श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय २५ ] लिङ्गार्चनविधिके अन्तर्गत शरीर एवं मनकी शुद्धिकी प्रक्रिया [ १२१
| श्लोक (संस्कृत) | अर्थ (हिन्दी) |
|---|---|
| करके तीर्थदेशमें स्थित द्रव्योंसे शरीरके मलका शोधन करनेके उपरान्त स्नान करना चाहिये॥ १३-१४॥ | |
| उद्धृतासीति मन्त्रेण पुनर्देहं विशोधयेत्।<br>मृदादाय ततश्चान्यद्वस्त्रं स्नात्वा ह्यनुल्बणम्॥ १५ | तत्पश्चात् 'उद्धृतासि वराहेण'^१ यह मन्त्र पढ़कर मिट्टी लेकर उससे शरीरकी शुद्धि करनी चाहिये। इसके अनन्तर स्नान करके दूसरा पवित्र वस्त्र धारण करना चाहिये॥ १५॥ |
| गन्धद्वारां दुराधर्षामिति मन्त्रेण मन्त्रवित्।<br>कपिलागोमयेनैव खस्थेनैव तु लेपयेत्॥ १६<br><br>पुनः स्नात्वा परित्यज्य तद्वस्त्रं मलिनं ततः।<br>शुक्लवस्त्रपरीधानो भूत्वा स्नानं समाचरेत्॥ १७ | पुनः मन्त्रवित् पुरुषको चाहिये कि वह 'गन्धद्वारां दुराधर्षाम्'^२ इस मन्त्रको पढ़कर कपिला गायके भूस्पर्शरहित गोमयका शरीरपर लेपन करे। इसके बाद स्नान करके उस मलिन वस्त्रको छोड़कर पुनः श्वेत वस्त्र धारण करके स्नान करना चाहिये॥ १६-१७॥ |
| सर्वपापविशुद्ध्यर्थमावाह्य वरुणं तथा।<br>सम्पूज्य मनसा देवं ध्यानयज्ञेन वै भवम्॥ १८<br><br>आचम्य त्रिस्तदा तीर्थे ह्यवगाह्य भवं स्मरन्।<br>पुनराचम्य विधिवदभिमन्त्र्य महाजलम्॥ १९<br><br>अवगाह्य पुनस्तस्मिन् जपेद्वै चाघमर्षणम्।<br>तत्तोये भानुसोमाग्निमण्डलं च स्मरेदृशी॥ २० | समस्त पापोंसे विमुक्तिके लिये वरुणदेवका आवाहन करके तथा मानसिक उपचारोंसे भगवान् शंकरकी विधिवत् पूजा करके तीन बार आचमनकर जलको अभिमन्त्रित करके शिवका स्मरण करते हुए तीर्थजलमें प्रवेश करे। इसके बाद गोता लगाकर 'ऋतञ्च सत्यञ्च'^३ इस अघमर्षण मन्त्रका जप करते हुए उस जलमें सूर्य, चन्द्र तथा अग्नि—इन तीनोंके मण्डलोंका उस संयमी व्यक्तिको ध्यान करना चाहिये॥ १८-२०॥ |
| आचम्य च पुनस्तस्माजलादुत्तीर्य मन्त्रवित्।<br>प्रविश्य तीर्थमध्ये तु पुनः पुण्यविवृद्धये॥ २१ | फिर आचमन करके उस जलसे निकलकर पुण्यकी वृद्धिहेतु उस मन्त्रवित्को पुनः जलमध्यमें प्रवेश करना चाहिये॥ २१॥ |
| शृङ्गेण पर्णपुटकैः पालाशैः क्षालितैस्तथा।<br>सकुशेन सपुष्पेण जलेनैवाभिषेचयेत्॥ २२<br><br>रुद्रेण पवमानेन त्वरिताख्येन मन्त्रवित्।<br>तरत्समन्दीवर्गाद्यैस्तथा शान्तिद्वयेन च॥ २३<br><br>शान्तिधर्मेण चैकेन पञ्चब्रह्मपवित्रकैः।<br>तत्तन्मन्त्राधिदेवानां स्वरूपं च ऋषीन् स्मरन्॥ २४ | मन्त्रवेत्ता गोशृंगके द्वारा अथवा प्रक्षालित पलाश-पत्ररचित पुटकद्वारा अथवा कुशा और पुष्प आदिद्वारा गृहीत जलसे रुद्र-सूक्त (शु०यजुर्वेद अ० १९ के नमस्ते रुद्र० इत्यादि ६६ मन्त्र), पवमानसूक्त (ऋग्वेदकी पावमानी ऋचाएँ), यो रुद्र० इत्यादि त्वरितसंज्ञक मन्त्र, तरत्समन्दी इत्यादि आद्याक्षरवाले मन्त्रों (ऋग्वेद ९।५८), शं नो मित्र० आदि दो मन्त्रों (यजु० ३६।९-१०), शान्तिधर्मक शं नो देवी० (शु०यजु० ३६।१२) एक मन्त्र, पञ्चब्रह्मपवित्रक सद्योजातादि मन्त्र-पंचकका^४ पाठ करते |
१. उद्धृतासि वराहेण कृष्णेन शतबाहुना। मृत्तिके त्वां च गृह्णामि प्रजया च धनेन च॥
२. गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्वये श्रियम्॥
३. ॐ ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत। ततो रात्र्यजायत। ततः समुद्रो अर्णवः। समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत। अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी। सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्वः। (ऋग्वेद १०।१९०।१)
४. (क) सद्योजातं प्रपद्यामि सद्योजाताय वै नमो नमः। भवे भवे नातिभवे भवस्व मां भवोद्भवाय नमः॥ (ख) वामदेवाय नमो ज्येष्ठाय