भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 118
११६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।योगात्मा, महात्मा, ध्यानपरायण एवं दृढ़व्रती होंगे, जो माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९७-९८१/२॥
एकविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ९९<br>वाचश्रवाः स्मृतो व्यासो यदा स ऋषिसत्तमः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दारुको नाम नामतः॥ १००<br>तस्माद्भविष्यते पुण्यं देवदारुवनं शुभम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः॥ १०१<br>प्लक्षो दार्भायणिश्चैव केतुमान् गौतमस्तथा।<br>योगात्मानो महात्मानो नियता ऊर्ध्वरेतसः॥ १०२<br>नैष्ठिकं व्रतमास्थाय रुद्रलोकाय ते गताः।पुनः क्रमसे इक्कीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋषिप्रवर वाचश्रवा व्यास होंगे, तब मैं भी दारुक नामसे आविर्भूत होऊँगा; इसलिये वह स्थान कल्याणप्रद तथा पुण्यकर होगा और मेरे नामपर वह देवदारुवनके नामसे प्रसिद्ध होगा। वहाँपर भी प्लक्ष, दार्भायणि, केतुमान् तथा गौतम नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे; जो महाप्रतापी, योगात्मा, महात्मा, संयत आत्मावाले एवं ब्रह्मचारी होंगे। वे सब निष्ठापूर्वक योगव्रतका पालन करके रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ९९-१०२१/२॥
द्वाविंशे परिवर्ते तु व्यासः शुष्मायणो यदा॥ १०३<br>तदाप्यहं भविष्यामि वाराणस्यां महामुनिः।<br>नाम्ना वै लाङ्गली भीमो यत्र देवाः सवासवाः॥ १०४<br>द्रक्ष्यन्ति मां कलौ तस्मिन् भवं चैव हलायुधम्।बाईसवें द्वापरके अन्तमें जब शुष्मायण नामक व्यास होंगे, उस समय मैं महामुनि 'भीम' नामसे हल धारण किये काशीमें अवतार ग्रहण करूँगा, जहाँपर उस कलिमें इन्द्रसहित सभी देवतागण अस्त्ररूपमें हल धारण करनेवाले हलायुध मुझ शिवका दर्शन प्राप्त करेंगे॥ १०३-१०४१/२॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः॥ १०५<br>भल्लवी मधुपिङ्गाक्षश्च श्वेतकेतुः कुशस्तथा।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं तेऽपि ध्यानपरायणाः॥ १०६<br>विमला ब्रह्मभूयिष्ठा रुद्रलोकाय संस्थिताः।वहाँपर भी भल्लवी, मधुपिंग, श्वेतकेतु तथा कुश नामक मेरे चार पुत्र होंगे। अतिशय धर्मनिष्ठ, ध्यानपरायण, विशुद्धात्मा एवं ब्रह्मभावको प्राप्त वे पुत्र भी माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ १०५-१०६१/२॥
परिवर्ते त्रयोविंशे तृणबिन्दुर्यदा मुनिः॥ १०७<br>व्यासो हि भविता ब्रह्मांस्तदाहं भविता पुनः।<br>श्वेतो नाम महाकायो मुनिपुत्रस्तु धार्मिकः॥ १०८<br>तत्र कालं जरिष्यामि तदा गिरिवरोत्तमे।<br>तेन कालञ्जरो नाम भविष्यति स पर्वतः॥ १०९<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>उशिको बृहदश्वश्च देवलः कविरेव च॥ ११०<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।हे ब्रह्मन्! पुनः तेईसवें द्वापरके अन्तमें जब मुनि तृणबिन्दु नामक व्यास होंगे, उस समय मैं धर्मनिष्ठ तथा महाकाय मुनिपुत्रके रूपमें 'श्वेत' नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ उत्तम पर्वतपर मैं कालको जीर्ण (व्यतीत) करूँगा, अतः वह पर्वत 'कालंजर' नामसे विख्यात होगा। वहाँपर भी उशिक, बृहदश्व, देवल तथा कवि नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। वे माहेश्वर योगको प्राप्त होकर रुद्रलोक जायेंगे॥ १०७-११०१/२॥
परिवर्ते चतुर्विंशे व्यासो ऋक्षो यदा विभो॥ १११<br>तदाप्यहं भविष्यामि कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>शूली नाम महायोगी नैमिषे देववन्दिते॥ ११२<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>शालिहोत्रोऽग्निवेशश्च युवनाश्वः शरद्वसुः॥ ११३<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण रुद्रलोकाय संस्थिताः।हे विभो! चौबीसवें द्वापरके अन्तमें जब ऋक्षमुनि व्यास होंगे, तब मैं उस युगान्त तथा कलिके प्रारम्भमें देववन्द्य नैमिषारण्यमें महान् योगीके रूपमें 'शूली' नामसे अवतार लूँगा। वहाँ भी शालिहोत्र, अग्निवेश, युवनाश्व एवं शरद्वसु नामक मेरे चार तपोधन शिष्य होंगे। वे भी उसी योगमार्गसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १११-११३१/२॥
पञ्चविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ ११४
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