श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
२४- श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन
अध्याय २४] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १०९
| प्रणम्य प्रयतो भूत्वा पुनराह पितामहः।<br>य एवं भगवान् विद्वान् गायत्र्या वै महेश्वरम्॥ ४९<br><br>विश्वात्मानं हि सर्वं त्वां गायत्र्यास्तव चेश्वर।<br>तस्य देहि परं स्थानं तथास्त्विति च सोऽब्रवीत्॥ ५० | प्रकार कहनेपर भगवान् ब्रह्माने प्रणाम करके विनम्रतापूर्वक रुद्रसे पुनः कहा—हे भगवन्! जो विद्वान् सर्वव्यापी विश्वात्मा आप महेश्वरको गायत्रीसहित सर्वत्र स्थित देखे तथा हे ईश्वर! आपकी एवं गायत्रीकी आराधना करे, उसे आप परमपद दें। इसपर उन शिवजीने कहा—वैसा ही होगा॥ ४८-५०॥ |
| तस्माद्विद्वान् हि विश्वत्वमस्याश्चास्य महात्मनः।<br>स याति ब्रह्मसायुज्यं वचनाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ ५१ | इसलिये प्रभु शिवद्वारा ब्रह्माजीके प्रति कहे गये वचनके अनुसार जो विद्वान् गायत्री तथा महात्मा रुद्रका विश्वरूपत्व जान लेता है, वह ब्रह्मसायुज्यको प्राप्त होता है अर्थात् ब्रह्मके साथ उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता है॥ ५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ‘विविधकल्पवर्णनं’ नाम त्रयोविंशोऽध्यायः॥ २३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें ‘विविधकल्पवर्णन’ नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २३॥
चौबीसवाँ अध्याय
श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले अट्ठाईस व्यासों, अट्ठाईस शिवावतारों तथा विविध शिवयोगियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
|---|---|
| श्रुतैवमखिलं ब्रह्मा रुद्रेण परिभाषितम्।<br>पुनः प्रणम्य देवेशं रुद्रमाह प्रजापतिः॥ १ | [हे मुनियो!] शिवके द्वारा कथित सम्पूर्ण वचनोंको सुनकर प्रजापति ब्रह्माने उन देवाधिदेव शिवको प्रणाम करके पुनः उनसे कहा—॥ १॥ |
| भगवन् देवेश विश्वरूप महेश्वर।<br>उमाधव महादेव नमो लोकाभिवन्दित॥ २ | हे भगवन्! हे देवेश! हे विश्वरूप! हे महेश्वर! हे उमापते! हे महादेव! हे लोकवन्द्य! आपको नमस्कार है॥ २॥ |
| विश्वरूप महाभाग कस्मिन् काले महेश्वर।<br>या इमास्ते महादेव तनवो लोकवन्दिताः॥ ३<br>कस्यां वा युगसम्भूतयां द्रक्ष्यन्तीह द्विजातयः।<br>केन वा तपसा देव ध्यानयोगेन केन वा॥ ४ | हे विश्वरूप! हे महाभाग! हे महेश्वर! हे महादेव! आपके ये जो लोकवन्द्य अवतार हैं, वे किस कालमें तथा किस युगमें द्विजातियोंके द्वारा इस लोकमें देखे जा सकेंगे?॥ ३½॥<br>हे देव! हे महादेव! आपको नमस्कार है। द्विजातिगण किस तप या ध्यानयोगके द्वारा आपका दर्शन कर पानेमें समर्थ हो सकते हैं?॥ ४½॥ |
| नमस्ते वै महादेव शक्यो द्रष्टुं द्विजातिभिः।<br>तस्य तद्वचनं श्रुत्वा शर्वः सम्प्रेक्ष्य तं पुरः॥ ५<br>स्मयन् प्राह महादेवो ऋग्यजुःसामसम्भवः। | ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदसे प्रादुर्भूत महादेव रुद्र अपने सम्मुख-स्थित उन पितामहको देखकर मुसकराते हुए उनसे बोले॥ ५½॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>तपसा नैव वृत्तेन दानधर्मफलेन च॥ ६ | भगवान् शिव बोले— मानव मुझे न तो केवल |
| ११० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| न तीर्थफलयोगेन क्रतुभिर्वाप्तदक्षिणैः।<br>न वेदाध्ययनैर्वापि न वित्तेन न वेदनैः॥ ७<br>न शक्यं मानवैर्द्रष्टुमृते ध्यानादहं त्विह। | तपसे, न आचारसे, न दानसे, न धर्मफलसे, न तीर्थाटनसे, न योगसे, न पुष्कल दक्षिणावाले यज्ञोंसे, न वेदोंके अध्ययनसे, न धनसे तथा न तो शास्त्रोंके परिशीलनमात्रसे ही देख सकनेमें समर्थ हैं, मेरा दर्शन ध्यानरहित साधनाके द्वारा नहीं किया जा सकता॥ ६-७१/२॥ | | सप्तमे चैव वाराहे ततस्तस्मिन् पितामह॥ ८<br>कल्पेश्वरोऽथ भगवान् सर्वलोकप्रकाशकः।<br>मनुर्वैवस्वतश्चैव तव पौत्रो भविष्यति॥ ९ | हे पितामह! वाराहकल्पके सातवें मन्वन्तरमें सभी लोकोंको प्रकाशित करनेवाला और कल्पका स्वामी मेरा अवताररूप वैवस्वत मनु आपके पौत्रके रूपमें अवतरित होगा॥ ८-९॥ | | तदा चतुर्युगावस्थे तस्मिन् कल्पे युगान्तिके।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां ब्राह्मणानां हिताय च॥ १०<br>उत्पत्स्यामि तदा ब्रह्मन् पुनरस्मिन् युगान्तिके।<br>युगप्रवृत्त्या च तदा तस्मिंश्च प्रथमे युगे॥ ११<br>द्वापरे प्रथमे ब्रह्मन् यदा व्यासः स्वयं प्रभुः।<br>तदाहं ब्राह्मणार्थाय कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ १२<br>भविष्यामि शिखायुक्तः श्वेतो नाम महामुनिः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये छागले पर्वतोत्तमे॥ १३ | उसी कल्पके द्वापरयुगके अन्तमें लोकोंपर अनुग्रह तथा ब्राह्मणोंके हितके लिये मैं अवतार ग्रहण करूँगा। पुनः हे ब्रह्मन्! युगप्रवृत्तिके अनुसार इसी प्रथम द्वापरयुगके अन्तमें जब स्वयं प्रभु व्यास होंगे, उस समय ब्राह्मणोंके हितार्थ मेरा अवतार होगा। इसके अनन्तर उसी युगकी समाप्तिपर कलिमें मैं शिखाधारी ‘श्वेत’ नामक महामुनिके रूपमें अवतीर्ण होऊँगा और पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके छागल नामवाले शिखरपर निवास करूँगा॥ १०-१३॥ | | तत्र शिष्याः शिखायुक्ता भविष्यन्ति तदा मम।<br>श्वेतः श्वेतशिखश्चैव श्वेतास्यः श्वेतलोहितः॥ १४<br>चत्वारस्तु महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>ततस्ते ब्रह्मभूयिष्ठा दृष्ट्वा ब्रह्मगतिं पराम्॥ १५<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति ध्यानयोगपरायणाः। | वहाँपर उस समय श्वेत, श्वेतशिख, श्वेतास्य तथा श्वेतलोहित नामक शिखायुक्त मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। ये चारों महात्मा, ब्रह्मनिष्ठ और वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे। तदनन्तर ध्यानयोगमें पूर्ण तत्पर वे ब्रह्मभूयिष्ठ शिष्य ब्रह्मकी परम गतिको जानकर मेरा सान्निध्य प्राप्त करेंगे॥ १४-१५१/२॥ | | ततः पुनर्यदा ब्रह्मन् द्वितीये द्वापरे प्रभुः॥ १६<br>प्रजापतिर्यदा व्यासः सद्यो नाम भविष्यति।<br>तदा लोकहितार्थाय सुतारो नाम नामतः॥ १७<br>भविष्यामि कलौ तस्मिन् शिष्यानुग्रहकाम्यया। | हे ब्रह्मन्! इसके बाद द्वितीय द्वापरके अन्तमें पुनः जब ‘सद्य’ नामक प्रजापतिरूप प्रभु व्यास होंगे, उसके अनन्तर कलिमें अपने शिष्योंके अनुग्रहकी कामनासे तथा लोकके कल्याणार्थ मैं सुतार नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ १६-१७१/२॥ | | तत्रापि मम ते शिष्या नामतः परिकीर्तिताः॥ १८<br>दुन्दुभिः शतरूपश्च ऋचीकः केतुमांस्तदा।<br>प्राप्य योगं तथा ध्यानं स्थाप्य ब्रह्म च भूतले॥ १९<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति सहचारित्वमेव च। | वहाँ भी दुन्दुभि, शतरूप, ऋचीक तथा केतुमान् नामसे प्रसिद्ध मेरे शिष्य प्रकट होंगे। वे योग तथा ध्यानको पूर्णतः प्राप्त होकर भूतलपर ब्रह्मज्ञान स्थापित करके शिवलोकको प्राप्त होंगे और सदा मेरे सान्निध्यमें रहेंगे॥ १८-१९१/२॥ | | तृतीये द्वापरे चैव यदा व्यासस्तु भार्गवः॥ २०<br>तदाप्यहं भविष्यामि दमनस्तु युगान्तिके।<br>तत्रापि च भविष्यन्ति चत्वारो मम पुत्रकाः॥ २१ | पुनः तीसरे द्वापरके अन्तमें जब ‘भार्गव’ नामक व्यास होंगे, तब मैं दमन नामसे अवतीर्ण होऊँगा और |
२५- लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन
अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन १११
| विकोशश्च विकेशश्च विपाशः शापनाशनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन महौजसः॥ २२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय भी विकोश, विकेश, विपाश तथा शापनाशन नामवाले मेरे चार शिष्य होंगे। उसी पूर्वोक्त ध्यान-योगके द्वारा वे महान् ओजस्वी शिष्य भी शिव-लोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन नहीं होता है॥ २०—२२१/२॥ | | चतुर्थे द्वापरे चैव व्यासोऽङ्गिराः स्मृतः॥ २३<br>तदाप्यहं भविष्यामि सुहोत्रो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्राश्चत्वारोऽपि तपोधनाः॥ २४<br>द्विजश्रेष्ठा भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः।<br>सुमुखो दुर्मुखश्चैव दुर्द्ररो दुरतिक्रमः॥ २५ | चौथे द्वापरके अन्तमें जब 'अंगिरा' नामक व्यास होंगे, तब मैं भी सुहोत्र नामसे अवतीर्ण होऊँगा और उस समय भी मेरे चार पुत्र प्रकट होंगे। सुमुख, दुर्मुख, दुर्दर तथा दुरतिक्रम नामवाले मेरे वे सभी पुत्र तपस्वी, द्विजश्रेष्ठ, योगात्मा एवं दृढ़ व्रतवाले होंगे॥ २३—२५॥ | | प्राप्य योगगतिं सूक्ष्मां विमला दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगयुक्ता महौजसः॥ २६<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | विशुद्ध मन तथा नष्टपापवाले, योगयुक्त और महान् ओजस्वी वे पुत्र भी उसी मार्गसे योगकी सूक्ष्म गतिको प्राप्त होकर रुद्रलोकको जायँगे, जहाँसे जीवका पुनर्जन्म नहीं होता है॥ २६१/२॥ | | पञ्चमे द्वापरे चैव व्यासस्तु सविता यदा॥ २७<br>तदा चापि भविष्यामि कङ्को नाम महातपाः।<br>अनुग्रहार्थं लोकानां योगात्मकैकलागतिः॥ २८ | पाँचवें द्वापरके अन्तमें जब 'सविता' नामक व्यास होंगे; उस समय भी लोकोंके अनुग्रहार्थ योगात्मा, एककलागतिवाला तथा महान् तपोव्रती मैं 'कंक' नामसे अवतार ग्रहण करूँगा॥ २७-२८॥ | | चत्वारस्तु महाभागा विमलाः शुद्धयोनयः।<br>शिष्या मम भविष्यन्ति योगात्मानो दृढव्रताः॥ २९<br>सनकः सनन्दनश्चैव प्रभुर्यश्च सनातनः।<br>विभुः सनत्कुमारश्च निर्ममा निरहङ्कृताः॥ ३०<br>मत्समीपमुपेष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | उस समय सनक, सनन्दन, प्रभु सनातन तथा विभु सनत्कुमार नामक मेरे चार शिष्य प्रकट होंगे। महाभाग्यशाली, विशुद्ध चित्तवाले, शुद्धयोनि, योगात्मा, दृढ़व्रती, ममतारहित तथा अहंकारशून्य वे शिष्य पुनर्जन्मसे मुक्ति प्राप्त करानेवाले मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे॥ २९-३०१/२॥ | | परिवर्ते पुनः षष्ठे मृत्युर्व्यासो यदा विभुः॥ ३१<br>तदाप्यहं भविष्यामि लोगाक्षिर्नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या योगात्मानो दृढव्रताः॥ ३२<br>भविष्यन्ति महाभागाश्चत्वारो लोकसम्मताः।<br>सुधामा विरजाश्चैव शङ्खपाद्रज एव च॥ ३३ | पुनः छठे द्वापरके अन्तमें जब 'मृत्यु' नामक महान् ऐश्वर्यशाली व्यासका अवतार होगा, तब मैं लोगाक्षि नामसे आविर्भूत होऊँगा। उस समय भी सुधामा, विरजा, शंखपाद तथा रज नामक मेरे चार शिष्य होंगे। वे योगात्मा, दृढ़ व्रतवाले, महाभाग्यवान् एवं लोकविश्रुत होंगे॥ ३१—३३॥ | | योगात्मानो महात्मानः सर्वे वै दग्धकिल्बिषाः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः॥ ३४<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | योगात्मा, महान् आत्मावाले तथा ध्यानयोगसे सम्पन्न वे सभी शिष्य उसी मार्गका आश्रय लेकर मेरे समीप पहुँचेंगे, जहाँसे पुनर्जन्म नहीं होता है॥ ३४१/२॥ | | सप्तमे परिवर्ते तु यदा व्यासः शतक्रतुः॥ ३५<br>विभुनामा महातेजाः प्रथितः पूर्वजन्मनि।<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ३६ | पूर्वजन्ममें विभु नामसे प्रख्यात महातेजस्वी शतक्रतु नामक व्यास जब सातवें द्वापरके अन्तमें होंगे, उस समय भी मैं उस द्वापरकी समाप्तिपर कलिमें सभी |
| ११२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| जैगीषव्यो विभुः ख्यातः सर्वेषां योगिनां वरः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति युगे तथा॥ ३७<br>सारस्वतश्च मेघश्च मेघवाहः सुवाहनः।<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगपरायणाः॥ ३८<br>गमिष्यन्ति महात्मानो रुद्रलोकं निरामयम्। | योगियोंमें श्रेष्ठ विभु जैगीषव्य नामसे प्रसिद्ध होऊँगा। उस युगमें भी सारस्वत, मेघ, मेघवाह तथा सुवाहन नामक मेरे चार पुत्र होंगे। ध्यानयोगमें परायण वे महात्मा उसी योगमार्गपर चलकर निर्विकार शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ३५–३८ १/२ ॥ |
| वसिष्ठश्चाष्टमे व्यासः परिवर्ते भविष्यति॥ ३९<br>यदा तदा भविष्यामि नाम्नाहं दधिवाहनः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगात्मानो दृढव्रताः॥ ४०<br>भविष्यन्ति महायोगा येषां नास्ति समो भुवि।<br>कपिलश्चासुरिश्चैव तथा पञ्चशिखो मुनिः॥ ४१<br>बाष्कलश्च महायोगी धर्मात्मानो महौजसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं ज्ञानिनो दग्धकिल्बिषाः॥ ४२<br>मत्समीपं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | पुनः आठवें द्वापरके अन्तमें जब 'वसिष्ठ' नामक व्यास होंगे, तब दधिवाहन नामसे मैं अवतरित होऊँगा। उस समय भी कपिल, आसुरि, पंचशिखमुनि तथा महायोगी बाष्कल—ये मेरे परम योगात्मा एवं दृढ़व्रती चार पुत्र होंगे, जिनके सदृश महान् योगी भूतलपर कोई नहीं होगा। वे धर्मात्मा तथा महान् ओजस्वी पुत्र भी माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर ज्ञानसम्पन्न और पापमुक्त हो मेरे सान्निध्यको प्राप्त होंगे, जहाँसे जीवका पुनः आगमन (जन्म) नहीं होता है॥ ३९–४२ १/२ ॥ |
| परिवर्ते तु नवमे व्यासः सारस्वतो यदा॥ ४३<br>तदाप्यहं भविष्यामि ऋषभो नाम नामतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ ४४<br>पराशरश्च गर्गश्च भार्गवाङ्गिरसौ तथा।<br>भविष्यन्ति महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः॥ ४५<br>ध्यानमार्गं समासाद्य गमिष्यन्ति तथैव ते।<br>सर्वे तपोबलोत्कृष्टाः शापानुग्रहकोविदाः॥ ४६<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण योगोक्तेन तपस्विनः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्॥ ४७ | नौवें द्वापरके अन्तमें जब 'सारस्वत' नामके व्यास होंगे, तब मैं भी ऋषभनामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी पराशर, गर्ग, भार्गव तथा अंगिरा नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे, जो महान् ओजस्वी, ब्रह्मनिष्ठ, वेदोंके पारगामी विद्वान् एवं महान् आत्मावाले होंगे। वे भी उसी प्रकार ध्यानमार्गको प्राप्त होकर इस लोकसे प्रस्थान करेंगे। तपोबलमें उत्कृष्ट, शाप-अनुग्रहके पूर्ण विद्वान् एवं तपोव्रती वे सभी पुत्र भी पूर्वोक्त उसी योगमार्गका आश्रय लेकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे, जहाँसे पुनः आगमन नहीं होता है॥ ४३–४७॥ |
| दशमे द्वापरे व्यासः त्रिपाद्वै नाम नामतः।<br>यदा भविष्यते विप्रस्तदाहं भविता मुनिः॥ ४८<br>हिमवच्छिखरे रम्ये भृगुतुङ्गे नगोत्तमे।<br>नाम्ना भृगोस्तु शिखरं प्रथितं देवपूजितम्॥ ४९<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति दृढव्रताः। | दसवें द्वापरके अन्तमें जब त्रिपाद् नामक विप्ररूप व्यास होंगे, तब मैं भृगुमुनिके रूपमें पर्वतोंमें उत्तम हिमालयके रमणीक भृगुतुंग नामक श्रेष्ठ पर्वत-शिखरपर अवतीर्ण होऊँगा। वह शिखर मेरे ही नामपर 'भृगुतुंग' नामसे प्रसिद्ध होगा तथा देवताओंद्वारा पूजित होगा॥ ४८-४९॥ |
| बलबन्धुर्निरामित्रः केतुशृङ्गस्तपोधनः॥ ५०<br>योगात्मानो महात्मानस्तपोयोगसमन्विताः।<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति तपसा दग्धकिल्बिषाः॥ ५१ | उस समय भी बलबन्धु, निरामित्र, केतुशृंग तथा तपोधन—ये मेरे चार पुत्र होंगे, जो दृढ़व्रती, योगात्मा, महात्मा एवं तपोयोगसे युक्त होंगे। वे अपनी तपस्यासे पापोंको दग्ध करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ५०–५१॥ |
| एकादशे द्वापरे तु व्यासस्तु त्रिव्रतो यदा।<br>तदाप्यहं भविष्यामि गङ्गाद्वारे कलौ तथा॥ ५२ | ग्यारहवें द्वापरके अन्तमें जब 'त्रिव्रत' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं कलिमें गंगाद्वारक्षेत्रमें |
अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन ११३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| उग्रो नाम महातेजाः सर्वलोकेषु विश्रुतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ ५३<br>लम्बोदरश्च लम्बाक्षो लम्बकेशः प्रलम्बकः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ५४ | अवतीर्ण होऊँगा तथा महातेजस्वी मैं उग्र नामसे सभी लोकोंमें विख्यात होऊँगा। उस समय भी लम्बोदर, लम्बाक्ष, लम्बकेश एवं प्रलम्बक नामवाले मेरे चार महातेजस्वी पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे ॥ ५२–५४॥ |
| द्वादशे परिवर्ते तु शततेजा यदा मुनिः।<br>भविष्यति महातेजा व्यासस्तु कविसत्तमः॥ ५५<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलाविह युगान्तिके।<br>हैतुकं वनमासाद्य अत्रिर्नाम्ना परिश्रुतः॥ ५६ | बारहवें द्वापरयुगके अन्तमें जब मुनि 'शततेजा' नामक महातेजस्वी तथा कविश्रेष्ठ व्यास होंगे, उस समय भी युगान्तमें इस लोकमें कलिमें मैं हैतुकवनमें अवतीर्ण होऊँगा और 'अत्रि' नामसे विख्यात होऊँगा॥ ५५-५६ ॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भस्मस्नानानुलेपनाः।<br>भविष्यन्ति महायोगा रुद्रलोकपरायणाः॥ ५७<br>सर्वज्ञः समबुद्धिश्च साध्यः सर्वस्तथैव च।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ५८ | उस समय भी सर्वज्ञ, समबुद्धि, साध्य तथा सर्व नामक मेरे चार पुत्र होंगे, जो रुद्रलोककी प्राप्तिके लिये तत्पर, महान् योगी तथा सदा भस्मसे अनुलिप्त शरीरवाले होंगे। वे भी माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर शिवलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ५७-५८ ॥ |
| त्रयोदशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमेण तु।<br>धर्मो नारायणो नाम व्यासस्तु भविता यदा॥ ५९<br>तदाप्यहं भविष्यामि बलिर्नाम महामुनिः।<br>बालखिल्य्याश्रमे पुण्ये पर्वते गन्धमादने॥ ६० | पुनः क्रमसे तेरहवें द्वापरयुगका अन्त आनेपर जब धर्मरूप 'नारायण' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं गन्धमादन पर्वतपर पवित्र बालखिल्य आश्रममें महामुनि 'बलि' नामसे अवतरित होऊँगा॥ ५९-६० ॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>सुधामा काश्यपश्चैव वासिष्ठो विरजस्तथा॥ ६१<br>महायोगबलोपेता विमला ऊर्ध्वरेतसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं गता हि ते॥ ६२ | उस समय भी सुधामा, काश्यप, वासिष्ठ तथा विरजा नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् तपस्वी, महायोगसे सम्पन्न, विशुद्धात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे और माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायँगे॥ ६१-६२॥ |
| यदा व्यासस्तरक्षुस्तु पर्याये तु चतुर्दशे।<br>तत्रापि पुनरेवाहं भविष्यामि युगान्तिके॥ ६३<br>वंशे त्वङ्गिरसां श्रेष्ठे गौतमो नाम नामतः।<br>भविष्यति महापुण्यं गौतमं नाम तद्वनम्॥ ६४ | चौदहवें द्वापरके अन्तमें जब 'तरक्षु' नामक व्यास होंगे, उस समय भी मैं अंगिरामुनिके उत्तम वंशमें गौतम नामसे अवतार ग्रहण करूँगा और वह स्थान परम पवित्र 'गौतमवन' नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ६३-६४॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति कलौ तदा।<br>अत्रिर्देवसदश्चैव श्रवणोऽथ श्रविष्ठकः॥ ६५<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे योगसमन्विताः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः॥ ६६ | उस कलिमें भी अत्रि, देवसद, श्रवण तथा श्रविष्ठक नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे सभी योगात्मा, महान् आत्मावाले और योगयुक्त पुत्र माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ६५-६६॥ |
| ततः पञ्चदशे प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते।<br>त्रैय्यारुणिर्यदा व्यासो द्वापरे समपद्यत॥ ६७<br>तदाप्यहं भविष्यामि नाम्ना वेदशिरा द्विजः।<br>तत्र वेदशिरो नाम अस्त्रं तत्पारमेश्वरम्॥ ६८ | पुनः क्रमसे पन्द्रहवें द्वापरका अन्त होनेपर जब 'त्रैय्यारुणि' नामक व्यास होंगे, उस समय भी द्विजस्वरूप 'वेदशिरा' नामसे मैं अवतार ग्रहण करूँगा। |
११४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| भविष्यति महावीर्य वेदशीर्षश्च पर्वतः।<br>हिमवत्पृष्ठमासाद्य सरस्वत्यां नगोत्तमे॥ ६९ | वहाँ मैं 'वेदशिरा' नामक अति दिव्य पारमेश्वर अस्त्र प्रकट करूँगा और पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके पृष्ठदेशमें सरस्वतीके तटपर वेदशीर्ष नामक पर्वत मेरा आश्रयस्थल होगा॥ ६७–६९॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशीरः कुनेत्रकः॥ ७०<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः॥ ७१ | उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशीर तथा कुनेत्रक नामवाले मेरे तपस्वी पुत्र प्रकट होंगे। योगात्मा, महात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले वे सभी पुत्र माहेश्वरयोगकी सिद्धि करके शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ७०–७१॥ |
| व्यासो युगे षोडशे तु यदा देवो भविष्यति।<br>तत्र योगप्रदानाय भक्तानां च यतात्मनाम्॥ ७२<br>तदाप्यहं भविष्यामि गोकर्णो नाम नामतः।<br>भविष्यति सुपुण्यं च गोकर्णं नाम तद्वनम्॥ ७३ | सोलहवें द्वापरके अन्तमें जब देव नामक व्यास होंगे, तब भक्तों तथा संयत आत्मावाले जनोंको योग प्रदान करनेके निमित्त मैं गोकर्ण नामसे अवतार लूँगा और वह स्थान परम पवित्र गोकर्णवनके नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७२–७३॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति च योगिनः।<br>काश्यपो ह्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः॥ ७४<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं गन्तारो रुद्रमेव हि॥ ७५ | उस समय भी काश्यप, उशना, च्यवन तथा बृहस्पति नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे। वे भी उसी मार्गसे ध्यानयोगसे युक्त होकर माहेश्वरयोग प्राप्त करके रुद्रलोक जायँगे॥ ७४–७५॥ |
| ततः सप्तदशे चैव परिवर्ते क्रमागते।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना देवकृतञ्जयः॥ ७६<br>तदाप्यहं भविष्यामि गुहावासीति नामतः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये महोत्तुङ्गे महालये॥ ७७<br>सिद्धक्षेत्रं महापुण्यं भविष्यति महालयम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगज्ञा ब्रह्मवादिनः॥ ७८<br>भविष्यन्ति महात्मानो निर्मला निरहङ्कृताः।<br>उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः॥ ७९ | पुनः क्रमसे सत्रहवें द्वापरके अन्तमें जब देवकृतंजय नामक व्यास होंगे, तब भी मैं हिमालयके अति उच्च महालय नामक रमणीक शिखरपर गुहावासी नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वह महालयस्थल परम पवित्र तथा सिद्धक्षेत्र माना जायगा। वहाँपर भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे। वे योगवेत्ता, ब्रह्मवादी, महात्मा, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होंगे॥ ७६–७९॥ |
| तेषां शतसहस्रं तु शिष्याणां ध्यानयोगिनाम्।<br>भविष्यन्ति तदा काले सर्वे ते ध्यानयुञ्जकाः॥ ८०<br>योगाभ्यासरताश्चैव हृदि कृत्वा महेश्वरम्।<br>महालये पदं न्यस्तं दृष्ट्वा यान्ति शिवं पदम्॥ ८१ | कलियुगमें उन पुत्रोंके ध्यानयोग करनेवाले हजारों शिष्य होंगे। ध्यान करनेवाले तथा योगाभ्यासपरायण वे सभी शिष्य महेश्वरको हृदयमें धारण करके महालय-क्षेत्रमें मेरे चरणोंका दर्शन करके शिवपदको प्राप्त होंगे॥ ८०–८१॥ |
| ये चान्येऽपि महात्मानः कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>ध्याने मनः समाधाय विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ ८२<br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>गत्वा महालयं पुण्यं दृष्ट्वा माहेश्वरं पदम्॥ ८३ | इनके अतिरिक्त अन्य जो भी महात्मा उस द्वापरके अन्तमें कलिमें अपना मन ध्यानमें लगाकर निर्मल आत्मा तथा शुद्ध बुद्धिवाले हो जायँगे, वे शोकरहित होकर मेरे अनुग्रहसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे। पुण्यप्रद |
| अध्याय २४ ] | श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन | १९५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तीर्णस्तारयते जन्तुर्दश पूर्वान् दशोत्तरान्।<br>आत्मानमेकविंशं तु तारयित्वा महालये ॥ ८४<br><br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>ततोऽष्टादशमे चैव परिवर्ते यदा विभो ॥ ८५ | महालयक्षेत्रमें जाकर माहेश्वरपदका दर्शन करके प्राणी अपनी दस पूर्वकी तथा दस बादकी और अपनी स्वयं—इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार महालयक्षेत्रमें पहुँचकर लोग अपने वंशका उद्धार करके मेरी कृपासे कष्टसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करेंगे॥ ८२-८४ १/२ ॥ |
| तदा ऋतञ्जयो नाम व्यासस्तु भविता मुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि शिखण्डी नाम नामतः ॥ ८६<br><br>सिद्धक्षेत्रे महापुण्ये देवदानवपूजिते।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये शिखण्डी नाम पर्वतः ॥ ८७<br><br>शिखण्डिनो वनं चापि यत्र सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः ॥ ८८ | हे विभो! पुनः अठारहवें द्वापरके अन्तमें जब ऋतंजयमुनि नामक व्यास होंगे, तब मैं सिद्धिप्रदायक, पुण्यप्रद तथा देव-दानवोंसे पूजित रमणीक हिमालय-शिखरपर शिखण्डी नामसे अवतार ग्रहण करूँगा और वह शिखर मेरे नामसे शिखण्डी पर्वत तथा वह क्षेत्र शिखण्डीका वन कहा जायगा, जहाँ सिद्ध महात्मा निवास करेंगे॥ ८५-८७ १/२ ॥ |
| वाचश्रवा ऋचीकश्च श्यावाश्वश्च यतीश्वरः।<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते वेदपारगाः ॥ ८९<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संवृताः।<br>अथ एकोनविंशे तु परिवर्ते क्रमागते ॥ ९० | वहाँपर भी वाचश्रवा, ऋचीक, श्यावाश्व तथा यतीश्वर नामक मेरे पुत्र होंगे। वे सब परम तपस्वी, योगात्मा, महात्मा तथा वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे, जो माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ८८-८९ १/२ ॥ |
| व्यासस्तु भविता नाम्ना भरद्वाजो महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि जटामाली च नामतः ॥ ९१<br><br>हिमवच्छिखरे रम्ये जटायुर्यत्र पर्वतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९२<br><br>हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षी कुथुमिस्तथा।<br>ईश्वरा योगधर्माणः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ ९३<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संस्थिताः।<br>ततो विंशतिमश्चैव परिवर्तो यदा तदा ॥ ९४ | तदनन्तर क्रमसे उन्नीसवें द्वापरके अन्तमें महामुनि भरद्वाज तो व्यास होंगे और उस समय मैं हिमालयके शिखरपर विराजमान रमणीक जटायु पर्वतपर जटामाली नामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षी तथा कुथुमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महाप्रतापी, ऐश्वर्ययुक्त, योग-ध्यानपरायण और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे। वे सब माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ९०-९३ १/२ ॥ |
| गौतमस्तु तदा व्यासो भविष्यति महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि अट्टहासस्तु नामतः ॥ ९५<br><br>अट्टहासप्रियाश्चैव भविष्यन्ति तदा नराः।<br>तत्रैव हिमवत्पृष्ठे अट्टहासो महागिरिः ॥ ९६<br><br>देवदानवयक्षेन्द्रसिद्धचारणसेवितः ।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९७ | पुनः जब बीसवें द्वापरका अन्त होगा, तब उस समय महामुनि गौतम तो व्यास होंगे और मैं भी उसी समय हिमालय-क्षेत्रमें अट्टहास नामसे अवतरित होऊँगा। तभीसे लोगोंकी अट्टहासके प्रति महान् प्रीति हो जायगी। वह क्षेत्र महागिरि अट्टहासके नामसे विख्यात होगा और देवता, दानव, यक्ष, इन्द्र, सिद्ध-महात्मा तथा चारण वहाँ सदा निवास करेंगे॥ ९४-९६ १/२ ॥ |
| योगात्मानो महात्मानो ध्यायिनो नियतव्रताः।<br>सुमन्तुर्बर्बरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ॥ ९८ | वहाँपर सुमन्तु, बर्बरी, विद्वान् कबन्ध तथा कुशिकन्धर—ये मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् ओजस्वी, |
| ११६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः। | योगात्मा, महात्मा, ध्यानपरायण एवं दृढ़व्रती होंगे, जो माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९७-९८१/२॥ |
| एकविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ९९<br>वाचश्रवाः स्मृतो व्यासो यदा स ऋषिसत्तमः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दारुको नाम नामतः॥ १००<br>तस्माद्भविष्यते पुण्यं देवदारुवनं शुभम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ १०१<br>प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा।<br>योगात्मानो महात्मानो नियता ऊर्ध्वरेतसः॥ १०२<br>नैष्ठिकं व्रतमास्थाय रुद्रलोकाय ते गताः। | पुनः क्रमसे इक्कीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋषिप्रवर वाचश्रवा व्यास होंगे, तब मैं भी दारुक नामसे आविर्भूत होऊँगा; इसलिये वह स्थान कल्याणप्रद तथा पुण्यकर होगा और मेरे नामपर वह देवदारुवनके नामसे प्रसिद्ध होगा। वहाँपर भी प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे; जो महाप्रतापी, योगात्मा, महात्मा, संयत आत्मावाले एवं ब्रह्मचारी होंगे। वे सब निष्ठापूर्वक योगव्रतका पालन करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९९-१०२१/२॥ |
| द्वाविंशे परिवर्ते तु व्यासः शुष्मायणो यदा॥ १०३<br>तदाप्यहं भविष्यामि वाराणस्यां महामुनिः।<br>नाम्ना वै लाङ्गली भीमो यत्र देवाः सवासवाः॥ १०४<br>द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन् भवं चैव हलायुधम्। | बाईसवें द्वापरके अन्तमें जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, उस समय मैं महामुनि 'भीम' नामसे हल धारण किये काशीमें अवतार ग्रहण करूँगा, जहाँपर उस कलिमें इन्द्रसहित सभी देवतागण अस्त्ररूपमें हल धारण करनेवाले हलायुध मुझ शिवका दर्शन प्राप्त करेंगे॥ १०३-१०४१/२॥ |
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः॥ १०५<br>भल्लवी मधुपिङ्गाक्षश्च श्वेतकेतुः कुशस्तथा।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं तेऽपि ध्यानपरायणाः॥ १०६<br>विमला ब्रह्मभूयिष्ठा रुद्रलोकाय संस्थिताः। | वहाँपर भी भल्लवी, मधुपिंग, श्वेतकेतु तथा कुश नामक मेरे चार पुत्र होंगे। अतिशय धर्मनिष्ठ, ध्यानपरायण, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मभावको प्राप्त वे पुत्र भी माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ १०५-१०६१/२॥ |
| परिवर्ते त्रयोविंशे तृणबिन्दुर्यदा मुनिः॥ १०७<br>व्यासो हि भविता ब्रह्मांस्तदाहं भविता पुनः।<br>श्वेतो नाम महाकायो मुनिपुत्रस्तु धार्मिकः॥ १०८<br>तत्र कालं जरिष्यामि तदा गिरिवरोत्तमे।<br>तेन कालञ्जरो नाम भविष्यति स पर्वतः॥ १०९<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च॥ ११०<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः। | हे ब्रह्मन्! पुनः तेईसवें द्वापरके अन्तमें जब मुनि तृणबिन्दु नामक व्यास होंगे, उस समय मैं धर्मनिष्ठ तथा महाकाय मुनिपुत्रके रूपमें 'श्वेत' नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ उत्तम पर्वतपर मैं कालको जीर्ण (व्यतीत) करूँगा, अतः वह पर्वत 'कालंजर' नामसे विख्यात होगा। वहाँपर भी उशिक, बृहदश्व, देवल तथा कवि नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। वे माहेश्वर योगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायेंगे॥ १०७-११०१/२॥ |
| परिवर्ते चतुर्विंशे व्यासो ऋक्षो यदा विभो॥ १११<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>शूली नाम महायोगी नैमिषे देववन्दिते॥ ११२<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः॥ ११३<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण रुद्रलोकाय संस्थिताः। | हे विभो! चौबीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋक्षमुनि व्यास होंगे, तब मैं उस युगान्त तथा कलिके प्रारम्भमें देववन्द्य नैमिषारण्यमें महान् योगीके रूपमें 'शूली' नामसे अवतार लूँगा। वहाँ भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपोधन शिष्य होंगे। वे भी उसी योगमार्गसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १११-११३१/२॥ |
| पञ्चविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ११४ |
अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन ११७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वासिष्ठस्तु यदा व्यासः शक्तिर्नाम्ना भविष्यति।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दण्डी मुण्डीश्वरः प्रभुः॥ ११५<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>छागलः कुण्डकर्णश्च कुभाण्डश्च प्रवाहकः॥ ११६<br>प्राप्य माहेश्वरं योगममृतत्वाय ते गताः। | पुनः क्रमिक रूपसे पचीसवें द्वापरके अन्तमें जब वसिष्ठजीके पुत्र शक्तिमुनि व्यास होंगे, उस समय जगत्प्रभु मैं दण्ड धारण किये हुए मुण्डीश्वर नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी छागल, कुण्डकर्ण, कुभाण्ड तथा प्रवाहक नामक मेरे चार तपोव्रती पुत्र होंगे। माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर वे अमरत्वको प्राप्त होंगे॥ ११४-११६ १/२॥ |
| षड्विंशे परिवर्ते तु यदा व्यासः पराशरः॥ ११७<br>तदाप्यहं भविष्यामि सहिष्णुर्नाम नामतः।<br>पुरं भद्रवटं प्राप्य कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ११८<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः।<br>उलूको विद्युतश्चैव शम्बूको ह्याश्वलायनः॥ ११९<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः। | छब्बीसवें द्वापरके अन्तमें जब पराशर नामक व्यास होंगे, उस समय भी उस युगान्तमें मैं कलिके प्रारम्भमें भद्र-वटक्षेत्रमें सहिष्णु नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ भी उलूक, विद्युत, शम्बूक तथा आश्वलायन नामक अत्यन्त धर्मपरायण मेरे चार पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ११७-११९ १/२॥ |
| सप्तविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२०<br>जातूकर्ण्यो यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि सोमशर्मा द्विजोत्तमः॥ १२१<br>प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा योगविश्रुतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः॥ १२२<br>अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च।<br>योगात्मानो महात्मानो विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ १२३<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं ततो गताः। | पुनः क्रमिक रूपसे सत्ताईसवें द्वापरके अन्तमें जब तपस्वी जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं योगविश्रुत तथा योगात्मा द्विजश्रेष्ठ सोमशर्माके रूपमें प्रभासक्षेत्रमें अवतरित होऊँगा। वहाँपर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। योगात्मा, महात्मा, निर्विकारहृदय तथा शुद्ध बुद्धिवाले वे शिष्य माहेश्वरयोग प्राप्त करके अन्तमें रुद्रलोक जायँगे॥ १२०-१२३ १/२॥ |
| अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२४<br>पराशरसुतः श्रीमान् विष्णुर्लोकपितामहः।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना द्वैपायनः प्रभुः॥ १२५<br>तदा षष्ठेन चांशेन कृष्णः पुरुषसत्तमः।<br>वसुदेवाद्यदुश्रेष्ठो वासुदेवो भविष्यति॥ १२६<br>तदाप्यहं भविष्यामि योगात्मा योगमायया।<br>लोकविस्मयनार्थाय ब्रह्मचारिशरीरकः॥ १२७<br>श्मशाने मृतमुत्सृष्टं दृष्ट्वा कायमनाथकम्।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय प्रविष्टो योगमायया॥ १२८<br>दिव्यां मेरुगुहां पुण्यां त्वया सार्धं च विष्णुना।<br>भविष्यामि तदा ब्रह्मन् लकुली नाम नामतः॥ १२९<br>कायावतार इत्येवं सिद्धक्षेत्रं च वै तदा।<br>भविष्यति सुविख्यातं यावद्भूमिर्धरिष्यति॥ १३० | पुनः क्रमसे अट्ठाईसवें द्वापरके आनेपर जब श्रीमान् लोकपितामह विष्णु अपने छठे अंशसे पराशरपुत्र 'कृष्णद्वैपायन' नामक व्यास होंगे, तब यदुश्रेष्ठ पुरुषोत्तम वासुदेव कृष्ण वसुदेवसे उत्पन्न होंगे। उस समय योगात्मा मैं लोगोंको विस्मित करनेके उद्देश्यसे योगमायासे एक ब्रह्मचारीका शरीर धारणकर प्रकट होऊँगा और योगमायाके प्रभावसे ब्राह्मणोंके कल्याणार्थ श्मशानमें मृत पड़े एक अनाथ ब्राह्मणका शरीर देखकर उसमें प्रवेश करूँगा। दिव्य तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मेरुगुहामें आपके एवं विष्णुके साथ मैं निवास करूँगा। हे ब्रह्मन्! उस समय मैं लकुली नामसे विख्यात होऊँगा और मेरा अवतार-स्थल जबतक भूमिकी सत्ता रहेगी, तबतक एक सिद्धक्षेत्रके रूपमें कायावतार—इस नामसे विख्यात रहेगा॥ १२४-१३०॥ |
| ११८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रः कौरुष्य एव च ॥ १३१<br>योगात्मानो महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं विमला ह्यूर्ध्वरेतसः॥ १३२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्। | वहाँपर भी कुशिक, गर्ग, मित्र तथा कौरुष्य नामक मेरे चार तपस्वी, योगात्मा, ब्रह्मज्ञानी और वेदोंके पारगामी विद्वान् पुत्र होंगे। विशुद्ध आत्मावाले तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेवाले वे पुत्र माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर पुनरागमनसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १३१-१३२ १/२॥ |
| एते पाशुपताः सिद्धा भस्मोद्धूलितविग्रहाः ॥ १३३<br>लिङ्गार्चनरता नित्यं बाह्याभ्यन्तरतः स्थिताः।<br>भक्त्या मयि च योगेन ध्याननिष्ठा जितेन्द्रियाः ॥ १३४ | ये पाशुपतयोगमें सिद्ध, भस्मसे विभूषित शरीरवाले, नित्य शिवलिङ्गके अर्चनमें तत्पर रहनेवाले, बाहर एवं भीतरसे भक्तिपूर्वक योगके द्वारा मुझमें स्थित रहनेवाले, ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होंगे॥ १३३-१३४॥ |
| संसारबन्धच्छेदार्थं ज्ञानमार्गप्रकाशकम्।<br>स्वरूपज्ञानसिद्ध्यर्थं योगं पाशुपतं महत् ॥ १३५ | ज्ञानमार्गका प्रकाशक यह पाशुपतयोग सांसारिक बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करने तथा आत्मज्ञान सिद्ध करनेके लिये एक महान् उपाय है॥ १३५॥ |
| योगमार्गा अनेकाश्च ज्ञानमार्गास्त्वनेकशः।<br>न निवृत्तिमपायान्ति विना पञ्चाक्षरीं क्वचित् ॥ १३६ | इस जगत्में अनेक योगमार्ग हैं तथा अनेक ज्ञानमार्ग हैं; किंतु पंचाक्षरी विद्या (नमः शिवाय)-के बिना प्राणी सांसारिक बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकते॥ १३६॥ |
| यदाचरेत्तपश्चार्यं सर्वद्वन्द्वविवर्जितम्।<br>तदा स मुक्तो मन्तव्यः पक्वं फलमिव स्थितः ॥ १३७ | जो मनुष्य सभी द्वन्द्वोंसे रहित होकर तप करता है, वह पके फलकी भाँति मुक्तिके लिये उपस्थित रहता है॥ १३७॥ |
| एकाहं यः पुमान् सम्यक् चरेत्पाशुपतव्रतम्।<br>न सांख्ये पञ्चरात्रे वा न प्राप्नोति गतिं कदा ॥ १३८ | जो पुरुष मात्र एक दिन भलीभाँति पाशुपतव्रत धारण करता है, वह उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उसे सांख्य तथा पञ्चरात्रसे कभी नहीं मिलती॥ १३८॥ |
| इत्येतद्वै मया प्रोक्तमवतारेषु लक्षणम्।<br>मन्वादिकृष्णपर्यन्तमष्टाविंशद्युगक्रमात् ॥ १३९<br>तत्र श्रुतिसमूहानां विभागो धर्मलक्षणः।<br>भविष्यति तदा कल्पे कृष्णद्वैपायनो यदा ॥ १४० | इस प्रकार मैंने युगक्रमसे मनुसे लेकर कृष्णद्वैपायन पर्यन्त अट्ठाईस अवतारोंका वर्णन आपसे कर दिया। उस कल्पमें जब धर्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब वे ही वेदसमूहोंका विभाग करेंगे॥ १३९-१४०॥ |
| सूत उवाच<br>निशम्यैवं महातेजा महादेवेन कीर्तितम्।<br>रुद्रावतारं भगवान् प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ १४१<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः पुनः प्राह च शङ्करम्। | सूतजी बोले— इस प्रकार महादेवके द्वारा कही गयी रुद्रावतारकी बातें सुनकर महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने प्रणामपूर्वक प्रिय वाणीसे महेश्वर शिवकी स्तुति की और पुनः उनसे कहा॥ १४१ १/२॥ |
| पितामह उवाच<br>सर्वे विष्णुमया देवाः सर्वे विष्णुमया गणाः ॥ १४२<br>न हि विष्णुसमा काचिद् गतिरन्या विधीयते।<br>इत्येवं सततं वेदा गायन्ति नात्र संशयः ॥ १४३ | पितामह बोले— सभी देवता तथा सभी गण विष्णुसे ही व्याप्त हैं। विष्णुके समान कोई अन्य गति हो ही नहीं सकती। ऐसा वेद निरन्तर गाते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है॥ १४२-१४३॥ |
| स देवदेवो भगवांस्तव लिङ्गार्चने रतः।<br>तव प्रणामपरमः कथं देवो ह्यभूत्प्रभुः ॥ १४४ | वे देवाधिदेव भगवान् विष्णु आपके लिङ्गार्चनमें |
अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया १११
| सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रपिबन्निव चक्षुर्भ्यां प्रीतस्तत्प्रश्नगौरवात्॥ १४५<br><br>पूजाप्रकरणं तस्मै तमालोक्याह शङ्करः।<br>भवान्नारायणश्चैव शक्रः साक्षात्सुरोत्तमः॥ १४६<br><br>मुनयश्च सदा लिङ्गं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्।<br>स्वं स्वं पदं विभो प्राप्तास्तस्मात्सम्पूजयन्ति ते॥ १४७ | निरन्तर रत क्यों रहते हैं तथा जगत्पति होकर भी सदा आपको प्रणाम क्यों करते हैं?॥ १४४॥<br><br>सूतजी बोले—परमेष्ठी ब्रह्माजीका वचन सुनकर हर्षातिरेकसे युक्त नेत्रोंवाले भगवान् शंकर उनके इस महत्त्वपूर्ण प्रश्नसे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें लिङ्ग-पूजा-प्रकरणके विषयमें बताया। भगवान् विष्णु, साक्षात् सुरश्रेष्ठ इन्द्र तथा मुनियोंने विधिविधानसे लिङ्गकी पूजा करके ही अपने-अपने पद प्राप्त किये हैं। हे विभो! इसीलिये वे लिङ्गपूजनमें तत्पर रहते हैं॥ १४५–१४७॥ | | लिङ्गार्चनं विना निष्ठा नास्ति तस्माज्जनार्दनः।<br>आत्मनो यजते नित्यं श्रद्धया भगवान् प्रभुः॥ १४८ | लिङ्गके अर्चनके बिना निष्ठाकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये जगत्पति भगवान् विष्णु श्रद्धापूर्वक मेरे लिङ्गका पूजन करते हैं॥ १४८॥ | | इत्येवमुक्त्वा ब्रह्माणमनुगृह्य महेश्वरः।<br>पुनः सम्प्रेक्ष्य देवेशं तत्रैवान्तरधीयत॥ १४९ | देवेश ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर तथा पुनः उनके ऊपर कृपादृष्टि डालकर महेश्वर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १४९॥ | | तमुद्दिश्य तदा ब्रह्मा नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>स्रष्टुं त्वशेषं भगवान् लब्धसंज्ञस्तु शङ्करात्॥ १५० | तत्पश्चात् उन शिवको हाथ जोड़कर प्रणाम करके और उनसे आज्ञा प्राप्त करके वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी रचना करनेमें प्रवृत्त हो गये॥ १५०॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधव्यासावतारवर्णनं नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधव्यासावतारवर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥
पचीसवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो लिङ्गमूर्तिर्महेश्वरः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण साम्प्रतम्॥ १ | ऋषिगण बोले—हे सूतजी! लिङ्गस्वरूप महेश्वर महादेवकी पूजा किस प्रकार की जानी चाहिये? अब आप हमलोगोंको यह बतानेकी कृपा करें॥ १॥ |
|---|---|
| सूत उवाच<br>देव्या पृष्टो महादेवः कैलासे तां नगात्मजाम्।<br>अङ्कस्थाम्राह देवेशो लिङ्गार्चनविधिं क्रमात्॥ २ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसी विषयमें कैलास पर्वतपर देवी पार्वतीके द्वारा पूछे जानेपर देवाधिदेव महादेवने अपने अंकमें विराजमान गिरिराजकिशोरी पार्वतीसे लिङ्गार्चन विधिका क्रमसे वर्णन किया था॥ २॥ |
| तदा पार्श्वे स्थितो नन्दी शालङ्कायनकात्मजः।<br>श्रुत्वाखिलं पुरा प्राह ब्रह्मपुत्राय सुव्रताः॥ ३ | हे सुव्रतो! उस समय समीपमें ही स्थित शालंकायनके पुत्र नन्दीने उस विधिका श्रवण करके पहले ब्रह्मापुत्र |
१२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सनत्कुमाराय शुभं लिङ्गार्चनविधिं परम्।<br>तस्माद् व्यासो महातेजाः श्रुतवाञ्छ्रुतिसम्मितम्॥ ४ | सनत्कुमारको वह परम पवित्र लिङ्गार्चनविधि बतायी और उनसे महातेजस्वी व्यासजीने वह श्रुतिप्रतिपादित विधि सुनी॥ ३-४॥ |
| स्नानयोगोपचारं च यथा शैलादिनो मुखात्।<br>श्रुतवान् तत्प्रवक्ष्यामि स्नानाद्यं चार्चनाविधिम्॥ ५ | शैलादि (नन्दी)-के मुखसे स्नान तथा लिङ्ग-पूजानुष्ठानकी जो विधि कही गयी है एवं जो मैंने भी सुनी है, उस स्नान तथा अर्चनविधिका आपलोगोंसे वर्णन करूँगा॥ ५॥ |
| शैलादिरुवाच<br>अथ स्नानविधिं वक्ष्ये ब्राह्मणानां हिताय च।<br>सर्वपापहरं साक्षाच्छिवेन कथितं पुरा॥ ६ | **शैलादि (नन्दिकेश्वर) बोले—**ब्राह्मणोंके कल्याणके निमित्त अब मैं स्नान-विधिके विषयमें कहूँगा। यह [विधिपूर्वक किया गया स्नान] सभी पापोंको दूर करनेवाला है। पूर्वकालमें स्वयं भगवान् शंकरने इसके महत्त्वका वर्णन किया है॥ ६॥ |
| अनेन विधिना स्नात्वा सकृत्पूज्य च शङ्करम्।<br>ब्रह्मकूर्चं च पीत्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७ | इस विधिसे स्नान करनेके बाद भक्तिपूर्वक एक बार शंकरजीकी पूजा करके विधिपूर्वक निर्मित ब्रह्मकूर्च (पंचगव्य)-का पानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥ |
| त्रिविधं स्नानमाख्यातं देवदेवेन शम्भुना।<br>हिताय ब्राह्मणाद्यानां चतुर्मुखसुतोत्तम॥ ८ | हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! ब्राह्मण आदिके हितके लिये देवाधिदेव शंकरने तीन प्रकारके स्नानोंका वर्णन किया है॥ ८॥ |
| वारुणं पुरतः कृत्वा ततश्चाग्नेयमुत्तमम्।<br>मन्त्रस्नानं ततः कृत्वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ९ | सर्वप्रथम जलस्नान करनेके बाद श्रेष्ठ अग्निस्नान (भस्मस्नान)-और फिर मार्जनरूप मन्त्रस्नान करके परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये॥ ९॥ |
| भावदुष्टोऽम्भसि स्नात्वा भस्मना च न शुध्यति।<br>भावशुद्धश्चरेच्छौचमन्यथा न समाचरेत्॥ १० | भावदुष्ट अर्थात् श्रद्धारहित प्राणी जलमें स्नान करके तथा भस्म लगा लेनेसे शुद्ध नहीं हो जाता है। भावनासे शुद्ध होकर ही मनुष्यको शुद्धि करनी चाहिये, अन्यथा नहीं॥ १०॥ |
| सरित्सरस्तडागेषु सर्वेष्वाप्रलयं नरः।<br>स्नात्वापि भावदुष्टश्चेन्न शुध्यति न संशयः॥ ११ | प्रलयपर्यन्त सभी नदियों, सरोवरों तथा तड़ागोंमें स्नान करके भी भावनासे दूषित मनवाला व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११॥ |
| नृणां हि चित्तकमलं प्रबुद्धमभवद्यदा।<br>प्रसुप्तं तमसा ज्ञानभानोर्भासा तदा शुचिः॥ १२ | तमोगुणके प्रभावसे मनुष्यका प्रसुप्त चित्तकमल जब ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशसे चेतनायुक्त हो जाता है, तभी शुद्धि हो पाती है॥ १२॥ |
| मृच्छकृत्तिलपुष्पं च स्नानार्थं भसितं तथा।<br>आदाय तीरे निःक्षिप्य स्नानतीर्थे कुशानि च॥ १३<br><br>प्रक्षाल्याचम्य पादौ च मलं देहाद्विशोध्य च।<br>द्रव्यैस्तु तीरदेशस्थैस्ततः स्नानं समाचरेत्॥ १४ | मिट्टी, गोमय, तिल, पुष्प तथा भस्म आदि लेकर स्नानके लिये स्नानतीर्थ जाकर वहाँ तटपर कुश बिछा लेना चाहिये। तदनन्तर दोनों पैर धोकर पुनः आचमन |
अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया [ १२१
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| करके तीर्थदेशमें स्थित द्रव्योंसे शरीरके मलका शोधन करनेके उपरान्त स्नान करना चाहिये॥ १३-१४॥ | |
| उद्धृतासीति मन्त्रेण पुनर्देहं विशोधयेत्।<br>मृदादाय ततश्चान्यद्वस्त्रं स्नात्वा ह्यनुल्बणम्॥ १५ | तत्पश्चात् 'उद्धृतासि वराहेण'^१ यह मन्त्र पढ़कर मिट्टी लेकर उससे शरीरकी शुद्धि करनी चाहिये। इसके अनन्तर स्नान करके दूसरा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये॥ १५॥ |
| गन्धद्वारां दुराधर्षामिति मन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>कपिलागोमयेनैव खस्थेनैव तु लेपयेत्॥ १६<br><br>पुनः स्नात्वा परित्यज्य तद्वस्त्रं मलिनं ततः।<br>शुक्लवस्त्रपरीधानो भूत्वा स्नानं समाचरेत्॥ १७ | पुनः मन्त्रवित् पुरुषको चाहिये कि वह 'गन्धद्वारां दुराधर्षाम्'^२ इस मन्त्रको पढ़कर कपिला गायके भूस्पर्शरहित गोमयका शरीरपर लेपन करे। इसके बाद स्नान करके उस मलिन वस्त्रको छोड़कर पुनः श्वेत वस्त्र धारण करके स्नान करना चाहिये॥ १६-१७॥ |
| सर्वपापविशुद्ध्यर्थमावाह्य वरुणं तथा।<br>सम्पूज्य मनसा देवं ध्यानयज्ञेन वै भवम्॥ १८<br><br>आचम्य त्रिस्तदा तीर्थे ह्यवगाह्य भवं स्मरन्।<br>पुनराचम्य विधिवदभिमन्त्र्य महाजलम्॥ १९<br><br>अवगाह्य पुनस्तस्मिन् जपेद्वै चाघमर्षणम्।<br>तत्तोये भानुसोमाग्निमण्डलं च स्मरेदृशी॥ २० | समस्त पापोंसे विमुक्तिके लिये वरुणदेवका आवाहन करके तथा मानसिक उपचारोंसे भगवान् शंकरकी विधिवत् पूजा करके तीन बार आचमनकर जलको अभिमन्त्रित करके शिवका स्मरण करते हुए तीर्थजलमें प्रवेश करे। इसके बाद गोता लगाकर 'ऋतञ्च सत्यञ्च'^३ इस अघमर्षण मन्त्रका जप करते हुए उस जलमें सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि—इन तीनोंके मण्डलोंका उस संयमी व्यक्तिको ध्यान करना चाहिये॥ १८-२०॥ |
| आचम्य च पुनस्तस्माजलादुत्तीर्य मन्त्रवित्।<br>प्रविश्य तीर्थमध्ये तु पुनः पुण्यविवृद्धये॥ २१ | फिर आचमन करके उस जलसे निकलकर पुण्यकी वृद्धिहेतु उस मन्त्रवित्को पुनः जलमध्यमें प्रवेश करना चाहिये॥ २१॥ |
| शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशैः क्षालितैस्तथा।<br>सकुशेन सपुष्पेण जलेनैवाभिषेचयेत्॥ २२<br><br>रुद्रेण पवमानेन त्वरिताख्येन मन्त्रवित्।<br>तरत्समन्दीवर्गाद्यैस्तथा शान्तिद्वयेन च॥ २३<br><br>शान्तिधर्मेण चैकेन पञ्चब्रह्मपवित्रकैः।<br>तत्तन्मन्त्राधिदेवानां स्वरूपं च ऋषीन् स्मरन्॥ २४ | मन्त्रवेत्ता गोशृंगके द्वारा अथवा प्रक्षालित पलाश-पत्ररचित पुटकद्वारा अथवा कुशा और पुष्प आदिद्वारा गृहीत जलसे रुद्र-सूक्त (शु०यजुर्वेद अ० १९ के नमस्ते रुद्र० इत्यादि ६६ मन्त्र), पवमानसूक्त (ऋग्वेदकी पावमानी ऋचाएँ), यो रुद्र० इत्यादि त्वरितसंज्ञक मन्त्र, तरत्समन्दी इत्यादि आद्याक्षरवाले मन्त्रों (ऋग्वेद ९।५८), शं नो मित्र० आदि दो मन्त्रों (यजु० ३६।९-१०), शान्तिधर्मक शं नो देवी० (शु०यजु० ३६।१२) एक मन्त्र, पञ्चब्रह्मपवित्रक सद्योजातादि मन्त्र-पंचकका^४ पाठ करते |
१. उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। मृत्तिके त्वां च गृह्णामि प्रजया च धनेन च॥
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
३. ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः। (ऋग्वेद १०।१९०।१)
४. (क) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (ख) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय
२६- भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहा-यज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान
| १२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| एवं हि चाभिषिच्याथ स्वमूर्ध्नि पयसा द्विजाः।<br>ध्यायेच्च त्र्यम्बकं देवं हृदि पञ्चास्यमीश्वरम्॥ २५<br><br>आचम्याचमनं कुर्यात्स्वसूत्रोक्तं समीक्ष्य च।<br>पवित्रहस्तः स्वासीनः शुचौ देशे यथाविधि॥ २६<br><br>अभ्युक्ष्य सकुशं चापि दक्षिणेन करेण तु।<br>पिबेत्प्रक्षिप्य त्रिस्तोयं चक्री भूत्वा ह्यातन्द्रितः॥ २७<br><br>प्रदक्षिणं ततः कुर्याद्विंसापापप्रशान्तये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं स्नानाचमनमुत्तमम्॥ २८<br><br>सर्वेषां ब्राह्मणानां तु हितार्थे द्विजसत्तमाः॥ २९। | हुए इन मन्त्रोंके अधिदेवताओंके स्वरूप एवं ऋषियोंका स्मरण करते हुए आत्माभिषेचन करे॥ २२–२४॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार जलसे अपने मस्तकपर अभिषेक करके त्रिनेत्र तथा पंचमुख परमेश्वर महादेवका हृदयमें ध्यान करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रकी रीतिके अनुसार आचमन करना चाहिये। तदनन्तर पवित्र स्थानमें सुन्दर आसनपर बैठकर हाथमें पवित्रक लेकर उस कुशके द्वारा दाहिने हाथसे अपने ऊपर जल छिड़के। पुनः जल लेकर तीन बार आचमन करके सभी हिंसा तथा पापोंके शमनके लिये आलस्यरहित होकर अपने स्थानपर घूमते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार मैंने सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें स्नान तथा आचमनके अत्युत्तम विधानका वर्णन कर दिया॥ २५–२९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे स्नानविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'स्नानविधि' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान
| नन्द्युवाच<br>आवाहयेत्ततो देवीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>आयातु वरदा देवीत्यनेनैव महेश्वरीम्॥ १<br><br>पाद्यमाचमनीयं च तस्याश्चार्घ्यं प्रदापयेत्।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा समासीनः स्थितोऽपि वा॥ २<br><br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>गायत्रीं प्रणवेनैव त्रिविधेष्वेक्रमाचरेत्॥ ३<br><br>अर्घ्यं दत्त्वा समभ्यर्च्य प्रणम्य शिरसा स्वयम्।<br>उत्तमे शिखरे देवीत्युक्त्वोद्वास्य च मातरम्॥ ४ | नन्दिकेश्वर बोले—[हे सनत्कुमार!] इस विधिसे स्नान करनेके पश्चात् 'आयातु वरदा देवी' इस मन्त्रसे महेश्वरी वेदमाता गायत्रीका आवाहन करना चाहिये और पुनः पाद्य, आचमन, अर्घ्य आदि अर्पित करना चाहिये। पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्रीजप प्रणवके साथ नियमपूर्वक करना चाहिये। इन तीनोंमें किसी एक विधिसे ही जप करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>सूर्यको अर्घ्य देकर उनका पूजनकर सिर झुकाकर |
नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (ग) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (घ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (ङ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥
अध्याय २६ ] भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप…भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान [ १२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्राच्यालोक्याभिवन्द्येशां गायत्रीं वेदमातरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रार्थयेद्भास्करं तथा॥ ५<br><br>(चित्र: सूर्य-प्रार्थना)<br><br>उदुत्यं च तथा चित्रं जातवेदसमेव च।<br>अभिवन्द्य पुनः सूर्यं ब्रह्माणं च विधानतः॥ ६<br><br>तथा सौराणि सूक्तानि ऋग्यजुःसामजानि च।<br>जप्त्वा प्रदक्षिणं पश्चात्रिः कृत्वा च विभावसोः॥ ७ | प्रणाम करके **‘उत्तमे शिखरे देवी’**¹ ऐसा कहकर माताका विसर्जन करके पूर्व दिशामें देखते हुए वेदमाता महेश्वरी गायत्रीका अभिवन्दन करके दोनों हाथ जोड़कर सूर्यकी प्रार्थना करनी चाहिये। **‘उदुत्यं जातवेदसम्’**² तथा **‘चित्रं देवानाम्’**³—इन मन्त्रोंसे सूर्य तथा ब्रह्माको नमस्कार करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके सूर्यसम्बन्धी सूक्तोंका विधानपूर्वक पाठ करके तीन बार सूर्यदेवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये॥ ४—७॥ |
| आत्मानं चान्तरात्मानं परमात्मानमेव च।<br>अभिवन्द्य पुनः सूर्यं ब्रह्माणं च विभावसुम्॥ ८<br><br>मुनीन् पितॄन् यथान्यायं स्वनाम्नावाहयेत्ततः।<br>सर्वानावाहयामीति देवानावाह्य सर्वतः॥ ९<br><br>तर्पयेद्विधिना पश्चात्प्राङ्मुखो वा ह्युदङ्मुखः।<br>ध्यात्वा स्वरूपं तत्तत्त्वमभिवन्द्य यथाक्रमम्॥ १० | इसके बाद आत्मा, अन्तरात्मा तथा परमात्माका ध्यान करके सूर्य, ब्रह्मा एवं अग्निको प्रणाम करना चाहिये। पुनः मुनियों, पितरों तथा देवताओं—सभीका उनका अपने नामसे आवाहन करे। सबको आवाहित करके पूर्वमुख अथवा उत्तरमुख होकर उनके तत्त्वों तथा स्वरूपोंका ध्यान करके विधिपूर्वक क्रमसे तीर्थके जलसे तर्पण करना चाहिये और अन्तमें प्रणाम करना चाहिये॥ ८—१०॥ |
| देवानां पुष्पतोयेन ऋषीणां तु कुशाम्भसा।<br>पितॄणां तिलतोयेन गन्धयुक्तेन सर्वतः॥ ११ | पुष्पयुक्त जलसे देवताओंका, कुशयुक्त जलसे ऋषियोंका तथा तिल और गन्धयुक्त जलसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये॥ ११॥ |
| यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणम्।<br>प्राचीनावीती विप्रेन्द्र पितॄणां तर्पयेत् क्रमात्॥ १२ | हे विप्रेन्द्र! यज्ञोपवीती अर्थात् सव्य होकर देवतर्पण, निवीती अर्थात् कण्ठमें यज्ञोपवीत धारण करके ऋषितर्पण<br><br>(चित्र: हाथके विभिन्न तीर्थ — देवतीर्थ, पितृतीर्थ, अग्नितीर्थ, कायतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ)<br><br>तथा प्राचीनावीती अर्थात् अपसव्य होकर पितृतर्पण क्रमानुसार करना चाहिये॥ १२॥ |
१. ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि। ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्॥
२. ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः॥ दृशे विश्वाय सूर्यम्॥ (यजु० ७।४१)
३. ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ऽसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥ (यजु० ७।४२)
| १२४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| अङ्गुल्यग्रेण वै धीमांस्तर्पयेद्देवतर्पणम्।<br>ऋषींन् कनिष्ठाङ्गुलिना श्रोत्रियः सर्वसिद्धये ॥ १३<br>पितॄंस्तु तर्पयेद्विद्वान् दक्षिणाङ्गुष्ठकेन तु। | सभी सिद्धियोंकी प्राप्तिके लिये बुद्धिमान् तथा विद्वान् वेदज्ञ ब्राह्मणको चाहिये कि वह अंगुलिके अग्रभागसे देवतर्पण, कनिष्ठ अँगुलीसे ऋषितर्पण एवं दाहिने अँगूठेसे पितृतर्पण सम्पन्न करे ॥ १३<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| तथैवं मुनिशार्दूल ब्रह्मयज्ञं यजेद् द्विजः॥ १४<br>देवयज्ञं च मानुष्यं भूतयज्ञं तथैव च।<br>पितृयज्ञं च पूतात्मा यज्ञकर्मपरायणः॥ १५ | हे मुनिश्रेष्ठ! इसी प्रकार यज्ञकर्मपरायण तथा पवित्रात्मा द्विजको ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, मनुष्ययज्ञ, भूतयज्ञ एवं पितृयज्ञ करना चाहिये ॥ १४-१५ ॥ |
| स्वशाखाध्ययनं विप्रा ब्रह्मयज्ञ इति स्मृतः।<br>अग्नौ जुहोति यच्चान्नं देवयज्ञ इति स्मृतः ॥ १६<br>सर्वेषामेव भूतानां बलिदानं विधानतः।<br>भूतयज्ञ इति प्रोक्तो भूतिदः सर्वदेहिनाम् ॥ १७<br>सदारान् सर्वतत्त्वज्ञान् ब्राह्मणान् वेदपारगान्।<br>प्रणम्य तेभ्यो यद्दत्तन्नं मानुष उच्यते ॥ १८<br>पितॄनुद्दिश्य यद्दत्तं पितृयज्ञः स उच्यते।<br>एवं पञ्च महायज्ञान् कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ १९ | हे विप्रो! अपनी शाखाका अध्ययन करना ब्रह्मयज्ञ कहा गया है तथा अग्निमें अन्न आदिका हवन देवयज्ञ कहा गया है। उसी प्रकार सभी भूतोंके लिये विधिपूर्वक बलि देना भूतयज्ञ कहा जाता है; यह भूतयज्ञ प्राणियोंको ऐश्वर्य प्रदान करनेवाला है। वेदवेत्ता एवं तत्त्वज्ञ ब्राह्मणोंको उनकी भार्यासहित सभीको प्रणाम करके उन्हें अन्नका दान करना मनुष्ययज्ञ कहा जाता है। पितरोंके निमित्त जो श्राद्ध आदि सम्पन्न किया जाता है, उसे पितृयज्ञ कहते हैं। इस प्रकार सभी मनोरथोंकी सिद्धिके लिये इन पाँच महायज्ञोंको करना चाहिये ॥ १६-१९ ॥ |
| सर्वेषां शृणु यज्ञानां ब्रह्मयज्ञः परः स्मृतः।<br>ब्रह्मयज्ञरतो मर्त्यो ब्रह्मलोके महीयते ॥ २०<br>ब्रह्मयज्ञेन तृप्यन्ति सर्वे देवाः सवासवाः।<br>ब्रह्मा च भगवान् विष्णुः शङ्करो नीललोहितः ॥ २१<br>वेदाश्च पितरः सर्वे नात्र कार्या विचारणा। | सुनिये, ब्रह्मयज्ञ सभी यज्ञोंसे श्रेष्ठ यज्ञ कहा गया है। ब्रह्मयज्ञ करनेवाला मनुष्य ब्रह्मलोकमें वास करते हुए आनन्दित होता है। ब्रह्मयज्ञसे इन्द्रसमेत सभी देवता, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, नीललोहित शंकरजी, सभी वेद तथा पितृगण संतुष्ट हो जाते हैं; इसमें किसी प्रकारकी शंका नहीं करनी चाहिये ॥ २०-२१<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| ग्रामाद् बहिर्गंतो भूत्वा ब्राह्मणो ब्रह्मयज्ञवित् ॥ २२<br>यावच्चदृष्टमभवदुटजानां छदं नरः।<br>प्राच्यामुदीच्यां च तथा प्रागुदीच्यामथापि वा ॥ २३<br>पुण्यमाचमनं कुर्याद् ब्रह्मयज्ञार्थमेव तत्। | ब्रह्मयज्ञ करनेके लिये ब्रह्मयज्ञवेत्ता ब्राह्मणको गाँवसे उतनी दूर बाहर चले जाना चाहिये, जहाँसे झोपड़ियोंकी छततक दिखायी न दे। वहाँ बैठकर पूर्व, उत्तर अथवा ईशान दिशाकी ओर मुख करके शुद्धिके लिये आचमन करना चाहिये ॥ २२-२३<sup>१</sup>/<sub>२</sub> ॥ |
| प्रीत्यर्थं च ऋचां विप्राः त्रिः पीत्वा प्लाव्य प्लाव्य च ॥ २४<br>यजुषां परिमृज्यैवं द्विः प्रक्षाल्य च वारिणा।<br>प्रीत्यर्थं सामवेदानामुपस्पृश्य च मूर्धनि ॥ २५<br>स्पृशेदथर्ववेदानां नेत्रे चाङ्गिरसां तथा।<br>नासिके ब्राह्मणोऽङ्गानां क्षाल्य क्षाल्य च वारिणा ॥ २६ | हे ब्राह्मणो! ऋग्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये तीन बार चुलुकभर जल पीकर, यजुर्वेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये जलद्वारा दो बार प्रक्षालन एवं परिमार्जन करके, सामवेदाधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिके लिये आचमन करके मूर्धाका स्पर्श करे। आंगिरससम्बन्धी अथर्ववेदके अधिष्ठातृ देवताकी प्रीतिकाके लिये नेत्रोंका स्पर्श करे। ब्राह्मणग्रन्थों, शिक्षा-कल्प आदि वेदांगोंकी प्रीतिके लिये |
अध्याय २६ ] भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप····भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान १२५
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अष्टादशपुराणानां ब्रह्माद्यानां तथैव च।<br>तथा चोपपुराणानां सौरादीनां यथाक्रमम्॥ २७<br><br>पुण्यानामितिहासानां शैवादीनां तथैव च।<br>श्रोत्रे स्पृशेद्धि तुष्ट्यर्थं हृद्देशं तु ततः स्पृशेत्॥ २८<br><br>कल्पादीनां तु सर्वेषां कल्पवित्कल्पवित्तमाः। | नासिकाको जलसे पवित्रकर स्पर्श करे। क्रमशः ब्रह्म आदि अठारह पुराणों, सौर आदि उपपुराणों, पवित्र इतिहासग्रन्थों तथा शैवादि आगमग्रन्थोंकी तुष्टिके लिये कानका स्पर्श करे। तदनन्तर हृदयदेशका स्पर्श करे। हे श्रेष्ठ कल्पवेत्ताओ! सभी कल्पग्रन्थोंके लिये भी पूर्वोक्त क्रिया करनी चाहिये॥ २४—२८ १/२॥ |
| एवमाचम्य चास्तीर्य दर्भपिञ्जूलमात्मनः॥ २९<br><br>कृत्वा पाणितले धीमानात्मनो दक्षिणोत्तरम्।<br>हेमाङ्गुलीयसंयुक्तो ब्रह्मबन्धुयुतोऽपि वा॥ ३०<br><br>विधिवद् ब्रह्मयज्ञं च कुर्यात्सूत्री समाहितः।<br>अकृत्वा च मुनिः पञ्च महायज्ञान् द्विजोत्तमः॥ ३१<br><br>भुक्त्वा च सूकराणां तु योनौ वै जायते नरः।<br>तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कर्तव्याः शुभमिच्छता॥ ३२ | बुद्धिमान् एवं संयमी श्रोत्रियको समाहितचित्त होकर इस प्रकार आचमन करके अपने दक्षिणसे उत्तरकी ओर कुश बिछाकर उसपर हाथ रखकर अपने हाथकी अँगुलीमें कुशाकी पवित्री अथवा सोनेकी अँगूठी धारणकर विधिपूर्वक ब्रह्मयज्ञ करना चाहिये। मुनि तथा द्विज होकर जो मनुष्य इन पाँच महायज्ञोंको किये बिना भोजन करता है, वह सूकरकी योनिमें जन्म लेता है। अतः अपने कल्याणके इच्छुक व्यक्तिको विशेष प्रयत्नके साथ इन्हें सम्पन्न करना चाहिये॥ २९—३२॥ |
| ब्रह्मयज्ञादथ स्नानं कृत्वादौ सर्वथात्मनः।<br>तीर्थं सङ्गृह्य विधिवत्प्रविशेच्छिविरं वशी॥ ३३<br><br>बहिरेव गृहात्पादौ हस्तौ प्रक्षाल्य वारिणा।<br>भस्मस्नानं ततः कुर्याद्विधिवद्देहशुद्धये॥ ३४<br><br>शोध्य भस्म यथान्यायं प्रणवेनाग्निहोत्रजम्।<br>ज्योतिः सूर्य इति प्रातर्जुहुयादुदिते यतः॥ ३५<br><br>ज्योतिर्गनिस्तथा सायं सम्यक् चानुदिते मृषा।<br>तस्मादुदितहोमस्थं भसितं पावनं शुभम्॥ ३६ | ब्रह्मयज्ञके पश्चात् डुबकी लगाकर स्नान करके इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले उस पुरुषको चाहिये कि तीर्थका जल लेकर विधिवत् शिविरमें प्रवेश करे। घरके बाहर जलसे हाथ-पैर धोकर पुनः देहकी शुद्धिके लिये विधिपूर्वक भस्मस्नान करना चाहिये। इसके लिये अग्निहोत्रका भस्म लेकर नियमानुसार प्रणवसे उसका शोधन कर लेना चाहिये। सूर्यके ज्योतिस्वरूप होनेसे सूर्योदयके पश्चात् प्रातःकाल 'ज्योतिः सूर्य०' इस मन्त्रसे और सायंकालमें 'ज्योतिराग्न०' इस मन्त्रसे हवन करना चाहिये। सूर्योदय हुए बिना किया गया अग्निहोत्र व्यर्थ होता है। इसलिये सूर्योदयके बाद किये गये हवनकी भस्म पवित्र तथा कल्याणप्रद होती है॥ ३३—३६॥ |
| नास्ति सत्यसमं यस्मादसत्यं पातकं च यत्।<br>ईशानेन शिरोदेशं मुखं तत्पुरुषेण च॥ ३७<br><br>उरोदेशमघोरेण गुह्यं वामेन सुव्रताः।<br>सद्येन पादौ सर्वाङ्गं प्रणवेनाभिषेचयेत्॥ ३८ | सत्यके समान कुछ भी नहीं है और असत्यसे बड़ा कोई पाप नहीं होता है। हे सुव्रतो! ईशानमन्त्रसे सिर, तत्पुरुषसे मुख, अघोरसे वक्षःस्थल, वामदेवसे गुह्यस्थान, सद्योजातसे दोनों पैर तथा प्रणवसे सभी अंगोंका भस्माभिषेचन करना चाहिये॥ ३७-३८॥ |
| ततः प्रक्षालयेत्पादं हस्तं ब्रह्मविदां वरः।<br>व्यपोह्य भस्म चादाय देवदेवमनुस्मरन्॥ ३९ | ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ पुरुषको इस भाँति भस्म-स्नान करके हाथ-पैर धोकर हाथमें कुश लेकर देवदेव |
२७- लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गा-भिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र
| १२६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| मन्त्रस्नानं ततः कुर्यादापो हि ष्ठादिभिः क्रमात्।<br>पुण्यैश्चैव तथामन्त्रैर्ऋग्यजुःसामसम्भवैः॥ ४० ॥ | शिवका स्मरण करते हुए 'आपो हि ष्ठा'* आदि मन्त्रों तथा ऋक्, यजुः एवं सामके पवित्र मन्त्रोंसे मन्त्रस्नान करना चाहिये॥ ३९-४०॥ |
| द्विजानां तु हितायैवं कथितं स्नानमद्य ते।<br>सङ्क्षिप्य यः सकृत्कुर्यात्स याति परमं पदम्॥ ४१ ॥ | ब्राह्मणोंके हितके लिये ही मैंने इस स्नानविधिका आज आपसे संक्षेपमें वर्णन किया है। जो मनुष्य एक बार भी इस विधिसे स्नान करेगा, वह परम गतिको प्राप्त होगा॥ ४१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पञ्चयज्ञविधानं नाम षड्विंशोऽध्यायः ॥ २६ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पंचयज्ञविधान' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत महेश्वरस्वरूप होकर विविध उपचारोंद्वारा लिङ्गपूजाका विधान, लिङ्गाभिषेककी महिमा तथा अभिषेकके मन्त्र
| शैलादिरुवाच | शैलादि बोले— |
|---|---|
| वक्ष्यामि शृणु सङ्क्षेपाल्लिङ्गार्चनविधिक्रमम्।<br>वक्तुं वर्षशतेनापि न शक्यं विस्तरेण यत्॥ १॥ | [हे सनत्कुमार!] सुनिये, अब मैं संक्षेपमें ही क्रमसे लिङ्गार्चन-विधिका वर्णन करूँगा; क्योंकि विस्तारके साथ इसका वर्णन तो सौ वर्षोंमें भी नहीं किया जा सकता है॥ १॥ |
| एवं स्नात्वा यथान्यायं पूजास्थानं प्रविश्य च।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा ध्यायेद्देवं त्रियम्बकम्॥ २<br><br>पञ्चवक्त्रं दशभुजं शुद्धस्फटिकसन्निभम्।<br>सर्वाभरणसंयुक्तं चित्राम्बरविभूषितम्॥ ३ | इस विधिसे नियमपूर्वक (त्रिविध जल, भस्म एवं मन्त्रसे) स्नानकर पूजाके स्थानपर प्रवेश करके तीन प्राणायामकर त्रिनेत्र, पंचमुख, दश भुजाओंवाले, शुद्ध स्फटिकतुल्य वर्णवाले, सभी आभूषणोंसे अलंकृत तथा विचित्र वस्त्रसे विभूषित शिवका ध्यान करना चाहिये॥ २-३॥ |
| तस्य रूपं समाश्रित्य दाहनप्लावनादिभिः।<br>शैवीं तनुं समास्थाय पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ४ | उनके इस रूपका ध्यानकर दाहन तथा प्लावन आदि भूतशुद्धिकी क्रियासे युक्त शैवी देहको हृदयमें स्थापित करके परमेश्वर शिवका पूजन करना चाहिये॥ ४॥ |
| देहशुद्धिं च कृत्वैव मूलमन्त्रं न्यसेत्क्रमात्।<br>सर्वत्र प्रणवेनैव ब्रह्माणि च यथाक्रमम्॥ ५ | इस प्रकार देहशुद्धि करके क्रमशः मूलमन्त्र, प्रणवयुक्त [अघोरादि पंच] ब्रह्ममन्त्रोंसे देहके सभी अंगोंमें न्यास करे॥ ५॥ |
| सूत्रे नमः शिवायेति छन्दांसि परमे शुभे।<br>मन्त्राणि सूक्ष्मरूपेण संस्थितानि यतस्ततः॥ ६ | परम कल्याणप्रद इस 'नमः शिवाय' सूत्रमें समस्त वेद तथा मन्त्र सूक्ष्मरूपमें विद्यमान रहते हैं। |
* ॐ आपो हि ष्ठा मयोभुवः। ॐ ता न ऊर्जे दधातन। ॐ महे रणाय चक्षसे। ॐ यो वः शिवतमो रसः। ॐ तस्य भाजयतेह नः। ॐ उशतीरिव मातरः। ॐ तस्मा अरं गमाम वः। ॐ यस्य क्षयाय जिन्वथ। ॐ आपो जनयथा च नः।
| अध्याय २७ ] | लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत लिङ्गपूजाका विधान | १२७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न्यग्रोधबीजे न्यग्रोधस्तथा सूत्रे तु शोभने।<br>महत्यपि महद् ब्रह्म संस्थितं सूक्ष्मवत्स्वयम्॥ ७ | जिस प्रकार वटके बीजमें विशाल वटवृक्षका भाव उपस्थित रहता है, उसी प्रकार इस पवित्र एवं महतयुक्त सूत्रमें महान् ब्रह्म सूक्ष्मरूपसे साक्षात् विराजमान है॥ ६-७॥ |
| सेचयेदर्चनस्थानं गन्धचन्दनवारिणा।<br>द्रव्याणि शोधयेत्पश्चात्क्षालनप्रोक्षणादिभिः॥ ८<br>क्षालनं प्रोक्षणं चैव प्रणवेन विधीयते।<br>प्रोक्षणीं चार्र्घ्यपात्रं च पाद्यपात्रमनुक्रमात्॥ ९ | पूजाके स्थानको गन्ध तथा चन्दनसे युक्त जलके द्वारा सेचित करना चाहिये; पुनः सभी पूजनद्रव्योंको क्षालन, प्रोक्षण आदिसे शोधित कर लेना चाहिये। क्षालन तथा प्रोक्षण प्रणवसे ही किया जाता है॥ ८ १/२॥ |
| तथा ह्याचमनीयार्थं कल्पितं पात्रमेव च।<br>स्थापयेद्विधिना धीमानवगुण्ठ्य यथाविधि॥ १०<br>दर्भैराच्छादयेच्चैव प्रोक्षयेच्छुद्धवारिणा।<br>तेषु तेष्वथ सर्वेषु क्षिपेत्तोयं सुशीतलम्॥ ११ | विवेकी पुरुषको चाहिये कि वह प्रोक्षणीपात्र, अर्घ्यपात्र, पाद्यपात्र तथा आचमनपात्रको भलीभाँति अनुक्रमसे स्थापित करे और फिर विधिपूर्वक अवगुंठन करे। पुनः उन सभी पात्रोंमें शुद्ध एवं शीतल जल डालकर उन्हें कुशोंसे ढककर उनपर शुद्ध जलका प्रोक्षण करना चाहिये॥ ९-११॥ |
| प्रणवेन क्षिपेत्तेषु द्रव्याण्यालोक्य बुद्धिमान्।<br>उशीरं चन्दनं चैव पाद्ये तु परिकल्पयेत्॥ १२<br>जातिकङ्कोलकर्पूरबहुमूलतमालकम् ।<br>चूर्णयित्वा यथान्यायं क्षिपेदाचमनीयके॥ १३<br>एवं सर्वेषु पात्रेषु दापयेच्चन्दनं तथा।<br>कर्पूरं च यथान्यायं पुष्पाणि विविधानि च॥ १४ | तत्पश्चात् बुद्धिमान् पुरुषको उन पात्रोंमें भलीभाँति देखकर विभिन्न द्रव्य प्रणवपूर्वक डालने चाहिये। पाद्यपात्रमें उशीर तथा चन्दन डाले और जाति, कंकोल, कपूर, शतावरी एवं तमालका चूर्ण बनाकर इन्हें उचित मात्रामें आचमनीय पात्रमें डाले। चंदन, कपूर तथा विविध प्रकारके पुष्प सभी पात्रोंमें डालने चाहिये॥ १२-१४॥ |
| कुशाग्रमक्षतांश्चैव यवव्रीहितिलानि च।<br>आज्यसिद्धार्थपुष्पाणि भसितं चार्र्घ्यपात्रके॥ १५<br>कुशपुष्पयवव्रीहिबहुमूलतमालकम् ।<br>दापयेत्प्रोक्षणीपात्रे भसितं प्रणवेन च॥ १६ | कुशका अग्रभाग, अक्षत, यव, धान, तिल, घी, सफेद सरसों, पुष्प तथा भस्म—इन्हें अर्घ्यपात्रमें डालना चाहिये। कुश, पुष्प, यव, धान, शतावरी, तमाल एवं भस्म—इन द्रव्योंको प्रणवसे प्रोक्षणीपात्रमें डालना चाहिये॥ १५-१६॥ |
| न्यसेत्पञ्चाक्षरं चैव गायत्रीं रुद्रदेवताम्।<br>केवलं प्रणवं वापि वेदसारमनुत्तमम्॥ १७ | तत्पश्चात् पञ्चाक्षर मन्त्र, रुद्रगायत्री अथवा केवल वेदसाररूप सर्वोत्तम प्रणवसे इन पात्रोंको अभिमन्त्रित करना चाहिये॥ १७॥ |
| अथ सम्प्रोक्षयेत्पश्चाद् द्रव्याणि प्रणवेन तु।<br>प्रोक्षणीपात्रसंस्थेन ईशानाद्यैश्च पञ्चभिः॥ १८ | इसके अनन्तर प्रणवयुक्त ईशान ( ॐ ईशानः सर्वविद्यानाम्० ) आदि पाँच याजुष मन्त्रोंसे प्रोक्षणीपात्रमें स्थित जलके द्वारा सभी पूजनद्रव्योंका प्रोक्षण करे॥ १८॥ |
| पार्श्वतो देवदेवस्य नन्दिनं मां समर्च्चयेत्।<br>दीप्तानलायुतप्रख्यं त्रिनेत्रं त्रिदशेश्वरम्॥ १९<br>बालेन्दुमुकुटं चैव हरिवक्त्रं चतुर्भुजम्।<br>पुष्पमालाधरं सौम्यं सर्वाभरणभूषितम्॥ २० | पुनः देवदेव शिवजीके दाहिनी ओर स्थित हजारों देदीप्यमान अग्निके सदृश वर्णवाले, बालचन्द्रमाको मुकुटरूपमें सिरपर धारण करनेवाले, वानरके तुल्य |
| १२८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- | | उत्तरे चात्मनः पुण्यां भार्यां च मरुतां शुभाम्।<br>सुयशां सुव्रतां चाम्बापादमण्डनतत्पराम्॥ २१ | मुखवाले, चार भुजाओंवाले, पुष्पकी माला धारण करनेवाले, सौम्य स्वरूपवाले तथा सभी अलंकारोंसे सुशोभित मुझ त्रिनेत्र नन्दीका विधिवत् पूजन करना चाहिये। पुनः उत्तरभागमें विराजमान पुण्यमयी, स्वर्ण-सदृश आभावाली, सुन्दर, कीर्तिशालिनी, पतिव्रता एवं माता पार्वतीके चरणोंके मण्डनमें सतत तत्पर रहनेवाली देवीरूपिणी मेरी भार्याकी पूजा करनी चाहिये॥ १९-२१॥ | | एवं पूज्य प्रविश्यान्तर्भवनं परमेष्ठिनः।<br>दत्त्वा पुष्पाञ्जलिं भक्त्या पञ्चमूर्धसु पञ्चभिः॥ २२<br><br>गन्धपुष्पैस्तथा धूपैर्विविधैः पूज्य शङ्करम्।<br>स्कन्दं विनायकं देवीं लिङ्गशुद्धिं च कारयेत्॥ २३ | इस प्रकार हम दोनोंकी पूजा करके परमेष्ठी शिवके मन्दिरमें प्रवेशकर शिवजीके पाँचों मस्तकोंपर सद्योजात आदि पाँच मन्त्रोंसे भक्तिपूर्वक पुष्पाञ्जलि अर्पित करनी चाहिये। पुनः गन्ध, पुष्प, धूप तथा विविध उपचारोंसे शंकर, कार्तिकेय, गणेशजी एवं पार्वतीकी पूजा करके शिवलिङ्गका निर्माल्य (अर्पित चढ़ावेका अवशेष) दूरकर लिङ्गकी शुद्धि करनी चाहिये॥ २२-२३॥ | | जप्त्वा सर्वाणि मन्त्राणि प्रणवादिनमोऽन्तकम्।<br>कल्पयेदासनं पश्चात्पद्माख्यं प्रणवेन तत्॥ २४ | पुनः सभी मन्त्रोंके आदिमें प्रणव (ॐ) तथा अन्तमें 'नमः' लगाकर जप करनेके पश्चात् परमेश्वरको प्रणवमन्त्रके द्वारा अष्टदल-कमलरूप आसन निवेदित करना चाहिये॥ २४॥ | | तस्य पूर्वदलं साक्षादणिमामायमक्षरम्।<br>लघिमा दक्षिणं चैव महिमा पश्चिमं तथा॥ २५<br><br>प्राप्तिस्तथोत्तरं पत्रं प्राकाम्यं पावकस्य तु।<br>ईशित्वं नैर्ऋतं पत्रं वशित्वं वायुगोचरे॥ २६<br><br>सर्वज्ञत्वं तथैशान्यं कर्णिका सोम उच्यते।<br>सोमस्याधस्तथा सूर्यस्तस्याधः पावकः स्वयम्॥ २७ | उस आसनका पूर्वदल अविनाशी तथा साक्षात् अणिमासिद्धिरूप है। उसका दक्षिणदल लघिमा, पश्चिमदल महिमा, उत्तरदल प्राप्ति, अग्निकोणका दल प्राकाम्य, नैर्ऋत्यकोणका दल ईशित्व, वायव्यकोणका दल वशित्व एवं ईशानकोणका दल सर्वज्ञत्वसिद्धिरूप है। उस पद्मासनकी कर्णिका (मध्यभाग) सोममण्डल कही जाती है। सोममण्डलके नीचे सूर्यमण्डल तथा उसके भी नीचे साक्षात् अग्निमण्डल है॥ २५-२७॥ | | धर्मादयो विदिक्ष्वेते त्वनन्तं कल्पयेत्क्रमात्।<br>अव्यक्तादिचतुर्दिक्षु सोमस्यान्ते गुणत्रयम्॥ २८<br><br>आत्मत्रयं ततश्चोर्ध्वं तस्यान्ते शिवपीठिका।<br>सद्योजातं प्रपद्यामीत्यावाह्य परमेश्वरम्॥ २९ | चारों उपदिशाओं (आग्नेय, नैर्ऋत्य, वायव्य तथा ईशान)-में धर्म आदि (धर्म, ज्ञान, वैराग्य एवं ऐश्वर्य), पूर्वादि चारों दिशाओं (पूर्व, दक्षिण, पश्चिम तथा उत्तर)-में अव्यक्तादि (अव्यक्त, महत्तत्त्व, अहंकार एवं चित्त), सोममण्डलके ऊपर तीन गुण (सत्त्व, रज, तम), इनके ऊपर तीन आत्माएँ (विश्व, तैजस तथा प्राज्ञ) और उसके ऊपर शिवपीठिका विराजमान है; ऐसे अनन्त- |