भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय १०४] गजाननका प्राकट्य करानेके लिये देवताओंद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति ५५१


श्लोकअर्थ
अनघाय विरिञ्चाय देव्याः कार्यार्थदायिने।<br>अकायायार्थकायाय हरेः कायापहारिणे॥ ८<br><br>कायान्तस्थामृताधारमण्डलावस्थिताय ते।<br>कृतादिभेदकालाय कालवेगाय ते नमः॥ ९शिवकी स्तुति करने लगे—आप सर्वात्मा, सर्वज्ञ तथा पिनाकधारीको नमस्कार है। निष्पाप, विशेष रूपसे ब्रह्माण्डकी रचना करनेवाले, देवी [पार्वती]-को तपस्याका फल प्रदान करनेवाले, कायारहित, प्रयोजनके लिये शरीर धारण करनेवाले, विष्णुकी कायाका अपहरण करनेवाले, देहके भीतर अमृताधार-मण्डलमें विराजमान रहनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। कृत (सत्ययुग) आदि कालभेदोंको उत्पन्न करनेवाले तथा कालवेग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ७–९॥
कालाग्निरूद्ररूपाय धर्माद्यष्टपदाय च।<br>कालीविशुद्धदेहाय कालिकाकारणाय ते॥ १०कालाग्निके समान भयंकर रूपवाले, धर्म आदि आठ पदों (स्थानों) वाले, महाकालीको विशुद्ध (गौर) देह करनेवाले तथा कालिका (चण्डिका)-की उत्पत्ति करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १०॥
कालकण्ठाय मुख्याय वाहनाय वराय ते।<br>अम्बिकापतये तुभ्यं हिरण्यपतये नमः॥ ११कालकण्ठ, प्रधानस्वरूप, वाहन (कर्मफलकी प्राप्ति करानेवाले) तथा सर्वश्रेष्ठ आप [शिव]-को नमस्कार है। अम्बिकापति तथा हिरण्यपति आप [शिव]-को नमस्कार है॥ ११॥
हिरण्यरेतसे चैव नमः शर्वाय शूलिने।<br>कपालदण्डपाशासिचर्माङ्कुशधराय च॥ १२<br><br>पतये हैमवत्याश्च हेमशुक्लाय ते नमः।<br>पीतशुक्लाय रक्षार्थं सुराणां कृष्णवर्त्मने॥ १३हिरण्यरेता, शर्व, शूली और कपाल-दण्ड-पाश-असि-चर्म-अंकुश धारण करनेवाले [शिव]-को नमस्कार है। पार्वतीपति, सुवर्णके समान शुक्ल (शुद्ध), [अर्धनारीश्वररूप होनेके कारण] पीत-शुक्ल वर्णवाले तथा देवताओंकी रक्षाके लिये अग्निरूपवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १२–१३॥
पञ्चमाय महापञ्चयज्ञिनां फलदाय च।<br>पञ्चास्यफणिहाराय पञ्चाक्षरमयाय ते॥ १४<br><br>पञ्चधा पञ्चकैवल्यदेवैरर्चितमूर्तये।<br>पञ्चाक्षरदृशे तुभ्यं परात्परतराय ते॥ १५तुरीयातीत, [देवयज्ञ आदि] पंच महायज्ञोंके कर्ताओंको फल देनेवाले, पंचमुख सर्पको हारके रूपमें धारण करनेवाले तथा पंचाक्षर [मन्त्र]-मय आप [शिव]-को नमस्कार है। पाँच प्रकारसे [रुद्र आदि] पंच कैवल्य देवोंद्वारा पूजित मूर्तिवाले, पंचाक्षर मन्त्ररूप दृष्टिवाले तथा परात्परतर आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १४–१५॥
षोडशस्वरवज्राङ्गवक्त्रायाक्षयरूपिणे ।<br>कादिपञ्चकहस्ताय चादिहस्ताय ते नमः॥ १६<br><br>टादिपादाय रुद्राय तादिपादाय ते नमः।<br>पादिमेण्द्राय यद्यङ्गधातुसप्तकधारिणे॥ १७[अकार आदि] सोलह स्वरमय वज्रके समान [अभेद्य] अंगों तथा मुखवाले, अक्षय रूपवाले, 'क' से प्रारम्भ होनेवाले पाँच अक्षररूप हाथवाले, 'च' आदि [पाँच वर्णरूप] हाथवाले, 'ट' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'त' आदि [पाँच वर्णरूप] पादवाले, 'प' आदि
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