भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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५५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| सान्तात्मरूपिणे साक्षात्क्षदन्तक्रोधिने नमः।<br>लवरेफहळाङ्गाय निरङ्गाय च ते नमः॥ १८ | [पाँच वर्णरूप] मेढ्र (लिंग) वाले, 'य'कारमय अंगसम्बन्धी सात धातुओंको धारण करनेवाले आप रुद्रको नमस्कार है। श-ष-स वर्णमय आत्मरूपवाले तथा 'क्ष' कारमय प्रलयस्वरूप क्रोधवाले [शिवको] नमस्कार है। ल, व, रेफ, ह, ळ—पाँच वर्णरूप हृदयोंवाले तथा निरंग आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १६-१८॥ | | सर्वेषामेव भूतानां हृदि निःस्वनकारिणे।<br>भ्रुवोरन्ते सदासद्भिर्दृष्टायात्यन्तभानवे॥ १९<br><br>भानुसोमाग्निनेत्राय परमात्मस्वरूपिणे।<br>गुणत्रयोपरिस्थाय तीर्थपादाय ते नमः॥ २० | सभी प्राणियोंके हृदयमें अनाहत ध्वनि करनेवाले, भक्तोंके द्वारा भ्रुवोंके मध्य सदा दिखायी देनेवाले, अत्यन्त भानु (सर्वप्रकाशक), सूर्य-चन्द्र-अग्निरूप नेत्रवाले, परमात्म-स्वरूपी, तीनों गुणोंसे ऊपर स्थित तथा तीर्थरूप पादवाले आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १९-२०॥ | | तीर्थतत्त्वाय साराय तस्मादपि पराय ते।<br>ऋग्यजुःसामवेदाय ओङ्काराय नमो नमः॥ २१ | तीर्थरूप तत्त्ववाले, सारस्वरूप (तीर्थफलरूप) और उस तीर्थफलके भी अधिष्ठाता आप [शिव]-को नमस्कार है। ऋक्-यजुः-सामवेदस्वरूप तथा ओंकारस्वरूप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २१॥ | | ओङ्कारे त्रिविधं रूपमास्थायोपरिवासिने।<br>पीताय कृष्णवर्णाय रक्तायात्यन्ततेजसे॥ २२<br><br>स्थानपञ्चकसंस्थाय पञ्चधाण्डबहिःक्रमात्।<br>ब्रह्मणे विष्णवे तुभ्यं कुमाराय नमो नमः॥ २३ | [ब्रह्मा, विष्णु, हर] तीन प्रकारके रूपको धारण करके प्रणवान्तनादमें तुरीयरूपसे स्थित रहनेवाले, पीत-कृष्ण-रक्त वर्णवाले, अपरिमित तेजवाले, ब्रह्माण्डके बाहर क्रमसे पाँच प्रकारसे [जल आदि] पाँच स्थानोंमें स्थित रहनेवाले और ब्रह्मा-विष्णु-कुमारस्वरूप आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २२-२३॥ | | अम्बायाः परमेशाय सर्वोपरिचराय ते।<br>मूलसूक्ष्मस्वरूपाय स्थूलसूक्ष्माय ते नमः॥ २४ | अम्बिकाके परमेश्वर तथा सबके ऊपर विचरण करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। मूल सूक्ष्म स्वरूपवाले तथा स्थूल-सूक्ष्मस्वरूप आप [शिव]-को नमस्कार है॥ २४॥ | | सर्वसङ्कल्पशून्याय सर्वस्माद्रक्षिताय ते।<br>आदिमध्यान्तशून्याय चित्संस्थाय नमो नमः॥ २५ | समस्त संकल्पोंसे रहित, सबसे रक्षित (गुप्त), आदि-मध्य-अन्तसे रहित तथा ज्ञानमें स्थित आप [शिव]-को बार-बार नमस्कार है॥ २५॥ | | यमाग्निवायुरुद्राम्बुसोमशक्रनिशाचरैः ।<br>दिङ्मुखे दिङ्मुखे नित्यं सगणैः पूजिताय ते॥ २६<br><br>सर्वेषु सर्वदा सर्वमार्गे सम्पूजिताय ते।<br>रुद्राय रुद्रनीलाय कद्रुद्राय प्रचेतसे।<br>महेश्वराय धीराय नमः साक्षात् शिवाय ते॥ २७ | गणोंसहित यम, अग्नि, वायु, रुद्र, वरुण, सोम, इन्द्र तथा निशाचरोंके द्वारा दिशाओं-विदिशाओंमें नित्य पूजित आप [शिव]-को नमस्कार है। सभी लोकोंमें तथा सभी मार्गोंमें सर्वदा पूजित आपको नमस्कार है। रुद्र, रुद्रनील, कद्रुद्र, प्रचेता, महेश्वर, धीर साक्षात् आप शिवको नमस्कार है॥ २६-२७॥ | | अथ शृणु भगवन् स्तवच्छलेन<br>कथितमजेन्द्रमुखैः सुरासुरेशैः। | हे भगवन्! सुनिये; देवताओं तथा दैत्योंके स्वामी |