानिमान् सर्वान् स्वतेजसा॥ ५<br><br>सर्वदेवेश्वरः श्रीमान् सर्वलोकपतिर्भवः।<br>यस्य वै देवदेवस्य वयं किङ्करवादिनः॥ ६[हे ऋषियो!] भगवान् वृषभध्वज शर्व पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो गये। इसके बाद ब्रह्माजीके कहनेसे भगवान् भवने सभी आश्रमोंके हितके लिये और क्रीड़ा करनेके लिये विधिपूर्वक पार्वतीके साथ विवाह किया॥ १-२॥<br><br>उस समय कमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी स्वयं मरीचि आदि महर्षियोंके साथ महादेवी पार्वतीके तपोवनमें गये थे। उन्होंने जगत्की निमित्तकारणस्वरूपा उन देवीकी प्रदक्षिणा करके कहा—'हे शैलजे! आप तपस्यासे लोकोंको किसलिये संतप्त कर रही हैं? हे मातः! आपने ही सम्पूर्ण जगत्‌का सृजन किया है, अतः आप इसका विनाश मत कीजिये; आप अपने तेजसे इन समस्त लोकोंको धारण कीजिये। श्रीमान् शिवजी सभी देवताओंके ईश्वर तथा सभी लोकोंके स्वामी हैं।