भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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११४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
भविष्यति महावीर्य वेदशीर्षश्च पर्वतः।<br>हिमवत्पृष्ठमासाद्य सरस्वत्यां नगोत्तमे॥ ६९वहाँ मैं 'वेदशिरा' नामक अति दिव्य पारमेश्वर अस्त्र प्रकट करूँगा और पर्वतोंमें श्रेष्ठ हिमालयके पृष्ठदेशमें सरस्वतीके तटपर वेदशीर्ष नामक पर्वत मेरा आश्रयस्थल होगा॥ ६७–६९॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>कुणिश्च कुणिबाहुश्च कुशीरः कुनेत्रकः॥ ७०<br>योगात्मानो महात्मानः सर्वे ते ह्यूर्ध्वरेतसः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः॥ ७१उस समय भी कुणि, कुणिबाहु, कुशीर तथा कुनेत्रक नामवाले मेरे तपस्वी पुत्र प्रकट होंगे। योगात्मा, महात्मा एवं नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करनेवाले वे सभी पुत्र माहेश्वरयोगकी सिद्धि करके शिवलोकको प्राप्त होंगे॥ ७०–७१॥
व्यासो युगे षोडशे तु यदा देवो भविष्यति।<br>तत्र योगप्रदानाय भक्तानां च यतात्मनाम्॥ ७२<br>तदाप्यहं भविष्यामि गोकर्णो नाम नामतः।<br>भविष्यति सुपुण्यं च गोकर्णं नाम तद्वनम्॥ ७३सोलहवें द्वापरके अन्तमें जब देव नामक व्यास होंगे, तब भक्तों तथा संयत आत्मावाले जनोंको योग प्रदान करनेके निमित्त मैं गोकर्ण नामसे अवतार लूँगा और वह स्थान परम पवित्र गोकर्णवनके नामसे प्रसिद्ध होगा॥ ७२–७३॥
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति च योगिनः।<br>काश्यपो ह्युशनाश्चैव च्यवनोऽथ बृहस्पतिः॥ ७४<br>तेऽपि तेनैव मार्गेण ध्यानयोगसमन्विताः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं गन्तारो रुद्रमेव हि॥ ७५उस समय भी काश्यप, उशना, च्यवन तथा बृहस्पति नामक मेरे चार महायोगी पुत्र होंगे। वे भी उसी मार्गसे ध्यानयोगसे युक्त होकर माहेश्वरयोग प्राप्त करके रुद्रलोक जायँगे॥ ७४–७५॥
ततः सप्तदशे चैव परिवर्ते क्रमागते।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना देवकृतञ्जयः॥ ७६<br>तदाप्यहं भविष्यामि गुहावासीति नामतः।<br>हिमवच्छिखरे रम्ये महोत्तुङ्गे महालये॥ ७७<br>सिद्धक्षेत्रं महापुण्यं भविष्यति महालयम्।<br>तत्रापि मम ते पुत्रा योगज्ञा ब्रह्मवादिनः॥ ७८<br>भविष्यन्ति महात्मानो निर्मला निरहङ्कृताः।<br>उतथ्यो वामदेवश्च महायोगो महाबलः॥ ७९पुनः क्रमसे सत्रहवें द्वापरके अन्तमें जब देवकृतंजय नामक व्यास होंगे, तब भी मैं हिमालयके अति उच्च महालय नामक रमणीक शिखरपर गुहावासी नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वह महालयस्थल परम पवित्र तथा सिद्धक्षेत्र माना जायगा। वहाँपर भी उतथ्य, वामदेव, महायोग एवं महाबल नामवाले मेरे चार पुत्र होंगे। वे योगवेत्ता, ब्रह्मवादी, महात्मा, मोहरहित तथा अहंकारशून्य होंगे॥ ७६–७९॥
तेषां शतसहस्रं तु शिष्याणां ध्यानयोगिनाम्।<br>भविष्यन्ति तदा काले सर्वे ते ध्यानयुञ्जकाः॥ ८०<br>योगाभ्यासरताश्चैव हृदि कृत्वा महेश्वरम्।<br>महालये पदं न्यस्तं दृष्ट्वा यान्ति शिवं पदम्॥ ८१कलियुगमें उन पुत्रोंके ध्यानयोग करनेवाले हजारों शिष्य होंगे। ध्यान करनेवाले तथा योगाभ्यासपरायण वे सभी शिष्य महेश्वरको हृदयमें धारण करके महालय-क्षेत्रमें मेरे चरणोंका दर्शन करके शिवपदको प्राप्त होंगे॥ ८०–८१॥
ये चान्येऽपि महात्मानः कलौ तस्मिन् युगान्तिके।<br>ध्याने मनः समाधाय विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ ८२<br>मम प्रसादाद्यास्यन्ति रुद्रलोकं गतज्वराः।<br>गत्वा महालयं पुण्यं दृष्ट्वा माहेश्वरं पदम्॥ ८३इनके अतिरिक्त अन्य जो भी महात्मा उस द्वापरके अन्तमें कलिमें अपना मन ध्यानमें लगाकर निर्मल आत्मा तथा शुद्ध बुद्धिवाले हो जायँगे, वे शोकरहित होकर मेरे अनुग्रहसे रुद्रलोकको प्राप्त होंगे। पुण्यप्रद
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