भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 556, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 556
५५४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लिये हुए समस्त लोकोंके उत्पादक कल्याणकारी गजाननको जन्म दिया॥ ९॥
ददुः पुष्पवर्षं हि सिद्धा मुनीन्द्रा-<br>स्तथा खेचरा देवसङ्घास्तदानीम्।<br>तदा तुष्टुवुश्चैकदन्तं सुरेशाः<br>प्रणेमुर्गणेशं महेशं वितन्द्राः॥ १०उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओंने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरोंने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेशको प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ १०॥
तदा तयोर्विनिर्गतः सुभैरवः समूर्तिमान्।<br>स्थितो ननर्त बालकः समस्तमङ्गलालयः॥ ११<br><br>विचित्रवस्त्रभूषणैरलङ्कृतो गजाननः।<br>महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवन्द्य तातमम्बिकाम्॥ १२उस समय उन शिवा-शिवसे उत्पन्न, विचित्र वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत तथा सभी मंगलोंका आलय महेश्वर-पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरवकी भाँति स्थित होकर पिता [शिव] तथा माताकी वन्दना करके नृत्य करने लगा॥ ११-१२॥
जातमात्रं सुतं दृष्ट्वा चकार भगवान् भवः।<br>गजाननाय कृत्यांस्तु सर्वान् सर्वेश्वरः स्वयम्॥ १३उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर भगवान् सर्वेश्वर भवने गजाननके लिये सभी [जातकर्म आदि] संस्कारोंको स्वयं किया॥ १३॥
आदाय च कराभ्यां च सुसुखाभ्यां भवः स्वयम्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं महादेवो जगद्गुरुः॥ १४<br><br>तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज।<br>देवानामपकारार्थं द्विजानां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यज्ञश्च दक्षिणाहीनः कृतो येन महीतले।<br>तस्य धर्मस्य विघ्नं च कुरु स्वर्गपथे स्थितः॥ १६इसके बाद जगद्गुरु महादेव भवने स्वयं [अपने] परम सुखदायक हाथोंसे उसे उठाकर, आलिंगन करके तथा उसके सिरको सूँघकर कहा—'हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा अवतार दैत्योंके विनाशके लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजोंके उपकारके लिये हुआ है। जिसने पृथ्वीतलपर दक्षिणाविहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथमें स्थित रहते हुए उसके धर्ममें विघ्न डालो। इस पृथ्वीतलपर जो