श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय २४ ] | श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन | १९५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तीर्णस्तारयते जन्तुर्दश पूर्वान् दशोत्तरान्।<br>आत्मानमेकविंशं तु तारयित्वा महालये ॥ ८४<br><br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>ततोऽष्टादशमे चैव परिवर्ते यदा विभो ॥ ८५ | महालयक्षेत्रमें जाकर माहेश्वरपदका दर्शन करके प्राणी अपनी दस पूर्वकी तथा दस बादकी और अपनी स्वयं—इस प्रकार इक्कीस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। इस प्रकार महालयक्षेत्रमें पहुँचकर लोग अपने वंशका उद्धार करके मेरी कृपासे कष्टसे रहित होकर रुद्रलोकको प्राप्त करेंगे॥ ८२-८४ १/२ ॥ |
| तदा ऋतञ्जयो नाम व्यासस्तु भविता मुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि शिखण्डी नाम नामतः ॥ ८६<br><br>सिद्धक्षेत्रे महापुण्ये देवदानवपूजिते।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये शिखण्डी नाम पर्वतः ॥ ८७<br><br>शिखण्डिनो वनं चापि यत्र सिद्धनिषेवितम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः ॥ ८८ | हे विभो! पुनः अठारहवें द्वापरके अन्तमें जब ऋतंजयमुनि नामक व्यास होंगे, तब मैं सिद्धिप्रदायक, पुण्यप्रद तथा देव-दानवोंसे पूजित रमणीक हिमालय-शिखरपर शिखण्डी नामसे अवतार ग्रहण करूँगा और वह शिखर मेरे नामसे शिखण्डी पर्वत तथा वह क्षेत्र शिखण्डीका वन कहा जायगा, जहाँ सिद्ध महात्मा निवास करेंगे॥ ८५-८७ १/२ ॥ |
| वाचश्रवा ऋचीकश्च श्यावाश्वश्च यतीश्वरः।<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते वेदपारगाः ॥ ८९<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संवृताः।<br>अथ एकोनविंशे तु परिवर्ते क्रमागते ॥ ९० | वहाँपर भी वाचश्रवा, ऋचीक, श्यावाश्व तथा यतीश्वर नामक मेरे पुत्र होंगे। वे सब परम तपस्वी, योगात्मा, महात्मा तथा वेदोंके पारगामी विद्वान् होंगे, जो माहेश्वर योगमें सिद्ध होकर रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ ८८-८९ १/२ ॥ |
| व्यासस्तु भविता नाम्ना भरद्वाजो महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि जटामाली च नामतः ॥ ९१<br><br>हिमवच्छिखरे रम्ये जटायुर्यत्र पर्वतः।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९२<br><br>हिरण्यनाभः कौशल्यो लोकाक्षी कुथुमिस्तथा।<br>ईश्वरा योगधर्माणः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः ॥ ९३<br><br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय संस्थिताः।<br>ततो विंशतिमश्चैव परिवर्तो यदा तदा ॥ ९४ | तदनन्तर क्रमसे उन्नीसवें द्वापरके अन्तमें महामुनि भरद्वाज तो व्यास होंगे और उस समय मैं हिमालयके शिखरपर विराजमान रमणीक जटायु पर्वतपर जटामाली नामसे अवतीर्ण होऊँगा। उस समय भी हिरण्यनाभ, कौशल्य, लोकाक्षी तथा कुथुमि नामक मेरे चार पुत्र होंगे। वे महाप्रतापी, ऐश्वर्ययुक्त, योग-ध्यानपरायण और नैष्ठिक ब्रह्मचारी होंगे। वे सब माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ९०-९३ १/२ ॥ |
| गौतमस्तु तदा व्यासो भविष्यति महामुनिः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि अट्टहासस्तु नामतः ॥ ९५<br><br>अट्टहासप्रियाश्चैव भविष्यन्ति तदा नराः।<br>तत्रैव हिमवत्पृष्ठे अट्टहासो महागिरिः ॥ ९६<br><br>देवदानवयक्षेन्द्रसिद्धचारणसेवितः ।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति महौजसः ॥ ९७ | पुनः जब बीसवें द्वापरका अन्त होगा, तब उस समय महामुनि गौतम तो व्यास होंगे और मैं भी उसी समय हिमालय-क्षेत्रमें अट्टहास नामसे अवतरित होऊँगा। तभीसे लोगोंकी अट्टहासके प्रति महान् प्रीति हो जायगी। वह क्षेत्र महागिरि अट्टहासके नामसे विख्यात होगा और देवता, दानव, यक्ष, इन्द्र, सिद्ध-महात्मा तथा चारण वहाँ सदा निवास करेंगे॥ ९४-९६ १/२ ॥ |
| योगात्मानो महात्मानो ध्यायिनो नियतव्रताः।<br>सुमन्तुर्बर्बरी विद्वान् कबन्धः कुशिकन्धरः ॥ ९८ | वहाँपर सुमन्तु, बर्बरी, विद्वान् कबन्ध तथा कुशिकन्धर—ये मेरे चार पुत्र होंगे। वे महान् ओजस्वी, |