भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २४ ] श्वेतवाराहकल्पके अट्ठाईस द्वापरोंके अन्तमें प्रकट होनेवाले व्यासोंका वर्णन ११७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
वासिष्ठस्तु यदा व्यासः शक्तिर्नाम्ना भविष्यति।<br>तदाप्यहं भविष्यामि दण्डी मुण्डीश्वरः प्रभुः॥ ११५<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपोधनाः।<br>छागलः कुण्डकर्णश्च कुभाण्डश्च प्रवाहकः॥ ११६<br>प्राप्य माहेश्वरं योगममृतत्वाय ते गताः।पुनः क्रमिक रूपसे पचीसवें द्वापरके अन्तमें जब वसिष्ठजीके पुत्र शक्तिमुनि व्यास होंगे, उस समय जगत्प्रभु मैं दण्ड धारण किये हुए मुण्डीश्वर नामसे अवतार ग्रहण करूँगा। उस समय भी छागल, कुण्डकर्ण, कुभाण्ड तथा प्रवाहक नामक मेरे चार तपोव्रती पुत्र होंगे। माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर वे अमरत्वको प्राप्त होंगे॥ ११४-११६ १/२॥
षड्विंशे परिवर्ते तु यदा व्यासः पराशरः॥ ११७<br>तदाप्यहं भविष्यामि सहिष्णुर्नाम नामतः।<br>पुरं भद्रवटं प्राप्य कलौ तस्मिन् युगान्तिके॥ ११८<br>तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति सुधार्मिकाः।<br>उलूको विद्युतश्चैव शम्बूको ह्याश्वलायनः॥ ११९<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकाय ते गताः।छब्बीसवें द्वापरके अन्तमें जब पराशर नामक व्यास होंगे, उस समय भी उस युगान्तमें मैं कलिके प्रारम्भमें भद्र-वटक्षेत्रमें सहिष्णु नामसे अवतीर्ण होऊँगा। वहाँ भी उलूक, विद्युत, शम्बूक तथा आश्वलायन नामक अत्यन्त धर्मपरायण मेरे चार पुत्र होंगे। वे माहेश्वरयोगको प्राप्त होकर रुद्रलोकको प्रस्थान करेंगे॥ ११७-११९ १/२॥
सप्तविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२०<br>जातूकर्ण्यो यदा व्यासो भविष्यति तपोधनः।<br>तदाप्यहं भविष्यामि सोमशर्मा द्विजोत्तमः॥ १२१<br>प्रभासतीर्थमासाद्य योगात्मा योगविश्रुतः।<br>तत्रापि मम ते शिष्या भविष्यन्ति तपोधनाः॥ १२२<br>अक्षपादः कुमारश्च उलूको वत्स एव च।<br>योगात्मानो महात्मानो विमलाः शुद्धबुद्धयः॥ १२३<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं रुद्रलोकं ततो गताः।पुनः क्रमिक रूपसे सत्ताईसवें द्वापरके अन्तमें जब तपस्वी जातूकर्ण्य व्यास होंगे, तब मैं योगविश्रुत तथा योगात्मा द्विजश्रेष्ठ सोमशर्माके रूपमें प्रभासक्षेत्रमें अवतरित होऊँगा। वहाँपर भी अक्षपाद, कुमार, उलूक एवं वत्स नामक मेरे चार तपस्वी शिष्य होंगे। योगात्मा, महात्मा, निर्विकारहृदय तथा शुद्ध बुद्धिवाले वे शिष्य माहेश्वरयोग प्राप्त करके अन्तमें रुद्रलोक जायँगे॥ १२०-१२३ १/२॥
अष्टाविंशे पुनः प्राप्ते परिवर्ते क्रमागते॥ १२४<br>पराशरसुतः श्रीमान् विष्णुर्लोकपितामहः।<br>यदा भविष्यति व्यासो नाम्ना द्वैपायनः प्रभुः॥ १२५<br>तदा षष्ठेन चांशेन कृष्णः पुरुषसत्तमः।<br>वसुदेवाद्यदुश्रेष्ठो वासुदेवो भविष्यति॥ १२६<br>तदाप्यहं भविष्यामि योगात्मा योगमायया।<br>लोकविस्मयनार्थाय ब्रह्मचारिशरीरकः॥ १२७<br>श्मशाने मृतमुत्सृष्टं दृष्ट्वा कायमनाथकम्।<br>ब्राह्मणानां हितार्थाय प्रविष्टो योगमायया॥ १२८<br>दिव्यां मेरुगुहां पुण्यां त्वया सार्धं च विष्णुना।<br>भविष्यामि तदा ब्रह्मन् लकुली नाम नामतः॥ १२९<br>कायावतार इत्येवं सिद्धक्षेत्रं च वै तदा।<br>भविष्यति सुविख्यातं यावद्भूमिर्धरिष्यति॥ १३०पुनः क्रमसे अट्ठाईसवें द्वापरके आनेपर जब श्रीमान् लोकपितामह विष्णु अपने छठे अंशसे पराशरपुत्र 'कृष्णद्वैपायन' नामक व्यास होंगे, तब यदुश्रेष्ठ पुरुषोत्तम वासुदेव कृष्ण वसुदेवसे उत्पन्न होंगे। उस समय योगात्मा मैं लोगोंको विस्मित करनेके उद्देश्यसे योगमायासे एक ब्रह्मचारीका शरीर धारणकर प्रकट होऊँगा और योगमायाके प्रभावसे ब्राह्मणोंके कल्याणार्थ श्मशानमें मृत पड़े एक अनाथ ब्राह्मणका शरीर देखकर उसमें प्रवेश करूँगा। दिव्य तथा पुण्य प्रदान करनेवाली मेरुगुहामें आपके एवं विष्णुके साथ मैं निवास करूँगा। हे ब्रह्मन्! उस समय मैं लकुली नामसे विख्यात होऊँगा और मेरा अवतार-स्थल जबतक भूमिकी सत्ता रहेगी, तबतक एक सिद्धक्षेत्रके रूपमें कायावतार—इस नामसे विख्यात रहेगा॥ १२४-१३०॥