श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा ५५३
| मखमदनयमाग्निदक्षयज्ञ-<br>क्षपणविचित्रविचेष्टितं क्षमस्व ॥ २८<br><br>सूत उवाच<br>यः पठेत्तु स्तवं भक्त्या शक्राग्निप्रमुखैः सुरैः।<br>कीर्तितं श्रावयेद्विद्वान् स याति परमां गतिम्॥ २९ | ब्रह्मा-इन्द्र आदिने मख, कामदेव, यम, अग्नि तथा दक्षयज्ञके विध्वंसरूपी आपके विचित्र क्रिया-कलापका वर्णन स्तुतिके बहाने किया है; आप क्षमा करें॥ २८॥<br><br>सूतजी बोले—जो विद्वान् [व्यक्ति] इन्द्र, अग्नि आदि प्रधान देवताओंके द्वारा किये गये इस स्तवको भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा [दूसरोंको] सुनाता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है॥ २९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे देवस्तुतिर्नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः ॥ १०४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'देवस्तुति' नामक एक सौ चारवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०४॥
एक सौ पाँचवाँ अध्याय
विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा
| सूत उवाच<br>यदा स्थिताः सुरेश्वराः प्रणम्य चैवमीश्वरम्।<br>तदाम्बिकापतिर्भवः पिनाकधृङ् महेश्वरः॥ १<br><br>ददौ निरीक्षणं क्षणाद्भवः स तान् सुरोत्तमान्।<br>प्रणेमुरादराद्धरं सुरा मुदार्द्रलोचनाः॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] शिवजीको प्रणाम करके जब सुरेश्वर लोग [यथास्थान] स्थित हो गये, तब अम्बिकापति, पिनाकधारी, भव महेश्वरने उन श्रेष्ठ देवताओंको क्षणभरमें दिव्य दृष्टि प्रदान की। तब अश्रुसे भीगे नेत्रवाले देवताओंने प्रसन्नतासे युक्त होकर आदरपूर्वक शिवको प्रणाम किया॥ १-२॥ |
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| भवः सुधामृतोपमैर्निरीक्षणैर्निरीक्षणात्।<br>तदाह भद्रमस्तु वः सुरेश्वरान् महेश्वरः॥ ३ | इसके बाद महेश्वर भवने सुधामृततुल्य दृष्टिसे देखकर सुरेश्वरोंसे कहा—'आपलोगोंका कल्याण हो'॥ ३॥ |
| वरार्थमीश वीक्ष्य ते सुरा गृहं गतास्त्विमे।<br>प्रणम्य चाह वाक्पतिः पतिं निरीक्ष्य निर्भयः॥ ४<br><br>सुरेतरादिभिः सदा ह्यविघ्नमर्थितो भवान्।<br>समस्तकर्मसिद्धये सुरापकारकारिभिः॥ ५<br><br>ततः प्रसीदताद्भवान् सुविघ्नकर्मकारणम्।<br>सुरापकारकारिणामिहैष एव नो वरः॥ ६ | तदनन्तर स्वामी शिवको देखकर निर्भय होकर बृहस्पतिने उन्हें प्रणाम करके कहा—'हे ईश! ये देवता आपका दर्शन करके वरप्राप्तिके लिये आपके घर आये हुए हैं। देवताओंका अपकार करनेवाले दैत्यों आदिके द्वारा निर्विघ्नतापूर्वक समस्त कर्मोंकी सिद्धिके लिये आप सदा प्रार्थित हैं। अतः आप देवताओंके अपकारी दैत्योंके विघ्नयुक्त कर्मका कारण बनिये और प्रसन्न होइये; यही हमलोगोंका वर है'॥ ४–६॥ |
| ततस्तदा निशम्य वै पिनाकधृक् सुरेश्वरः।<br>गणेश्वरं सुरेश्वरं वपुर्दधार सः शिवः॥ ७<br><br>गणेश्वराश्च तुष्टुवुः सुरेश्वरा महेश्वरम्।<br>समस्तलोकसम्भवं भवार्तिहारिणं शुभम्॥ ८ | तब यह सुनकर उन पिनाकधारी सुरेश्वर शिवने देवताओंके स्वामी गणेश्वरका शरीर धारण किया। तदनन्तर गणेश्वरों तथा [ब्रह्मा आदि] सुरेश्वरोंने समस्त लोकोंको उत्पन्न करनेवाले तथा संसारका कष्ट दूर करनेवाले शुभ [गजाननरूपी] महेश्वरकी स्तुति की॥ ७-८॥ |
| इभाननाश्रितं वरं त्रिशूलपाशधारिणम्।<br>समस्तलोकसम्भवं गजाननं तदाम्बिका॥ ९ | इसके बाद अम्बिका [पार्वती]-ने हाथीके समान मुख धारण किये हुए और [हाथोंमें] त्रिशूल तथा पाश |