भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया १११


| सूत उवाच<br>निशम्य वचनं तस्य ब्रह्मणः परमेष्ठिनः।<br>प्रपिबन्निव चक्षुर्भ्यां प्रीतस्तत्प्रश्नगौरवात्॥ १४५<br><br>पूजाप्रकरणं तस्मै तमालोक्याह शङ्करः।<br>भवान्नारायणश्चैव शक्रः साक्षात्सुरोत्तमः॥ १४६<br><br>मुनयश्च सदा लिङ्गं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्।<br>स्वं स्वं पदं विभो प्राप्तास्तस्मात्सम्पूजयन्ति ते॥ १४७ | निरन्तर रत क्यों रहते हैं तथा जगत्पति होकर भी सदा आपको प्रणाम क्यों करते हैं?॥ १४४॥<br><br>सूतजी बोले—परमेष्ठी ब्रह्माजीका वचन सुनकर हर्षातिरेकसे युक्त नेत्रोंवाले भगवान् शंकर उनके इस महत्त्वपूर्ण प्रश्नसे अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्हें लिङ्ग-पूजा-प्रकरणके विषयमें बताया। भगवान् विष्णु, साक्षात् सुरश्रेष्ठ इन्द्र तथा मुनियोंने विधिविधानसे लिङ्गकी पूजा करके ही अपने-अपने पद प्राप्त किये हैं। हे विभो! इसीलिये वे लिङ्गपूजनमें तत्पर रहते हैं॥ १४५–१४७॥ | | लिङ्गार्चनं विना निष्ठा नास्ति तस्माज्जनार्दनः।<br>आत्मनो यजते नित्यं श्रद्धया भगवान् प्रभुः॥ १४८ | लिङ्गके अर्चनके बिना निष्ठाकी प्राप्ति नहीं हो सकती, इसलिये जगत्पति भगवान् विष्णु श्रद्धापूर्वक मेरे लिङ्गका पूजन करते हैं॥ १४८॥ | | इत्येवमुक्त्वा ब्रह्माणमनुगृह्य महेश्वरः।<br>पुनः सम्प्रेक्ष्य देवेशं तत्रैवान्तरधीयत॥ १४९ | देवेश ब्रह्माजीसे ऐसा कहकर तथा पुनः उनके ऊपर कृपादृष्टि डालकर महेश्वर वहींपर अन्तर्धान हो गये॥ १४९॥ | | तमुद्दिश्य तदा ब्रह्मा नमस्कृत्य कृताञ्जलिः।<br>स्रष्टुं त्वशेषं भगवान् लब्धसंज्ञस्तु शङ्करात्॥ १५० | तत्पश्चात् उन शिवको हाथ जोड़कर प्रणाम करके और उनसे आज्ञा प्राप्त करके वे भगवान् ब्रह्मा सृष्टिकी रचना करनेमें प्रवृत्त हो गये॥ १५०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधव्यासावतारवर्णनं नाम चतुर्विंशतितमोऽध्यायः॥ २४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणे अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधव्यासावतारवर्णन' नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २४॥


पचीसवाँ अध्याय

लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिके लिये अन्तः एवं बाह्य स्नानकी प्रक्रिया और विविध मन्त्रोंसे आत्माभिषेचन

ऋषय ऊचुः<br>कथं पूज्यो महादेवो लिङ्गमूर्तिर्महेश्वरः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं रोमहर्षण साम्प्रतम्॥ १ऋषिगण बोले—हे सूतजी! लिङ्गस्वरूप महेश्वर महादेवकी पूजा किस प्रकार की जानी चाहिये? अब आप हमलोगोंको यह बतानेकी कृपा करें॥ १॥
सूत उवाच<br>देव्या पृष्टो महादेवः कैलासे तां नगात्मजाम्।<br>अङ्कस्थाम्राह देवेशो लिङ्गार्चनविधिं क्रमात्॥ २सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] इसी विषयमें कैलास पर्वतपर देवी पार्वतीके द्वारा पूछे जानेपर देवाधिदेव महादेवने अपने अंकमें विराजमान गिरिराजकिशोरी पार्वतीसे लिङ्गार्चन विधिका क्रमसे वर्णन किया था॥ २॥
तदा पार्श्वे स्थितो नन्दी शालङ्कायनकात्मजः।<br>श्रुत्वाखिलं पुरा प्राह ब्रह्मपुत्राय सुव्रताः॥ ३हे सुव्रतो! उस समय समीपमें ही स्थित शालंकायनके पुत्र नन्दीने उस विधिका श्रवण करके पहले ब्रह्मापुत्र