भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय २६ ] भगवती गायत्रीका आवाहन तथा जप…भस्मस्नान एवं मन्त्रस्नान [ १२३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्राच्यालोक्याभिवन्द्येशां गायत्रीं वेदमातरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्रार्थयेद्भास्करं तथा॥ ५<br><br>(चित्र: सूर्य-प्रार्थना)<br><br>उदुत्यं च तथा चित्रं जातवेदसमेव च।<br>अभिवन्द्य पुनः सूर्यं ब्रह्माणं च विधानतः॥ ६<br><br>तथा सौराणि सूक्तानि ऋग्यजुःसामजानि च।<br>जप्त्वा प्रदक्षिणं पश्चात्रिः कृत्वा च विभावसोः॥ ७प्रणाम करके **‘उत्तमे शिखरे देवी’**¹ ऐसा कहकर माताका विसर्जन करके पूर्व दिशामें देखते हुए वेदमाता महेश्वरी गायत्रीका अभिवन्दन करके दोनों हाथ जोड़कर सूर्यकी प्रार्थना करनी चाहिये। **‘उदुत्यं जातवेदसम्’**² तथा **‘चित्रं देवानाम्’**³—इन मन्त्रोंसे सूर्य तथा ब्रह्माको नमस्कार करके ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदके सूर्यसम्बन्धी सूक्तोंका विधानपूर्वक पाठ करके तीन बार सूर्यदेवकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये॥ ४—७॥
आत्मानं चान्तरात्मानं परमात्मानमेव च।<br>अभिवन्द्य पुनः सूर्यं ब्रह्माणं च विभावसुम्॥ ८<br><br>मुनीन् पितॄन् यथान्यायं स्वनाम्नावाहयेत्ततः।<br>सर्वानावाहयामीति देवानावाह्य सर्वतः॥ ९<br><br>तर्पयेद्विधिना पश्चात्प्राङ्मुखो वा ह्युदङ्मुखः।<br>ध्यात्वा स्वरूपं तत्तत्त्वमभिवन्द्य यथाक्रमम्॥ १०इसके बाद आत्मा, अन्तरात्मा तथा परमात्माका ध्यान करके सूर्य, ब्रह्मा एवं अग्निको प्रणाम करना चाहिये। पुनः मुनियों, पितरों तथा देवताओं—सभीका उनका अपने नामसे आवाहन करे। सबको आवाहित करके पूर्वमुख अथवा उत्तरमुख होकर उनके तत्त्वों तथा स्वरूपोंका ध्यान करके विधिपूर्वक क्रमसे तीर्थके जलसे तर्पण करना चाहिये और अन्तमें प्रणाम करना चाहिये॥ ८—१०॥
देवानां पुष्पतोयेन ऋषीणां तु कुशाम्भसा।<br>पितॄणां तिलतोयेन गन्धयुक्तेन सर्वतः॥ ११पुष्पयुक्त जलसे देवताओंका, कुशयुक्त जलसे ऋषियोंका तथा तिल और गन्धयुक्त जलसे पितरोंका तर्पण करना चाहिये॥ ११॥
यज्ञोपवीती देवानां निवीती ऋषितर्पणम्।<br>प्राचीनावीती विप्रेन्द्र पितॄणां तर्पयेत् क्रमात्॥ १२हे विप्रेन्द्र! यज्ञोपवीती अर्थात् सव्य होकर देवतर्पण, निवीती अर्थात् कण्ठमें यज्ञोपवीत धारण करके ऋषितर्पण<br><br>(चित्र: हाथके विभिन्न तीर्थ — देवतीर्थ, पितृतीर्थ, अग्नितीर्थ, कायतीर्थ, ब्रह्मतीर्थ)<br><br>तथा प्राचीनावीती अर्थात् अपसव्य होकर पितृतर्पण क्रमानुसार करना चाहिये॥ १२॥

१. ॐ उत्तमे शिखरे देवी भूम्यां पर्वतमूर्धनि। ब्राह्मणेभ्योऽभ्यनुज्ञाता गच्छ देवि यथासुखम्॥
२. ॐ उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः॥ दृशे विश्वाय सूर्यम्॥ (यजु० ७।४१)
३. ॐ चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः। आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ऽसूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च॥ (यजु० ७।४२)