भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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११८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तत्रापि मम ते पुत्रा भविष्यन्ति तपस्विनः।<br>कुशिकश्चैव गर्गश्च मित्रः कौरुष्य एव च ॥ १३१<br>योगात्मानो महात्मानो ब्राह्मणा वेदपारगाः।<br>प्राप्य माहेश्वरं योगं विमला ह्यूर्ध्वरेतसः॥ १३२<br>रुद्रलोकं गमिष्यन्ति पुनरावृत्तिदुर्लभम्।वहाँपर भी कुशिक, गर्ग, मित्र तथा कौरुष्य नामक मेरे चार तपस्वी, योगात्मा, ब्रह्मज्ञानी और वेदोंके पारगामी विद्वान् पुत्र होंगे। विशुद्ध आत्मावाले तथा नैष्ठिक ब्रह्मचर्यव्रत धारण करनेवाले वे पुत्र माहेश्वरयोगमें सिद्ध होकर पुनरागमनसे मुक्ति दिलानेवाले रुद्रलोकको प्राप्त होंगे॥ १३१-१३२ १/२॥
एते पाशुपताः सिद्धा भस्मोद्धूलितविग्रहाः ॥ १३३<br>लिङ्गार्चनरता नित्यं बाह्याभ्यन्तरतः स्थिताः।<br>भक्त्या मयि च योगेन ध्याननिष्ठा जितेन्द्रियाः ॥ १३४ये पाशुपतयोगमें सिद्ध, भस्मसे विभूषित शरीरवाले, नित्य शिवलिङ्गके अर्चनमें तत्पर रहनेवाले, बाहर एवं भीतरसे भक्तिपूर्वक योगके द्वारा मुझमें स्थित रहनेवाले, ध्यानपरायण तथा जितेन्द्रिय होंगे॥ १३३-१३४॥
संसारबन्धच्छेदार्थं ज्ञानमार्गप्रकाशकम्।<br>स्वरूपज्ञानसिद्ध्यर्थं योगं पाशुपतं महत् ॥ १३५ज्ञानमार्गका प्रकाशक यह पाशुपतयोग सांसारिक बन्धनसे मुक्ति प्राप्त करने तथा आत्मज्ञान सिद्ध करनेके लिये एक महान् उपाय है॥ १३५॥
योगमार्गा अनेकाश्च ज्ञानमार्गास्त्वनेकशः।<br>न निवृत्तिमपायान्ति विना पञ्चाक्षरीं क्वचित् ॥ १३६इस जगत्में अनेक योगमार्ग हैं तथा अनेक ज्ञानमार्ग हैं; किंतु पंचाक्षरी विद्या (नमः शिवाय)-के बिना प्राणी सांसारिक बन्धनसे मुक्त नहीं हो सकते॥ १३६॥
यदाचरेत्तपश्चार्यं सर्वद्वन्द्वविवर्जितम्।<br>तदा स मुक्तो मन्तव्यः पक्वं फलमिव स्थितः ॥ १३७जो मनुष्य सभी द्वन्द्वोंसे रहित होकर तप करता है, वह पके फलकी भाँति मुक्तिके लिये उपस्थित रहता है॥ १३७॥
एकाहं यः पुमान् सम्यक् चरेत्पाशुपतव्रतम्।<br>न सांख्ये पञ्चरात्रे वा न प्राप्नोति गतिं कदा ॥ १३८जो पुरुष मात्र एक दिन भलीभाँति पाशुपतव्रत धारण करता है, वह उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उसे सांख्य तथा पञ्चरात्रसे कभी नहीं मिलती॥ १३८॥
इत्येतद्वै मया प्रोक्तमवतारेषु लक्षणम्।<br>मन्वादिकृष्णपर्यन्तमष्टाविंशद्युगक्रमात् ॥ १३९<br>तत्र श्रुतिसमूहानां विभागो धर्मलक्षणः।<br>भविष्यति तदा कल्पे कृष्णद्वैपायनो यदा ॥ १४०इस प्रकार मैंने युगक्रमसे मनुसे लेकर कृष्णद्वैपायन पर्यन्त अट्ठाईस अवतारोंका वर्णन आपसे कर दिया। उस कल्पमें जब धर्मस्वरूप श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास होंगे, तब वे ही वेदसमूहोंका विभाग करेंगे॥ १३९-१४०॥
सूत उवाच<br>निशम्यैवं महातेजा महादेवेन कीर्तितम्।<br>रुद्रावतारं भगवान् प्रणिपत्य महेश्वरम् ॥ १४१<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिः पुनः प्राह च शङ्करम्।सूतजी बोले— इस प्रकार महादेवके द्वारा कही गयी रुद्रावतारकी बातें सुनकर महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने प्रणामपूर्वक प्रिय वाणीसे महेश्वर शिवकी स्तुति की और पुनः उनसे कहा॥ १४१ १/२॥
पितामह उवाच<br>सर्वे विष्णुमया देवाः सर्वे विष्णुमया गणाः ॥ १४२<br>न हि विष्णुसमा काचिद् गतिरन्या विधीयते।<br>इत्येवं सततं वेदा गायन्ति नात्र संशयः ॥ १४३पितामह बोले— सभी देवता तथा सभी गण विष्णुसे ही व्याप्त हैं। विष्णुके समान कोई अन्य गति हो ही नहीं सकती। ऐसा वेद निरन्तर गाते हैं; इसमें कोई संशय नहीं है॥ १४२-१४३॥
स देवदेवो भगवांस्तव लिङ्गार्चने रतः।<br>तव प्रणामपरमः कथं देवो ह्यभूत्प्रभुः ॥ १४४वे देवाधिदेव भगवान् विष्णु आपके लिङ्गार्चनमें