श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
१०२- पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| ५३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रत्याः प्रलापमाकर्ण्य देवदेवो वृषध्वजः।<br>कृपया परया प्राह कामपत्नीं निरीक्ष्य च॥ ४२<br><br>अमूर्तोऽपि ध्रुवं भद्रे कार्यं सर्वं पतिस्तव।<br>रतिकाले ध्रुवं भद्रे करिष्यति न संशयः॥ ४३<br><br>यदा विष्णुश्च भविता वासुदेवो महायशाः।<br>शापाद् भृगोर्महातेजाः सर्वलोकहिताय वै॥ ४४<br><br>तदा तस्य सुतो यश्च स पतिस्ते भविष्यति।<br>सा प्रणम्य तदा रुद्रं कामपत्नी शुचिस्मिता॥ ४५<br><br>जगाम मदनं लब्ध्वा वसन्तेन समन्विता॥ ४६ | विलाप करने लगी। रतिके विलापको सुनकर देवदेव वृषध्वजने परम कृपासे कामदेवकी पत्नीकी ओर देखकर उससे कहा—'हे भद्रे! तुम्हारा पति देहरहित होते हुए भी रतिकालमें निश्चित रूपसे सम्पूर्ण कार्य करेगा; हे भद्रे! इसमें सन्देह नहीं है। जब [भगवान्] विष्णु भृगुके शापसे सभी लोकोंके हितके लिये महायशस्वी तथा महातेजस्वी वासुदेव (वसुदेवपुत्र)-के रूपमें अवतीर्ण होंगे, तब उनका [प्रद्युम्न नामक] जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही तुम्हारा पति होगा'॥ ४०—४४¹/₂॥<br><br>इसके बाद रुद्रको प्रणाम करके पवित्र मुसकानवाली वह कामपत्नी अनंगको प्राप्त करके वसन्तके साथ चली गयी॥ ४५-४६॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे मदनदाहो नामैकाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०१॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'मदनदाह' नामक एक सौ एकवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०१॥
एक सौ दोवाँ अध्याय
पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका ब्राह्मणवेषमें आकर उन्हें वरदान देना, हिमालयद्वारा पार्वतीस्वयंवरकी घोषणा, स्वयंवरमें भगवान् शिवका बालरूपमें उपस्थित होकर सभीको मोहित करना, पुनः ब्रह्माकी स्तुतिसे प्रसन्न हो महेश्वरका मनोहर वररूप धारणकर सबको आनन्दित करना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| तपसा च महादेव्याः पार्वत्या वृषभध्वजः।<br>प्रीतश्च भगवान् शर्वो वचनाद् ब्रह्मणस्तदा॥ १<br><br>हिताय चाश्रमाणां च क्रीडार्थं भगवान् भवः।<br>तदा हैमवतीं देवीमुपयेमे यथाविधि॥ २<br><br>जगाम स स्वयं ब्रह्मा मरीच्याद्यैर्महर्षिभिः।<br>तपोवनं महादेव्याः पार्वत्याः पद्मसम्भवः॥ ३<br><br>प्रदक्षिणीकृत्य च तां देवीं स जगतोऽरणीम्।<br>किमर्थं तपसा लोकान् सन्तापयसि शैलजे॥ ४<br><br>त्वया सृष्टं जगत्सर्वं मातस्त्वं मा विनाशय।<br>त्वं हि सन्धारये लोकानिमान् सर्वान् स्वतेजसा॥ ५<br><br>सर्वदेवेश्वरः श्रीमान् सर्वलोकपतिर्भवः।<br>यस्य वै देवदेवस्य वयं किङ्करवादिनः॥ ६ | [हे ऋषियो!] भगवान् वृषभध्वज शर्व पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो गये। इसके बाद ब्रह्माजीके कहनेसे भगवान् भवने सभी आश्रमोंके हितके लिये और क्रीड़ा करनेके लिये विधिपूर्वक पार्वतीके साथ विवाह किया॥ १-२॥<br><br>उस समय कमलसे उत्पन्न ब्रह्माजी स्वयं मरीचि आदि महर्षियोंके साथ महादेवी पार्वतीके तपोवनमें गये थे। उन्होंने जगत्की निमित्तकारणस्वरूपा उन देवीकी प्रदक्षिणा करके कहा—'हे शैलजे! आप तपस्यासे लोकोंको किसलिये संतप्त कर रही हैं? हे मातः! आपने ही सम्पूर्ण जगत्का सृजन किया है, अतः आप इसका विनाश मत कीजिये; आप अपने तेजसे इन समस्त लोकोंको धारण कीजिये। श्रीमान् शिवजी सभी देवताओंके ईश्वर तथा सभी लोकोंके स्वामी हैं। |
| अध्याय १०२] | पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना | ५३१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स एवं परमेशानः स्वयं च वरयिष्यति।<br>वरदे येन सृष्टासि न विना यस्त्वयाम्बिके॥ ७<br><br>वर्तते नात्र सन्देहस्तव भर्ता भविष्यति। | हमलोग जिन देवाधिदेवके सेवक कहे जाते हैं, वे परमेश्वर ही स्वयं आपका वरण करेंगे। हे वरदे! जिन्होंने आपका सृजन किया है और हे अम्बिके! जो आपके बिना रह नहीं सकते; वे [शिवजी] आपके पति होंगे; इसमें सन्देह नहीं है'॥ ३—७½॥ |
| इत्युक्त्वा तां नमस्कृत्य मुहुः सम्प्रेक्ष्य पार्वतीम्॥ ८<br><br>गते पितामहे देवो भगवान् परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुं द्विजरूपेण चाश्रमम्॥ ९ | ऐसा कहकर उन पार्वतीको नमस्कार करके बार-बार उनकी ओर देखकर पितामह (ब्रह्मा)-के चले जानेपर भगवान् परमेश्वर [शिव] अनुग्रह करनेके लिये ब्राह्मणके रूपमें उस आश्रममें गये॥ ८-९॥ |
| सा च दृष्ट्वा महादेवं द्विजरूपेण संस्थितम्।<br>प्रतिभाद्यैः प्रभुं ज्ञात्वा ननाम वृषभध्वजम्॥ १०<br><br>सम्पूज्य वरदं देवं ब्राह्मणं छद्मनागतम्।<br>तुष्टाव परमेशानं पार्वती परमेश्वरम्॥ ११ | द्विजरूपसे उपस्थित महादेवको देखकर उन पार्वतीने उनकी दीप्ति आदिके द्वारा उन्हें भगवान् वृषभध्वज जानकर प्रणाम किया। ब्राह्मणके छद्मरूपमें आये हुए वरदाता महादेवकी पूजा करके पार्वतीने उन परमेशान परमेश्वरकी स्तुति की॥ १०-११॥ |
| अनुगृह्य तदा देवीमुवाच प्रहसन्निव।<br>कुलधर्माश्रयं रक्षन् भूधरस्य महात्मनः॥ १२<br><br>क्रीडार्थं च सतां मध्ये सर्वदेवपतिर्भवः।<br>स्वयंवरे महादेवि तव दिव्यसुशोभने॥ १३<br><br>आस्थाय रूपं यत्सौम्यं समेष्येऽहं सह त्वया। | तदनन्तर देवीपर अनुग्रह करके शिवजी हँसते हुए बोले—'हे महादेवि! सभी देवताओंका स्वामी मैं शिव महात्मा हिमालयके कुलधर्मकी परम्पराकी रक्षा करता हुआ क्रीड़ा करनेके लिये सज्जनोंके मध्य तुम्हारे दिव्य तथा अतिसुन्दर स्वयंवरमें सौम्य रूप धारण करके तुमसे मिलूँगा'॥ १२-१३½॥ |
| इत्युक्त्वा तां समालोक्य देवो दिव्येन चक्षुषा॥ १४<br><br>जगामेष्टं तदा दिव्यं स्वपुरं प्रययौ च सा।<br>दृष्ट्वा हृष्टस्तदा देवीं मेनया तुहिनाचलः॥ १५ | ऐसा कह करके उन्हें दिव्य दृष्टिसे देखकर शिवजी अपने अभीष्ट (प्रिय) दिव्य लोकको चले गये |
| ५४० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| आलिङ्ग्याघ्राय सम्पूज्य पुत्रीं साक्षात्तपस्विनीम्।<br>दुहितुर्देवदेवेन न जानन्नभिमन्त्रितम्॥ १६<br>स्वयंवरं तदा देव्याः सर्वलोकेष्वघोषयत्।<br>अथ ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः साक्षाज्जनार्दनः॥ १७ | और इसके बाद वे भी चली गयीं। तब देवीको देखकर मैनासहित हिमालय साक्षात् तपस्विनी अपनी पुत्रीका आलिंगन करके, उनका मस्तक सूंघकर और उनकी पूजा करके अत्यन्त प्रसन्न हुए। तत्पश्चात् देवाधिदेव [शिव]-द्वारा अपनी पुत्रीको दिये गये संकेतको न जानते हुए भी हिमालयने सभी लोकोंमें देवीके स्वयंवरकी घोषणा कर दी॥ १४-१६१/२॥ |
| शक्रश्च भगवान् वह्निर्भास्करो भग एव च।<br>त्वष्टार्यमा विवस्वांश्च यमो वरुण एव च॥ १८<br>वायुः सोमस्तथेशानो रुद्राश्च मुनयस्तथा।<br>अश्विनौ द्वादशादित्या गन्धर्वा गरुडस्तथा॥ १९<br>यक्षाः सिद्धास्तथा साध्या दैत्याः किंपुरुषोरगाः।<br>समुद्राश्च नदा वेदा मन्त्राः स्तोत्रादयः क्षणाः॥ २०<br>नागाश्च पर्वताः सर्वे यज्ञाः सूर्यादयो ग्रहाः।<br>त्रयस्त्रिंशच्च देवानां त्रयश्च त्रिशतं तथा॥ २१<br>त्रयश्च त्रिसहस्रं च तथान्ये बहवः सुराः।<br>जग्मुर्गिरीन्द्रपुत्र्यास्तु स्वयंवरमनुत्तमम्॥ २२ | इसके अनन्तर ब्रह्मा, साक्षात् भगवान् जनार्दन विष्णु, ऐश्वर्यशाली इन्द्र, अग्निदेव, सूर्य, भग, त्वष्टा, अर्यमा, विवस्वान्, यम, वरुण, वायु, सोम, ईशान, सभी रुद्र, मुनिगण, दोनों अश्विनीकुमार, बारहों आदित्य, समस्त गन्धर्व, गरुड़, यक्ष, सिद्ध, साध्य, दैत्य, किंपुरुष, उरग, समुद्र, नद, वेद, मन्त्र, स्तोत्र आदि, क्षण, नाग, पर्वत, सभी यज्ञ, सूर्य आदि ग्रह, वसु, रुद्र तथा आदित्य आदि तैंतीस देवताओंके भेद-प्रभेदरूप ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव ये तीन, तीन सौ तथा तीन हजार तीन देवता तथा अन्य बहुत-से देवता पर्वतराजकी पुत्रीके अत्युत्तम स्वयंवरमें पहुँचे॥ १७-२२॥ |
| अथ शैलसुता देवी हैममारुह्य शोभनम्।<br>विमानं सर्वतोभद्रं सर्वरत्नैरलङ्कृतम्॥ २३<br>अप्सरोभिः प्रनृत्ताभिः सर्वाभरणभूषितैः।<br>गन्धर्वैःसिद्धैर्विविधैः किन्नरैश्च सुशोभनैः॥ २४<br>वन्दिभिः स्तूयमाना च स्थिता शैलसुता तदा।<br>सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं चावहत्तथा॥ २५<br>मालिनी गिरिपुत्र्यास्तु सन्ध्यापूर्णेन्दुमण्डलम्।<br>चामरासक्तहस्ताभिर्दिव्यस्त्रीभिश्च संवृता॥ २६<br>मालां गृह्य जया तस्थौ सुरद्रुमसमुद्भवाम्।<br>विजया व्यजनं गृह्य स्थिता देव्याः समीपगा॥ २७ | तदनन्तर पार्वती देवी स्वर्णनिर्मित तथा सभी रत्नोंसे अलंकृत सर्वतोभद्र नामक उत्तम विमानपर आरूढ़ होकर नृत्य करती हुई अप्सराओं, सभी आभूषणोंसे विभूषित विविध गन्धर्वों, सिद्धों तथा परम सुन्दर किन्नरोंके साथ और बन्दीजनोंद्वारा स्तुत होती हुई वहाँ उपस्थित हुईं। [उनकी सखी] मालिनी रत्नकिरणोंसे मिश्रित श्वेत वर्णका सन्ध्याकालीन चन्द्रमण्डलसदृश छत्र [उन] पार्वतीके ऊपर लगाये हुए थी। वे पार्वती हाथोंमें चँवर लिये हुई दिव्य स्त्रियोंसे घिरी हुई थीं। कल्पवृक्षके पुष्पोंसे निर्मित माला [हाथमें] लेकर जया [नामक सखी] खड़ी थी और विजया व्यजन (पंखा) लेकर देवीके समीप खड़ी थी॥ २३-२७॥ |
| मालां प्रगृह्य देव्यां तु स्थितायां देवसंसदि।<br>शिशुर्भूत्वा महादेवः क्रीडार्थं वृषभध्वजः॥ २८<br>उत्सङ्गतलसंसुप्तो बभूव भगवान् भवः।<br>अथ दृष्ट्वा शिशुं देवास्तस्या उत्सङ्गवर्तिनम्॥ २९<br>कोऽयमत्रेति सम्मन्त्र्य चुक्षुभुश्च समागताः।<br>वज्रमाहारयत्तस्य बाहुमुद्यम्य वृत्रहा॥ ३० | देवताओंकी सभामें [अपने हाथमें] माला लेकर देवी पार्वतीके स्थित होनेपर भगवान् वृषभध्वज भव महादेव क्रीड़ा करनेके लिये एक शिशुके रूपमें होकर देवीकी गोदमें सोये हुएकी भाँति स्थित हो गये। तब उनकी गोदमें स्थित शिशुको देखकर 'यहाँपर यह कौन है'—ऐसा विचार करके [वहाँ] उपस्थित देवतागण |
अध्याय १०२] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४१
| स बाहुरुद्यमस्तस्य तथैव समुपस्थितः।<br>स्तम्भितः शिशुरूपेण देवदेवेन लीलया ॥ ३१<br><br>वज्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहुं चालयितुं तथा।<br>वह्निः शक्तिं तथा क्षेप्तुं न शशाक तथा स्थितः ॥ ३२ | क्षुब्ध हो उठे॥ २८-२९ १/२ ॥<br><br>वृत्रासुरका संहार करनेवाले इन्द्रने भुजा उठाकर उस [शिशु]-के ऊपर वज्र चलाना चाहा, किंतु उनका उठा हुआ वह बाहु वैसा ही रह गया। शिशुरूपधारी देवदेव [शिव]-के द्वारा लीलापूर्वक स्तम्भित कर दिये गये वे इन्द्र वज्र फेंकने तथा अपनी भुजा चलानेमें समर्थ नहीं हुए। [इसी प्रकार] अग्निदेव भी अपनी शक्ति चलानेमें समर्थ नहीं हुए और वैसे ही खड़े रह गये॥ ३०-३२॥ |
| यमोऽपि दण्डं खड्गं च निर्ऋतिर्मुनिपुङ्गवाः।<br>वरुणो नागपाशं च ध्वजयष्टिं समीरणः ॥ ३३<br><br>सोमो गदां धनेशश्च दण्डं दण्डभृतां वरः।<br>ईशानश्च तथा शूलं तीव्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३४<br><br>रुद्राश्च शूलमादित्या मुशलं वसवस्तथा।<br>मुद्गरं स्तम्भिताः सर्वे देवेनाशु दिवौकसः ॥ ३५<br><br>स्तम्भिता देवदेवेन तथान्ये च दिवौकसः। | हे श्रेष्ठ मुनियो! इसी प्रकार यम अपने दण्डको, निर्ऋति अपने खड्गको, वरुण अपने नागपाशको, वायुदेव अपने ध्वजदण्डको, सोम अपनी गदाको, दण्डधारियोंमें श्रेष्ठ कुबेर अपने दण्डको तथा ईशान अपने तीक्ष्ण त्रिशूलको उठाकर खड़े ही रह गये। सभी रुद्र शूलको, सभी आदित्य मुसलको तथा वसुगण मुद्गरको उठाये ही रह गये; सभी देवता शीघ्र ही महादेवके द्वारा स्तम्भित कर दिये गये। [इसी प्रकार] देवाधिदेवने अन्य देवताओंको भी स्तम्भित कर दिया॥ ३३-३५ १/२॥ |
| शिरः प्रकम्पयन् विष्णुश्चक्रमुद्यम्य संस्थितः ॥ ३६<br><br>तस्यापि शिरसो बालः स्थिरत्वं प्रचकार ह।<br>चक्रं क्षेप्तुं न शशाक बाहूंचालयितुं न च ॥ ३७<br><br>पूषा दन्तान् दशन् दन्तैर्बालमैक्षत मोहितः।<br>तस्यापि दशनाः पेतुर्दृष्टमात्रस्य शम्भुना ॥ ३८ | विष्णु [अपने] सिरको हिलाते हुए चक्र उठाकर खड़े रहे। उस बालकने उनके भी सिरको स्थिर कर दिया। वे [विष्णु] अपना चक्र फेंकने तथा बाहुओंको चलानेमें समर्थ नहीं हुए। पूषाने मोहित होकर अपने दाँतोंसे दाँतोंको किटकिटाते हुए उस बालककी ओर देखा। शिवके देखनेमात्रसे ही उसके दाँत गिर गये। |
| ५४२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| बलं तेजश्च योगं च तथैवास्तम्भयद्विभुः।<br>अथ तेषु स्थितेष्वेव मन्युमत्सु सुरेष्वपि ॥ ३९ | उसी प्रकार विभु शिवने सबके बल, तेज तथा योगको स्तम्भित कर दिया॥ ३६–३८ १/२॥ |
| ब्रह्मापरमसंविग्नो ध्यानमास्थाय शङ्करम्।<br>बुबुधे देवमीशानमुमोत्सङ्गे तमास्थितम्॥ ४०<br>स बुद्ध्वा देवमीशानं शीघ्रमुत्थाय विस्मितः।<br>ववन्दे चरणौ शम्भोरस्तुवच्च पितामहः॥ ४१<br>पुराणैः सामसङ्गीतैः पुण्याख्यैर्गुह्यनामभिः। | इसके बाद क्रोधमें भरे हुए उन समस्त देवताओंके स्तम्भित हो जानेपर अत्यन्त व्याकुल ब्रह्माने शंकरका ध्यान करके यह जान लिया कि उमाकी गोदमें वे भगवान् ईशान ही विराजमान हैं। ईशानदेवको पहचानकर शीघ्र उन्हें उठाकर विस्मित हुए पितामहने शम्भुके चरणोंकी वन्दना की और प्राचीन सामगानों, उनके पवित्र नामों तथा गुप्त नामोंके द्वारा उनकी स्तुति की॥ ३९–४१ १/२॥ |
| स्रष्टा त्वं सर्वलोकानां प्रकृतेश्च प्रवर्तकः॥ ४२<br>बुद्धिस्त्वं सर्वलोकानामहङ्कारस्त्वमीश्वरः।<br>भूतानामिन्द्रियाणां च त्वमेवेश प्रवर्तकः॥ ४३<br>तवाहं दक्षिणादङ्गात्सृष्टः पूर्वं पुरातनः।<br>वामहस्तान्महाबाहो देवो नारायणः प्रभुः॥ ४४<br>इयं च प्रकृतिर्देवी सदा ते सृष्टिकारण।<br>पत्नीरूपं समास्थाय जगत्कारणमागता॥ ४५<br>नमस्तुभ्यं महादेव महादेव्यै नमो नमः।<br>प्रसादात्तव देवेश नियोगाच्च मया प्रजाः॥ ४६<br>देवाद्यास्तु इमाः सृष्टा मूढास्त्वद्योगमोहिताः।<br>कुरु प्रसादमैतेषां यथापूर्वं भवन्त्विमे॥ ४७ | [ब्रह्माने कहा—] आप समस्त लोकोंके स्रष्टा तथा प्रकृतिके प्रवर्तक हैं। आप सभी लोकोंकी बुद्धि एवं अहंकार हैं। आप ईश्वर हैं। हे ईश! आप ही सभी प्राणियोंकी इन्द्रियोंके प्रवर्तक हैं। हे महाबाहो! सर्वप्रथम आपके दाहिने हाथसे पुरातन मैं [ब्रह्मा] उत्पन्न हुआ हूँ और बायें हाथसे भगवान् प्रभु नारायण उत्पन्न हुए हैं। हे सृष्टिकारण! ये देवी प्रकृति सर्वदा आपकी पत्नीका रूप धारणकर जगत्की कारणभूता बनी हैं। हे महादेव! आपको नमस्कार है; महादेवीको बार-बार नमस्कार है। हे देवेश! मैंने आपकी कृपासे तथा आपके आदेशसे इन प्रजाओं तथा देवता आदिका सृजन किया है। आपके योगसे मोहित होकर ये देवगण अब मूढ़ताको प्राप्त हो गये हैं। अब आप इनपर अनुग्रह कीजिये, जिससे ये पूर्वकी भाँति हो जायँ॥ ४२–४७॥ |
| सूत उवाच<br>विज्ञाप्यैवं तदा ब्रह्मा देवदेवं महेश्वरम्।<br>संस्तम्भितांस्तदा तेन भगवानाह पद्मजः॥ ४८<br>मूढास्थ देवताः सर्वा नैव बुध्यत शङ्करम्।<br>देवदेवमिहायान्तं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ४९<br>गच्छध्वं शरणं शीघ्रं देवाः शक्रपुरोगमाः।<br>सनारायणकाः सर्वे मुनिभिः शङ्करं प्रभुम्॥ ५०<br>सार्धं मयैव देवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>अनया हैमवत्या च प्रकृत्या सह सत्तमम्॥ ५१ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इस प्रकार देवदेव महेश्वरका स्तवन करके पद्मयोनि भगवान् ब्रह्माने उन [शिव]-के द्वारा स्तम्भित किये गये देवताओंसे कहा— मूढ़ताको प्राप्त आप सभी देवताओंने सभी देवोंसे नमस्कृत होनेवाले यहाँ आये हुए देवदेव शंकरको नहीं पहचाना। हे देवताओ! इन्द्र आदि आप सभी देवगण नारायणको, सभी मुनियोंको तथा मुझको साथ लेकर इन प्रकृतिस्वरूपा पार्वतीके साथ विराजमान सर्वश्रेष्ठ, प्रभु, देवेश, परमात्मा, ईश्वर शंकरकी शरणमें शीघ्र चलिये॥ ४८–५१॥ |
| तत्र ते स्तम्भितास्तेन तथैव सुरसत्तमाः।<br>प्रणेमुर्मनसा सर्वे सनारायणकाः प्रभुम्॥ ५२ | तब उन शिवके द्वारा वहाँपर स्तम्भित किये गये नारायणसहित उन सभी श्रेष्ठ देवताओंने प्रभु [शिव]-को मनसे प्रणाम किया॥ ५२॥ |
| अथ तेषां प्रसन्नोऽभूद्देवदेवस्त्रियम्बकः।<br>यथापूर्वं चकाराशु वचनाद् ब्रह्मणः प्रभुः॥ ५३ | इसके बाद देवदेव त्रिलोचन [शिव] उनपर |
अध्याय १०२ ] पार्वतीकी तपस्यासे प्रसन्न हो भगवान् शिवका उन्हें वरदान देना ५४३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत एवं प्रसन्ने तु सर्वदेवनिवारणम्।<br>वपुश्चकार देवेशो दिव्यं परममद्भुतम्॥ ५४॥ | प्रसन्न हो गये और उन प्रभुने ब्रह्माके वचनानुसार सबको पूर्वकी भाँति कर दिया॥ ५३॥<br>इस प्रकार प्रसन्न हो जानेपर उन देवेश्वरने सभी देवताओंके द्वारा न देखे जा सकनेवाला, दिव्य तथा परम अद्भुत शरीर धारण किया॥ ५४॥ |
| तेजसा तस्य देवास्ते सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>सब्रह्मकाः ससाध्याश्च सनारायणकास्तथा॥ ५५॥<br><br>सयमाश्र्च सरुद्राश्च चक्षुरप्रार्थयन् विभुम्।<br>तेभ्यश्च परमं चक्षुः सर्वदृष्टौ च शक्तिमत्॥ ५६॥ | तब उनके तेजसे इन्द्र, चन्द्र, सूर्य, ब्रह्मा, साध्यगण, नारायण, यम, सभी रुद्र आदिके सहित वे देवता प्रतिहत (नष्ट) दृष्टिवाले हो गये। तब उन लोगोंने प्रभुसे [दिव्य] दृष्टिके लिये प्रार्थना की। इसपर उमापति शर्वने उन्हें सब कुछ देखनेमें समर्थ दिव्य दृष्टि प्रदान की; साथ ही उन्होंने भवानी तथा हिमालयको भी दिव्य दृष्टि दी॥ ५५-५६ १/२॥ |
| ददावम्बापतिः शर्वो भवान्याश्च चलस्य च।<br>लब्ध्वा चक्षुस्तदा देवा इन्द्रविष्णुपुरोगमाः॥ ५७॥<br><br>सब्रह्मकाः सशक्राश्च तमपश्यन् महेश्वरम्।<br>ब्रह्माद्या नेमिरे तूर्णं भवानी च गिरीश्वरः॥ ५८॥<br><br>मुनयश्च महादेवं गणेशाः शिवसम्मताः।<br>ससृजुः पुष्पवृष्टिं च खेचराः सिद्धचारणाः॥ ५९॥<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुस्तुष्टुवुर्मुनयः प्रभुम्।<br>जगुर्गन्धर्वमुख्याश्च ननृतुश्चाप्सरोगणाः॥ ६०॥<br><br>मुमुहुर्गणपाः सर्वे मुमोदाम्बा च पार्वती।<br>तस्य देवी तदा हृष्टा समक्षं त्रिदिवौकसाम्॥ ६१॥ | तब दिव्य दृष्टि प्राप्त करके ब्रह्मा तथा शक्र-सहित इन्द्र, विष्णु आदि प्रधान देवताओंने उन महेश्वरका दर्शन किया। ब्रह्मा आदि देवताओं, भवानी (पार्वती), गिरीश्वर [हिमालय], मुनियों तथा शिवप्रिय गणेश्वरोंने शीघ्र ही महादेवको प्रणाम किया। आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने [उनपर] पुष्पवृष्टि की, देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं, मुनिगण प्रभुकी स्तुति करने लगे, प्रधान गन्धर्व गाने लगे तथा अप्सराएँ नाचने लगीं, सभी गणेश्वर आनन्दित हो उठे और अम्बा पार्वती भी आनन्दविभोर हो गयीं॥ ५७-६० १/२॥<br><br>उस समय आह्लादित देवी [पार्वती]-ने त्रिदेवोंके |
| पादयोः स्थापयामास मालां दिव्यां सुगन्धिनीम्।<br>साधु साध्विति सम्प्रोच्य तया तत्रैव चार्चितम्॥ ६२॥ | समक्ष उन शिवके चरणोंमें दिव्य तथा सुगन्धित माला |
१०३- भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना
| सहदेव्या नमश्चक्रुः शिरोभिर्भूतलाश्रितैः ।<br>सर्वे सब्रह्मका देवाः सयक्षोरगराक्षसाः ॥ ६३ । | समर्पित कर दी। ब्रह्मा-यक्ष-उरग-राक्षसोंसहित सभी देवताओंने 'साधु-साधु' कहकर वहाँपर उन पार्वतीके द्वारा पूजित शिवको उन देवीसमेत पृथ्वीतलपर मस्तक टेककर प्रणाम किया॥ ६१–६३॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमास्वयंवरो नाम द्व्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमास्वयंवर' नामक एक सौ दोवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०२॥
एक सौ तीनवाँ अध्याय
भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा तथा विवाहके अनन्तर भगवान् शिवका काशी-आगमन और पार्वतीको मुक्तिक्षेत्र काशीकी महिमा बताना
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| अथ ब्रह्मा महादेवमभिवन्द्य कृताञ्जलिः।<br>उद्वाहः क्रियतां देव इत्युवाच महेश्वरम् ॥ १ | [हे ऋषियो!] इसके बाद ब्रह्माने हाथ जोड़कर महादेव महेश्वरको प्रणाम करके यह कहा—'हे देव! अब विवाह कीजिये'॥ १॥ |
| तस्य तद्वचनं श्रुत्वा ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>यथेष्टमिति लोकेशं प्राह भूतपतिः प्रभुः ॥ २ | उन परमेष्ठी ब्रह्माका वह वचन सुनकर भूतपति शिवने लोकेश [ब्रह्मा]-से कहा—'जो आपकी इच्छा हो'॥ २॥ |
| उद्वाहार्थं महेशस्य तत्क्षणादेव सुव्रताः।<br>ब्रह्मणा कल्पितं दिव्यं पुरं रत्नमयं शुभम् ॥ ३ | हे सुव्रतो! ब्रह्माने महेशके विवाहके लिये उसी क्षण रत्नमय, दिव्य तथा सुन्दर नगरका निर्माण किया॥ ३॥ |
| अथादितिर्दितिः साक्षाद्दनुः कद्रूः सुकालिका।<br>पुलोमा सुरसा चैव सिंहिका विनता तथा ॥ ४<br>सिद्धिर्माया क्रिया दुर्गा देवी साक्षात्सुधा स्वधा।<br>सावित्री वेदमाता च रजनी दक्षिणा द्युतिः ॥ ५<br>स्वाहा स्वधा मतिर्बुद्धिर्ऋद्धिर्वृद्धिः सरस्वती।<br>राका कुहूः सिनीवाली देवी अनुमती तथा ॥ ६<br>धरणी धारणी चेला शची नारायणी तथा।<br>एताश्चान्याश्च देवानां मातरः पत्नयस्तथा ॥ ७<br>उद्वाहः शङ्करस्येति जग्मुः सर्वा मुदान्विताः।<br>उरगा गरुडा यक्षा गन्धर्वाः किन्नरा गणाः ॥ ८<br>सागरा गिरयो मेघा मासाः संवत्सरास्तथा।<br>वेदा मन्त्रास्तथा यज्ञाः स्तोमा धर्माश्च सर्वशः ॥ ९<br>हुङ्कारः प्रणवश्चैव प्रतिहाराः सहस्रशः।<br>कोटिरप्सरसो दिव्यास्तासां च परिचारिकाः ॥ १०<br>याश्च सर्वेषु द्वीपेषु देवलोकेषु निम्नगाः।<br>ताश्च स्त्रीविग्रहाः सर्वाः सज्जग्मुर्हृष्टमानसाः ॥ ११<br>गणपाश्च महाभागाः सर्वलोकनमस्कृताः।<br>उद्वाहः शङ्करस्येति तत्राजग्मुर्मुदान्विताः ॥ १२ | इसके बाद अदिति, दिति, साक्षात् दनु, कद्रू, सुकालिका, पुलोमा, सुरसा, सिंहिका, विनता, सिद्धि, माया, क्रिया, साक्षात् देवी दुर्गा, सुधा, स्वधा, वेदमाता सावित्री, रजनी, दक्षिणा, द्युति, स्वाहा, स्वधा, मति, बुद्धि, ऋद्धि, वृद्धि, सरस्वती, राका, कुहू, सिनीवाली, देवी अनुमती, धरणी, धारणी, इला, शची, नारायणी—ये सब एवं अन्य सभी देवमाताएँ तथा देवपत्नयाँ 'शंकरका विवाह हो रहा है'—ऐसा सोचकर आनन्दमग्न होकर [वहाँ] गयीं। सभी उरग, गरुड़, यक्ष, गन्धर्व, किन्नर, गण, समुद्र, पर्वत, मेघ, मास, संवत्सर, वेद, मन्त्र, यज्ञ, स्तोम, धर्म, हुंकार, प्रणव, हजारों प्रतिहार, करोड़ों दिव्य अप्सराएँ तथा उनकी परिचारिकाएँ और समस्त द्वीपों तथा देवलोकोंमें जो भी नदियाँ हैं, वे सब स्त्रीका रूप धारण करके प्रसन्नचित्त होकर वहाँ गयीं। सभी लोकोंसे नमस्कृत महाभाग गणेश्वर भी 'यह शंकरका विवाह है'—यह सोचकर प्रसन्नतासे युक्त हो वहाँ आये॥ ४–१२॥ |
| अध्याय १०३ ] | भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा | ५४५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अभ्ययुः शङ्खवर्णाश्च गणकोट्यो गणेश्वराः।<br>दशभिः केकराक्षश्च विद्युतोऽष्टाभिरेव च॥ १३<br><br>चतुःषष्ट्या विशाखाश्च नवभिः पारयात्रिकः।<br>षड्भिः सर्वान्तकः श्रीमान् तथैव विकृताननः ॥ १४<br><br>ज्वालाकेशो द्वादशभिः कोटिभिर्गणपुङ्गवः।<br>सप्तभिः समदः श्रीमान् दुन्दुभोऽष्टाभिरेव च ॥ १५<br><br>पञ्चभिश्च कपालीशः षड्भिः सन्दारकः शुभः।<br>कोटिकोटिभिरेवेह गण्डकः कुम्भकस्तथा ॥ १६ | शंखके समान वर्णवाले गणेश्वर [अपने] करोड़ों गणोंके साथ पहुँचे। केकराक्ष दस करोड़ गणोंके साथ, विद्युत आठ करोड़ गणोंके साथ, विशाख चौंसठ करोड़ गणोंके साथ, पारयात्रिक नौ करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् सर्वान्तक छः करोड़ गणोंके साथ, विकृतानन भी छः करोड़ गणोंके साथ, गणोंमें श्रेष्ठ ज्वालाकेश बारह करोड़ गणोंके साथ, श्रीमान् समद सात करोड़ गणोंके साथ, दुन्दुभ आठ करोड़ गणोंके साथ, कपालीश पाँच करोड़ गणोंके साथ, उत्तम संदारक छः करोड़ गणोंके साथ और गण्डक तथा कुम्भक करोड़ों-करोड़ों गणोंके साथ आये ॥ १३-१६॥ |
| विष्टम्भोऽष्टाभिरेवेह गणपः सर्वसत्तमः।<br>पिप्पलश्च सहस्रेण सन्नादश्च तथा द्विजाः ॥ १७<br><br>आवेष्टनस्तथाष्टाभिः सप्तभिश्चन्द्रतापनः।<br>महाकेशः सहस्रेण कोटीनां गणपो वृतः ॥ १८ | हे द्विजो ! सर्वश्रेष्ठ गणेश्वर विष्टम्भ आठ करोड़ गणोंके साथ और पिप्पल तथा सन्नाद एक-एक हजार करोड़ गणोंके साथ आये। आवेष्टन [नामक गणेश्वर] आठ करोड़ गणोंके साथ, चन्द्रतापन सात करोड़ गणोंके साथ और गणेश्वर महाकेश हजार करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १७-१८॥ |
| कुण्डी द्वादशभिर्वीरस्तथा पर्वतकः शुभः।<br>कालश्च कालकश्चैव महाकालः शतेन वै ॥ १९<br><br>आग्निकः शतकोट्या वै कोट्याग्निमुख एव च।<br>आदित्यमूर्धा कोट्या च तथा चैव धनावहः॥ २० | पराक्रमशाली [गणेश्वर] कुण्डी तथा शुभ पर्वतक बारह करोड़ गणोंके साथ और काल, कालक तथा महाकाल सौ करोड़ गणोंके साथ आये। आग्निक सौ करोड़ गणोंके साथ तथा अग्निमुख एक करोड़ गणोंके साथ आये। उसी प्रकार आदित्यमूर्धा तथा धनावह [नामक गणेश्वर] भी एक करोड़ गणोंके साथ आये ॥ १९-२०॥ |
| सन्नामश्च शतेनैव कुमुदः कोटिभिस्तथा।<br>अमोघः कोकिलश्चैव कोटिकोट्या सुमन्त्रकः ॥ २१<br><br>काकपादोऽपरः षष्ट्या षष्ट्या सन्तानकः प्रभुः।<br>महाबलश्च नवभिर्मधुपिङ्गश्च पिङ्गलः ॥ २२<br><br>नीलो नवत्या देवेशः पूर्णभद्रस्तथैव च।<br>कोटीनां चैव सप्तत्या चतुर्वक्त्रो महाबलः ॥ २३<br><br>कोटिकोटिसहस्राणां शतैर्विंशतिभिर्वृताः।<br>तत्राजग्मुस्तथा देवास्ते सर्वे शङ्करं भवम् ॥ २४ | सन्नाम तथा कुमुद सौ करोड़ गणोंके साथ आये। अमोघ, कोकिल तथा सुमन्त्रक करोड़-करोड़ गणोंके साथ आये। दूसरे गणेश्वर काकपाद साठ करोड़ गणोंके साथ, प्रभुतासम्पन्न सन्तानक साठ करोड़ गणोंके साथ और महाबल, मधु, पिंग तथा पिंगल नौ करोड़ गणोंके साथ आये। नील, देवेश तथा पूर्णभद्र नब्बे करोड़ गणोंके साथ और महाबलशाली चतुर्वक्त्र सत्तर करोड़ गणोंके साथ आये। वे सभी देव अपने बीस सौ हजार करोड़ गणोंसे घिरे हुए वहाँ भगवान् शंकरके पास पहुँचे ॥ २१-२४॥ |
| ५४६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भूतकोटिसहस्रेण प्रमथः कोटिभिस्त्रिभिः।<br>वीरभद्रश्चतुःषष्ट्या रोमजाश्चैव कोटिभिः ॥ २५<br>करणश्चैव विंशत्या नवत्या केवलः शुभः।<br>पञ्चाक्षः शतमम्युश्च मेघमन्युस्तथैव च ॥ २६<br>काष्ठकूटश्चतुःषष्ट्या सुकेशो वृषभस्तथा।<br>विरूपाक्षश्च भगवान् चतुःषष्ट्या सनातनः ॥ २७<br>तालकेतुः षडास्यश्च पञ्चास्यश्च सनातनः।<br>संवर्तकस्तथा चैत्रो लकुलीशः स्वयं प्रभुः ॥ २८<br>लोकान्तकश्च दीप्तास्यो तथा दैत्यान्तकः प्रभुः।<br>मृत्युहृत्कालहा कालो मृत्युञ्जयकरस्तथा ॥ २९<br>विषादो विषदश्चैव विद्युतः कान्तकः प्रभुः।<br>देवो भृङ्गी रिटिः श्रीमान् देवदेवप्रियस्तथा ॥ ३०<br>अशनिर्भासकश्चैव चतुःषष्ट्या सहस्रपात्।<br>एते चान्ये च गणपा असंख्यता महाबलाः ॥ ३१<br>सर्वे सहस्त्रहस्ताश्च जटामुकुटधारिणः।<br>चन्द्ररेखावतंसाश्च नीलकण्ठास्त्रिलोचनाः ॥ ३२<br>हारकुण्डलकेयूरमुकुटाद्यैरलङ्कृताः ।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशा अणिमादिगुणैर्वृताः ॥ ३३<br>सूर्यकोटिप्रतीकाशास्तत्राजग्मुर्गणेश्वराः ।<br>पातालचारिणश्चैव सर्वलोकनिवासिनः ॥ ३४<br>तुम्बुरुर्नारदो हाहा हूहूश्चैव तु सामगाः।<br>रत्नान्यादाय वाद्यांश्च तत्राजग्मुस्तदा पुरम् ॥ ३५ | प्रमथ [अपने] हजार करोड़ भूतों तथा तीन करोड़ गणोंके साथ आये। वीरभद्र चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और रोमज करोड़ों गणोंके साथ आये। करण बीस करोड़ गणोंके साथ और केवल, शुभ, पंचाक्ष, शतमम्यु तथा मेघमन्यु भी नब्बे करोड़ गणोंके साथ आये। काष्ठकूट, सुकेश तथा वृषभ चौंसठ करोड़ गणोंके साथ और भगवान् सनातन विरूपाक्ष भी चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। इसी प्रकार तालकेतु, षडास्य, पंचास्य, सनातन, संवर्तक, चैत्र, साक्षात् प्रभु लकुलीश, लोकान्तक, दीप्तास्य, प्रभु दैत्यान्तक, मृत्युहृत्, कालहा, काल, मृत्युंजयकर, विषाद, विषद, विद्युत, प्रभु कान्तक, देव, भृंगी, रिटि, श्रीमान् देवदेवप्रिय, अशनि, भासक तथा सहस्रपात् चौंसठ करोड़ गणोंके साथ आये। ये सब तथा अन्य असंख्य महाबली गणेश्वर भी वहाँ आये। वे सभी हजार हाथोंवाले, जटा-मुकुट धारण किये हुए, मस्तकपर चन्द्ररेखासे विभूषित, नीलकण्ठवाले, तीन नेत्रोंवाले, हार-कुण्डल-केयूर-मुकुट आदिसे अलंकृत, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके समान प्रतीत होनेवाले, अणिमा आदि सिद्धियोंसे युक्त थे; करोड़ों सूर्योंके सदृश आभावाले पाताललोकमें विचरण करनेवाले तथा सभी लोकोंमें निवास करनेवाले वे गणेश्वर वहाँ आये। तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू एवं साम गान करनेवाले भी रत्नों तथा वाद्ययन्त्रोंको लेकर उस पुरमें आये॥ २५-३५॥ |
| ऋषयः कृत्स्नशस्तत्र देवगीतास्तपोधनाः।<br>पुण्यान् वैवाहिकान् मन्त्रानजपुर्हृष्टमानसाः ॥ ३६ | देवताओंद्वारा स्तुत तथा तपोधन बहुत-से ऋषिगण प्रसन्नचित्त होकर विवाहसम्बन्धी पवित्र मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे ॥ ३६ ॥ |
| तत एवं प्रवृत्ते तु सर्वतश्च समागमे।<br>गिरिजां तामलङ्कृत्य स्वयमेव शुचिस्मिताम् ॥ ३७<br>पुरं प्रवेशयामास स्वयमादाय केशवः।<br>सदस्याह च देवेशं नारायणमजो हरिम् ॥ ३८ | इस प्रकार पूर्णरूपसे सबके उपस्थित हो जानेपर विष्णुने स्वयं पवित्र मुसकानवाली पार्वतीको अलंकृत करके तथा स्वयं उन्हें ला करके पुरमें प्रवेश कराया। तदनन्तर ब्रह्माने देवताओंके स्वामी नारायण विष्णुसे सभामें कहा— |
| भवानग्रे समुत्पन्नो भवान्या सह दैवतैः।<br>वामाङ्गादस्य रुद्रस्य दक्षिणाङ्गादहं प्रभो ॥ ३९<br>मन्मूर्तिस्तुहिनाद्रीशो यज्ञार्थं सृष्ट एव हि।<br>एषा हैमवती जज्ञे मायया परमेष्ठिनः ॥ ४० | ‘हे प्रभो! पहले आप इन रुद्रके बाएँ अंगसे भवानी तथा देवताओंके साथ उत्पन्न हुए और मैं इनके दाहिने अंगसे उत्पन्न हुआ। मेरे अंशस्वरूप पर्वतराज हिमालय वास्तवमें इस यज्ञके लिये ही उत्पन्न |
अध्याय १०३] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४७
| श्रौतस्मार्तप्रवृत्त्यर्थमुद्वाहार्थमिहागतः ।<br>अतोऽसौ जगतां धात्री धाता तव ममापि च ॥ ४१<br><br>अस्य देवस्य रुद्रस्य मूर्तिभिर्विहितं जगत्।<br>क्ष्माबग्निखेन्दुसूर्यात्मपवनात्मा यतो भवः ॥ ४२<br><br>तथापि तस्मै दातव्या वचनाच्च गिरेर्मम।<br>एषा ह्यजा शुक्लकृष्णा लोहिता प्रकृतिर्भवान् ॥ ४३<br><br>श्रेयोऽपि शैलराजेन सम्बन्धोऽयं तवापि च।<br>तव पाद्मे समुद्भूतः कल्पे नाभ्यम्बुजादहम् ॥ ४४<br><br>मदंशस्यास्य शैलस्य ममापि च गुरुर्भवान्। | किये गये हैं। इन पार्वतीने परमेष्ठी [शिव]-की मायासे हिमवान्की पुत्रीके रूपमें जन्म लिया है। अतः ये सभी लोकोंकी, आपकी तथा मेरी भी धात्री (जननी) हैं और श्रौत-स्मार्त प्रवृत्तिके लिये विवाहके उद्देश्यसे यहाँ आये हुए ये रुद्र सबके धाता (जनक) हैं। चूँकि पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, चन्द्र, सूर्य, आत्मा तथा पवन शिवके ही विग्रहस्वरूप हैं, अतः इन रुद्रदेवकी [इन्हीं] मूर्तियोंसे ही जगत् उत्पन्न हुआ है। तथापि हिमवान्के तथा मेरे वचनसे शुक्ल-कृष्ण-लोहित वर्णवाली मायारूपा इन पार्वतीको उन शिवके निमित्त प्रदान कर देना चाहिये; [हे विष्णो!] आप भी प्रकृतिरूप हैं। पर्वतराजके साथ यह सम्बन्ध आपके लिये भी कल्याणप्रद है। मैं पद्मकल्पमें आपके नाभिकमलसे उत्पन्न हुआ था; अतः आप मेरे अंशस्वरूप इन हिमालयके तथा मेरे भी गुरु हैं'॥ ३७-४४ १/२ ॥ |
| <div align="center">सूत उवाच</div>बाढमित्यजमाहासौ देवदेवो जनार्दनः ॥ ४५<br><br>देवाश्च मुनयः सर्वे देवदेवश्च शङ्करः।<br>ततश्चोत्थाय विद्वान् सः पद्मनाभः प्रणम्य ताम् ॥ ४६<br><br>पादौ प्रक्षाल्य देवस्य कराभ्यां कमलेक्षणः।<br>अभ्युक्षदात्मनो मूर्ध्नि ब्रह्मणश्च गिरेस्तथा ॥ ४७<br><br>त्वदीयेषा विवाहार्थं मेनजा ह्यनुजा मम।<br>इत्युक्त्वा सोदकं दत्त्वा देवीं देवेश्वराय ताम् ॥ ४८<br><br>स्वात्मानमपि देवाय सोदकं प्रददौ हरिः। | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तब उन देवदेव जनार्दनने ब्रह्मासे कहा—'ठीक है।' तब देवतागण, सभी मुनि तथा देवदेव शिव प्रसन्न हो गये। तदनन्तर कमलके समान नेत्रवाले उन विद्वान् पद्मनाभ विष्णुने उठकर उन [पार्वती]-को प्रणाम करके अपने हाथोंसे शिवके दोनों चरणोंको धोकर अपने, ब्रह्माके तथा हिमालयके सिरपर जल छिड़का। '[हे शिव!] आपकी नित्यसम्बन्धिनी ये [पार्वती] विवाहविधिकी सिद्धिके लिये ही मेनासे उत्पन्न हुई हैं; ये मेरी छोटी बहन हैं'—ऐसा कहकर विष्णुने उन पार्वतीको देवेश्वरके लिये जलसहित समर्पित करके स्वयं अपनेको भी उन देवके लिये जलसहित समर्पित कर दिया॥ ४५-४८ १/२ ॥ |
| अथ सर्वे मुनिश्रेष्ठाः सर्ववेदार्थपारगाः ॥ ४९<br><br>ऊचुर्दाता गृहीता च फलं द्रव्यं विचारतः।<br>एष देवो हरो नूनं मायया हि ततो जगत् ॥ ५० | इसके बाद सभी वेदोंके अर्थोंमें पारंगत श्रेष्ठ मुनियोंने कहा—'विचार करनेपर वस्तुतः ये महादेव शिव ही दाता, गृहीता, द्रव्य तथा फल सब कुछ हैं और इन्हींकी मायासे यह जगत् स्थित है'—ऐसा कहकर प्रसन्नतासे रोमांचित उन सभीने शिवजीको प्रणाम किया॥ ४९-५० १/२ ॥ |
| इत्युक्त्वा तं प्रणेमुश्च प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ॥ ५१<br><br>देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः।<br>वेदाश्च मूर्तिमन्तस्ते प्रणेमुस्तं महेश्वरम् ॥ ५२ | उस समय आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवृष्टि की, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और |
1985 Lingamahapuran_Section_19_2_Front
| ५४८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्रह्मणा मुनिभिः सार्धं देवदेवमुमापतिम्। | अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। सभी वेदोंने शरीर धारण करके ब्रह्मा तथा मुनियोंके साथ उन देवदेव उमापति महेश्वरको प्रणाम किया॥ ५१-५२ १/२ ॥ |
| देवोऽपि देवीमालोक्य सलज्जां हिमशैलजाम् ॥ ५३ <br><br> न तृप्यत्यनवद्याङ्गी सा च देवं वृषध्वजम्। <br> वरदोऽस्मीति तं प्राह हरिं सोऽप्याह शङ्करम् ॥ ५४ <br><br> त्वयि भक्तिः प्रसीदेति ब्रह्माख्यां च ददौ तु सः। <br> ततस्तु पुनरेवाह ब्रह्मा विज्ञापयन् प्रभुम् ॥ ५५ <br><br> हविर्जुहोमि वह्नौ तु उपाध्यायपदे स्थितः। <br> ददासि मम यद्याज्ञां कर्तव्यो ह्यकृतो विधिः ॥ ५६ | लज्जासे भरी हुई देवी पार्वतीको देखकर शिव तृप्त नहीं होते थे और दूषणरहित शरीरवाली वे [पार्वती] भी देवदेव वृषभध्वजको देखकर तृप्त नहीं होती थीं। तब शिवने विष्णुसे कहा—'मैं वरदाता हूँ।' इसपर उन्होंने भी शंकरसे कहा—'आपमें मेरी भक्ति बनी रहे; मुझपर प्रसन्न होइये।' तब शिवने उन्हें ब्रह्मत्व प्रदान किया। इसके बाद ब्रह्माने पुनः प्रभुसे प्रार्थना करते हुए कहा—'मैं उपाध्याय (आचार्य)-के पदपर स्थित होकर अग्निमें हवन करता हूँ और यदि आप आज्ञा दें, तो जो विधि अभीतक नहीं की गयी है, उसे सम्पन्न करूँ'॥ ५३—५६ ॥ |
| तमाह शङ्करो देवं देवदेवो जगत्पतिः। <br> यद्यदिष्टं सुरश्रेष्ठ तत्कुरुष्व यथेप्सितम् ॥ ५७ <br><br> कर्तास्मि वचनं सर्वं देवदेव पितामह। | तब जगत्के स्वामी देवदेव शंकरने उन देव ब्रह्मासे कहा—'हे सुरश्रेष्ठ! जो-जो अभीष्ट हो, उसे आप इच्छानुसार कीजिये। हे देवदेव! हे पितामह! मैं [आपके] समस्त वचनका पालन करूँगा'॥ ५७ १/२ ॥ |
| ततः प्रणम्य हृष्टात्मा ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ ५८ <br><br> हस्तं देवस्य देव्याश्च युयोज परमं प्रभुः। <br> ज्वलनश्च स्वयं तत्र कृताञ्जलिरुपस्थितः ॥ ५९ <br><br> श्रौतैस्तैर्महामन्त्रैमूर्तिमद्भिरुपस्थितैः । <br> यथोक्तविधिना हुत्वा लाजानपि यथाक्रमम् ॥ ६० <br><br> आनीतान् विष्णुना विप्रान् सम्पूज्य विविधैर्वरैः। <br> त्रिश्च तं ज्वलनं देवं कारयित्वा प्रदक्षिणम् ॥ ६१ <br><br> मुक्त्वा हस्तसमायोगं सहितैः सर्वदैवतैः। <br> सुरैश्च मानवैः सर्वैः प्रहृष्टेनान्तरात्मना ॥ ६२ <br><br> ननाम भगवान् ब्रह्मा देवदेवमुमापतिम्। | तदनन्तर [उन्हें] प्रणाम करके प्रसन्नचित्त परम प्रभु लोकपितामह ब्रह्माने शिव तथा देवी [पार्वती]-के हाथोंको [परस्पर] मिला दिया। स्वयं अग्निदेव हाथ जोड़े हुए वहाँ उपस्थित हुए। [साक्षात्] मूर्त्तिमान् होकर उपस्थित वैवाहिक श्रौत महामन्त्रोंके द्वारा यथोक्त विधिसे हवन करनेके अनन्तर विष्णुके द्वारा लाये गये लाजा (धानका लावा)-का भी यथाक्रम हवन करके विविध गोदानोंसे विप्रोंकी पूजाकर पुनः तीन बार अग्निदेवकी प्रदक्षिणा कराकर उनके मिले हुए हाथको मुक्त कराकर भगवान् ब्रह्माने प्रसन्न मनसे सभी देवताओं, ऋषियों तथा मनुष्योंके साथ देवदेव उमापतिको प्रणाम किया॥ ५८—६२ १/२ ॥ |
| ततः पाद्यं तयोर्दत्वा शम्भोराचमनं तथा ॥ ६३ <br><br> मधुपर्कं तथा गां च प्रणम्य च पुनः शिवम्। <br> अतिष्ठद्भगवान् ब्रह्मा देवैरिन्द्रपुरोगमैः ॥ ६४ | तत्पश्चात् उन दोनोंको पाद्य जल देकर और शम्भुको आचमन, मधुपर्क तथा गौ प्रदान करके पुनः शिवको प्रणाम करके भगवान् ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंके साथ स्थित हो बैठ गये॥ ६३-६४॥ |
अध्याय १०३ ] भगवान् शिव एवं पार्वतीके विवाहकी मांगलिक कथा ५४९
| भृग्वाद्या मुनयः सर्वे चाक्षतैस्तिलतण्डुलैः।<br>सूर्यादयः समभ्यर्च्य तुष्टुवुर्वृषभध्वजम्॥ ६५ | समस्त भृगु आदि मुनियों तथा सूर्य आदि ग्रहोंने अक्षतों तथा तिल-तण्डुलोंसे वृषभध्वजका अर्चन करके उनकी स्तुति की॥ ६५॥ |
| शिवः समाप्य देवोक्तं वह्निमारोप्य चात्मनि।<br>तया समागतो रुद्रः सर्वलोकहिताय वै॥ ६६ | तत्पश्चात् वे रुद्र शिव ब्रह्मोक्त समस्त [वैवाहिक] कृत्य सम्पन्न करके तथा अग्निको अपनेमें आरोपित करके सभी लोकोंके हितके लिये उन पार्वतीके साथ वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६६॥ |
| यः पठेच्छृणुयाद्वापि भवोद्वाहं शुचिस्मितः।<br>श्रावयेद्वा द्विजान् शुद्धान् वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ६७ | जो [व्यक्ति] पवित्र होकर प्रसन्नतापूर्वक शिवके विवाह-आख्यानको पढ़ता अथवा सुनता है अथवा वेद-वेदांगमें पारंगत शुद्ध द्विजोंको सुनाता है, वह गणपति-पद प्राप्त करके शिवके साथ आनन्दित होता है। जहाँ भी ब्राह्मणोंद्वारा इस विवाह-प्रसंगको कहा जाता है, वहाँपर शिवजी विराजमान रहते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। अतः हे द्विजो! विधिवत् उनकी पूजा करके इस आख्यानको अवश्य कहना चाहिये। हे उत्तम ब्राह्मणो! श्रेष्ठ द्विजों तथा क्षत्रियोंके विवाहमें इस अत्युत्तम सम्पूर्ण शिवविवाह-प्रसंगका कीर्तन करना चाहिये॥ ६७-६९^{१}/_२॥ |
| स लब्ध्वा गाणपत्यं च भवेन सह मोदते।<br>यत्रायं कीर्त्यते विप्रैस्तावदास्ते तदा भवः॥ ६८ | |
| तस्मात्सम्पूज्य विधिवत्कीर्तयेनान्यथा द्विजाः।<br>उद्वाहे च द्विजेन्द्राणां क्षत्रियाणां द्विजोत्तमाः॥ ६९ | |
| कीर्तनीयमिदं सर्वं भवोद्वाहमनुत्तमम्। | |
| कृतोद्वाहस्तदा देव्या हैमवत्या वृषभध्वजः॥ ७०<br>सगणो नन्दिना सार्धं सर्वदेवगणैर्वृतः।<br>पुरीं वाराणसीं दिव्यामाजगाम महाद्युतिः॥ ७१ | तब विवाह कर लेनेके उपरान्त महाकान्तिसम्पन्न शिवजी [अपने] गणों, नन्दी तथा देवी पार्वतीके साथ दिव्य वाराणसीपुरीमें आये॥ ७०-७१॥ |
| अविमुक्ते सुखासीनं प्रणम्य वृषभध्वजम्।<br>अपृच्छत् क्षेत्रमाहात्म्यं भवानी हर्षितानना॥ ७२ | इसके बाद हर्षयुक्त मुखमण्डलवाली भवानी अविमुक्त (वाराणसी)-में सुखपूर्वक आसीन वृषभध्वजको प्रणाम करके [उस] क्षेत्रका माहात्म्य पूछने लगीं॥ ७२॥ |
| अथाहार्धेन्दुतिलकः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम्।<br>अविमुक्तस्य माहात्म्यं विस्तराच्छक्यते नहि॥ ७३ | तब अर्धचन्द्रको तिलकरूपमें धारण करनेवाले शिवजी उत्तम क्षेत्रमाहात्म्यका वर्णन करने लगे—'हे सुरेशानि! मेरे द्वारा अविमुक्तक्षेत्रका माहात्म्य विस्तारपूर्वक नहीं कहा जा सकता है; यह क्षेत्र ऋषियोंद्वारा पूजित है। हे देवि! मैं अविमुक्तक्षेत्रमें होनेवाले पुण्यफलका वर्णन कैसे करूँ, जहाँपर मरनेवाले पापियोंकी एक ही जन्ममें मुक्ति हो जाती है। [लोगोंद्वारा] अन्यत्र किया गया पाप वाराणसीमें नष्ट हो जाता है और वाराणसीमें किया गया पाप पिशाचयोनिरूपी नरककी प्राप्ति करानेवाला होता है। हजारों पाप करके मनुष्योंके लिये पिशाचत्व श्रेष्ठ है, किंतु काशीपुरीके बिना स्वर्गमें हजार बार इन्द्रपद |
| वक्तुं मया सुरेशानि ऋषिसङ्घाभिपूजितम्।<br>किं मया वर्ण्यते देवि ह्यविमुक्तफलोदयः॥ ७४ | |
| पापिनां यत्र मुक्तिः स्यान्मृतानामेकजन्मना।<br>अन्यत्र तु कृतं पापं वाराणस्यां व्यपोहति॥ ७५ | |
| वाराणस्यां कृतं पापं पैशाच्यनरकावहम्।<br>कृत्वा पापसहस्राणि पिशाचत्वं वरं नृणाम्॥ ७६ | |
| न तु शक्रसहस्रत्वं स्वर्गे काशीपुरीं विना।<br>यत्र त्रिविष्टपो देवो यत्र विश्वेश्वरो विभुः॥ ७७ |
१०४- गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| ५५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ओङ्कारेशः कृत्तिवासा मृतानां न पुनर्भवः।<br>उक्त्वा क्षेत्रस्य माहात्म्यं सङ्क्षेपाच्छशिशेखरः॥ ७८<br><br>दर्शयामास चोद्यानं परित्यज्य गणेश्वरान्।<br>तत्रैव भगवान् जातो गजवक्त्रो विनायकः॥ ७९<br><br>दैत्यानां विघ्नरूपार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्।<br>एतद्वः कथितं सर्वं कथासर्वस्वमुत्तमम्॥ ८०<br><br>यथाश्रुतं मया सर्वं प्रसादाद्भोः सुशोभनम्॥ ८१ | प्राप्त करना भी श्रेष्ठ नहीं है। जहाँपर भगवान् त्रिविष्टप, विभु, विश्वेश्वर तथा कृत्तिवास ओंकारेश [सदा] विराजमान हैं, उस काशीमें मरनेवालोंका पुनर्जन्म नहीं होता'॥ ७३—७७ १/२॥<br>इस प्रकार संक्षेपमें क्षेत्रका माहात्म्य कहकर गणेश्वरोंको विदा करके चन्द्रशेखरने पार्वतीको [अपना] उद्यान दिखाया। भगवान् गजानन विनायक दैत्योंको विघ्न उत्पन्न करनेके लिये तथा देवताओंका विघ्न दूर करनेके लिये वहींपर उत्पन्न हुए थे। [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंको कथाका सम्पूर्ण उत्तम तथा सुन्दर तत्त्व संक्षेपमें बता दिया, जैसा कि मैंने व्यासजीकी कृपासे सुना था॥ ७८—८१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पार्वतीविवाहवर्णनं नाम त्र्यधिकशततमोऽध्यायः॥ १०३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पार्वतीविवाहवर्णन' नामक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०३॥
एक सौ चारवाँ अध्याय
गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] गणोंके स्वामी गजानन विनायक कैसे उत्पन्न हुए; उनका प्रभाव कैसा है? इसे आप बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| कथं विनायको जातो गजवक्त्रो गणेश्वरः।<br>कथं प्रभावस्तस्यैवं सूत वक्तुमिहार्हसि॥ १ | |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— हे द्विजो! इसी बीच इन्द्र तथा उपेन्द्रसहित देवतागण एकत्र होकर दैत्योंके धर्ममें विघ्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। हे विप्रो! [वे विचार करने लगे कि] असुर, यातुधान, क्रूर कर्मवाले राक्षस तथा पृथ्वीपर जो अन्य तमोगुणी तथा रजोगुणी लोग हैं, उन्होंने अविघ्नतापूर्वक कार्य करनेहेतु यज्ञ-दान आदिके द्वारा महेश्वर, ब्रह्मा तथा विष्णुकी सम्यक् पूजा करके अभीष्ट वर प्राप्त कर लिया है; अतः हे सुरश्रेष्ठो! सर्वदा हम लोगोंका पराभव हो रहा है। इसलिये उनके विघ्नके लिये, देवताओंके अविघ्नके लिये, स्त्रियोंको पुत्रप्राप्तिके लिये तथा पुरुषोंके कर्मकी सिद्धिके लिये आप सभीलोग विघ्नेश गणपति के सृजनहेतु शंकरकी स्तुति कीजिये॥ २—६॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समेत्य ते।<br>धर्मविघ्नं तदा कर्तुं दैत्यानामभवन् द्विजाः॥ २<br>असुरा यातुधानाश्च राक्षसाः क्रूरकर्मिणः।<br>तामसाश्च तथा चान्ये राजसाश्च तथा भुवि॥ ३<br>अविघ्नं यज्ञदानाद्यैः समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>ब्रह्माणं च हरिं विप्रा लब्धेप्सितवरा यतः॥ ४<br>ततोऽस्माकं सुरश्रेष्ठाः सदाविजयसम्भवः।<br>तेषां ततस्तु विघ्नार्थमविघ्नाय दिवौकसाम्॥ ५<br>पुत्रार्थं चैव नारीणां नराणां कर्मसिद्धये।<br>विघ्नेशं शङ्करं स्रष्टुं गणपं स्तोतुमर्हथ॥ ६ | |
| इत्युक्त्वान्योन्यमनघं तुष्टुवुः शिवमिश्वरम्।<br>नमः सर्वात्मने तुभ्यं सर्वज्ञाय पिनाकिने॥ ७ | आपसमें ऐसा कहकर वे [देवता] निष्पाप ईश्वर |
अध्याय १०४] गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ५५१
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अनघाय विरिञ्चाय देव्याः कार्यार्थदायिने।<br>अकायायार्थकायाय हरेः कायापहारिणे॥ ८<br><br>कायान्तस्थामृताधारमण्डलावस्थिताय ते।<br>कृतादिभेदकालाय कालवेगाय ते नमः॥ ९ | शिवकी स्तुति करने लगे—आप सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा पिनाकधारीको नमस्कार है। निष्पाप, विशेष रूपसे ब्रह्माण्डकी रचना करनेवाले, देवी [पार्वती]-को तपस्याका फल प्रदान करनेवाले, कायारहित, प्रयोजनके लिये शरीर धारण करनेवाले, विष्णुकी कायाका अपहरण करनेवाले, देहके भीतर अमृताधार-मण्डलमें विराजमान रहनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। कृत (सत्ययुग) आदि कालभेदोंको उत्पन्न करनेवाले तथा कालवेग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ७–९॥ |
| कालाग्निरूद्ररूपाय धर्माद्यष्टपदाय च।<br>कालीविशुद्धदेहाय कालिकाकारणाय ते॥ १० | कालाग्निके समान भयंकर रूपवाले, धर्म आदि आठ पदों (स्थानों) वाले, महाकालीको विशुद्ध (गौर) देह करनेवाले तथा कालिका (चण्डिका)-की उत्पत्ति करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १०॥ |
| कालकण्ठाय मुख्याय वाहनाय वराय ते।<br>अम्बिकापतये तुभ्यं हिरण्यपतये नमः॥ ११ | कालकण्ठ, प्रधानस्वरूप, वाहन (कर्मफलकी प्राप्ति करानेवाले) तथा सर्वश्रेष्ठ आप [शिव]-को नमस्कार है। अम्बिकापति तथा हिरण्यपति आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ११॥ |
| हिरण्यरेतसे चैव नमः शर्वाय शूलिने।<br>कपालदण्डपाशासिचर्माङ्कुशधराय च॥ १२<br><br>पतये हैमवत्याश्च हेमशुक्लाय ते नमः।<br>पीतशुक्लाय रक्षार्थं सुराणां कृष्णवर्त्मने॥ १३ | हिरण्यरेता, शर्व, शूली और कपाल-दण्ड-पाश-असि-चर्म-अंकुश धारण करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। पार्वतीपति, सुवर्णके समान शुक्ल (शुद्ध), [अर्धनारीश्वररूप होनेके कारण] पीत-शुक्ल वर्णवाले तथा देवताओंकी रक्षाके लिये अग्निरूपवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १२–१३॥ |
| पञ्चमाय महापञ्चयज्ञिनां फलदाय च।<br>पञ्चास्यफणिहाराय पञ्चाक्षरमयाय ते॥ १४<br><br>पञ्चधा पञ्चकैवल्यदेवैरर्चितमूर्तये।<br>पञ्चाक्षरदृशे तुभ्यं परात्परतराय ते॥ १५ | तुरीयातीत, [देवयज्ञ आदि] पंच महायज्ञोंके कर्ताओंको फल देनेवाले, पंचमुख सर्पको हारके रूपमें धारण करनेवाले तथा पंचाक्षर [मन्त्र]-मय आप [शिव]-को नमस्कार है। पाँच प्रकारसे [रुद्र आदि] पंच कैवल्य देवोंद्वारा पूजित मूर्तिवाले, पंचाक्षर मन्त्ररूप दृष्टिवाले तथा परात्परतर आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १४–१५॥ |
| षोडशस्वरवज्राङ्गवक्त्रायाक्षयरूपिणे ।<br>कादिपञ्चकहस्ताय चादिहस्ताय ते नमः॥ १६<br><br>टादिपादाय रुद्राय तादिपादाय ते नमः।<br>पादिमेण्द्राय यद्यङ्गधातुसप्तकधारिणे॥ १७ | [अकार आदि] सोलह स्वरमय वज्रके समान [अभेद्य] अंगों तथा मुखवाले, अक्षय रूपवाले, 'क' से प्रारम्भ होनेवाले पाँच अक्षररूप हाथवाले, 'च' आदि [पाँच वर्णरूप] हाथवाले, 'ट' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'त' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'प' आदि |
| ५५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सान्तात्मरूपिणे साक्षात्क्षदन्तक्रोधिने नमः।<br>लवरेफहळाङ्गाय निरङ्गाय च ते नमः॥ १८ | [पाँच वर्णरूप] मेढ्र (लिंग) वाले, 'य'कारमय अंगसम्बन्धी सात धातुओंको धारण करनेवाले आप रुद्रको नमस्कार है। श-ष-स वर्णमय आत्मरूपवाले तथा 'क्ष' कारमय प्रलयस्वरूप क्रोधवाले [शिवको] नमस्कार है। ल, व, रेफ, ह, ळ—पाँच वर्णरूप हृदयोंवाले तथा निरंग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १६-१८॥ | | सर्वेषामेव भूतानां हृदि निःस्वनकारिणे।<br>भ्रुवोरन्ते सदासद्भिर्दृष्टायात्यन्तभानवे॥ १९<br><br>भानुसोमाग्निनेत्राय परमात्मस्वरूपिणे।<br>गुणत्रयोपरिस्थाय तीर्थपादाय ते नमः॥ २० | सभी प्राणियोंके हृदयमें अनाहत ध्वनि करनेवाले, भक्तोंके द्वारा भ्रुवोंके मध्य सदा दिखायी देनेवाले, अत्यन्त भानु (सर्वप्रकाशक), सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप नेत्रवाले, परमात्म-स्वरूपी, तीनों गुणोंसे ऊपर स्थित तथा तीर्थरूप पादवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १९-२०॥ | | तीर्थतत्त्वाय साराय तस्मादपि पराय ते।<br>ऋग्यजुःसामवेदाय ओङ्काराय नमो नमः॥ २१ | तीर्थरूप तत्त्ववाले, सारस्वरूप (तीर्थफलरूप) और उस तीर्थफलके भी अधिष्ठाता आप [शिव]-को नमस्कार है। ऋक्-यजुः-सामवेदस्वरूप तथा ओंकारस्वरूप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २१॥ | | ओङ्कारे त्रिविधं रूपमास्थायोपरिवासिने।<br>पीताय कृष्णवर्णाय रक्तायात्यन्ततेजसे॥ २२<br><br>स्थानपञ्चकसंस्थाय पञ्चधाण्डबहिःक्रमात्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे तुभ्यं कुमाराय नमो नमः॥ २३ | [ब्रह्मा, विष्णु, हर] तीन प्रकारके रूपको धारण करके प्रणवान्तनादमें तुरीयरूपसे स्थित रहनेवाले, पीत-कृष्ण-रक्त वर्णवाले, अपरिमित तेजवाले, ब्रह्माण्डके बाहर क्रमसे पाँच प्रकारसे [जल आदि] पाँच स्थानोंमें स्थित रहनेवाले और ब्रह्मा-विष्णु-कुमारस्वरूप आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २२-२३॥ | | अम्बायाः परमेशाय सर्वोपरिचराय ते।<br>मूलसूक्ष्मस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्माय ते नमः॥ २४ | अम्बिकाके परमेश्वर तथा सबके ऊपर विचरण करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। मूल सूक्ष्म स्वरूपवाले तथा स्थूल-सूक्ष्मस्वरूप आप [शिव]-को नमस्कार है॥ २४॥ | | सर्वसङ्कल्पशून्याय सर्वस्माद्रक्षिताय ते।<br>आदिमध्यान्तशून्याय चित्संस्थाय नमो नमः॥ २५ | समस्त संकल्पोंसे रहित, सबसे रक्षित (गुप्त), आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा ज्ञानमें स्थित आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २५॥ | | यमाग्निवायुरुद्राम्बुसोमशक्रनिशाचरैः ।<br>दिङ्मुखे दिङ्मुखे नित्यं सगणैः पूजिताय ते॥ २६<br><br>सर्वेषु सर्वदा सर्वमार्गे सम्पूजिताय ते।<br>रुद्राय रुद्रनीलाय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>महेश्वराय धीराय नमः साक्षात् शिवाय ते॥ २७ | गणोंसहित यम, अग्नि, वायु, रुद्र, वरुण, सोम, इन्द्र तथा निशाचरोंके द्वारा दिशाओं-विदिशाओंमें नित्य पूजित आप [शिव]-को नमस्कार है। सभी लोकोंमें तथा सभी मार्गोंमें सर्वदा पूजित आपको नमस्कार है। रुद्र, रुद्रनील, कद्रुद्र, प्रचेता, महेश्वर, धीर साक्षात् आप शिवको नमस्कार है॥ २६-२७॥ | | अथ शृणु भगवन् स्तवच्छलेन<br>कथितमजेन्द्रमुखैः सुरासुरेशैः। | हे भगवन्! सुनिये; देवताओं तथा दैत्योंके स्वामी |
१०५- विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा ५५३
| मखमदनयमाग्निदक्षयज्ञ-<br>क्षपणविचित्रविचेष्टितं क्षमस्व ॥ २८<br><br>सूत उवाच<br>यः पठेत्तु स्तवं भक्त्या शक्राग्निप्रमुखैः सुरैः।<br>कीर्तितं श्रावयेद्विद्वान् स याति परमां गतिम्॥ २९ | ब्रह्मा-इन्द्र आदिने मख, कामदेव, यम, अग्नि तथा दक्षयज्ञके विध्वंसरूपी आपके विचित्र क्रिया-कलापका वर्णन स्तुतिके बहाने किया है; आप क्षमा करें॥ २८॥<br><br>सूतजी बोले—जो विद्वान् [व्यक्ति] इन्द्र, अग्नि आदि प्रधान देवताओंके द्वारा किये गये इस स्तवको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा [दूसरोंको] सुनाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है॥ २९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवस्तुतिर्नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवस्तुति' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०४॥
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
| सूत उवाच<br>यदा स्थिताः सुरेश्वराः प्रणम्य चैवमीश्वरम्।<br>तदाम्बिकापतिर्भवः पिनाकधृङ् महेश्वरः॥ १<br><br>ददौ निरीक्षणं क्षणाद्भवः स तान् सुरोत्तमान्।<br>प्रणेमुरादराद्धरं सुरा मुदार्द्रलोचनाः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] शिवजीको प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [यथास्थान] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वरने उन श्रेष्ठ देवताओंको क्षणभरमें दिव्य दृष्टि प्रदान की। तब अश्रुसे भीगे नेत्रवाले देवताओंने प्रसन्नतासे युक्त होकर आदरपूर्वक शिवको प्रणाम किया॥ १-२॥ |
|---|---|
| भवः सुधामृतोपमैर्निरीक्षणैर्निरीक्षणात्।<br>तदाह भद्रमस्तु वः सुरेश्वरान् महेश्वरः॥ ३ | इसके बाद महेश्वर भवने सुधामृततुल्य दृष्टिसे देखकर सुरेश्वरोंसे कहा—'आपलोगोंका कल्याण हो'॥ ३॥ |
| वरार्थमीश वीक्ष्य ते सुरा गृहं गतास्त्विमे।<br>प्रणम्य चाह वाक्पतिः पतिं निरीक्ष्य निर्भयः॥ ४<br><br>सुरेतरादिभिः सदा ह्यविघ्नमर्थितो भवान्।<br>समस्तकर्मसिद्धये सुरापकारकारिभिः॥ ५<br><br>ततः प्रसीदताद्भवान् सुविघ्नकर्मकारणम्।<br>सुरापकारकारिणामिहैष एव नो वरः॥ ६ | तदनन्तर स्वामी शिवको देखकर निर्भय होकर बृहस्पतिने उन्हें प्रणाम करके कहा—'हे ईश! ये देवता आपका दर्शन करके वरप्राप्तिके लिये आपके घर आये हुए हैं। देवताओंका अपकार करनेवाले दैत्यों आदिके द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये आप सदा प्रार्थित हैं। अतः आप देवताओंके अपकारी दैत्योंके विघ्नयुक्त कर्मका कारण बनिये और प्रसन्न होइये; यही हमलोगोंका वर है'॥ ४–६॥ |
| ततस्तदा निशम्य वै पिनाकधृक् सुरेश्वरः।<br>गणेश्वरं सुरेश्वरं वपुर्दधार सः शिवः॥ ७<br><br>गणेश्वराश्च तुष्टुवुः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>समस्तलोकसम्भवं भवार्तिहारिणं शुभम्॥ ८ | तब यह सुनकर उन पिनाकधारी सुरेश्वर शिवने देवताओंके स्वामी गणेश्वरका शरीर धारण किया। तदनन्तर गणेश्वरों तथा [ब्रह्मा आदि] सुरेश्वरोंने समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले तथा संसारका कष्ट दूर करनेवाले शुभ [गजाननरूपी] महेश्वरकी स्तुति की॥ ७-८॥ |
| इभाननाश्रितं वरं त्रिशूलपाशधारिणम्।<br>समस्तलोकसम्भवं गजाननं तदाम्बिका॥ ९ | इसके बाद अम्बिका [पार्वती]-ने हाथीके समान मुख धारण किये हुए और [हाथोंमें] त्रिशूल तथा पाश |
| ५५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| लिये हुए समस्त लोकोंके उत्पादक कल्याणकारी गजाननको जन्म दिया॥ ९॥ | |
| ददुः पुष्पवर्षं हि सिद्धा मुनीन्द्रा-<br>स्तथा खेचरा देवसङ्घास्तदानीम्।<br>तदा तुष्टुवुश्चैकदन्तं सुरेशाः<br>प्रणेमुर्गणेशं महेशं वितन्द्राः॥ १० | उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओंने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरोंने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेशको प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ १०॥ |
| तदा तयोर्विनिर्गतः सुभैरवः समूर्तिमान्।<br>स्थितो ननर्त बालकः समस्तमङ्गलालयः॥ ११<br><br>विचित्रवस्त्रभूषणैरलङ्कृतो गजाननः।<br>महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवन्द्य तातमम्बिकाम्॥ १२ | उस समय उन शिवा-शिवसे उत्पन्न, विचित्र वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत तथा सभी मंगलोंका आलय महेश्वर-पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरवकी भाँति स्थित होकर पिता [शिव] तथा माताकी वन्दना करके नृत्य करने लगा॥ ११-१२॥ |
| जातमात्रं सुतं दृष्ट्वा चकार भगवान् भवः।<br>गजाननाय कृत्यांस्तु सर्वान् सर्वेश्वरः स्वयम्॥ १३ | उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर भगवान् सर्वेश्वर भवने गजाननके लिये सभी [जातकर्म आदि] संस्कारोंको स्वयं किया॥ १३॥ |
| आदाय च कराभ्यां च सुसुखाभ्यां भवः स्वयम्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं महादेवो जगद्गुरुः॥ १४<br><br>तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज।<br>देवानामपकारार्थं द्विजानां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यज्ञश्च दक्षिणाहीनः कृतो येन महीतले।<br>तस्य धर्मस्य विघ्नं च कुरु स्वर्गपथे स्थितः॥ १६ | इसके बाद जगद्गुरु महादेव भवने स्वयं [अपने] परम सुखदायक हाथोंसे उसे उठाकर, आलिंगन करके तथा उसके सिरको सूँघकर कहा—'हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा अवतार दैत्योंके विनाशके लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजोंके उपकारके लिये हुआ है। जिसने पृथ्वीतलपर दक्षिणाविहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथमें स्थित रहते हुए उसके धर्ममें विघ्न डालो। इस पृथ्वीतलपर जो |
अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा [ ५५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अध्यापनं चाध्ययनं व्याख्यानं कर्म एव च।<br>योऽन्यायतः करोत्यस्मिंस्तस्य प्राणान् सदा हर॥ १७<br><br>वर्णाच्च्युतानां नारीणां नराणां नरपुङ्गव।<br>स्वधर्मरहितानां च प्राणानपहर प्रभो॥ १८<br><br>याः स्त्रियस्त्वां सदा कालं पुरुषाश्च विनायक।<br>यजन्ति तासां तेषां च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि॥ १९<br><br>त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष बालगणेश्वर।<br>यौवनस्थांश्च वृद्धांश्च इहामुत्र च पूजितः॥ २०<br><br>जगतत्रयेऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः।<br>सम्पूज्यो वन्दनीयश्च भविष्यसि न संशयः॥ २१<br><br>मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक।<br>यजन्ति यज्ञैर्वा विप्रैरग्रे पूज्यो भविष्यसि॥ २२<br><br>त्वामनभ्यर्च्य कल्याणं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम्।<br>कुरुते तस्य कल्याणमकल्याणं भविष्यति॥ २३<br><br>ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चैव गजानन।<br>सम्पूज्य सर्वसिद्धयर्थं भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः॥ २४<br><br>त्वां गन्धपुष्पधूपाद्यैरनभ्यर्च्य जगत्त्रये।<br>देवैरपि तथाऽन्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित्॥ २५<br><br>अभ्यर्चयन्ति ये लोका मानवास्तु विनायकम्।<br>ते चार्चनीयाः शक्राद्यैर्भविष्यन्ति न संशयः॥ २६<br><br>अजं हरिं च मां वापि शक्रमन्यान् सुरानपि।<br>विघ्नैर्बाधयसि त्वां चेन्नार्चयन्ति फलार्थिनः॥ २७ | अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [अन्य] कर्म करता हो; उसके प्राणोंको तुम सदा हरते रहो। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! वर्णसे च्युत तथा अपने धर्मसे रहित पुरुषों एवं स्त्रियोंके प्राणोंको हर लो। हे विनायक! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो। हे बालगणेश्वर! तुम इस लोक तथा परलोकमें पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तोंकी रक्षा सम्पूर्ण प्रयत्नसे करो। तुम तीनों लोकोंमें सर्वत्र विघ्नगणेश्वरके रूपमें पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है। हे पुत्र! जो [विप्र] मेरी, विष्णुकी तथा ब्रह्माकी पूजा करते हैं अथवा [अग्निष्टोम आदि] यज्ञोंके द्वारा यजन करते हैं, उन ब्राह्मणोंके द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे। तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याणके लिये श्रौत-स्मार्त-लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगलके रूपमें परिवर्तित हो जायेगा। हे गजानन! तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंके द्वारा शुभ भक्ष्य-भोज्य आदिसे भली-भाँति पूजाके योग्य होओगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे तुम्हारी पूजा किये बिना तीनों लोकोंमें कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगोंसे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है। जो मानव विनायककी पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदिके द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। यदि फलकी इच्छा रखनेवाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नोंसे बाधित करो'॥ १४-२७॥ |
| ससर्ज च तदा विघ्नगणं गणपतिः प्रभुः।<br>गणैः सार्धं नमस्कृत्याप्यतिष्ठत्तस्य चाग्रतः॥ २८ | तब प्रभु गणपतिने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया और वे गणोंके साथ शिवजीको नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये॥ २८॥ |
| तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् पूजयन्ति गणेश्वरम्।<br>दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासौ गणेश्वरः॥ २९<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं स्कन्दाग्रजसमुद्भवम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखी भवेत्॥ ३० | उसी समयसे लोग इस लोकमें गणपतिकी पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालने लगे। [हे ऋषियो!] मैंने आप लोगोंको स्कन्द (कार्तिकेय)-के अग्रजकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण आख्यान बता दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सुखी हो जाता है॥ २९-३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विनायकोत्पत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विनायकोत्पत्ति' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५॥
१०६- दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| ५५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
एक सौ छठा अध्याय
दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>नृत्यारम्भः कथं शम्भोः किमर्थं वा यथातथम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं श्रुतः स्कन्दाग्रजोद्भवः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हमलोगों ने स्कन्दके अग्रजका प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि शम्भुके नृत्यका आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>दारुकोऽसुरसम्भूतस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>सूदयामास कालाग्निरिव देवान् द्विजोत्तमान्॥ २ | **सूतजी बोले—**दारुक नामक एक दैत्य असुरोंमें उत्पन्न हुआ। तपस्यासे पराक्रम प्राप्त करके कालाग्निके समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजोंको पीड़ित करने लगा॥ २॥ |
| दारुकेण तदा देवास्ताडिताः पीडिता भृशम्।<br>ब्रह्माणं च तथेशानं कुमारं विष्णुमेव च॥ ३<br>यममिन्द्रमनुप्राप्य स्त्रीवध्य इति चासुरः।<br>स्त्रीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्माद्यैर्युधि संस्थितैः॥ ४ | उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदिके पास पहुँचकर उन देवताओंको सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए। 'यह असुर स्त्रीवध्य है'—ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्धके लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदिके साथ वह असुर युद्ध करने लगा॥ ३-४॥ |
| बाधितास्तेन ते सर्वे ब्रह्माणं प्राप्य वै द्विजाः।<br>विज्ञाप्य तस्मै तत्सर्वं तेन सार्धमुमापतिम्॥ ५<br>सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः।<br>ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधा नतः॥ ६<br>दारुणो भगवान् दारुः पूर्वं तेन विनिर्जिताः।<br>निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवध्यं त्रातुमर्हसि॥ ७ | हे द्विजो! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्माके पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुनः उन [ब्रह्माके] साथ उमापतिके यहाँ जाकर पितामहको आगे करके [शिवकी] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेशके निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा—'हे भगवन्! दारुक महाभयंकर है; हमलोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्रीके द्वारा वध्य उस दैत्य दारुकका संहार करके आप हमलोगोंकी रक्षा कीजिये'॥ ५-७॥ |
| विज्ञप्तिं ब्रह्मणः श्रुत्वा भगवान् भगनेत्रहा।<br>देवीमुवाच देवेशो गिरिजां प्रहसन्निव॥ ८<br>भवतीं प्रार्थयाम्यद्य हिताय जगतां शुभे।<br>वधार्थं दारुकस्यास्य स्त्रीवध्यस्य वरानने॥ ९ | ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान् देवेशने देवी गिरिजासे हँसते हुए कहा—'हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकोंके हितके लिये इस स्त्रीवध्य दारुकके वधहेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ'॥ ८-९॥ |
| अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्मतत्परा॥ १०<br>एकेनांशेन देवेशं प्रविष्टा देवसत्तमम्।<br>न विवेद तदा ब्रह्मा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ११ | तब उनका वचन सुनकर संसारको उत्पन्न करनेवाली उन देवेश्वरीने जन्मके लिये तत्पर होकर शिवके शरीरमें प्रवेश किया। वे [पार्वती] देवताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वरमें |
अध्याय १०६] भगवान् शिवद्वारा काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना [५५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम्।<br>मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञोऽपि चतुर्मुखः॥ १२ | अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये। मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे॥ १०-१२॥ |
| सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती।<br>कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः॥ १३ | उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया॥ १३॥ |
| तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै।<br>ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम्॥ १४ | इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव]-ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी (कृष्णवर्णके कण्ठवाली) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया॥ १४॥ |
| जाता यदा कालिमकालकण्ठी<br>जाता तदानीं विपुला जयश्रीः।<br>देवेतराणामजयस्त्वसिद्ध्या<br>तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य॥ १५ | जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुई। अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [शिव]-को प्रसन्नता हुई॥ १५॥ |
| जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा<br>दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम्।<br>कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-<br>मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः॥ १६ | विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे॥ १६॥ |
| तथैव जातं नयनं ललाटे<br>सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा।<br>कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं<br>करे करालं च विभूषणानि॥ १७ | उनके ललाटमें शिवकी भाँति [तीसरा] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [कालकूट] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पोंके हार-कुण्डल आदि] आभूषण धारण किये हुए थीं॥ १७॥ |
| सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः।<br>सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः॥ १८ | कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए॥ १८॥ |
| आज्ञया दारुकं तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी।<br>दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान्॥ १९ | तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [काली]-ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया॥ १९॥ |
| संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत्।<br>क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम्॥ २० | हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब |
| भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले।<br>रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः॥ २१ | ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [काशीमें] श्मशानमें [जाकर] |