श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| ५५४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| लिये हुए समस्त लोकोंके उत्पादक कल्याणकारी गजाननको जन्म दिया॥ ९॥ | |
| ददुः पुष्पवर्षं हि सिद्धा मुनीन्द्रा-<br>स्तथा खेचरा देवसङ्घास्तदानीम्।<br>तदा तुष्टुवुश्चैकदन्तं सुरेशाः<br>प्रणेमुर्गणेशं महेशं वितन्द्राः॥ १० | उस समय सिद्धों, मुनियों, आकाशचारियों तथा देवताओंने पुष्पवृष्टि की; तब सुरेश्वरोंने आलस्यरहित होकर एकदन्त महेश्वर गणेशको प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की॥ १०॥ |
| तदा तयोर्विनिर्गतः सुभैरवः समूर्तिमान्।<br>स्थितो ननर्त बालकः समस्तमङ्गलालयः॥ ११<br><br>विचित्रवस्त्रभूषणैरलङ्कृतो गजाननः।<br>महेश्वरस्य पुत्रकोऽभिवन्द्य तातमम्बिकाम्॥ १२ | उस समय उन शिवा-शिवसे उत्पन्न, विचित्र वस्त्र-आभूषणोंसे अलंकृत तथा सभी मंगलोंका आलय महेश्वर-पुत्र वह बालक गजानन मूर्तिमान् सुन्दर भैरवकी भाँति स्थित होकर पिता [शिव] तथा माताकी वन्दना करके नृत्य करने लगा॥ ११-१२॥ |
| जातमात्रं सुतं दृष्ट्वा चकार भगवान् भवः।<br>गजाननाय कृत्यांस्तु सर्वान् सर्वेश्वरः स्वयम्॥ १३ | उत्पन्न हुए पुत्रको देखकर भगवान् सर्वेश्वर भवने गजाननके लिये सभी [जातकर्म आदि] संस्कारोंको स्वयं किया॥ १३॥ |
| आदाय च कराभ्यां च सुसुखाभ्यां भवः स्वयम्।<br>आलिङ्ग्याघ्राय मूर्धानं महादेवो जगद्गुरुः॥ १४<br><br>तवावतारो दैत्यानां विनाशाय ममात्मज।<br>देवानामपकारार्थं द्विजानां ब्रह्मवादिनाम्॥ १५<br><br>यज्ञश्च दक्षिणाहीनः कृतो येन महीतले।<br>तस्य धर्मस्य विघ्नं च कुरु स्वर्गपथे स्थितः॥ १६ | इसके बाद जगद्गुरु महादेव भवने स्वयं [अपने] परम सुखदायक हाथोंसे उसे उठाकर, आलिंगन करके तथा उसके सिरको सूँघकर कहा—'हे मेरे पुत्र ! तुम्हारा अवतार दैत्योंके विनाशके लिये और देवताओं तथा ब्रह्मवादी द्विजोंके उपकारके लिये हुआ है। जिसने पृथ्वीतलपर दक्षिणाविहीन यज्ञ किया है, तुम स्वर्गपथमें स्थित रहते हुए उसके धर्ममें विघ्न डालो। इस पृथ्वीतलपर जो |
अध्याय १०५ ] विघ्ननाशक श्रीगणेशजीके प्राकट्यकी कथा [ ५५५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| अध्यापनं चाध्ययनं व्याख्यानं कर्म एव च।<br>योऽन्यायतः करोत्यस्मिंस्तस्य प्राणान् सदा हर॥ १७<br><br>वर्णाच्च्युतानां नारीणां नराणां नरपुङ्गव।<br>स्वधर्मरहितानां च प्राणानपहर प्रभो॥ १८<br><br>याः स्त्रियस्त्वां सदा कालं पुरुषाश्च विनायक।<br>यजन्ति तासां तेषां च त्वत्साम्यं दातुमर्हसि॥ १९<br><br>त्वं भक्तान् सर्वयत्नेन रक्ष बालगणेश्वर।<br>यौवनस्थांश्च वृद्धांश्च इहामुत्र च पूजितः॥ २०<br><br>जगतत्रयेऽत्र सर्वत्र त्वं हि विघ्नगणेश्वरः।<br>सम्पूज्यो वन्दनीयश्च भविष्यसि न संशयः॥ २१<br><br>मां च नारायणं वापि ब्रह्माणमपि पुत्रक।<br>यजन्ति यज्ञैर्वा विप्रैरग्रे पूज्यो भविष्यसि॥ २२<br><br>त्वामनभ्यर्च्य कल्याणं श्रौतं स्मार्तं च लौकिकम्।<br>कुरुते तस्य कल्याणमकल्याणं भविष्यति॥ २३<br><br>ब्राह्मणैः क्षत्रियैर्वैश्यैः शूद्रैश्चैव गजानन।<br>सम्पूज्य सर्वसिद्धयर्थं भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः॥ २४<br><br>त्वां गन्धपुष्पधूपाद्यैरनभ्यर्च्य जगत्त्रये।<br>देवैरपि तथाऽन्यैश्च लब्धव्यं नास्ति कुत्रचित्॥ २५<br><br>अभ्यर्चयन्ति ये लोका मानवास्तु विनायकम्।<br>ते चार्चनीयाः शक्राद्यैर्भविष्यन्ति न संशयः॥ २६<br><br>अजं हरिं च मां वापि शक्रमन्यान् सुरानपि।<br>विघ्नैर्बाधयसि त्वां चेन्नार्चयन्ति फलार्थिनः॥ २७ | अन्यायपूर्वक अध्ययन, अध्यापन, व्याख्यान तथा [अन्य] कर्म करता हो; उसके प्राणोंको तुम सदा हरते रहो। हे नरश्रेष्ठ! हे प्रभो! वर्णसे च्युत तथा अपने धर्मसे रहित पुरुषों एवं स्त्रियोंके प्राणोंको हर लो। हे विनायक! जो स्त्रियाँ तथा पुरुष सदा कालरूप तुम्हारी पूजा करें, तुम उन्हें अपना साम्य प्रदान करो। हे बालगणेश्वर! तुम इस लोक तथा परलोकमें पूजित होकर युवा और वृद्ध भक्तोंकी रक्षा सम्पूर्ण प्रयत्नसे करो। तुम तीनों लोकोंमें सर्वत्र विघ्नगणेश्वरके रूपमें पूजनीय तथा वन्दनीय होओगे; इसमें संशय नहीं है। हे पुत्र! जो [विप्र] मेरी, विष्णुकी तथा ब्रह्माकी पूजा करते हैं अथवा [अग्निष्टोम आदि] यज्ञोंके द्वारा यजन करते हैं, उन ब्राह्मणोंके द्वारा भी सबसे पहले तुम पूज्य होओगे। तुम्हारी पूजा न करके जो कल्याणके लिये श्रौत-स्मार्त-लौकिक कर्म करेगा, उसका मंगल अमंगलके रूपमें परिवर्तित हो जायेगा। हे गजानन! तुम समस्त कार्योंकी सिद्धिके लिये ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रोंके द्वारा शुभ भक्ष्य-भोज्य आदिसे भली-भाँति पूजाके योग्य होओगे। गन्ध, पुष्प, धूप आदिसे तुम्हारी पूजा किये बिना तीनों लोकोंमें कहीं भी देवताओं तथा अन्य लोगोंसे भी कुछ नहीं प्राप्त हो सकता है। जो मानव विनायककी पूजा करेंगे, वे इन्द्र आदिके द्वारा भी पूजनीय होंगे; इसमें सन्देह नहीं है। यदि फलकी इच्छा रखनेवाले तुम्हारी पूजा नहीं करते हों, तो वे चाहे ब्रह्मा, विष्णु, स्वयं मैं, इन्द्र अथवा अन्य देवता ही क्यों न हों, उन्हें तुम विघ्नोंसे बाधित करो'॥ १४-२७॥ |
| ससर्ज च तदा विघ्नगणं गणपतिः प्रभुः।<br>गणैः सार्धं नमस्कृत्याप्यतिष्ठत्तस्य चाग्रतः॥ २८ | तब प्रभु गणपतिने विघ्नगणोंको उत्पन्न किया और वे गणोंके साथ शिवजीको नमस्कार करके उनके आगे खड़े हो गये॥ २८॥ |
| तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् पूजयन्ति गणेश्वरम्।<br>दैत्यानां धर्मविघ्नं च चकारासौ गणेश्वरः॥ २९<br><br>एतद्वः कथितं सर्वं स्कन्दाग्रजसमुद्भवम्।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि श्रावयेद्वा सुखी भवेत्॥ ३० | उसी समयसे लोग इस लोकमें गणपतिकी पूजा करने लगे और वे गणेश्वर दैत्योंके धर्ममें विघ्न डालने लगे। [हे ऋषियो!] मैंने आप लोगोंको स्कन्द (कार्तिकेय)-के अग्रजकी उत्पत्तिका सम्पूर्ण आख्यान बता दिया। जो इसे पढ़ता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह सुखी हो जाता है॥ २९-३०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विनायकोत्पत्तिर्नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः॥ १०५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विनायकोत्पत्ति' नामक एक सौ पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०५॥
१०६- दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| ५५६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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एक सौ छठा अध्याय
दारुकासुरके विनाशके लिये भगवान् शिवद्वारा अपने शरीरसे काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना एवं शिवताण्डवनृत्यकी कथा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ऋषय ऊचुः<br>नृत्यारम्भः कथं शम्भोः किमर्थं वा यथातथम्।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं श्रुतः स्कन्दाग्रजोद्भवः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हमलोगों ने स्कन्दके अग्रजका प्रादुर्भाव तो सुन लिया; अब आप हमलोगोंको यथार्थरूपसे यह बतायें कि शम्भुके नृत्यका आरम्भ कैसे तथा किसलिये हुआ?॥ १॥ |
| सूत उवाच<br>दारुकोऽसुरसम्भूतस्तपसा लब्धविक्रमः।<br>सूदयामास कालाग्निरिव देवान् द्विजोत्तमान्॥ २ | **सूतजी बोले—**दारुक नामक एक दैत्य असुरोंमें उत्पन्न हुआ। तपस्यासे पराक्रम प्राप्त करके कालाग्निके समान वह [असुर] देवताओं तथा उत्तम द्विजोंको पीड़ित करने लगा॥ २॥ |
| दारुकेण तदा देवास्ताडिताः पीडिता भृशम्।<br>ब्रह्माणं च तथेशानं कुमारं विष्णुमेव च॥ ३<br>यममिन्द्रमनुप्राप्य स्त्रीवध्य इति चासुरः।<br>स्त्रीरूपधारिभिः स्तुत्यैर्ब्रह्माद्यैर्युधि संस्थितैः॥ ४ | उस समय वह दारुक ब्रह्मा, ईशान, कुमार, विष्णु, यम, इन्द्र आदिके पास पहुँचकर उन देवताओंको सताने लगा, इससे वे देवता बहुत पीड़ित हुए। 'यह असुर स्त्रीवध्य है'—ऐसा सोचकर स्त्रीरूपधारी तथा युद्धके लिये स्थित उन स्तुत्य ब्रह्मा आदिके साथ वह असुर युद्ध करने लगा॥ ३-४॥ |
| बाधितास्तेन ते सर्वे ब्रह्माणं प्राप्य वै द्विजाः।<br>विज्ञाप्य तस्मै तत्सर्वं तेन सार्धमुमापतिम्॥ ५<br>सम्प्राप्य तुष्टुवुः सर्वे पितामहपुरोगमाः।<br>ब्रह्मा प्राप्य च देवेशं प्रणम्य बहुधा नतः॥ ६<br>दारुणो भगवान् दारुः पूर्वं तेन विनिर्जिताः।<br>निहत्य दारुकं दैत्यं स्त्रीवध्यं त्रातुमर्हसि॥ ७ | हे द्विजो! तब उसके द्वारा बाधित किये गये वे सभी [देवतागण] ब्रह्माके पास पहुँचकर उनसे सब कुछ निवेदन करके पुनः उन [ब्रह्माके] साथ उमापतिके यहाँ जाकर पितामहको आगे करके [शिवकी] स्तुति करने लगे। इसके बाद देवेशके निकट जाकर अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम करके ब्रह्मा ने कहा—'हे भगवन्! दारुक महाभयंकर है; हमलोग उससे पहले ही पराजित हो चुके हैं। स्त्रीके द्वारा वध्य उस दैत्य दारुकका संहार करके आप हमलोगोंकी रक्षा कीजिये'॥ ५-७॥ |
| विज्ञप्तिं ब्रह्मणः श्रुत्वा भगवान् भगनेत्रहा।<br>देवीमुवाच देवेशो गिरिजां प्रहसन्निव॥ ८<br>भवतीं प्रार्थयाम्यद्य हिताय जगतां शुभे।<br>वधार्थं दारुकस्यास्य स्त्रीवध्यस्य वरानने॥ ९ | ब्रह्माजीकी प्रार्थना सुनकर भगके नेत्रोंको नष्ट करनेवाले भगवान् देवेशने देवी गिरिजासे हँसते हुए कहा—'हे शुभे! हे वरानने! मैं सभी लोकोंके हितके लिये इस स्त्रीवध्य दारुकके वधहेतु आज आपसे प्रार्थना करता हूँ'॥ ८-९॥ |
| अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतोऽरणिः।<br>विवेश देहे देवस्य देवेशी जन्मतत्परा॥ १०<br>एकेनांशेन देवेशं प्रविष्टा देवसत्तमम्।<br>न विवेद तदा ब्रह्मा देवाश्चेन्द्रपुरोगमाः॥ ११ | तब उनका वचन सुनकर संसारको उत्पन्न करनेवाली उन देवेश्वरीने जन्मके लिये तत्पर होकर शिवके शरीरमें प्रवेश किया। वे [पार्वती] देवताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वरमें |
अध्याय १०६] भगवान् शिवद्वारा काली तथा अष्टभैरवोंको प्रकट करना [५५७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| गिरिजां पूर्ववच्छम्भोर्दृष्ट्वा पार्श्वस्थितां शुभाम्।<br>मायया मोहितस्तस्याः सर्वज्ञोऽपि चतुर्मुखः॥ १२ | अपने सोलहवें अंशसे प्रविष्ट हुईं; उस समय ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रधान देवता भी इसे नहीं जान पाये। मंगलमयी पार्वतीको पूर्ववत् शम्भुके समीप स्थित देखकर सब कुछ जाननेवाले ब्रह्मा भी उनकी मायासे मोहित हो गये थे॥ १०-१२॥ |
| सा प्रविष्टा तनुं तस्य देवदेवस्य पार्वती।<br>कण्ठस्थेन विषेणास्य तनुं चक्रे तदात्मनः॥ १३ | उन देवदेवके शरीरमें प्रविष्ट हुईं उन पार्वतीने उनके कण्ठमें स्थित विषसे अपने शरीरको बनाया॥ १३॥ |
| तां च ज्ञात्वा तथाभूतां तृतीयेनेक्षणेन वै।<br>ससर्ज कालीं कामारिः कालकण्ठीं कपर्दिनीम्॥ १४ | इसके बाद उन पार्वतीको विषभूता जानकर कामशत्रु [शिव]-ने अपने तीसरे नेत्रसे कालकण्ठी (कृष्णवर्णके कण्ठवाली) कपर्दिनी कालीको उत्पन्न किया॥ १४॥ |
| जाता यदा कालिमकालकण्ठी<br>जाता तदानीं विपुला जयश्रीः।<br>देवेतराणामजयस्त्वसिद्ध्या<br>तुष्टिर्भवान्याः परमेश्वरस्य॥ १५ | जब विषके कारण कृष्णवर्णके कण्ठवाली काली प्रादुर्भूत हुईं, उस समय विपुल विजयश्री भी उत्पन्न हुई। अब असिद्धिके कारण दैत्योंकी पराजय निश्चित है, इससे भवानी तथा परमेश्वर [शिव]-को प्रसन्नता हुई॥ १५॥ |
| जातां तदानीं सुरसिद्धसङ्घा<br>दृष्ट्वा भयाद्दुद्रुवुरग्निकल्पाम्।<br>कालीं गरालङ्कृतकालकण्ठी-<br>मुपेन्द्रपद्मोद्भवशक्रमुख्याः॥ १६ | विषसे अलंकृत कृष्णवर्णके कण्ठवाली तथा अग्निके सदृश स्वरूपवाली उस प्रादुर्भूत कालीको देखकर सभी देवता, सिद्धगण और विष्णु-ब्रह्मा-इन्द्र आदि प्रधान देवता भी उस समय भयके कारण भागने लगे॥ १६॥ |
| तथैव जातं नयनं ललाटे<br>सितांशुलेखा च शिरस्युदग्रा।<br>कण्ठे करालं निशितं त्रिशूलं<br>करे करालं च विभूषणानि॥ १७ | उनके ललाटमें शिवकी भाँति [तीसरा] नेत्र था, मस्तकपर अति तीव्र चन्द्ररेखा थी, कण्ठमें [कालकूट] विष था, हाथमें विकराल तीक्ष्ण त्रिशूल था और वे [सर्पोंके हार-कुण्डल आदि] आभूषण धारण किये हुए थीं॥ १७॥ |
| सार्धं दिव्याम्बरा देव्यः सर्वाभरणभूषिताः।<br>सिद्धेन्द्रसिद्धाश्च तथा पिशाचा जज्ञिरे पुनः॥ १८ | कालीके साथ दिव्य वस्त्र धारण किये हुईं तथा सभी आभूषणोंसे विभूषित देवियाँ, सिद्धोंके स्वामी, सिद्धगण तथा पिशाच भी उत्पन्न हुए॥ १८॥ |
| आज्ञया दारुकं तस्याः पार्वत्याः परमेश्वरी।<br>दानवं सूदयामास सूदयन्तं सुराधिपान्॥ १९ | तब उन पार्वतीकी आज्ञासे परमेश्वरी [काली]-ने सुराधिपोंको मारनेवाले असुर दारुकका वध कर दिया॥ १९॥ |
| संरम्भातिप्रसङ्गाद्वै तस्याः सर्वमिदं जगत्।<br>क्रोधाग्निना च विप्रेन्द्राः सम्बभूव तदातुरम्॥ २० | हे श्रेष्ठ विप्रो! उनके अतिशय वेग तथा क्रोधकी अग्निसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याकुल हो उठा। तब |
| भवोऽपि बालरूपेण श्मशाने प्रेतसङ्कुले।<br>रुरोद मायया तस्याः क्रोधाग्निं पातुमीश्वरः॥ २१ | ईश्वर भव भी मायासे बालरूप धारणकर उन कालीकी क्रोधाग्निको पीनेके लिये [काशीमें] श्मशानमें [जाकर] |
१०७- शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ५५८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| रोने लगे॥ २०-२१॥ | |
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| तं दृष्ट्वा बालमीशानं मायया तस्य मोहिता।<br>उत्थाप्याघ्राय वक्षोजं स्तनं सा प्रददौ द्विजाः॥ २२ | हे द्विजो! उन बालरूप ईशानको देखकर उनकी मायासे मोहित उन कालीने उन्हें उठाकर मस्तक सूंघकर अपना वक्षस्थित स्तन ग्रहण कराया॥ २२॥ |
| स्तनजेन तदा सार्धं कोपमस्याः पपौ पुनः।<br>क्रोधेनानेन वै बालः क्षेत्राणां रक्षकोऽभवत्॥ २३<br><br>मूर्तयोऽष्टौ च तस्यापि क्षेत्रपालस्य धीमतः।<br>एवं वै तेन बालेन कृता सा क्रोधमूर्च्छिता॥ २४ | तब वे बालरूप शिव दूधके साथ उनका क्रोध भी पी गये और इस प्रकार वे इस क्रोधसे क्षेत्रोंकी रक्षा करनेवाले हो गये। उन बुद्धिमान् क्षेत्रपाल [भैरव]-की भी आठ मूर्तियाँ हो गयीं। इस प्रकार वे काली उस बालकके द्वारा क्रोधमूर्च्छित (नष्ट संज्ञावाली) कर दी गयीं॥ २३-२४॥ |
| कृतमस्याः प्रसादार्थं देवदेवेन ताण्डवम्।<br>सन्ध्यायां सर्वभूतैन्द्रैः प्रेतैः प्रीतेन शूलिना॥ २५ | इसके बाद प्रीतियुक्त देवदेव शिवने इन [काली]-की प्रसन्नताके लिये सन्ध्याकालमें श्रेष्ठ भूतों तथा प्रेतोंके साथ ताण्डव [नृत्य] किया॥ २५॥ |
| पीत्वा नृत्तामृतं शम्भोराकण्ठं परमेश्वरी।<br>ननर्त सा च योगिन्यः प्रेतस्थाने यथासुखम्॥ २६ | शम्भुके नृत्यामृतका कण्ठपर्यन्त पान करके वे परमेश्वरी [उस] श्मशानमें सुखपूर्वक नाचने लगीं और योगिनियाँ भी उनके साथ नाचने लगीं॥ २६॥ |
| तत्र सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समन्ततः।<br>प्रणेमुस्तुष्टुवुः कालीं पुनर्देवीं च पार्वतीम्॥ २७ | वहाँपर ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्रसहित सभी देवताओंने सभी ओरसे कालीको तथा पुनः देवी पार्वतीको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की॥ २७॥ |
| एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं ताण्डवं शूलिनः प्रभोः।<br>योगानन्देन च विभोः ताण्डवं चेति चापरे॥ २८ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें शूलधारी प्रभुके ताण्डवनृत्यका वर्णन कर दिया; 'योगके आनन्दके कारण विभु [शिव]-का ताण्डव होता है'—ऐसा अन्य लोग कहते हैं॥ २८॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवताण्डवकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः॥ १०६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवताण्डवकथन' नामक एक सौ छठा अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०६॥
एक सौ सातवाँ अध्याय
शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना
| ऋषय ऊचुः | ऋषिगण बोले— |
|---|---|
| पुरोपमन्युना सूत गाणपत्यं महेश्वरात्।<br>क्षीरार्णवः कथं लब्धो वक्तुमर्हसि साम्प्रतम्॥ १ | हे सूतजी! पूर्वकालमें उपमन्युने महेश्वरसे गणाधिप पद प्राप्त करके पुनः क्षीरसागरको कैसे प्राप्त किया; आप इस समय बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥ |
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
| एवं कालीमुपालभ्य गते देवे त्र्यम्बके।<br>उपमन्युः समभ्यर्च्य तपसा लब्धवान् फलम्॥ २ | [हे ऋषियो!] इस प्रकार कालीको उत्पन्न करके त्रिनेत्र शिवके चले जानेपर उपमन्युने तपस्याके द्वारा उनकी पूजा करके फल प्राप्त किया था॥ २॥ |
अध्याय १०७ ] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५५१
| उपमन्युरिति ख्यातो मुनिश्च द्विजसत्तमाः।<br>कुमार इव तेजस्वी क्रीडमानो यदृच्छया॥ ३<br><br>कदाचित्क्षीरमल्पं च पीतवान् मातुलाश्रमे।<br>ईर्ष्यया मातुलसुतो ह्यपिबत् क्षीरमुत्तमम्॥ ४ | हे श्रेष्ठ द्विजो! 'उपमन्यु'—इस नामसे प्रसिद्ध एक मुनि थे; कुमारके समान तेजस्वी उन्होंने किसी समय स्वेच्छानुसार खेलते हुए [अपने] मामाके आश्रममें थोड़ा-सा दूध पी लिया, तब ईर्ष्याके कारण उनके मामाके पुत्रने उत्तम दुग्धका पान किया॥ ३-४॥ |
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| पीत्वा स्थितं यथाकामं दृष्ट्वा प्रोवाच मातरम्।<br>मातर्मातर्महाभागे मम देहि तपस्विनि॥ ५<br><br>गव्यं क्षीरमतिस्वादु नाल्पमुष्णं नमाम्यहम्। | तब इच्छानुसार दुग्ध पीकर उसे पासमें खड़ा देखकर उपमन्युने अपनी मातासे कहा—हे मातः! हे महाभागे! हे तपस्विनि! आप मुझको गायका दुग्ध दीजिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट हो, गर्म हो तथा अल्प न हो; मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ ५ १/२॥ |
| सूत उवाच<br>उपलालितैवं पुत्रेण पुत्रमालिङ्ग्य सादरम्॥ ६<br><br>दुःखिता विललापार्ता स्मृत्वा नैर्धन्यमात्मनः।<br>स्मृत्वा स्मृत्वा पुनः क्षीरमुपमन्युरपि द्विजाः।<br>देहि देहीति तामाह रोदमानो महाद्युतिः॥ ७ | सूतजी बोले—इस प्रकार पुत्रके द्वारा स्नेह-पूर्वक कही गयी वह बात सुनकर माता आदरके साथ पुत्रका आलिंगन करके दुःखित हो गयी और अपनी निर्धनताका स्मरणकर व्याकुल होकर विलाप करने लगी। हे द्विजो! बार-बार दूधका स्मरण करके महातेजस्वी उपमन्यु भी मातासे रोते हुए यही कहते थे—'मुझे दो, मुझे दो'॥ ६-७॥ |
| उञ्छवृत्त्यार्जितान् बीजान् स्वयं पिष्ट्वा च सा तदा।<br>बीजपिष्टं तदालोड्य तोयेन कलभाषिणी॥ ८<br><br>एह्येहि मम पुत्रेति सामपूर्वं ततः सुतम्।<br>आलिङ्ग्यादाय दुःखार्ता प्रददौ कृत्रिमं पयः॥ ९ | तत्पश्चात् उंछवृत्ति (फसल कट जानेके बाद खेतमें पड़े दानोंको बटोरना)-से अर्जित बीजोंको स्वयं पीसकर पुनः बीजके उस आटेको जलके साथ मिलाकर मधुरभाषिणी वह माता बोली, 'हे मेरे पुत्र! आओ, आओ।' इसके बाद सान्त्वनापूर्वक पुत्रको पकड़कर आलिंगन करके दुःखसे व्याकुल माताने उसे कृत्रिम दुग्ध दे दिया॥ ८-९॥ |
| पीत्वा च कृत्रिमं क्षीरं मात्रा दत्तं द्विजोत्तमः।<br>नैतत्क्षीरमिति प्राह मातरं चातिविह्वलः॥ १० | तब माताके द्वारा दिये गये उस कृत्रिम दुग्धको पीकर द्विजश्रेष्ठ [उपमन्यु]-ने अति विह्वल होकर मातासे कहा—'यह दूध नहीं है'॥ १०॥ |
| दुःखिता सा तदा प्राह सम्प्रेक्ष्याघ्राय मूर्धनि।<br>सम्मार्ज्य नेत्रे पुत्रस्य कराभ्यां कमलायते॥ ११ | तब दुःखसे भरी हुई उस माताने बालककी ओर देखकर उसका मस्तक सूँघकर अपने हाथोंसे पुत्रके कमलसदृश विशाल नेत्रोंको पोंछकर कहा— |
| तटिनी रत्नपूर्णास्ते स्वर्गपातालगोचराः।<br>भाग्यहीना न पश्यन्ति भक्तिहीनाश्च ये शिवे॥ १२ | '[हे पुत्र!] जो शिवके प्रति भक्तिरहित हैं, वे भाग्यहीन लोग रत्नोंसे परिपूर्ण तथा स्वर्ग-पातालमें गोचर होनेवाली नदियोंको नहीं देख पाते हैं। |
| राज्यं स्वर्गं च मोक्षं च भोजनं क्षीरसम्भवम्।<br>न लभन्ते प्रियाण्येषां नो तुष्यति सदा भवः॥ १३ | शिवजी जिनके ऊपर सदा प्रसन्न नहीं रहते हैं, वे लोग राज्य, स्वर्ग, मोक्ष और दुग्धसे बने हुए भोजन तथा अन्य प्रिय वस्तुओंको नहीं प्राप्त कर सकते |
| ५६० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भवप्रसादजं सर्वं नान्यदेवप्रसादजम्।<br>अन्यदेवेषु निरता दुःखार्ता विभ्रमन्ति च॥ १४<br><br>क्षीरं तत्र कुतोऽस्माकं महादेवो न पूजितः।<br>पूर्वजन्मनि यद्दत्तं शिवमुद्दिश्य वै सुत॥ १५<br><br>तदेव लभ्यं नान्यत्तु विष्णुमुद्दिश्य वा प्रभुम्।<br>निशम्य वचनं मातुरुपमन्युर्महाद्युतिः॥ १६<br><br>बालोऽपि मातरं प्राह प्रणिपत्य तपस्विनीम्।<br>त्यज शोकं महाभागे महादेवोऽस्ति चेत्क्वचित्॥ १७<br><br>चिराद्वा ह्यचिराद्वापि क्षीरोदं साधयाम्यहम्। | हैं। शिवकी कृपासे ही सबकुछ प्राप्त होता है, अन्य देवताओंकी कृपासे नहीं; अन्य देवताओंमें परायण रहनेवाले दुःखसे व्यथित होकर [संसारचक्रमें] भ्रमण करते रहते हैं। हमलोगोंको दूध कैसे मिल सकता है; क्योंकि हमलोगोंने महादेवकी पूजा नहीं की है। हे पुत्र! शिवको उद्देश्य करके पूर्वजन्ममें जो कुछ समर्पित किया जाता है, वही प्राप्त होता है; विष्णु अथवा अन्य देवताको उद्देश्य करके देनेपर कुछ नहीं प्राप्त होता है'॥ ११-१५½॥<br><br>तब माताका वचन सुनकर महातेजस्वी बालक उपमन्यु भी तपस्विनी माताको प्रणाम करके बोला—'हे महाभागे! शोकका त्याग करो; महादेवजी चाहे कहीं भी हों, मैं शीघ्र अथवा विलम्बसे क्षीरसमुद्रको प्राप्त कर लूँगा'॥ १६-१७½॥ |
| सूत उवाच<br>तां प्रणम्यैवमुक्त्वा स तपः कर्तुं प्रचक्रमे॥ १८<br><br>तमाह माता सुशुभं कुर्विति सुतरां सुतम्।<br>अनुज्ञातस्तया तत्र तपस्तेपे सुदुस्तरम्॥ १९ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] उसे प्रणामकर वे [उपमन्यु] तप करनेके लिये प्रवृत्त हुए। तब माताने पुत्रसे कहा—'पूर्णरूपसे अत्यन्त शुभ तपस्या करो।' |
| हिमवत्पर्वतं प्राप्य वायुभक्षः समाहितः।<br>तपसा तस्य विप्रस्य विधूपितमभूज्जगत्॥ २० | उससे आज्ञा प्राप्त करके हिमवान् पर्वतपर जाकर वायुका आहार करते हुए एकाग्रचित्त होकर वे अति कठोर तप करने लगे॥ १८-१९½॥ |
| प्रणम्याहुस्तु तत्सर्वं हरये देवसत्तमाः।<br>श्रुत्वा तेषां तदा वाक्यं भगवान् पुरुषोत्तमः॥ २१<br><br>किमिदं त्विति सञ्चिन्त्य ज्ञात्वा तत्कारणं च सः।<br>जगाम मन्दरं तूर्णं महेश्वरदिदृक्षया॥ २२ | उस विप्रकी तपस्यासे [सम्पूर्ण] जगत् तप्त हो उठा। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंने विष्णुको प्रणाम करके वह बात बतायी। इसके बाद उनका वचन सुनकर वे भगवान् पुरुषोत्तम 'यह क्या है'—ऐसा सोचकर पुनः उसका कारण जानकर महेश्वरके दर्शनकी इच्छासे शीघ्रतापूर्वक मन्दर पर्वतपर गये॥ २०-२२॥ |
| दृष्ट्वा देवं प्रणम्यैवं प्रोवाचेदं कृताञ्जलिः।<br>भगवन् ब्राह्मणः कश्चिदुपमन्युरिति श्रुतः॥ २३<br><br>क्षीरार्थमदहत्सर्वं तपसा तं निवारय। | शिवको देखकर उन्हें प्रणाम करके विष्णुने हाथ जोड़कर यह कहा—'हे भगवन्! उपमन्यु नामसे प्रसिद्ध किसी ब्राह्मणने दुग्धके लिये [अपनी] तपस्यासे सबको जला डाला; आप उसे रोकिये'॥ २३½॥ |
| एतस्मिन्नन्तरे देवः पिनाकी परमेश्वरः।<br>शक्ररूपं समास्थाय गन्तुं चक्रे मतिं तदा॥ २४<br><br>अथ जगाम मुनेस्तु तपोवनं<br>गजवरेण सितेन सदाशिवः।<br>सह सुरासुरसिद्धमहोरगै-<br>रमरराजतनुं स्वयमास्थितः॥ २५ | इसके अनन्तर पिनाकधारी देव परमेश्वरने इन्द्रका रूप धारणकर वहाँ जानेका विचार किया। तत्पश्चात् वे सदाशिव देवराज [इन्द्र]-का रूप धारणकर श्वेत गजराजपर आरूढ़ होकर सुरों, असुरों, सिद्धों तथा महान् नागोंके साथ मुनिके तपोवनमें गये॥ २४-२५॥ |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सहैव चारुह्य तदा द्विपं तं<br>प्रगृह्य बालव्यजनं विवस्वान्।<br>वामेन शच्या सहितं सुरेन्द्रं<br>करेण चान्येन सितातपत्रम्॥ २६ | उनके साथ ही उस हाथीपर चढ़कर सूर्यदेव [अपने] बाएँ हाथमें बालव्यजन तथा दाएँ हाथमें श्वेत छत्र लेकर शचीसहित सुरेन्द्रकी सेवा कर रहे थे॥ २६॥ |
| रराज भगवान् सोमः शक्ररूपी सदाशिवः।<br>सितातपत्रेण यथा चन्द्रबिम्बेन मन्दरः॥ २७ | उस समय उमासहित शक्ररूपी भगवान् सदाशिव श्वेत छत्रसे उसी तरह सुशोभित हो रहे थे, जैसे चन्द्रबिम्बसे मन्दर [पर्वत] सुशोभित होता है॥ २७॥ |
| आस्थायैवं हि शक्रस्य स्वरूपं परमेश्वरः।<br>जगामानुग्रहं कर्तुमुपमन्योस्तदाश्रमम्॥ २८ | इस प्रकार इन्द्रका स्वरूप धारण करके परमेश्वर [उस] उपमन्युपर अनुग्रह करनेके लिये उसके आश्रममें गये॥ २८॥ |
| तं दृष्ट्वा परमेशानं शक्ररूपधरं शिवम्।<br>प्रणम्य शिरसा प्राह मुनिर्मुनिवराः स्वयम्॥ २९<br><br>पावितश्चाश्रमश्चायं मम देवेश्वरः स्वयम्।<br>प्राप्तः शक्रो जगन्नाथो भगवान् भानुना प्रभुः॥ ३० | हे मुनिवरो! इन्द्ररूपधारी उन परमेशान शिवको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम करके मुनि [उपमन्यु]-ने स्वयं कहा—'मेरा यह आश्रम पवित्र हो गया; क्योंकि देवताओंके स्वामी, जगत्पति, भगवान् प्रभु इन्द्र सूर्यके साथ [यहाँ] स्वयं आये हुए हैं'॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्त्वा स्थितं वीक्ष्य कृताञ्जलिपुटं द्विजम्।<br>प्राह गम्भीरया वाचा शक्ररूपधरो हरः॥ ३१<br><br>तुष्टोऽस्मि ते वरं ब्रूहि तपसानेन सुव्रत।<br>ददामि चेप्सितान् सर्वान् धौम्याग्रज महामते॥ ३२ | ऐसा कहकर हाथ जोड़कर खड़े हुए द्विजको देखकर इन्द्ररूपधारी शिव गम्भीर वाणीमें बोले—'हे सुव्रत! मैं तुम्हारे इस तपसे प्रसन्न हो गया हूँ; वर माँगो। हे [ऋषि] धौम्यके अग्रज! हे महामते! मैं [तुम्हें] समस्त अभीष्ट प्रदान करता हूँ'॥ ३१-३२॥ |
| एवमुक्तस्तदा तेन शक्रेण मुनिसत्तमः।<br>वरयामि शिवे भक्तिमित्युवाच कृताञ्जलिः॥ ३३ | तब शक्ररूपी शिवके द्वारा ऐसा कहे जानेपर मुनिश्रेष्ठने हाथ जोड़कर कहा—'मैं शिवमें भक्तिका वर माँगता हूँ'॥ ३३॥ |
| ५६२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| ततो निशम्य वचनं मुनेः कुपितवत्प्रभुः।<br>प्राह सव्यग्रमीशानः शक्ररूपधरः स्वयम्॥ ३४<br>मां न जानासि देवर्षे देवराजानमीश्वरम्।<br>त्रैलोक्याधिपतिं शक्रं सर्वदेवनमस्कृतम्॥ ३५<br>मद्भक्तो भव विप्रर्षे मामेवार्चय सर्वदा।<br>ददामि सर्वं भद्रं ते त्यज रुद्रं च निर्गुणम्॥ ३६ | तब मुनिका वचन सुनकर इन्द्रका रूप धरण करनेवाले प्रभु ईशान कुपितकी भाँति व्यग्रतापूर्वक बोले—'हे देवर्षे! तीनों लोकोंके अधिपति तथा सभी देवताओंसे नमस्कार किये जानेवाले मुझ ईश्वर देवराज इन्द्रको क्या तुम नहीं जानते हो? हे विप्रर्षे! तुम मेरे भक्त हो जाओ और सर्वदा मेरी ही पूजा करो, मैं तुम्हें सब कुछ प्रदान करता हूँ, तुम्हारा कल्याण हो; तुम निर्गुण शिवका त्याग कर दो'॥ ३४-३६॥ | | ततः शक्रस्य वचनं श्रुत्वा श्रोत्रविदारणम्।<br>उपमन्युरिदं प्राह जपन् पञ्चाक्षरं शुभम्॥ ३७<br>मन्ये शक्रस्य रूपेण नूनमत्रागतः स्वयम्।<br>कर्तुं दैत्याधमः कश्चिद्धर्मविघ्नं च नान्यथा॥ ३८<br>त्वयैव कथितं सर्वं भवनिन्दारतेन वै।<br>प्रसङ्गाद्देवदेवस्य निर्गुणत्वं महात्मनः॥ ३९<br>बहुनात्र किमुक्तेन मयाद्यानुमितं महत्।<br>भवान्तरकृतं पापं श्रुता निन्दा भवस्य तु॥ ४०<br>श्रुत्वा निन्दां भवस्याथ तत्क्षणादेव सन्त्यजेत्।<br>स्वदेहं तं निहत्याशु शिवलोकं स गच्छति॥ ४१<br>यो वाचोत्पाटयेज्जिह्वां शिवनिन्दारतस्य तु।<br>त्रिः सप्तकुलमुद्धृत्य शिवलोकं स गच्छति॥ ४२<br>आस्तां तावन्ममेच्छा या क्षीरं प्रति सुराधमम्।<br>निहत्य त्वां शिवास्त्रेण त्यजाम्येतत्कलेवरम्॥ ४३<br>पुरा मात्रा तु कथितं तथ्यमेव न संशयः।<br>पूर्वजन्मनि चास्माभिरपूजित इति प्रभुः॥ ४४ | तब इन्द्रका कर्णविदारक वचन सुनकर उपमन्युने पवित्र पंचाक्षरमन्त्रका जप करते हुए यह कहा—'अब मैं समझता हूँ कि निश्चय ही कोई अधम दैत्य स्वयं इन्द्रके स्वरूपमें मेरे धर्ममें विघ्न डालनेके लिये यहाँ आया है; इसमें सन्देह नहीं है। शिवनिन्दापरायण आपने ही प्रसंगवश महात्मा देवदेव [शिव]-की निर्गुणता भी बतायी है। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मैंने आज अनुमान किया है कि पूर्वजन्ममें किया हुआ मेरा कोई महापाप अवश्य है, जिसके कारण मैंने शिवकी निन्दा सुनी है। जो शिवकी निन्दा सुनकर उसी क्षण उस [शिवनिन्दक]-को मारकर अपने शरीरको त्याग देता है, वह शिवलोकको जाता है। जो [व्यक्ति] वाणीसे शिवनिन्दा करनेवालेकी जीभ उखाड़ लेता है, वह [अपनी] इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार करके शिवलोकको जाता है। दूधके लिये मेरी जो इच्छा है, वह अब दूर रहे; शिवके अस्त्रसे तुझ सुराधमका वध करके मैं [अपने] इस शरीरका भी त्याग कर दूँगा। माताने पहले जो कहा था, वह सत्य है; इसमें सन्देह नहीं है। हमलोगोंने पूर्वजन्ममें शिवकी पूजा नहीं की थी'॥ ३७-४४॥ | | एवमुक्त्वा तु तं देवमुपमन्युरभीतवत्।<br>शक्रं चक्रे मतिं हन्तुमथर्वास्त्रेण मन्त्रवित्॥ ४५<br>भस्माधारान्महातेजा भस्ममुष्टिं प्रगृह्य च।<br>अथर्वास्त्रं ततस्तस्मै ससर्ज च ननाद च॥ ४६<br>दग्धुं स्वदेहमाग्नेयीं ध्यात्वा वै धारणां तदा।<br>अतिष्ठच्च महातेजाः शुष्केन्धनमिवाव्ययः॥ ४७ | ऐसा कहकर निडरकी भाँति होकर मन्त्रवेत्ता उपमन्युने उन इन्द्रदेवको अथर्वास्त्रसे मार देनेका विचार किया। उस महातेजस्वीने भस्मके आधारसे एक मुट्ठी भस्म लेकर उसके लिये अथर्वास्त्रका सृजन किया और जोरसे ध्वनि की। तब आग्नेयी धारणाका ध्यान करके अपने देहको सूखे ईंधनकी तरह जलानेके लिये वह अव्यय तेजस्वी खड़ा हो गया॥ ४५-४७॥ | | एवं व्यवसिते विप्रे भगवान् भगनेत्रहा।<br>वारयामास सौम्येन धारणां तस्य योगिनः॥ ४८ | उस विप्रके ऐसा निश्चय करनेपर भगके नेत्रको |
अध्याय १०७] शिवभक्त उपमन्युकी कथा तथा उमामहेश्वरद्वारा उसपर अनुग्रह करना ५६३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथर्वास्त्रं तदा तस्य संहृतं चन्द्रिकेण तु।<br>कालाग्निसदृशं चेदं नियोगान्नन्दिनस्तथा॥ ४९ | नष्ट करनेवाले भगवान् शिवने सोमधारणाद्योगसे उस योगी [उपमन्यु]-की [आग्नेयी] धारणाको रोक दिया। तब नन्दीके आदेशसे चन्द्रिक [नामक गण]-ने उसके कालाग्नि-सदृश अथर्वास्त्रका संहरण कर लिया॥ ४८-४९॥ |
| स्वरूपमेव भगवानास्थाय परमेश्वरः।<br>दर्शयामास विप्राय बालेन्दुकृतशेखरम्॥ ५० | इसके बाद भगवान् परमेश्वरने बालचन्द्रमासे शोभित मस्तकवाले [अपने] स्वरूपको धारण करके विप्रको दिखाया॥ ५०॥ |
| क्षीरधारासहस्त्रं च क्षीरोदार्णवमेव च।<br>दध्यादेरर्णवं चैव घृतोदार्णवमेव च॥ ५१<br><br>फलार्णवं च बालस्य भक्ष्यभोज्यार्णवं तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव तथातिष्ठन् समन्ततः॥ ५२ | उस समय बालक [उपमन्यु]-के चारों ओर हजारों दुग्धधाराएँ, क्षीरसागर, मधुका समुद्र, दधिका सागर, घृतका सागर, फलका सागर, [अन्य] भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर तथा अपूपोंके पर्वत उपस्थित हो गये॥ ५१-५२॥ |
| उपमन्युमुवाच सस्मितो<br>भगवान् बन्धुजनैः समावृतम्।<br>गिरिजामवलोक्य सस्मितां सघृणं<br>प्रेक्ष्य तु तं तदा घृणी॥ ५३<br><br>भुङ्क्ष्व भोगान् यथाकामं बान्धवैः पश्य वत्स मे।<br>उपमन्यो महाभाग तवाम्बैषा हि पार्वती॥ ५४<br><br>मया पुत्रीकृतोऽस्यद्य दत्तः क्षीरोदधिस्तथा।<br>मधुनश्चार्णवश्चैव दध्नश्चार्णव एव च॥ ५५<br><br>आज्योदनार्णवश्चैव फललेह्यार्णवस्तथा।<br>अपूपगिरयश्चैव भक्ष्यभोज्यार्णवः पुनः॥ ५६<br><br>पिता तव महादेवः पिता वै जगतां मुने।<br>माता तव महाभागा जगन्माता न संशयः॥ ५७<br><br>अमरत्वं मया दत्तं गाणपत्यं च शाश्वतम्।<br>वरान् वरय दास्यामि नात्र कार्या विचारणा॥ ५८ | तदनन्तर दयालु भगवान् [शिव]-ने मुसकानयुक्त गिरिजाको देखकर तथा बन्धुजनोंसे घिरे हुए उपमन्युकी ओर दयापूर्वक देखकर मुसकराकर उससे कहा—'हे मेरे पुत्र! तुम अपने बान्धवोंके साथ इच्छानुसार भोगोंका उपभोग करो। हे उपमन्यो! हे महाभाग! देखो, ये पार्वती तुम्हारी माता हैं। मैंने आज तुम्हें अपना पुत्र बना लिया है और तुम्हें क्षीरसागर, मधुसागर, दधिसागर, घृत तथा ओदनका सागर, फलोंका सागर, लेह्य पदार्थोंका सागर, अपूपोंके पर्वत तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थोंका सागर प्रदान किया है। हे मुने! सभी लोकोंके पिता महादेव तुम्हारे पिता हैं और जगज्जननी महाभागा पार्वती तुम्हारी माता हैं; इसमें सन्देह नहीं है। मैंने तुम्हें अमरत्व तथा शाश्वत गाणपत्य प्रदान कर दिया, अब तुम अन्य वरोंको भी माँग लो, मैं तुम्हें दूँगा; इसमें तुम्हें सन्देह नहीं करना चाहिये'॥ ५३-५८॥ |
| एवमुक्त्वा महादेवः कराभ्यामुपगृह्य तम्।<br>आघ्राय मूर्धनि विभुर्ददौ देव्यास्तदा भवः॥ ५९ | ऐसा कहकर महादेव विभु शिवने उसे दोनों हाथोंसे उठाकर उसका सिर सूँघकर पुनः उसे देवी [पार्वती]-को दे दिया॥ ५९॥ |
| देवी तनयमालोक्य ददौ तस्मै गिरीन्द्रजा।<br>योगैश्वर्यं तदा तुष्टा ब्रह्मविद्यां द्विजोत्तमाः॥ ६० | हे श्रेष्ठ द्विजो! तब [अपने] पुत्रको देखकर गिरिराजपुत्री देवी [पार्वती]-ने प्रसन्न होकर उसे योगैश्वर्य तथा ब्रह्मविद्या प्रदान की॥ ६०॥ |
| सोऽपि लब्ध्वा वरं तस्याः कुमारत्वं च सर्वदा।<br>तुष्टाव च महादेवं हर्षगद्गदया गिरा॥ ६१ | उसने भी उन पार्वतीसे वर तथा शाश्वत कुमारत्व प्राप्त करके हर्षके कारण गद्गद वाणीसे महादेवकी |
१०८- भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ५६४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| वरयामास च तदा वरेण्यं विरजेक्षणम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रणिपत्य पुनः पुनः॥ ६२<br><br>प्रसीद देवदेवेश त्वयि चाव्यभिचारिणी।<br>श्रद्धा चैव महादेव सान्निध्यं चैव सर्वदा॥ ६३ | स्तुति की और इसके बाद हाथ जोड़कर विरजेक्षण (सात्त्विकजनोंपर दृष्टि डालनेवाले) वरेण्य शिवको बार-बार प्रणाम करके वर माँगा—'हे देवदेवेश! प्रसन्न होइए। हे महादेव! आपमें मेरी अव्यभिचारिणी श्रद्धा रहे तथा सर्वदा आपका सान्निध्य प्राप्त हो'॥ ६१–६३॥ | | एवमुक्तस्तदा तेन प्रहसन्निव शङ्करः।<br>दत्त्वेप्सितं हि विप्राय तत्रैवान्तरधीयत॥ ६४। | तब उसके ऐसा कहनेपर शंकरजी हँसते हुए उस विप्रको वांछित वर प्रदान करके वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ ६४॥ |
इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उपमन्युचरितं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः॥ १०७॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उपमन्युचरित' नामक एक सौ सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०७॥
एक सौ आठवाँ अध्याय
भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना और उनसे पाशुपतज्ञान प्राप्त करना तथा पाशुपतव्रतका माहात्म्य
| ऋषय ऊचुः | **ऋषिगण बोले—**अक्लिष्ट कर्मवाले वासुदेव श्रीकृष्णने धौम्यके ज्येष्ठ भ्राता [उपमन्यु]-का दर्शन किया था और उनसे दिव्य पाशुपतव्रत ग्रहण किया था। हे सूतजी! बुद्धिमान् श्रीकृष्णने उनसे यह ज्ञान कैसे प्राप्त किया; उस पापनाशिनी कथाको बतानेकी कृपा |
|---|---|
| दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>धौम्याग्रजस्ततो लब्धं दिव्यं पाशुपतं व्रतम्॥ १<br>कथं लब्धं तदा ज्ञानं तस्मात्कृष्णेन धीमता।<br>वक्तुमर्हसि तां सूत कथां पातकनाशिनीम्॥ २ |
अध्याय १०८] भगवान् श्रीकृष्णका गुरु उपमन्युके आश्रममें जाना... पाशुपतव्रतका माहात्म्य ५६५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कीजिये ॥ १-२ ॥ | |
| सूत उवाच<br>स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः ।<br>निन्दन्नेव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः ॥ ३ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] सनातन वासुदेव अपनी इच्छासे अवतीर्ण हुए थे, फिर भी उन्होंने मानवरूपकी निन्दा करते हुए देहशुद्धि की थी ॥ ३ ॥ |
| पुत्रार्थं भगवांस्तत्र तपस्तप्तुं जगाम च ।<br>आश्रमं चोपमन्योर्वै दृष्टवांस्तत्र तं मुनिम् ॥ ४<br><br>नमश्चकार तं दृष्ट्वा धौम्याग्रजमहो द्विजाः ।<br>बहुमानेन वै कृष्णस्त्रिः कृत्वा वै प्रदक्षिणम् ॥ ५ | भगवान् [श्रीकृष्ण] पुत्रप्राप्तिहेतु तप करनेके लिये उपमन्युके आश्रममें गये और उन्होंने वहाँ उन मुनिका दर्शन किया। हे द्विजो! उन धौम्याग्रजको देखकर अत्यन्त सम्मानके साथ उनकी तीन बार प्रदक्षिणा करके श्रीकृष्णने उन्हें नमस्कार किया ॥ ४-५ ॥ |
| तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः ।<br>नष्टमेव मलं सर्वं कायजं कर्मजं तथा ॥ ६ | उन मुनिके अवलोकनमात्रसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णका सम्पूर्ण देहजनित तथा कर्मजनित मल नष्ट हो गया ॥ ६ ॥ |
| भस्मनोद्धूलनं कृत्वा उपमन्युर्महाद्युतिः ।<br>तमग्निरिति विप्रेन्द्रा वायुरित्यादिभिः क्रमात् ॥ ७<br><br>दिव्यं पाशुपतं ज्ञानं प्रददौ प्रीतमानसः । | हे विप्रेन्द्रो! महातेजस्वी उपमन्युने भस्मोद्धूलन करके प्रसन्नचित्त होकर क्रमसे अग्नि, वायु आदि मन्त्रोंके द्वारा उन्हें दिव्य पाशुपत ज्ञान प्रदान किया ॥ ७१/२ ॥ |
| मुनेः प्रसादान्मान्योऽसौ कृष्णः पाशुपते द्विजाः ॥ ८<br><br>तपसा त्वेकवर्षान्ते दृष्ट्वा देवं महेश्वरम् ।<br>साम्बं सगणमव्यग्रं लब्धवान् पुत्रमात्मनः ॥ ९<br><br>तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयः संशितव्रताः ।<br>दिव्याः पाशुपताः सर्वे तस्थुः संवृत्य सर्वदा ॥ १० | हे द्विजो! मुनिकी कृपासे वे श्रीकृष्ण पाशुपतव्रतमें मान्य हो गये। [अपनी] तपस्यासे एक वर्षके अन्तमें पार्वती तथा गणोंसहित अव्यग्र देव महेश्वरका दर्शन करके उन्होंने अपना पुत्र प्राप्त किया। उसी समयसे प्रशस्त व्रतवाले दिव्य मुनिगण तथा पशुपतिके सभी भक्त सदा उन कृष्णको घेरकर स्थित रहने लगे ॥ ८-१० ॥ |
५६६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| अन्यं च कथयिष्यामि मुक्त्यर्थं प्राणिनां सदा।<br>सौवर्णीं मेखलां कृत्वा आधारं दण्डधारणम्॥ ११<br><br>सौवर्णं पिण्डिकं चापि व्यजनं दण्डमेव च।<br>नरैः स्त्रियाथ वा कार्यं मषीभाजनलेखनीम्॥ १२<br><br>क्षुराकर्त्तरिका चापि अथ पात्रमथापि वा।<br>पाशुपताय दातव्यं भस्मोद्धूलितविग्रहैः॥ १३<br><br>सौवर्णं रजतं वापि ताम्रं वाथ निवेदयेत्।<br>आत्मवित्तानुसारेण योगिनं पूजयेद् बुधः॥ १४ | [हे ऋषियो!] सदा सभी प्राणियोंकी मुक्तिके लिये मैं अन्य व्रतको भी बताऊँगा। सुवर्णमयी मेखला (परिनालिका) बनाकर उसके आधार, दण्डधारण (जलनिवारक बाहरी भाग), पिण्डक (लिङ्ग), व्यजन, दीक्षादण्ड—यह सब सोनेका बनाना चाहिये; साथ ही मषीपात्रयुक्त लेखनी, छुरी सहित कैंची तथा जलपात्र भी स्वर्णमय बनाकर इन सभी सामग्रियोंको भस्मसे उद्धूलित शरीरवाले पुरुषोंके द्वारा या स्त्रीके द्वारा किसी पशुपति-भक्तको दे दिया जाना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि अपने धन-सामर्थ्यके अनुसार सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी ही सामग्री समर्पित करे और उस योगीकी पूजा करे॥ ११-१४॥ | | ते सर्वे पापनिर्मुक्ताः समस्तकुलसंयुताः।<br>यान्ति रुद्रपदं दिव्यं नात्र कार्या विचारणा॥ १५<br><br>तस्मादनेन दानेन गृहस्थो मुच्यते भवात्।<br>योगिनां सम्प्रदानेन शिवः क्षिप्रं प्रसीदति॥ १६<br><br>राज्यं पुत्रं धनं भव्यमश्वं यानमथापि वा।<br>सर्वस्वं वापि दातव्यं यदीच्छेन्मोक्षमुत्तमम्॥ १७<br><br>अध्रुवेण शरीरेण ध्रुवं साध्यं प्रयत्नतः।<br>भव्यं पाशुपतं नित्यं संसारार्णवतारकम्॥ १८ | [ऐसा दान करनेवाले] वे सभीलोग सम्पूर्ण कुलसहित पापमुक्त होकर दिव्य रुद्रपदको जाते हैं; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। अतः गृहस्थ इस दानके द्वारा संसार [चक्र]-से छूट जाता है। योगियोंके लिये यह दान करनेसे शिव शीघ्र ही प्रसन्न होते हैं। यदि कोई उत्तम मोक्ष चाहता हो, तो उसे भव्य राज्य, पुत्र, धन, अश्व, यान—यहाँतक कि सर्वस्वका दान कर देना चाहिये। [इस] अनित्य शरीरसे भव्य, नित्य (शाश्वत) तथा संसार-सागरसे पार करनेवाले पाशुपतव्रतको प्रयत्नपूर्वक अवश्य सिद्ध करना चाहिये॥ १५-१८॥ | | एतद्वः कथितं सर्वं सङ्क्षेपान्न च संशयः।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि विष्णुलोकं स गच्छति॥ १९ | [हे ऋषियो!] मैंने संक्षेपमें आपलोगोंको यह सब बता दिया। जो इसे पढ़ता है अथवा सुनता है, वह विष्णुलोकको जाता है; इसमें संशय नहीं है॥ १९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः॥ १०८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पाशुपतव्रतमाहात्म्यवर्णन' नामक एक सौ आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ १०८ ॥
॥ समाप्तश्चायं पूर्वभागः॥
॥ श्रीलिङ्गमहापुराणका पूर्वभाग पूर्ण हुआ॥
१- भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीलिङ्गमहापुराण
[ उत्तरभाग ]
पहला अध्याय
भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा
| ऋषय ऊचुः <br> कृष्णास्तुष्यति केनेह सर्वदेवेश्वरेश्वरः। <br> वक्तुमर्हसि चास्माकं सूत सर्वार्थविद्वरान्॥ १ | **ऋषि बोले—**हे सूतजी! समस्त देवताओं और ईश्वरोंके ईश्वर भगवान् कृष्ण इस लोकमें किससे सन्तुष्ट होते हैं? आप हम लोगोंको बतायें; आप सम्पूर्ण तत्त्वोंके ज्ञाता हैं॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच <br> पुरा पृष्टो महातेजा मार्कण्डेयो महामुनिः। <br> अम्बरीषेण विप्रेन्द्रास्तद्वदामि यथातथम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे विप्रवरो! पूर्वकालमें अम्बरीषने भी महातेजस्वी महामुनि मार्कण्डेयसे [इस विषयमें] पूछा था; मैं उसे यथार्थरूपसे बता रहा हूँ॥ २॥ |
| अम्बरीष उवाच <br> मुने समस्तधर्माणां पारगस्त्वं महामते। <br> मार्कण्डेय पुराणोऽसि पुराणार्थविशारदः॥ ३ | **अम्बरीष बोले—**हे मुने! हे महामते! हे मार्कण्डेयजी! आप समस्त धर्मोंके पूर्ण ज्ञाता, अत्यन्त पुरातन तथा पुराणतत्त्वोंके विद्वान् हैं॥ ३॥ |
| नारायणानां दिव्यानां धर्माणां श्रेष्ठमुत्तमम्। <br> तत्किं ब्रूहि महाप्राज्ञ भक्तानामिह सुव्रत॥ ४ | हे महाप्राज्ञ! नारायणके द्वारा निर्मित दिव्य धर्मोंमें कौन-सा धर्म श्रेष्ठ तथा उत्तम है? हे सुव्रत! उसे आप यहाँपर भक्तोंके कल्याणार्थ बतायें॥ ४॥ |
| सूत उवाच <br> तस्य तद्वचनं श्रुत्वा समुत्थाय कृताञ्जलिः। <br> स्मरन्नारायणं देवं कृष्णमच्युतमव्ययम्॥ ५ | **सूतजी बोले—**उनका यह वचन सुनकर [मार्कण्डेयजी] उठ करके दोनों हाथ जोड़कर अविनाशी तथा अच्युत भगवान् नारायण कृष्णका स्मरण करते हुए कहने लगे॥ ५॥ |
| ५६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मार्कण्डेय उवाच<br>शृणु भूप यथान्यायं पुण्यं नारायणात्मकम्।<br>स्मरणं पूजनं चैव प्रणामो भक्तिपूर्वकम्॥ ६<br><br>प्रत्येकमश्वमेधस्य यज्ञस्य सममुच्यते।<br>य एकः पुरुषः श्रेष्ठः परमात्मा जनार्दनः॥ ७<br><br>यस्माद् ब्रह्मा ततः सर्वं समाश्रित्यैवमुच्यते।<br>धर्ममेकं प्रवक्ष्यामि यद्दृष्टं विदितं मया॥ ८ | मार्कण्डेयजी बोले— हे राजन्! सम्यक् प्रकारसे सुनिये; भक्तिपूर्वक [अनुष्ठित किये गये] भगवान् नारायणके स्मरण, पूजन और प्रणाम—इनमेंसे प्रत्येकको अश्वमेधयज्ञके समान फल प्रदान करनेवाला कहा जाता है; क्योंकि एकमात्र वे प्रभु जनार्दन ही परम पुरुष परमात्मा हैं, जिनसे आश्रय लेकर ब्रह्माजी जगत्के स्रष्टा कहे जाते हैं। मैंने जो देखा है तथा जाना है, उसी एकमात्र धर्मका वर्णन करूँगा॥ ६–८॥ | | पुरा त्रेतायुगे कश्चित् कौशिको नाम वै द्विजः।<br>वासुदेवपरो नित्यं सामगानरतः सदा॥ ९ | प्राचीनकालमें त्रेतायुगमें एक कौशिक नामवाले ब्राह्मण थे; वे नित्य-निरन्तर वासुदेवपरायण रहते हुए सामगानमें तल्लीन रहते थे॥ ९॥ | | भोजनासनशय्यासु सदा तद्गतमानसः।<br>उदारचरितं विष्णोर्गायमानः पुनः पुनः॥ १० | भगवान् विष्णुके उदार चरित्रका बार-बार गान करते हुए वे भोजन करने, बैठने तथा शयनमें सदा उन्हींमें अपना चित्त लगाये रहते थे॥ १०॥ | | विष्णोः स्थलं समासाद्य हरेः क्षेत्रमनुत्तमम्।<br>अगायत हरिं तत्र तालवर्णलयान्वितम्॥ ११<br><br>मूर्च्छनास्वरयोगेन श्रुतिभेदेन भेदितम्।<br>भक्तियोगं समापन्नो भिक्षामात्रं हि तत्र वै॥ १२ | परम पवित्रक्षेत्रस्थ भगवान् विष्णुके मन्दिरमें आकर वे ताल, स्वर और लयसे युक्त, मूर्च्छना और स्वरयोग, बृहद्रथन्तर आदि श्रुतिभेदसे अन्वित भगवान् श्रीहरिका गान करते थे। इस प्रकार भक्तियोगमें सदा स्थित रहकर वे वहींपर भिक्षामात्र ग्रहण करते हुए रहते थे॥ ११-१२॥ | | तत्रैनं गायमानं च दृष्ट्वा कश्चिद्द्विजस्तदा।<br>पद्माख्य इति विख्यातस्तस्मै चान्नं ददौ तदा॥ १३<br><br>सकुटुम्बो महातेजा ह्युष्णान्नं हि तत्र वै।<br>कौशिको हि तदा हृष्टो गायन्नास्ते हरिं प्रभुम्॥ १४ | उस समय उन्हें वहाँ गाते हुए देखकर 'पद्माख्य' (पद्माक्ष)—इस नामसे विख्यात किसी द्विजने उन्हें अन्न प्रदान किया। तब महातेजस्वी कौशिक अपने कुटुम्बसहित उष्ण अन्नको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक प्रभु श्रीहरिका गुणगान करते हुए वहींपर स्थित हो गये॥ १३-१४॥ | | शृण्वन्नास्ते स पद्माख्यः काले काले विनिर्गतः।<br>कालयोगेन सम्प्राप्ताः शिष्या वै कौशिकस्य च॥ १५<br><br>सप्त राजन्यवैश्यानां विप्राणां कुलसम्भवाः।<br>ज्ञानविद्याधिकाः शुद्धा वासुदेवपरायणाः॥ १६ | वह पद्माख्य भी सदा उसे सुनता रहता था और समय-समयपर वहाँसे चला भी जाता था। किसी समय कालयोगसे द्विज कौशिकके सात शिष्य वहाँ आये। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यकुलमें उत्पन्न; ज्ञान और विद्यासे परिपूर्ण; विशुद्ध मनवाले तथा भगवान् वासुदेवके अनन्य भक्त थे॥ १५-१६॥ | | तेषामपि तथानाद्यं पद्माक्षः प्रददौ स्वयम्।<br>शिष्यैश्च सहितो नित्यं कौशिको हृष्टमानसः॥ १७ | स्वयं पद्माक्षने उन्हें भी अन्नादिसहित उपयोगी पदार्थ प्रदान किये। वे कौशिक प्रसन्नचित्त होकर अपने शिष्योंके साथ वहींपर विष्णुमन्दिरमें प्रभु श्रीहरिका सम्यक् रूपसे सदा गुणगान करते रहते थे॥ १७½॥ |
अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [ ५६९
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| विष्णुस्थले हरिं तत्र आस्ते गायन् यथाविधि।<br>तत्रैव मालवो नाम वैश्यो विष्णुपरायणः॥ १८<br>दीपमालां हरेर्नित्यं करोति प्रीतिमानसः।<br>मालवी नाम भार्या च तस्य नित्यं पतिव्रता॥ १९<br>गोमयेन समालिप्य हरेः क्षेत्रं समन्ततः।<br>भर्त्रा सहास्ते सुप्रीता शृण्वती गानमुत्तमम्॥ २० | वहींपर मालव नामक विष्णुपरायण वैश्य प्रसन्नचित्त होकर प्रतिदिन भगवान् श्रीहरिके लिये दीपमाला अर्पित किया करता था। उस वैश्यकी मालवी नामवाली पतिव्रता भार्या भी श्रीहरिके उस सम्पूर्ण स्थानको सम्यक् प्रकारसे गोमयसे नित्य लीपकर अत्यन्त प्रसन्न होकर उत्तम गानका श्रवण करती हुई अपने पतिके साथ वहाँ रहती थी॥ १८–२०॥ |
| कुशस्थलात्समापन्ना ब्राह्मणाः शंसितव्रताः।<br>पञ्चाशद्वै समापन्ना हरेर्गानार्थमुत्तमाः॥ २१<br>साधयन्तो हि कार्याणि कौशिकस्य महात्मनः।<br>गानविद्यार्थतत्त्वज्ञाः शृण्वन्तो ह्यवसंस्तु ते॥ २२ | उसी समय प्रशस्त व्रतवाले पचास श्रेष्ठ ब्राह्मण श्रीहरिका गान सुननेके निमित्त कुशस्थलसे वहाँपर आ गये। गान-विद्याके मूल रहस्यको जाननेवाले वे ब्राह्मण महात्मा कौशिकके कार्योंको सम्पन्न करते हुए और [श्रीहरिका गुणगान] सुनते हुए वहीं रहने लगे॥ २१-२२॥ |
| ख्यातमासीत्तदा तस्य गानं वै कौशिकस्य तत्।<br>श्रुत्वा राजा समभ्येत्य कालिङ्गो वाक्यमब्रवीत्॥ २३<br>कौशिकाद्य गणैः सार्धं गायस्वेह च मां पुनः।<br>शृणुध्वं च तथा यूयं कुशस्थलजना अपि॥ २४ | उस समय उन कौशिकका गान प्रसिद्ध हो गया था, अतः उस प्रसिद्धिको सुनकर राजा कलिङ्गने वहाँ आकर यह वचन कहा—हे कौशिक! आज आप अपने गणोंके साथ मेरे लिये गान कीजिये, जिसे आप सभी लोग तथा कुशस्थलके नागरिक भी सुनें॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा कौशिकः प्राह राजानं सान्त्वया गिरा।<br>न जिह्वा मे महाराजन् वाणी च मम सर्वदा॥ २५<br>हरेरन्यमपीन्द्रं वा स्तौति नैव च वक्ष्यति।<br>एवमुक्ते तु तच्छिष्यो वासिष्ठो गौतमो हरिः॥ २६ | उसे सुनकर कौशिकने सान्त्वनाभरी वाणीमें राजासे कहा—हे महाराज! मेरी जिह्वा तथा वाणी भगवान् श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी यहाँतक कि इन्द्रकी भी स्तुति नहीं करती; अतः यह जिह्वा नहीं बोलेगी॥ २५ १/२ ॥ |
| सारस्वतस्तथा चित्रश्चित्रमाल्यस्तथा शिशुः।<br>ऊचुस्ते पार्थिवं तद्वद्यथा प्राह च कौशिकः॥ २७<br>श्रावकास्ते तथा प्रोचुः पार्थिवं विष्णुतत्पराः।<br>श्रोत्राणीमानि शृण्वन्ति हरेरन्यं न पार्थिव॥ २८<br>गानकीर्तिं वयं तस्य शृणुमोऽन्यां न च स्तुतिम्।<br>तच्छ्रुत्वा पार्थिवो रुष्टो गायतामिति चाब्रवीत्॥ २९ | उनके ऐसा कहनेपर उनके वासिष्ठ, गौतम, हरि, सारस्वत, चित्र, चित्रमाल्य, शिशु आदि जो शिष्यगण थे; उन्होंने भी राजासे वैसा ही कहा, जैसा कौशिकने कहा था। विष्णुपरायण उन श्रोताओंने भी कहा—हे पार्थिव! [हम लोगोंके] ये कान श्रीहरिको छोड़कर किसी दूसरेका गुणगान नहीं सुनते। हम लोग उन्हींका यशोगान सुनते हैं; कोई दूसरी स्तुति नहीं सुनते॥ २६—२८ १/२ ॥ |
| स्वभृत्यान् ब्राह्मणा होते कीर्तिं शृण्वन्ति मे यथा।<br>न शृण्वन्ति कथं तस्माद् गायमाने समन्ततः॥ ३० | उसे सुनकर राजाने रुष्ट होकर अपने सेवकोंसे कहा—अब तुम लोग गाओ, जिससे ये ब्राह्मण मेरी कीर्ति सुनें। चारों ओरसे गाये जानेवाले मेरे यशको ये कैसे नहीं सुनेंगे?॥ २९-३०॥ |
| एवमुक्तास्तदा भृत्या जगुः पार्थिवमुत्तमम्।<br>निरुद्धमार्गा विप्रास्ते गाने वृत्ते तु दुःखिताः॥ ३१ | तब उनके ऐसा कहनेपर वे भृत्यगण राजाका उत्तम यशोगान करने लगे। गानके आरम्भ होनेपर |
| ५७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| काष्ठशङ्कुभिरन्योन्यं श्रोत्राणि विदधुर्द्विजाः ।<br>कौशिकाद्याश्च तां ज्ञात्वा मनोवृत्तिं नृपस्य वै ॥ ३२<br>प्रसह्यास्मांस्तु गायेत स्वगानेऽसौ नृपः स्थितः ।<br>इति विप्राः सुनियता जिह्वाग्रं चिच्छिदुः करैः ॥ ३३ | बलपूर्वक अवरुद्ध मार्गवाले वे विप्र बहुत दुःखित हुए और उन्होंने काष्ठकी खूँटियोंसे एक-दूसरेके कानोंको बन्द कर दिया ॥ ३१ १/२ ॥<br><br>यह राजा अपने यशके गानमें प्रवृत्त [लिप्त] है और हमको बलपूर्वक गानेको कहेगा। कौशिकादि ब्राह्मणोंने उस राजाकी इस मनोवृत्तिको जानकर अपनी जिह्वाके अग्रभागको अपने हाथोंसे काट लिया ॥ ३२-३३ ॥ |
| ततो राजा सुसङ्क्रुद्धः स्वदेशात्तान्यवासयत्।<br>आदाय सर्वं वित्तं च ततस्ते जग्मुरुत्तराम् ॥ ३४<br>दिशमासाद्य कालेन कालधर्मेण योजिताः ।<br>तानागतान्यमो दृष्ट्वा किं कर्तव्यमिति स्म ह ॥ ३५ | तदनन्तर राजाने अत्यन्त कुपित होकर उन्हें अपने राज्यसे निर्वासित कर दिया। तब अपना सारा धन लेकर वे विप्र चले गये और उत्तर दिशामें पहुँचकर यथासमय स्थूलशरीरके वियोग (मृत्यु)-को प्राप्त हो गये। तब उन्हें आया हुआ देखकर 'अब क्या किया जाय'—यह सोचकर यमराज व्याकुल हो उठे ॥ ३४-३५ ॥ |
| चेष्टितं तत्क्षणे राजन् ब्रह्मा प्राह सुराधिपान्।<br>कौशिकादीन् द्विजानद्य वासयध्वं यथासुखम्॥ ३६<br>गानयोगेन ये नित्यं पूजयन्ति जनार्दनम्।<br>तानानयत भद्रं वो यदि देवत्वमिच्छथ ॥ ३७ | हे राजन्! यमराजकी यह चेष्टा देखकर ब्रह्माजीने देवाधिपोंसे उसी क्षण कहा—'आपलोग कौशिक आदि द्विजोंको अभी सुखमय निवास प्रदान कीजिये।' यदि आप लोग अपना देवत्व चाहते हैं, तो वे विप्र जो [श्रीहरिके] गान तथा चित्तवृत्तिके निरोधके द्वारा भगवान् जनार्दनकी नित्य पूजा करते हैं, उन्हें ले आइये; इससे आप लोगोंका कल्याण होगा ॥ ३६-३७ ॥ |
| इत्युक्ता लोकपालास्ते कौशिकेति पुनः पुनः ।<br>मालवेति तथा केचित् पद्माक्षेति तथा परे ॥ ३८<br>क्रोशमानाः समभ्येत्य तानादाय विहायसा ।<br>ब्रह्मलोकं गताः शीघ्रं मुहूर्त्तेनैव ते सुराः ॥ ३९ | [ब्रह्माजीके द्वारा] इस प्रकार कहे गये वे लोकपाल 'हे कौशिक!', कुछ देवता 'हे मालव!' तथा अन्य देवतागण 'हे पद्माक्ष!'—ऐसा बार-बार पुकारते हुए उन विप्रोंके पास पहुँचकर उन्हें साथमें लेकर आकाशमार्गसे शीघ्र ही क्षणभरमें ब्रह्मलोक पहुँच गये ॥ ३८-३९ ॥ |
| कौशिकादींस्ततो दृष्ट्वा ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>प्रत्युद्गम्य यथान्यायं स्वागतेनाभ्यपूजयत्॥ ४०<br>ततः कोलाहलमभूदतिगौरवमुल्बणम्।<br>ब्रह्मणा चरितं दृष्ट्वा देवानां नृपसत्तम ॥ ४१ | तत्पश्चात् कौशिक आदिको देखकर लोकपितामह ब्रह्मा ने आगे बढ़कर स्वागतके द्वारा समुचितरूपसे उनका अत्यधिक सम्मान किया। हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजीके द्वारा [उन विप्रोंके प्रति] किये गये महान् सम्मानको देखकर देवताओंमें परस्पर कोलाहल होने लगा ॥ ४०-४१ ॥ |
| हिरण्यगर्भो भगवांस्तानिवार्य सुरोत्तमान्।<br>कौशिकादीन् समादाय मुनीन् देवैः समावृतः ॥ ४२<br>विष्णुलोकं ययौ शीघ्रं वासुदेवपरायणः।<br>तत्र नारायणो देवः श्वेतद्वीपनिवासिभिः ॥ ४३ | तदनन्तर वासुदेवपरायण भगवान् ब्रह्मा उन श्रेष्ठ देवताओंको ऐसा करनेसे रोककर कौशिक आदि मुनियोंको लेकर देवताओंके साथ शीघ्र ही विष्णुलोक चले गये ॥ ४२ १/२ ॥ |
अध्याय १] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा [५७१
| श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ज्ञानयोगेश्वरैः सिद्धैर्विष्णुभक्तैः समाहितैः।<br>नारायणसमैर्दिव्यैश्चतुर्बाहुधरैः शुभैः॥ ४४<br>विष्णुचिह्नसमापन्नैर्दीप्यमानैरकल्मषैः ।<br>अष्टाशीतिसहस्रैश्च सेव्यमानो महाजनैः॥ ४५<br>अस्माभिनारदाद्यैश्च सनकाद्यैरकल्मषैः।<br>भूतैर्नानाविधैश्चैव दिव्यस्त्रीभिः समन्ततः॥ ४६<br>सेव्यमानोऽथ मध्ये वै सहस्रद्वारसंवृते।<br>सहस्रयोजनायामे दिव्ये मणिमये शुभे॥ ४७<br>विमाने विमले चित्रे भद्रपीठासने हरिः।<br>लोककार्ये प्रसक्तानां दत्तदृष्टिश्च माधवः॥ ४८ | वहाँ भगवान् नारायण श्वेतद्वीपमें निवास करनेवाले ज्ञानयोगेश्वर, विष्णुभक्त, एकनिष्ठ, सिद्ध, नारायणके समान विग्रहवाले, दिव्य, चार भुजाएँ धारण करनेवाले, मनोहर, श्रीविष्णुके चिह्नोंसे युक्त, दीप्तिमान् तथा निर्विकार अट्ठासी हजार महापुरुषोंके द्वारा एवं हम लोगों, नारद-सनक आदि मुनियों, अनेकविध निष्पाप प्राणियों तथा दिव्य स्त्रियोंके द्वारा सभी ओरसे सेवित हो रहे थे। वे माधव श्रीहरि मध्य भागमें स्थित हजार द्वारोंवाले, हजार योजन विस्तारवाले, अलौकिक, मणिनिर्मित तथा मनोहर विमानमें स्वच्छ एवं अद्भुत सिंहासनपर विराजमान होकर लोककार्यमें तत्पर लोगोंपर दृष्टि दिये हुए सुशोभित हो रहे थे॥४३–४८॥ |
| तस्मिन् कालेऽथ भगवान् कौशिकाद्यैश्च संवृतः।<br>आगम्य प्रणिपत्याग्रे तुष्टाव गरुडध्वजम्॥ ४९ | उसी समय कौशिक आदि मुनियोंसहित भगवान् ब्रह्मा गरुड़ध्वज श्रीहरिके सम्मुख आकर प्रणाम करके उनकी स्तुति करने लगे॥४९॥ |
| ततो विलोक्य भगवान् हरिनारायणः प्रभुः।<br>कौशिकेत्याह सम्प्रीत्या तान् सर्वांश्च यथाक्रमम्॥ ५०<br>जयघोषो महानासीन्महाश्चर्यं समागते।<br>ब्रह्माणमाह विश्वात्मा शृणु ब्रह्मन् मयोदितम्॥ ५१ | तत्पश्चात् ऐश्वर्यसम्पन्न नारायण भगवान् श्रीहरिने उन सबको देखकर अत्यन्त प्रेमके साथ उन्हें क्रमसे कौशिक आदि [नाम लेकर] पुकारा। इस महान् आश्चर्यके घटित होनेपर वहाँ जयकारकी तीव्र ध्वनि होने लगी॥ ५० ½॥ |
| कौशिकस्य इमे विप्राः साध्यसाधनतत्पराः।<br>हिताय सम्प्रवृत्ता वै कुशस्थलनिवासिनः॥ ५२<br>मत्कीर्तिश्रवणे युक्ता ज्ञानतत्त्वार्थकोविदाः।<br>अनन्यदेवताभक्ताः साध्या देवा भवन्त्विमे॥ ५३<br>मत्समीपे तथान्यत्र प्रवेशं देहि सर्वदा। | विश्वात्मा विष्णुने ब्रह्मासे कहा—हे ब्रह्मन्! मेरा कथन सुनिये, साध्य-साधनमें तत्पर रहनेवाले ये कुशस्थल-निवासी विप्र कौशिकका हित करनेके लिये प्रवृत्त हैं। ये ज्ञानके तत्त्वार्थके पण्डित, मेरी कीर्तिके श्रवणमें तत्पर रहनेवाले तथा देवताओंके अनन्य भक्त हैं; ये साध्यदेव हों। इन्हें मेरे समीप तथा अन्यत्र भी सर्वदा प्रवेश दीजिये॥ ५१–५३ ½॥ |
| एवमुक्त्वा पुनर्देवः कौशिकं प्राह माधवः॥ ५४<br>स्वशिष्यैस्त्वं महाप्राज्ञ दिग्बन्धो भव मे सदा।<br>गणाधिपत्यमापन्नो यत्राहं त्वं समास्व वै॥ ५५ | ऐसा कहकर प्रभु माधवने कौशिकसे कहा—हे महाप्राज्ञ! आप अपने शिष्योंके साथ सदा मेरे समीप विराजमान रहें। मेरे गणाधिप बनकर अब आप वहीं स्थित रहें, जहाँ मैं रहूँ॥ ५४–५५॥ |
| मालवं मालवीं चैवं प्राह दामोदरो हरिः।<br>मम लोके यथाकामं भार्यया सह मालव॥ ५६<br>दिव्यरूपधरः श्रीमान् शृण्वन् गानमिहाधिपः।<br>आस्व नित्यं यथाकामं यावल्लोका भवन्ति वै॥ ५७ | इसी प्रकार दामोदर श्रीहरिने मालव तथा मालवीसे कहा—‘हे मालव! आप मेरे लोकमें अपनी भार्याके साथ दिव्य रूप धारण करके ऐश्वर्यसम्पन्न होकर मेरा यशोगान सुनते हुए राजाके रूपमें प्रतिष्ठित होकर |
| ५७२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ उत्तरभाग |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पद्माक्षमाह भगवान् धनदो भव माधवः।<br>धनानामीश्वरो भूत्वा यथाकालं हि मां पुनः ॥ ५८<br><br>आगम्य दृष्ट्वा मां नित्यं कुरु राज्यं यथासुखम्।<br>एवमुक्त्वा हरिर्विष्णुर्ब्रह्माणमिदमब्रवीत् ॥ ५९<br><br>कौशिकस्यास्य गानेन योगनिद्रा च मे गता।<br>विष्णुस्थले च मां स्तौति शिष्यैरेष समन्ततः ॥ ६०<br><br>राज्ञा निरस्तः क्रूरेण कलिङ्गेन महीयसा।<br>स जिह्वाच्छेदनं कृत्वा हरेरन्यं कथञ्चन ॥ ६१<br><br>न स्तोष्यामीति नियतः प्राप्तोऽसौ मम लोकताम्।<br>एते च विप्रा नियता मम भक्ता यशस्विनः ॥ ६२<br><br>श्रोत्रच्छिद्रमथाहत्य शङ्कुभिर्वै परस्परम्।<br>श्रोण्यामो नैव चान्यद्वै हरेः कीर्तिमिति स्म ह॥ ६३<br><br>एते विप्राश्च देवत्वं मम सान्निध्यमेव च।<br>मालवो भार्यया सार्धं मत्क्षेत्रं परिमृज्य वै ॥ ६४<br><br>दीपमालादिभिर्नित्यमभ्यर्च्य सततं हि माम्।<br>गानं शृणोति नियतो मत्कीर्तिचरितान्वितम् ॥ ६५<br><br>तेनासौ प्राप्तवाँल्लोकं मम ब्रह्म सनातनम्।<br>पद्माक्षोऽसौ ददौ भोज्यं कौशिकस्य महात्मनः ॥ ६६<br><br>धनेशत्वमवाप्तोऽसौ मम सान्निध्यमेव च।<br>एवमुक्त्वा हरिस्तत्र समाजे लोकपूजितः ॥ ६७<br><br>तस्मिन् क्षणे समापन्ना मधुराक्षरपेशलैः।<br>विपञ्चीगुणतत्त्वज्ञैर्वाद्यविद्याविशारदैः ॥ ६८<br><br>मन्दं मन्दस्मितादेवी विचित्राभरणान्विता।<br>गायमाना समायाता लक्ष्मीर्विष्णुपरिग्रहा॥ ६९<br><br>वृता सहस्रकोटीभिरङ्गनाभिः समन्ततः।<br>ततो गणाधिपा दृष्ट्वा भुशुण्डीपरिघायुधाः ॥ ७०<br><br>ब्रह्मादींस्तर्जयन्तस्ते मुनीन् देवान् समन्ततः।<br>उत्सारयन्तः संहृष्टाधिष्ठिताः पर्वतोपमाः ॥ ७१ | यथेच्छया निवास कीजिये; जबतक लोक स्थित रहें, तबतक आप यहाँ यथेच्छ रहें'॥ ५६-५७॥<br><br>तदनन्तर भगवान् माधवने पद्माक्षसे कहा—आप 'धनद' हो जाइये; धनोंके स्वामी बनकर आप पुनः यथासमय मेरे पास आकर मेरा दर्शन करके सुखपूर्वक सदा राज्य कीजिये॥ ५८१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर श्रीहरि विष्णुने ब्रह्मासे यह कहा— इन कौशिकके गानसे मेरी योगनिद्रा समाप्त हो गयी है। ये अपने शिष्योंके साथ विष्णुस्थलमें सम्यक् रूपसे मेरी स्तुति कर रहे थे। क्रूर तथा अत्यधिक शक्तिशाली राजा कलिङ्गने इन्हें [देशसे] निकाल दिया है। इन्होंने अपनी जिह्वा काटकर 'श्रीहरिके अतिरिक्त किसी अन्यकी स्तुति मैं किसी भी प्रकारसे नहीं करूँगा'—ऐसा निश्चय कर लिया था, अतः ये मेरे लोकको प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार इन संयमी, मेरे भक्त तथा यशस्वी विप्रोंने काष्ठकी खूँटियाँ एक-दूसरेके कानोंमें ठोंककर यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि हमलोग श्रीहरिकी कीर्तिको छोड़कर अन्य कुछ भी नहीं सुनेंगे। अतएव इन 'विप्रों' ने भी देवत्व तथा मेरा सान्निध्य प्राप्त किया है, ये मालव भी अपनी भार्याके साथमें मेरे मन्दिरको भलीभाँति स्वच्छ करके दीप, माला आदि [उपचारों]-से नित्य मेरी अर्चना करके सावधान होकर मेरी कीर्ति तथा चरितसे युक्त गानका निरन्तर श्रवण किया करते थे; इसीलिये हे ब्रह्मन्! इन्होंने मेरा सनातन लोक प्राप्त किया है। इन पद्माक्षने महात्मा कौशिकको भोजन प्रदान किया था, इसीलिये इन्हें धनेशत्व तथा मेरे सान्निध्यकी प्राप्ति हुई है॥ ५९-६६१/२ ॥<br><br>ऐसा कहकर भगवान् श्रीहरि वहाँ समाजमें लोकपूजित हुए। उसी क्षण मधुर स्वरोंके विशेषज्ञ, वीणाके गुणतत्त्वोंके ज्ञाता तथा वाद्यविद्याके विशारद मनीषियोंके साथ विचित्र आभूषणोंसे मण्डित विष्णुभार्या लक्ष्मीजी मन्द-मन्द मुसकान करती तथा गाती हुई वहाँ आयीं; वे हजारों, करोड़ों अंगनाओंसे घिरी हुई थीं। तब उन्हें देखकर भुशुण्डी तथा परिघ नामक आयुध धारण किये सभी गणाधिप मुनियों, ब्रह्मा आदि देवताओंको |
अध्याय १ ] भगवद्गुणगानकी महिमामें कौशिक ब्राह्मणकी कथा ५७३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| सभी ओरसे फटकारते हुए तथा वहाँसे हटाते हुए प्रसन्नचित्त होकर वहाँ स्थित हो गये। तत्पश्चात् ब्रह्मा तथा अन्य देवताओंके साथ हमसब वहाँसे निकल गये॥ ६७–७१ १/२ ॥ | |
| सर्वे वयं हि निर्याताः सार्धं वै ब्रह्मणा सुरैः।<br>तस्मिन् क्षणे समाहूतस्तुम्बरुर्मु निसत्तमः॥ ७२<br>प्रविवेश समीपं वै देव्या देवस्य चैव हि।<br>तत्रासीनो यथायोगं नानामूर्च्छासमन्वितम् ॥ ७३<br>जगौ कलपदं हृष्टो विपञ्चीं चाभ्यवादयत्।<br>नानारत्नसमायुक्तैर्दिव्यैराभरणोत्तमैः ॥ ७४<br>दिव्यमाल्यैस्तथा शुभ्रैः पूजितो मुनिसत्तमः।<br>निर्गतस्तुम्बरुर्हृष्टो अन्ये च ऋषयः सुराः॥ ७५ | उसी समय मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु बुलाये गये और उन्होंने भगवान् विष्णु तथा देवी लक्ष्मीके समीप प्रवेश किया। वहाँ आसीन होकर वे प्रसन्नतापूर्वक नानाविध मूर्च्छनाओंसे युक्त मधुर पदोंका सम्यक् प्रकारसे गान करने लगे तथा वीणा बजाने लगे। तत्पश्चात् अनेक प्रकारके रत्नजटित दिव्य तथा श्रेष्ठ आभूषणों एवं दिव्य तथा मनोहर हारोंसे पूजित होकर मुनिश्रेष्ठ तुम्बुरु प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे निकल आये। हे शत्रुदमन! उन्हें यथोचित रूपसे पूजित होते हुए देखकर अन्य ऋषि एवं देवतागण उनकी प्रशंसा करने लगे॥ ७२–७५ १/२ ॥ |
| दृष्ट्वा सम्पूजितं यान्तं यथायोगमरिन्दम।<br>नारदोऽथ मुनिर्दृष्ट्वा तुम्बरोः सत्क्रियां हरेः ॥ ७६<br>शोकाविष्टेन मनसा सन्तप्तहृदयेक्षणः।<br>चिन्तामापेदिवांस्तत्र शोकमूर्च्छाकुलात्मकः ॥ ७७<br>केनाहं हि हरेर्यास्ये योगं देवीसमीपतः।<br>अहो तुम्बरुणा प्राप्तं धिङ्मां मूढं विचेतसम् ॥ ७८<br>योऽहं हरेः संनिकाशं भूतैर्निर्यातितः कथम्।<br>जीवन् यास्यामि कुत्राहमहो तुम्बरुणा कृतम् ॥ ७९ | तब भगवान् श्रीहरिके द्वारा गन्धर्व तुम्बुरुके प्रति किये गये सत्कारको देखकर सन्तप्त हृदय तथा नेत्रोंवाले एवं शोक तथा मूर्छासे व्याकुल चित्तवाले नारदमुनि चिन्तित हो उठे। वे शोकाविष्ट मनसे सोचने लगे कि मैं किस प्रकारसे श्रीहरिका सान्निध्य तथा देवी लक्ष्मीका सामीप्य प्राप्त करूँगा; अहो, तुम्बुरुने इसे प्राप्त कर लिया है। मुझ मूर्ख तथा विवेकहीनको धिक्कार है! मैं गणाधिपोंके द्वारा श्रीहरिके पाससे क्यों निकाल दिया गया; अब मैं जीवन धारण करते हुए कहाँ जाऊँगा ? अहो, तुम्बुरुने ही ऐसा कर डाला है ! ॥ ७६–७९ ॥ |
| इति सञ्चिन्तयन् विप्रस्तप आस्थितवान् मुनिः।<br>दिव्यं वर्षसहस्त्रं तु निरुच्छ्वाससमन्वितः ॥ ८०<br>ध्यायन् विष्णुमथाध्यास्ते तुम्बरोः सत्क्रियां स्मरन्।<br>रोदमानो मुहुर्विद्वान् धिङ्मामिति च चिन्तयन् ॥ ८१ | ऐसा सोचते हुए विप्र नारद तपमें स्थित हो गये। विद्वान् मुनि नारद भगवान् विष्णुका ध्यान करते हुए, तुम्बुरुके सत्कारका स्मरण करते हुए, बार-बार विलाप करते हुए और 'मुझे धिक्कार है'—ऐसा सोचते हुए [प्राणायामके द्वारा] श्वास रोककर एक हजार दिव्य वर्षोंतक [तपस्यामें] बैठे रहे ॥ ८०–८१ ॥ |
| तत्र यत्कृतवान् विष्णुस्तच्छृणुष्व नराधिप ॥ ८२ | हे राजन् ! इसके बाद भगवान् विष्णुने जो किया, उसे आप सुनें ॥ ८२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे उत्तरभागे कौशिकवृत्तकथनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत उत्तरभागमें 'कौशिकवृत्तकथन' नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ ॥ १ ॥