श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| १२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| एवं हि चाभिषिच्याथ स्वमूर्ध्नि पयसा द्विजाः।<br>ध्यायेच्च त्र्यम्बकं देवं हृदि पञ्चास्यमीश्वरम्॥ २५<br><br>आचम्याचमनं कुर्यात्स्वसूत्रोक्तं समीक्ष्य च।<br>पवित्रहस्तः स्वासीनः शुचौ देशे यथाविधि॥ २६<br><br>अभ्युक्ष्य सकुशं चापि दक्षिणेन करेण तु।<br>पिबेत्प्रक्षिप्य त्रिस्तोयं चक्री भूत्वा ह्यातन्द्रितः॥ २७<br><br>प्रदक्षिणं ततः कुर्याद्विंसापापप्रशान्तये।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तं स्नानाचमनमुत्तमम्॥ २८<br><br>सर्वेषां ब्राह्मणानां तु हितार्थे द्विजसत्तमाः॥ २९। | हुए इन मन्त्रोंके अधिदेवताओंके स्वरूप एवं ऋषियोंका स्मरण करते हुए आत्माभिषेचन करे॥ २२–२४॥<br><br>हे द्विजो! इस प्रकार जलसे अपने मस्तकपर अभिषेक करके त्रिनेत्र तथा पंचमुख परमेश्वर महादेवका हृदयमें ध्यान करना चाहिये और अपने गृह्यसूत्रकी रीतिके अनुसार आचमन करना चाहिये। तदनन्तर पवित्र स्थानमें सुन्दर आसनपर बैठकर हाथमें पवित्रक लेकर उस कुशके द्वारा दाहिने हाथसे अपने ऊपर जल छिड़के। पुनः जल लेकर तीन बार आचमन करके सभी हिंसा तथा पापोंके शमनके लिये आलस्यरहित होकर अपने स्थानपर घूमते हुए प्रदक्षिणा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! इस प्रकार मैंने सभी ब्राह्मणोंके कल्याणके लिये संक्षेपमें स्नान तथा आचमनके अत्युत्तम विधानका वर्णन कर दिया॥ २५–२९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे स्नानविधिर्नाम पञ्चविंशोऽध्यायः॥ २५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'स्नानविधि' नामक पचीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ २५॥
छब्बीसवाँ अध्याय
भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप, सूर्यकी प्रार्थना, सूर्यसूक्तोंका पाठ, देव-ऋषि-पितृतर्पण, पंचमहायज्ञोंका अनुष्ठान, भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान
| नन्द्युवाच<br>आवाहयेत्ततो देवीं गायत्रीं वेदमातरम्।<br>आयातु वरदा देवीत्यनेनैव महेश्वरीम्॥ १<br><br>पाद्यमाचमनीयं च तस्याश्चार्घ्यं प्रदापयेत्।<br>प्राणायामत्रयं कृत्वा समासीनः स्थितोऽपि वा॥ २<br><br>सहस्रं वा तदर्थं वा शतमष्टोत्तरं तु वा।<br>गायत्रीं प्रणवेनैव त्रिविधेष्वेक्रमाचरेत्॥ ३<br><br>अर्घ्यं दत्त्वा समभ्यर्च्य प्रणम्य शिरसा स्वयम्।<br>उत्तमे शिखरे देवीत्युक्त्वोद्वास्य च मातरम्॥ ४ | नन्दिकेश्वर बोले—[हे सनत्कुमार!] इस विधिसे स्नान करनेके पश्चात् 'आयातु वरदा देवी' इस मन्त्रसे महेश्वरी वेदमाता गायत्रीका आवाहन करना चाहिये और पुनः पाद्य, आचमन, अर्घ्य आदि अर्पित करना चाहिये। पुनः तीन बार प्राणायाम करके बैठे-बैठे अथवा खड़े होकर एक हजार अथवा पाँच सौ अथवा एक सौ आठ बार गायत्रीजप प्रणवके साथ नियमपूर्वक करना चाहिये। इन तीनोंमें किसी एक विधिसे ही जप करना चाहिये॥ १–३॥<br><br>सूर्यको अर्घ्य देकर उनका पूजनकर सिर झुकाकर |
नमः श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः कालाय नमः कलविकरणाय नमो बलविकरणाय नमो बलाय नमो बलप्रमथनाय नमः सर्वभूतदमनाय नमो मनोन्मनाय नमः॥ (ग) अघोरेभ्योऽथ घोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वशर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तु रुद्ररूपेभ्यः॥ (घ) तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि। तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥ (ङ) ईशानः सर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानां ब्रह्माधिपतिर्ब्रह्मणोऽधिपतिर्ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदाशिवोम्॥