भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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१२० श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सनत्कुमाराय शुभं लिङ्गार्चनविधिं परम्।<br>तस्माद् व्यासो महातेजाः श्रुतवाञ्छ्रुतिसम्मितम्॥ ४सनत्कुमारको वह परम पवित्र लिङ्गार्चनविधि बतायी और उनसे महातेजस्वी व्यासजीने वह श्रुतिप्रतिपादित विधि सुनी॥ ३-४॥
स्नानयोगोपचारं च यथा शैलादिनो मुखात्।<br>श्रुतवान् तत्प्रवक्ष्यामि स्नानाद्यं चार्चनाविधिम्॥ ५शैलादि (नन्दी)-के मुखसे स्नान तथा लिङ्ग-पूजानुष्ठानकी जो विधि कही गयी है एवं जो मैंने भी सुनी है, उस स्नान तथा अर्चनविधिका आपलोगोंसे वर्णन करूँगा॥ ५॥
शैलादिरुवाच<br>अथ स्नानविधिं वक्ष्ये ब्राह्मणानां हिताय च।<br>सर्वपापहरं साक्षाच्छिवेन कथितं पुरा॥ ६**शैलादि (नन्दिकेश्वर) बोले—**ब्राह्मणोंके कल्याणके निमित्त अब मैं स्नान-विधिके विषयमें कहूँगा। यह [विधिपूर्वक किया गया स्नान] सभी पापोंको दूर करनेवाला है। पूर्वकालमें स्वयं भगवान् शंकरने इसके महत्त्वका वर्णन किया है॥ ६॥
अनेन विधिना स्नात्वा सकृत्पूज्य च शङ्करम्।<br>ब्रह्मकूर्चं च पीत्वा तु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ७इस विधिसे स्नान करनेके बाद भक्तिपूर्वक एक बार शंकरजीकी पूजा करके विधिपूर्वक निर्मित ब्रह्मकूर्च (पंचगव्य)-का पानकर मनुष्य सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है॥ ७॥
त्रिविधं स्नानमाख्यातं देवदेवेन शम्भुना।<br>हिताय ब्राह्मणाद्यानां चतुर्मुखसुतोत्तम॥ ८हे ब्रह्माजीके उत्तम पुत्र! ब्राह्मण आदिके हितके लिये देवाधिदेव शंकरने तीन प्रकारके स्नानोंका वर्णन किया है॥ ८॥
वारुणं पुरतः कृत्वा ततश्चाग्नेयमुत्तमम्।<br>मन्त्रस्नानं ततः कृत्वा पूजयेत्परमेश्वरम्॥ ९सर्वप्रथम जलस्नान करनेके बाद श्रेष्ठ अग्निस्नान (भस्मस्नान)-और फिर मार्जनरूप मन्त्रस्नान करके परमेश्वरकी पूजा करनी चाहिये॥ ९॥
भावदुष्टोऽम्भसि स्नात्वा भस्मना च न शुध्यति।<br>भावशुद्धश्चरेच्छौचमन्यथा न समाचरेत्॥ १०भावदुष्ट अर्थात् श्रद्धारहित प्राणी जलमें स्नान करके तथा भस्म लगा लेनेसे शुद्ध नहीं हो जाता है। भावनासे शुद्ध होकर ही मनुष्यको शुद्धि करनी चाहिये, अन्यथा नहीं॥ १०॥
सरित्सरस्तडागेषु सर्वेष्वाप्रलयं नरः।<br>स्नात्वापि भावदुष्टश्चेन्न शुध्यति न संशयः॥ ११प्रलयपर्यन्त सभी नदियों, सरोवरों तथा तड़ागोंमें स्नान करके भी भावनासे दूषित मनवाला व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ११॥
नृणां हि चित्तकमलं प्रबुद्धमभवद्यदा।<br>प्रसुप्तं तमसा ज्ञानभानोर्भासा तदा शुचिः॥ १२तमोगुणके प्रभावसे मनुष्यका प्रसुप्त चित्तकमल जब ज्ञानरूपी सूर्यके प्रकाशसे चेतनायुक्त हो जाता है, तभी शुद्धि हो पाती है॥ १२॥
मृच्छकृत्तिलपुष्पं च स्नानार्थं भसितं तथा।<br>आदाय तीरे निःक्षिप्य स्नानतीर्थे कुशानि च॥ १३<br><br>प्रक्षाल्याचम्य पादौ च मलं देहाद्विशोध्य च।<br>द्रव्यैस्तु तीरदेशस्थैस्ततः स्नानं समाचरेत्॥ १४मिट्टी, गोमय, तिल, पुष्प तथा भस्म आदि लेकर स्नानके लिये स्नानतीर्थ जाकर वहाँ तटपर कुश बिछा लेना चाहिये। तदनन्तर दोनों पैर धोकर पुनः आचमन