श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा [ ५५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अध्यापनं चाध्ययनं व्याख्यानं कर्म एव च।<br>योऽन्यायतः करोत्यस्मिंस्तस्य प्राणान् सदा हर॥ १७<br><br>वर्णाच्च्युतानां नारीणां नराणां नरपुङ्गव।<br>स्वधर्मरहितानां च प्राणानपहर प्रभो॥ १८<br><br>याः स्त्रियस्त्वां सदा कालं पुरुषाश्च विनायक।<br>यजन्ति तासां तेषां च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि॥ १९<br><br>त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष बालगणेश्वर।<br>यौवनस्थांश्च वृद्धांश्च इहामुत्र च पूजितः॥ २०<br><br>जगतत्रयेऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः।<br>सम्पूज्यो वन्दनीयश्च भविष्यसि न संशयः॥ २१<br><br>मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक।<br>यजन्ति यज्ञैर्वा विप्रैरग्रे पूज्यो भविष्यसि॥ २२<br><br>त्वामनभ्यर्च्य कल्याणं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम्।<br>कुरुते तस्य कल्याणमकल्याणं भविष्यति॥ २३<br><br>ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चैव गजानन।<br>सम्पूज्य सर्वसिद्धयर्थं भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः॥ २४<br><br>त्वां गन्धपुष्पधूपाद्यैरनभ्यर्च्य जगत्त्रये।<br>देवैरपि तथाऽन्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित्॥ २५<br><br>अभ्यर्चयन्ति ये लोका मानवास्तु विनायकम्।<br>ते चार्चनीयाः शक्राद्यैर्भविष्यन्ति न संशयः॥ २६<br><br>अजं हरिं च मां वापि शक्रमन्यान् सुरानपि।<br>विघ्नैर्बाधयसि त्वां चेन्नार्चयन्ति फलार्थिनः॥ २७ | अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [अन्य] कर्म करता हो; उसके प्राणोंको तुम सदा हरते रहो। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! वर्णसे च्युत तथा अपने धर्मसे रहित पुरुषों एवं स्त्रियोंके प्राणोंको हर लो। हे विनायक! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो। हे बालगणेश्वर! तुम इस लोक तथा परलोकमें पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तोंकी रक्षा सम्पूर्ण प्रयत्नसे करो। तुम तीनों लोकोंमें सर्वत्र विघ्नगणेश्वरके रूपमें पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है। हे पुत्र! जो [विप्र] मेरी, विष्णुकी तथा ब्रह्माकी पूजा करते हैं अथवा [अग्निष्टोम आदि] यज्ञोंके द्वारा यजन करते हैं, उन ब्राह्मणोंके द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे। तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याणके लिये श्रौत-स्मार्त-लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगलके रूपमें परिवर्तित हो जायेगा। हे गजानन! तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंके द्वारा शुभ भक्ष्य-भोज्य आदिसे भली-भाँति पूजाके योग्य होओगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे तुम्हारी पूजा किये बिना तीनों लोकोंमें कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगोंसे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है। जो मानव विनायककी पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदिके द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। यदि फलकी इच्छा रखनेवाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नोंसे बाधित करो'॥ १४-२७॥ |
| ससर्ज च तदा विघ्नगणं गणपतिः प्रभुः।<br>गणैः सार्धं नमस्कृत्याप्यतिष्ठत्तस्य चाग्रतः॥ २८ | तब प्रभु गणपतिने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया और वे गणोंके साथ शिवजीको नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये॥ २८॥ |
| तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् पूजयन्ति गणेश्वरम्।<br>दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासौ गणेश्वरः॥ २९<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं स्कन्दाग्रजसमुद्भवम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखी भवेत्॥ ३० | उसी समयसे लोग इस लोकमें गणपतिकी पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालने लगे। [हे ऋषियो!] मैंने आप लोगोंको स्कन्द (कार्तिकेय)-के अग्रजकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण आख्यान बता दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सुखी हो जाता है॥ २९-३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विनायकोत्पत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विनायकोत्पत्ति' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५॥