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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

५०- भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन

२१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| स एव जगतां कालः पाताले च व्यवस्थितः।<br>विष्णोर्विश्वगुरोमूर्त्तिर्दिव्यः साक्षाद्धलायुधः॥ ६५॥<br><br>शयनं देवदेवस्य स हरेः कङ्कणं विभोः।<br>वने पनसवृक्षाणां सशुक़ा दानवादयः॥ ६६॥<br><br>किन्नरैरुरगाश्चैव विशाखकवने स्थिताः।<br>मनोहरवने वृक्षाः सर्वकोटिसमन्विताः॥ ६७॥<br><br>नन्दीश्वरो गणवरैः स्तूयमानो व्यवस्थितः।<br>सन्तानकस्थलीमध्ये साक्षाद्देवी सरस्वती॥ ६८॥<br><br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्ता वनेषु वनवासिनः।<br>असंख्याता मयाप्यत्र वक्तुं नो विस्तरेण तु॥ ६९॥ | वे पातालमें रहते हैं; वे ही समस्त लोकोंके काल हैं। वे विश्वगुरु विष्णुकी दिव्य मूर्ति हैं, साक्षात् हलायुध हैं, देवदेव विष्णुकी शय्या हैं और प्रभु शिवके कंकण (कंगन)-स्वरूप हैं॥ ६४-६५ १/२ ॥<br><br>दानव आदि शुक्राचार्यके साथ कटहलके वृक्षोंके वनमें और सभी उरग किन्नरोंके साथ विशाखवन (नारिकेलवन)-में रहते हैं। विविध प्रकारकी जातियोंवाले वृक्ष उस मनोहरवनमें हैं। नन्दीश्वर भी श्रेष्ठ गणोंके द्वारा स्तुत होते हुए वहाँ विराजमान हैं। सन्तानक (कल्पवृक्ष) क्षेत्रके मध्यमें साक्षात् सरस्वती देवी रहती हैं॥ ६६-६८॥<br><br>[हे विप्रो!] इस प्रकार मैंने इन वनोंमें निवास करनेवाले लोगोंका संक्षेपमें वर्णन किया; ये असंख्य हैं, विस्तारपूर्वक इनका वर्णन करनेमें मैं समर्थ नहीं हूँ॥ ६९॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे जम्बूद्वीपवर्णनं नामैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ४९ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'जम्बूद्वीपवर्णन' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४९ ॥


पचासवाँ अध्याय

भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन

| सूत उवाच<br>शितान्तशिखरे शक्रः पारिजातवने शुभे।<br>तस्य प्राच्यां कुमुदाद्रिकूटोऽसौ बहुविस्तरः॥ १॥<br>अष्टौ पुराप्युदीर्णानि दानवानां द्विजोत्तमाः।<br>सुवर्णकोटरे पुण्ये राक्षसानां महात्मनाम्॥ २॥<br>नीलकानां पुराण्याहुरष्टषष्टिर्द्विजोत्तमाः।<br>महानीलेऽपि शैलेन्द्रे पुराणि दश पञ्च च॥ ३॥<br>हयाननानां मुख्यानां किन्नराणां च सुव्रताः।<br>वेणुसौधे महाशैले विद्याधरपुरत्रयम्॥ ४॥<br>वैकुण्ठे गरुडः श्रीमान् करञ्जे नीललोहितः।<br>वसुधारे वसूनां तु निवासः परिकीर्तितः॥ ५॥<br>रत्नधारे गिरिवरे सप्तर्षीणां महात्मनाम्।<br>सप्तस्थानानि पुण्यानि सिद्धावासयुतानि च॥ ६॥<br>महत्प्रजापतेः स्थानमेकशृङ्गे नगोत्तमे।<br>गजशैले तु दुर्गाद्याः सुमेधे वसवस्तथा॥ ७॥ | सूतजी बोले—इन्द्र शितान्तके शिखरपर विद्यमान सुन्दर पारिजातवनमें रहते हैं। उसके पूर्वमें कुमुदपर्वतकी चोटी है, वह बहुत विस्तृत है। हे श्रेष्ठ द्विजो! वहाँ दानवोंके आठ पुर कहे गये हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! पवित्र सुवर्णकोटरमें नीलक नामक महान् राक्षसोंके अड़सठ पुर बताये गये हैं॥ १-२ १/२ ॥<br><br>हे सुव्रतो! पर्वतश्रेष्ठ महानीलपर भी घोड़ेके समान मुखवाले प्रधान किन्नरोंके पन्द्रह पुर हैं और महान् पर्वत वेणुसौधपर विद्याधरोंके तीन पुर हैं॥ ३-४॥<br><br>श्रीमान् गरुड़ वैकुण्ठ पर्वतपर और नीललोहित रुद्र करंज पर्वतपर निवास करते हैं। वसुओंका निवास वसुधारमें बताया गया है। गिरिश्रेष्ठ रत्नधारपर महात्मा सप्तर्षियोंके सात पवित्र स्थान हैं, जो सिद्धोंके वाससे युक्त हैं॥ ५-६॥<br><br>पर्वतोंमें उत्तम एकशृंग पर्वतपर प्रजापतिका महान् आवास है। गजशैलपर दुर्गा आदि तथा सुमेधपर वसुगण |

अध्याय ५०] भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन २१७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आदित्याश्च तथा रुद्राः कृतावासास्तथाश्विनौ ।<br>अशीतिर्देवपुर्यस्तु हेमकक्षे नगोत्तमे ॥ ८<br>सुनीले रक्षसां वासाः पञ्चकोटिशतानि च ।<br>पञ्चकूटे पुराण्यासन् पञ्चकोटिप्रमाणतः ॥ ९<br>शतशृङ्गे पुरशतं यक्षाणाममितौजसाम् ।<br>ताम्राभे काद्रवेयाणां विशाखे तु गुहस्य वै ॥ १०रहते हैं। पर्वतोंमें उत्तम हेमकक्ष पर्वतपर अस्सी देवपुरियाँ हैं, वहाँ आदित्यगण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार निवास करते हैं ॥ ७-८॥<br>सुनील पर्वतपर राक्षसोंके पाँच सौ करोड़ निवासस्थान हैं। पंचकूटपर पाँच करोड़ पुर हैं। शतशृंगपर अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ पुर हैं। ताम्राभ पर्वतपर काद्रवेयोंका और विशाख पर्वतपर गुहका निवासस्थान है ॥ ९-१०॥
श्वेतोदरे मुनिश्रेष्ठाः सुपर्णस्य महात्मनः ।<br>पिशाचके कुबेरस्य हरिकूटे हरेर्गृहम् ॥ ११हे श्रेष्ठ मुनियो ! श्वेतोदर पर्वतपर महात्मा सुपर्णका, पिशाचकपर कुबेरका और हरिकूटपर विष्णुका आवास है ॥ ११ ॥
कुमुदे किन्नरावासस्त्वञ्जने चारणालयः ।<br>कृष्णे गन्धर्वनिलयः पाण्डुरे पुरसप्तकम् ॥ १२<br>विद्याधराणां विप्रेन्द्रा विश्वभोगसमन्वितम् ।<br>सहस्रशिखरे शैले दैत्यानामुग्रकर्मणाम् ॥ १३<br>पुराणां तु सहस्राणि सप्तशक्रारिणां द्विजाः ।<br>मुकुटे पन्नगावासः पुष्पकेतौ मुनीश्वराः ॥ १४<br>वैवस्वतस्य सोमस्य वायोर्नागाधिपस्य च ।<br>तक्षकै चैव शैलेन्द्रे चत्वार्यायतनानि च ॥ १५कुमुद पर्वतपर किन्नरोंका आवास है। अंजन पर्वतपर चारणोंका निवासस्थान है। कृष्णपर्वतपर गन्धर्वोंका निवासस्थान है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! पाण्डुर पर्वतपर विद्याधरोंके सात पुर हैं, जो सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त हैं। हे द्विजो ! सहस्रशिखर पर्वतपर भयानक कर्मवाले इन्द्रशत्रु दैत्योंके सात हजार पुर हैं। हे मुनीश्वरो ! पुष्पकेतु मुकुट पर्वतपर पन्नगोंका आवास है। वैवस्वत, सोम, वायु और नागाधिपतिके चार निवासस्थान शैलराज तक्षकपर हैं ॥ १२-१५ ॥
ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राणां गुहस्य च महात्मनः ।<br>कुबेरस्य च सोमस्य तथान्येषां महात्मनाम् ॥ १६<br>सन्त्यायतनमुख्यानि मर्यादापर्वतेष्वपि ।<br>श्रीकण्ठाद्रिगुहावासी सर्वावासः सहोमया ॥ १७<br>श्रीकण्ठस्याधिपत्यं वै सर्वदेवेश्वरस्य च ।<br>अण्डस्यास्य प्रवृत्तिस्तु श्रीकण्ठेन न संशयः ॥ १८ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, महात्मा गुह, कुबेर, सोम तथा अन्य महात्माओंके मुख्य निवासस्थान मर्यादा-पर्वतोंपर हैं। सर्वव्यापी शिव [भगवती] उमाके साथ श्रीकण्ठपर्वतकी गुफामें निवास करते हैं। सभी देवताओंके ईश्वर शिवका आधिपत्य श्रीकण्ठ पर्वतपर है। इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति श्रीकण्ठसे ही हुई है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६-१८ ॥
अनन्तेशादयस्त्वेवं प्रत्येकं चाण्डपालकाः ।<br>चक्रवर्तिन इत्युक्तास्ततो विघ्नेश्वरास्त्विह ॥ १९<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितान्यत्र स्थानानि च समासतः ।<br>मर्यादापर्वतेष्वद्य शृण्वन्तु प्रवदाम्यहम् ॥ २०<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितं विश्वं चराचरमिदं जगत् ।<br>कालाग्निशिवपर्यन्तं कथं वक्ष्ये सविस्तरम् ॥ २१अनन्त, ईश आदि इनमेंसे प्रत्येक देवता ब्रह्माण्ड रक्षक हैं, अतः वे चक्रवर्ती तथा विघ्नेश्वर कहे गये हैं। अब मैं मर्यादापर्वतोंपर श्रीकण्ठसे अधिष्ठित स्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। मैं श्रीकण्ठसे अधिष्ठित कालाग्निशिवपर्यन्त इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌का विस्तारपूर्वक वर्णन कैसे कर सकता हूँ ? ॥ १९-२१ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥

५१- दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन

२१८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

इक्यावनवाँ अध्याय

दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
देवकूटे गिरौ मध्ये महाकूटे सुशोभने।<br>हेमवैदूर्यमाणिक्यनीलगोमेदकान्तिभिः ॥ १<br>तथान्यैर्मणिमुख्यैश्च निर्मिते निर्मले शुभे।<br>शाखाशतसहस्राढ्ये सर्वद्रुमविभूषिते ॥ २<br>चम्पकाशोकपुन्नागबकुलासनमण्डिते ।<br>पारिजातकसम्पूर्णे नानापक्षिगणान्विते ॥ ३<br>नैकधा तु शतैश्चित्रे विचित्रकुसुमाकुले।<br>नितम्बपुष्पसालम्बे नैकसत्त्वगणान्विते ॥ ४<br>विमलस्वादुपानीये नैकप्रस्रवणैर्युते।<br>निर्झरैः कुसुमाकीर्णैरनेकैश्र्च विभूषिते ॥ ५<br>पुष्पोडुपवहाभिश्च स्रवन्तीभिरलङ्कृते।<br>स्निग्धवर्णं महामूलमनेकस्कन्धपादपम्॥ ६<br>रम्यं ह्यविरलच्छायं दशयोजनमण्डलम्।<br>तत्र भूतवनं नाम नानाभूतगणालयम्॥ ७बड़ी-बड़ी चोटियोंवाले, अत्यन्त सुन्दर, स्वर्ण-वैदूर्य, माणिक्य-नीलम-गोमेद तथा अन्य बहुमूल्य मणियोंसे निर्मित, स्वच्छ, पवित्र, सौ हजार शाखाओंसे युक्त, सभी प्रकारके वृक्षोंसे मण्डित, चम्पक-अशोक-पुन्नाग-बकुल तथा असनसे विभूषित, पारिजातसे परिपूर्ण, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे भरे हुए, सैकड़ों प्रकारके धातुओंसे चित्रित, अद्भुत पुष्पोंसे युक्त, नीचेतक लटकती हुई पुष्प-शाखाओंसे युक्त नितम्बवाले, नानाविध पशु-समूहोंसे भरे हुए, अनेक धाराओंसे युक्त, स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलवाले, अनेकविध पुष्पोंसे भरे हुए निर्झरोंसे विभूषित और बहती हुई धाराओं तथा उनमें तैरते हुए पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित देवकूट पर्वतपर उसके मध्यमें मनोहर वर्णवाला, गहरी जड़ों तथा अनेक स्कन्धोंसे युक्त वृक्षोंवाला, मनोहर, घनी छायावाला, दस योजन मण्डल (परिधि)-वाला तथा अनेक भूतगणोंके निवासस्थानोंसे समन्वित भूतवन नामक वन है॥ १—७॥
महादेवस्य देवस्य शङ्करस्य महात्मनः।<br>दीप्तमायतनं तत्र महामणिविभूषितम् ॥ ८<br>हेमप्राकारसंयुक्तं मणितोरणमण्डितम्।<br>स्फाटिकैश्च विचित्रैश्च गोपुरैश्च समन्वितम् ॥ ९<br>सिंहासनैर्मणिमयैः शुभास्तरणसंयुतैः।<br>क्षितावितस्ततः सम्यक् शर्वेणाधिष्ठितैः शुभैः ॥ १०<br>अम्लानमालानिचितैर्नानावर्णैर्गृहोत्तमैः ।<br>मण्डपैः सुविचित्रैस्तु स्फाटिकस्तम्भसंयुतैः ॥ ११<br>संयुतं सर्वभूतैन्द्रैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रपूजितैः।<br>वराहगजसिंहर्क्षशार्दूलकरभाननैः ॥ १२<br>गृध्रोलूकमुलैश्चान्यैर्मृगोष्ट्राजमुखैरपि ।<br>प्रमथैर्विविधैः स्थूलैर्गिरिकूटोपमैः शुभैः ॥ १३<br>करालैर्हरिकेशैश्च रोमशैश्च महाभुजैः।<br>नानावर्णाकृतिधरैर्नानासंस्थानसंस्थितैः ॥ १४वहाँ महादेव महात्मा भगवान् शंकरका कान्तिमान् निवासस्थान है। वह महामणियोंसे विभूषित; स्वर्णकी चहारदीवारीसे युक्त; मणिमय तोरणोंसे मण्डित; स्फटिकके बने हुए विचित्र गोपुरोंसे युक्त; भूमिपर इधर-उधर शुभ आस्तरणोंसे ढके हुए, शिवजीके द्वारा अधिष्ठित, सुन्दर तथा मणिमय सिंहासनोंसे युक्त; कभी न मुरझानेवाले अनेक रंगके फूलोंसे विभूषित उत्तम भवनोंसे युक्त; स्फटिकके स्तम्भोंवाले अत्यन्त विचित्र मण्डपोंसे समन्वित; ब्रह्मा, इन्द्र तथा उपेन्द्रके द्वारा पूजित सभी भूतगणोंसे संयुक्त; वराह-गज-सिंह-ऋक्ष-शार्दूल, करभ, गीध, उल्लू-मृग-उष्ट्र तथा अजके समान मुखवाले, पर्वतके शिखरके समान स्थूल, सुन्दर, भयानक सिंहके समान केशों तथा रोमोंवाले, बड़ी भुजाओंवाले, अनेक वर्ण

अध्याय ५१ ] दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन २१९


श्लोकअर्थ
दीप्तास्यैर्दीप्तचरितैर्नन्दीश्वरमुखैः शुभैः।<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसङ्काशैरणिमादिगुणान्वितैः ॥ १५<br><br>अशून्यममरैर्नित्यं महापार्षदैस्तथा।<br>तत्र भूतपतेर्देवाः पूजां नित्यं प्रयुञ्जते ॥ १६तथा आकारवाले, विभिन्न आसनोंसे बैठे हुए प्रभामय मुखवाले, भव्य चरितवाले, ब्रह्मा-इन्द्र-विष्णुके तुल्य प्रतीत होनेवाले तथा अणिमा आदि गुणोंसे समन्वित नन्दीश्वर आदि विविध प्रमथोंसे सुशोभित; देवताओं तथा महापार्षदोंसे नित्य परिपूर्ण रहता है। वहाँ देवतालोग भूतपति शिवकी नित्य पूजा करते हैं॥ ८—१६॥
झर्झरैः शङ्खपटहैर्भेरीडिण्डिमगोमुखैः।<br>ललितावासितोद्गीतैर्नृत्तवल्गितगर्जितैः ॥ १७<br><br>पूजितो वै महादेवः प्रमथैः प्रमथेश्वरः।<br>सिद्धर्षिदेवगन्धर्वैर्ब्रह्मणा च महात्मना ॥ १८<br><br>उपेन्द्रप्रमुखैश्चान्यैः पूजितस्तत्र शङ्करः।<br>विभक्तचारुशिखरं यत्र तच्छङ्खवर्चसम् ॥ १९प्रमथगण झाँझ, शंख, पटह, भेरी, डिण्डिम तथा गोमुख (वाद्ययन्त्रों)-द्वारा, ललित तथा मधुरगानोंके द्वारा, नाचने-कूदने तथा गर्जन-ध्वनिके द्वारा प्रमथपति महादेवकी पूजा करते हैं। वहाँ सिद्ध, ऋषि, देवता, गन्धर्व, महात्मा ब्रह्मा, उपेन्द्र आदि तथा अन्य लोग शंकरकी पूजा करते हैं। जहाँ शंकरकी पूजा होती है, वह सुन्दर शिखर दो भागोंमें बँटा हुआ तथा शंखके समान कान्तिमान् प्रतीत होता है॥ १७-१९॥
कैलासो यक्षराजस्य कुबेरस्य महात्मनः।<br>निवासः कोटियक्षाणां तथान्येषां महात्मनाम् ॥ २०<br><br>तत्रापि देवदेवस्य भवस्यायतनं महत्।<br>तस्मिन्नायतने सोमः सदास्ते सगणो हरः ॥ २१<br><br>यत्र मन्दाकिनी नाम नलिनी विपुलोदका।<br>सुवर्णमणिसोपाना कुबेरशिखरे शुभे ॥ २२<br><br>जाम्बूनदमयैः पद्मैर्गन्धस्पर्शगुणान्वितैः।<br>नीलवैडूर्यपत्रैश्च गन्धोपेतैर्महोत्पलैः ॥ २३<br><br>तथा कुमुदखण्डैश्च महापद्मैरलङ्कृत।<br>यक्षगन्धर्वनारीभिरप्सरोभिश्च सेविता ॥ २४<br><br>देवदानवगन्धर्वैर्यक्षराक्षसकिन्नरैः ।<br>उपस्पृष्टजला पुण्या नदी मन्दाकिनी शुभा ॥ २५कैलास यक्षोंके राजा महात्मा कुबेरका, करोड़ों यक्षोंका तथा अन्य महात्माओंका निवासस्थान है। वहाँ देवाधिदेव शिवका विशाल भवन है। शिवजी उस भवनमें उमा तथा [अपने] गणोंके साथ सदा विराजमान रहते हैं। वहाँ कुबेरके सुन्दर शिखरपर बहुत जलसे भरी हुई सोने तथा मणियोंसे निर्मित सीढ़ियोंवाली और कुमुदपुष्पोंसे युक्त मन्दाकिनी नामक नदी है। वह पुण्यदायिनी तथा पवित्र मन्दाकिनी नदी गन्ध-स्पर्शगुणोंसे युक्त सुवर्णमय कमलों, नील वैडूर्यके पत्तों, गन्धयुक्त विशाल उत्पलों और कुमुदों तथा महापद्मोंसे अलंकृत; यक्षों तथा गन्धर्वोंकी स्त्रियों और अप्सराओंसे सेवित एवं देवता-दानव-गन्धर्व-यक्ष-राक्षस-किन्नरोंके द्वारा उपस्पृष्ट (स्नान-पानके लिये उपयुक्त) जलवाली है॥ २०-२५॥
तस्याश्चोत्तरपार्श्वे तु भवस्यायतनं शुभम्।<br>वैडूर्यमणिसम्पन्नं तत्रास्ते शङ्करोऽव्ययः ॥ २६<br><br>द्विजाः कनकनन्दायास्तीरे वै प्राचिदक्षिणे।<br>वनं द्विजसहस्त्राढ्यं मृगपक्षिसमाकुलम् ॥ २७<br><br>तत्रापि सगणः साम्बः क्रीडतेऽद्रिसमे गृहे।<br>नन्दायाः पश्चिमे तीरे किञ्चिद्वै दक्षिणाश्रिते ॥ २८उसके उत्तरभागमें शिवजीका वैडूर्यमणिनिर्मित सुन्दर भवन है, वहाँ अविनाशी शंकर निवास करते हैं। हे द्विजो! उसके पूर्व-दक्षिणमें कनकनन्दाके तटपर हजारों द्विजोंसे सेवित और पशुओं तथा पक्षियोंसे भरा हुआ एक वन है। वहाँ भी कैलासपुल्य भवनमें शिवजी उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं॥ २६-२७ १/२॥<br><br>नन्दाके पश्चिमी तटपर थोड़ी दूर दक्षिणमें अनेक

५२- विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन

२२०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
पुरं रुद्रपुरी नाम नानाप्रासादसङ्कुलम्।<br>तत्रापि शतधा कृत्वा ह्यात्मानं चाम्बया सह॥ २९<br>क्रीडते सगणः साम्बस्तच्छिवालयमुच्यते।<br>एवं शतसहस्राणि शर्वस्यायतनानि तु॥ ३०<br>प्रतिद्वीपे मुनिश्रेष्ठाः पर्वतेषु वनेषु च।<br>नदीनदतटाकानां तीरेष्वर्णवसन्धिषु॥ ३१महलोंसे युक्त रुद्रपुरी नामक नगर है। वहाँ भी शिवजी सैकड़ों रूप धारण करके उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं, उसे शिवालय कहा जाता है। इस प्रकार हे मुनिश्रेष्ठो! प्रत्येक द्वीपमें पर्वतोंपर, वनोंमें, नदी-नद-सरोवरोंके तटोंपर और समुद्रोंके संगमोंपर भगवान् शिवके सैकड़ों-हजारों निवासस्थान हैं॥ २८-३१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधद्वीपशोभावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधद्वीपशोभावर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥


बावनवाँ अध्याय

विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन

सूत उवाच<br>नद्यश्च बहवः प्रोक्ताः सदा बहुजलाः शुभाः।<br>सरोवरेभ्यः सम्भूतास्त्वसंख्याता द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>प्राङ्मुखा दक्षिणास्यास्तु चोत्तरप्रभवाः शुभाः।<br>पश्चिमाग्राः पवित्राश्च प्रतिवर्षं प्रकीर्तिताः॥ २<br><br>आकाशाम्भवनिधैर्योऽसौ सोम इत्यभिधीयते।<br>आधारः सर्वभूतानां देवानाममृताकरः॥ ३<br><br>अस्मात्प्रवृत्ता पुण्योदा नदी त्वाकाशगामिनी।<br>सप्तमेनानिलपथा प्रवृत्ता चामृतोदका॥ ४<br><br>सा ज्योतींष्यनुवर्तन्ती ज्योतिर्गणनिषेविता।<br>ताराकोटिसहस्राणां नभसश्च समायुता॥ ५<br><br>परिवर्तत्यहरहो यथा सोमस्तथैव सा।<br>चत्वार्यशीतिश्च तथा सहस्राणां समुच्छ्रितः॥ ६<br><br>योजनानां महामेरुः श्रीकण्ठाक्रीडकोमलः।<br>तत्रासीनो यतः शर्वः साम्बः सह गणेश्वरैः॥ ७<br><br>क्रीडते सुचिरं कालं तस्मात्पुण्यजला शिवा।<br>गिरिं मेरुं नदी पुण्या सा प्रयाति प्रदक्षिणम्॥ ८<br><br>विभज्यमानसलिला सा जवेनानिलेन च।<br>मेरोरन्तरकूटेषु निपपात चतुर्ष्वपि॥ ९सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! प्रत्येक वर्षमें सदा विपुल जलसे भरी हुई बहुत-सी असंख्य पवित्र नदियाँ बतायी गयी हैं, वे सरोवरोंसे निकली हुई हैं। वे पवित्र नदियाँ पूर्वकी ओर, दक्षिणकी ओर, उत्तरकी ओर तथा पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली कही गयी हैं॥ १-२॥<br><br>आकाशमें जो जलसागर है, उसे सोम कहा जाता है। वह सभी प्राणियोंका आधार तथा देवताओंके लिये अमृतका भण्डार है; इससे निकली हुई पुण्य जलवाली नदी आकाशमें बहती है। सातवें वायुमार्गसे प्रवृत्त यह अमृतमय जलवाली नदी ज्योतिरूप गणोंके बीच प्रवाहित होती है। यह आकाशके हजारों-करोड़ों ताराओंसे घिरी हुई है। यह चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन चारों ओर प्रवाहित होती रहती है॥ ३-५ १/२॥<br><br>महामेरु चौरासी हजार योजन ऊँचा है, वह भगवान् श्रीकण्ठका कोमल क्रीड़ास्थल है। वहाँ शिवजी उमा तथा गणेश्वरोंके साथ विराजमान रहते हैं और दीर्घकालतक क्रीड़ा करते हैं, अतः वह पवित्र जलवाली तथा कल्याणकारिणी है। वह पुण्यदायिनी नदी मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करती है॥ ६-८॥<br><br>वायुके वेगके कारण विभाजित होते हुए जलवाली वह नदी मेरुके अन्तर्गत चारों कूटोंमें प्रवाहित होती है। सभी पर्वतोंको विभागपूर्वक सभी ओरसे लाँघकर वह

अध्याय ५२] विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन २२१

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
समन्तात्समतिक्रम्य सर्वान्‍द्रीन् प्रविभागशः।<br>नियोगाद्देवदेवस्य प्रविष्टा सा महार्णवम्॥ १०<br>अस्या विनिर्गता नद्यः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>सर्वद्वीपद्रिवर्षेषु बहवः परिकीर्तिताः॥ ११<br>क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याता गङ्गा यद्गां गताम्बरात्।देवदेव शिवके आदेशसे महासागरमें प्रवेश करती है। इससे निकली हुई सैकड़ों-हजारों अनेक नदियाँ कही गयी हैं, जो सभी द्वीपों, पर्वतों तथा देशोंमें हैं। छोटी नदियाँ तो असंख्य हैं; गंगा आकाशसे पृथ्वीपर आयी हुई हैं, इसलिये वे गंगा कहलाती हैं॥ ९—११ १/२॥
केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभोजनाः॥ १२<br>स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभा जीवितं चायुतं स्मृतम्।<br>भद्राश्वे शुक्लवर्णाश्च स्त्रियश्चन्द्रांशुसन्निभाः॥ १३<br>कालााम्रभोजनाः सर्वे निरातङ्का रतिप्रियाः।<br>दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति शिवभाविताः॥ १४<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितचेतसः।केतुमालवर्षमें मनुष्य कृष्णवर्णवाले हैं, वे सब कटहलका आहार ग्रहण करते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ उत्पलके वर्णवाली हैं। वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्ष कही गयी है। भद्राश्ववर्षमें स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणोंके समान शुक्ल वर्णकी हैं। वहाँके सभी लोग कालााम्रका भोजन करनेवाले, भयरहित तथा रतिप्रिय हैं। शिवका ध्यान करनेवाले वे लोग दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोगोंके समान वे भी मनको ईश्वरमें लगाये रखते हैं॥ १२—१४ १/२॥
तथा रमणके जीवा न्यग्रोधफलभोजनाः॥ १५<br>दशवर्षसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति शुक्लास्ते सर्वे शिवध्यानपरायणाः॥ १६<br>हैरण्मया महाभागा हिरण्मयवनाश्रयाः।<br>एकादशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च॥ १७<br>वर्षाणां तत्र जीवन्ति अश्वत्थाशनजीवनाः।<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितमानसाः॥ १८रमणकवर्षमें लोग बरगदका फल ग्रहण करते हैं। वे ग्यारह हजार पाँच सौ वर्ष जीवित रहते हैं। वे सब शुक्लवर्णके होते हैं और शिवके ध्यानमें लगे रहते हैं। हिरण्मयवनका आश्रय लेकर महाभाग्यशाली हिरण्मय लोग रहते हैं। वे वहाँपर बारह हजार पाँच सौ वर्ष जीते हैं और अश्वत्थ (पीपल)-के आहारपर जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोग अपने मनको शिवमें लगाये रखते हैं॥ १५—१८॥
कुरुवर्षे तु कुरवः स्वर्गलोकात्परिच्युताः।<br>सर्वे मैथुनजाताश्च क्षीरिणः क्षीरभोजनाः॥ १९<br>अन्योन्यमनुरक्ताश्च चक्रवाकसधर्मिणः।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं सुखनिषेविणः॥ २०<br>त्रयोदशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति ते महावीर्या न चान्यस्त्रीनिषेविणः॥ २१<br>सहैव मरणं तेषां कुरूणां स्वर्गवासिनाम्।<br>हृष्टानां सुप्रवृद्धानां सर्वान्नामृतभोजिनाम्॥ २२<br>सदा तु चन्द्रकान्तानां सदा यौवनशालिनाम्।<br>श्यामाङ्गानां सदा सर्वभूषणास्पददेहिनाम्॥ २३<br>जम्बूद्वीपे तु तत्रापि कुरुवर्षं सुशोभनम्।<br>तत्र चन्द्रप्रभं शम्भोर्विमानं चन्द्रमौलिनः॥ २४कुरुवर्षमें कुरुलोग स्वर्गसे गिरे हुए हैं। वे सभी मैथुनक्रियासे उत्पन्न हुए हैं। वे दुग्धका पान तथा भोजन करते हैं। वे एक-दूसरेसे प्रेम करनेवाले, चक्रवाक पक्षीके समान गुण-धर्मवाले, रोगरहित, शोकमुक्त एवं सदा सुखोंका भोग करनेवाले हैं। वे चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीते हैं। वे महातेजस्वी हैं और अन्य स्त्रीका सेवन नहीं करते हैं। हृष्ट-पुष्ट, अत्यन्त प्रबुद्ध, सभी प्रकारके अन्न तथा अमृतके आहारवाले, सदा चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, सदा यौवनशाली, श्याम वर्णके शरीरवाले एवं सर्वदा सभी प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित शरीरवाले उन स्वर्गवासी कुरुओंका मरण साथ-साथ होता है। वहाँ जम्बूद्वीपमें भी अत्यन्त सुन्दर कुरुवर्ष है। चन्द्रशेखर शिवका चन्द्रमाकी प्रभाके समान एक विमान वहाँपर विद्यमान है॥ १९—२४॥

| २२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| वर्षे तु भारते मर्त्याः पुण्याः कर्मवशायुषः।<br>शतायुषः समाख्याता नानावर्णाल्पदेहिनः॥ २५<br><br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्मफलाशिनः।<br>नानाज्ञानार्थसम्पन्ना दुर्बलाश्चाल्पभोगिनः॥ २६ | भारतवर्षमें मनुष्य पुण्यशाली, कर्मके अधीन आयुवाले, [प्रायः] सौ वर्षकी आयुवाले, अनेक रंगवाले, छोटे शरीरवाले, अनेक देवताओंकी पूजामें परायण, नानाविध कर्मोंका फल भोगनेवाले, अनेक ज्ञानके अर्थोंसे सम्पन्न, दुर्बल तथा अल्प सुखको भोगनेवाले कहे गये हैं॥ २५-२६॥ | | इन्द्रद्वीपे तथा केचित्तथैव च कसेरुके।<br>ताम्रद्वीपं गताः केचित्केचिद्देशं गभस्तिमत्॥ २७<br><br>नागद्वीपं तथा सौम्यं गान्धर्वं वारुणं गताः।<br>केचिन्म्लेच्छाः पुलिन्दाश्च नानाजातिसमुद्भवाः॥ २८<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्मृताः।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च सर्वशः॥ २९<br><br>इज्ज्यायुद्धवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः।<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्ततेऽत्र परस्परम्॥ ३०<br><br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु।<br>सङ्कल्पश्चाभिमानश्च आश्रमाणां यथाविधि॥ ३१<br><br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्यत्र मानुषी।<br>तेषां च युगकर्माणि नान्यत्र मुनिपुङ्गवाः॥ ३२ | उनमेंसे कुछ इन्द्रद्वीपमें, कुछ कसेरुकद्वीपमें, कुछ ताम्रद्वीपमें और कुछ गभस्तिमान् देशमें चले गये। कुछ नागद्वीपमें, कुछ सोमद्वीपमें, कुछ गन्धर्वद्वीपमें तथा कुछ वरुणद्वीपमें चले गये। कुछ लोग विविध जातियोंसे उत्पन्न म्लेच्छ और पुलिन्द हैं। उस द्वीपके पूर्वी भागमें किरात तथा पश्चिमी भागमें यवन बताये गये हैं। उसके मध्यभागमें सर्वत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र हैं। वे पूजन, युद्ध, वाणिज्य आदिके द्वारा जीविका चलाते हुए वहाँ व्यवस्थित हैं। उन वर्णोंका अपने-अपने कर्मोंमें परस्पर यह व्यवहार धर्म, अर्थ तथा कामसे सम्बन्धित है। उनमें संकल्प एवं अभिमान [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रमोंमें उचित रूपमें विद्यमान है। वहाँपर स्वर्ग तथा मोक्षके लिये मनुष्योंकी जो प्रवृत्ति है और उनके जो युगकर्म हैं, हे मुनिश्रेष्ठो! वैसा अन्यत्र नहीं है॥ २७-३२॥ | | दशवर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे नृणाम्।<br>सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः॥ ३३<br><br>अनामया ह्यशोकाश्च सर्वे ते शिवभाविताः।<br>शुद्धसत्त्वाश्च हेमाभाः सदाराः प्लक्षभोजनाः॥ ३४ | किम्पुरुषवर्षमें मनुष्योंकी स्थिति दस हजार वर्षतक रहती है। वहाँके पुरुष सुवर्णके रंगवाले होते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान होती हैं। वे सब रोगरहित, शोकरहित, शिवभक्तिसे युक्त, विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न, स्वर्णके समान आभावाले, अपनी पत्नियोंके साथ रहनेवाले तथा गूलरका भोजन करनेवाले होते हैं॥ ३३-३४॥ | | महारजतसङ्काशा हरिवर्षेऽपि मानवाः।<br>देवलोकाच्च्युताः सर्वे देवाकाराश्च सर्वशः॥ ३५<br><br>हरं यजन्ति सर्वेशं पिबन्तीक्षुरसं शुभम्।<br>न जरा बाधते तेन न च जीर्यन्ति ते नराः॥ ३६<br><br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः।<br>मध्यमं यन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम्॥ ३७ | हरिवर्षमें भी मनुष्य महारजतके समान वर्णवाले होते हैं। वे सब देवलोकसे च्युत हुए हैं और हर प्रकारसे देवताओंके आकारके होते हैं। वे सर्वेश्वर शिवका पूजन करते हैं और पवित्र इक्षुरसका पान करते हैं, अतः उन्हें बुढ़ापा बाधित नहीं करता और वे लोग वृद्ध नहीं होते। वहाँ मनुष्य दस हजार वर्ष जीवित रहते हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीर्यन्ति मानवाः।<br>चन्द्रसूर्यो न नक्षत्रं न प्रकाशमिलावृते॥ ३८ | मध्यमें स्थित जो इलावृत नामक वर्ष कहा गया है, वहाँ सूर्य नहीं तपता है और वहाँ मनुष्य बूढ़े नहीं होते। इलावृतवर्षमें न सूर्य-चन्द्रमा हैं, न तारे हैं और |

अध्याय ५२ ]विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन२२३

पद्मप्रभाः पद्ममुखाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः।<br>पद्मपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते भवभाविताः॥ ३९<br><br>जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।<br>देवलोकागतास्तत्र जायन्ते ह्यजरामराः॥ ४०<br><br>त्रयोदशसहस्त्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।<br>आयुःप्रमाणं जीवन्ति वर्षे दिव्ये त्विलावृते॥ ४१<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधते त्विमान्।<br>न क्षुधा न क्लमश्चापि न जनो मृत्युमांस्तथा॥ ४२<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपप्रतीकाशं जायते भास्वरं तु तत्॥ ४३न तो प्रकाश ही है। वहाँके लोग कमलके समान प्रभाववाले, कमलके समान मुखवाले, कमलके पत्रके समान नेत्रोंवाले और कमलपत्रकी सुगन्धिसे युक्त होते हैं। वे शिवमें ध्यानपरायण रहते हैं। वे जामुनके फलके रसका आहार करनेवाले, धूपके प्रभावसे रहित तथा सुगन्धमय होते हैं। देवलोकसे आये हुए वे लोग अजर-अमर होते हैं। उस दिव्य इलावृतवर्षमें वे श्रेष्ठ मनुष्य तेरह हजार वर्षतक अपनी पूरी आयुभर जीवित रहते हैं। जामुनके फलका रस पीनेसे इन्हें न बुढ़ापा बाधित करता है, न भूख लगती है और न थकावट होती है। वहाँके लोग [समयसे पूर्व] मरते नहीं हैं। वहाँ जाम्बूनद नामक स्वर्ण होता है; वह देवताओंका आभूषण है तथा इन्द्रगोप (कीटविशेष)-के समान प्रकाशमान रहता है॥ ३७-४३॥
एवं मया समाख्याता नववर्षानुवर्तिनः।<br>वर्णायुर्भोजनाद्यानि सङ्क्षिप्य न तु विस्तरात्॥ ४४इस प्रकार मैंने नौ वर्षोंके निवासियोंका वर्णन कर दिया। मैंने उनके वर्ण, आयु, भोजन आदिके विषयमें विस्तारसे नहीं बल्कि संक्षेपमें कहा है॥ ४४॥
हेमकूटे तु गन्धर्वा विज्ञेयाश्चाप्सरोगणाः।<br>सर्वे नागाश्च निषधे शेषवासुकितक्षकाः॥ ४५<br><br>महाबलास्त्रयस्त्रिंशद्रमन्ते याज्ञिकाः सुराः।<br>नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४६हेमकूटपर्वतपर गन्धर्वों तथा अप्सराओंको रहनेवाला जानना चाहिये। शेष, वासुकि, तक्षक और सभी नाग निषधपर रहते हैं। तैंतीस महाबली याज्ञिक देवता, सिद्धगण तथा विशुद्धात्मा ब्रह्मर्षि वैदूर्य मणिवाले नीलपर्वतपर रहते हैं॥ ४५-४६॥
दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते।<br>शृङ्गवान् पर्वतश्चैव पितॄणां निलयः सदा॥ ४७<br><br>हिमवान् यक्षमुख्यानां भूतानामीश्वरस्य च।<br>सर्वाद्रिषु महादेवो हरिणा ब्रह्मणाम्बया॥ ४८<br><br>नन्दिना च गणैश्चैव वर्षेषु च वनेषु च।<br>नीलश्वेतत्रिशृङ्गे च भगवान्नीललोहितः॥ ४९<br><br>सिद्धैर्देवैश्च पितृभिर्दृष्टो नित्यं विशेषतः।<br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः॥ ५०<br><br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्।<br>एते पर्वतराजानो जम्बूद्वीपे व्यवस्थिताः॥ ५१दैत्यों एवं दानवोंका निवासस्थान श्वेतपर्वत कहा जाता है। शृंगवान्पर्वत [सभी] पितरोंका निवासस्थान है। हिमवान् सभी यक्षों, भूतों तथा शिवका निवास है। महादेवजी श्रीविष्णु, ब्रह्मा, उमा, नन्दी और [अपने] गणोंके साथ सभी पर्वतों, वर्षों तथा वनोंमें निवास करते हैं। भगवान् नीललोहित नील, श्वेत एवं त्रिशृंग पर्वतोंपर विशेष रूपसे सिद्धों, देवताओं तथा पितरोंके साथ सदा दिखायी पड़ते हैं। नीलपर्वत वैदूर्यमय, श्वेतपर्वत शुक्लवर्णवाला, हिरण्यमयपर्वत मोरपंखके वर्णका और शृंगवान्पर्वत सुनहरे वर्णका है। ये सभी पर्वतराज जम्बूद्वीपमें स्थित हैं॥ ४७-५१॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशस्वभाववर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशस्वभाववर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥

५३- भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य

२२४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

तिरपनवाँ अध्याय

भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतों, ऊर्ध्वलोकों तथा नरकोंका वर्णन, सर्वत्र सदाशिवकी व्यापकता एवं यक्षरूप शिव और भगवती उमाका माहात्म्य

सूत उवाचसूतजी बोले— प्लक्ष आदि सात द्वीपोंमें सात पर्वत हैं, जो सीधे, लम्बे तथा प्रत्येक दिशाओंमें फैले हुए हैं; वे वर्षपर्वतके रूपमें प्रतिष्ठित हैं॥ १॥
प्लक्षद्वीपादिद्वीपेषु सप्त सप्तसु पर्वताः।<br>ऋज्वायताः प्रतिदिशं निविष्टा वर्षपर्वताः॥ १मैं प्लक्षद्वीपमें स्थित सातों दिव्य महापर्वतोंका वर्णन करूँगा। पहला गोमेदक तथा दूसरा चान्द्र कहा जाता है। तीसरा नारद तथा चौथा दुन्दुभि नामवाला कहा गया है। पाँचवाँ सोमक तथा छठा सुमनस् नामवाला कहा जाता है, उसे वैभव [नामवाला] भी कहा गया है। सातवाँ पर्वत वैभ्राज नामसे प्रसिद्ध है। विशेष रूपसे ये ही सात पर्वत प्लक्षद्वीपमें बताये गये हैं॥ २–४॥
प्लक्षद्वीपे तु वक्ष्यामि सप्त दिव्यान् महाचलान्।<br>गोमेदकोऽत्र प्रथमो द्वितीयश्चान्द्र उच्यते॥ २
तृतीयो नारदो नाम चतुर्थो दुन्दुभिः स्मृतः।<br>पञ्चमः सोमको नाम सुमनाः षष्ठ उच्यते॥ ३
स एव वैभवः प्रोक्तो वैभ्राजः सप्तमः स्मृतः।<br>सप्तैते गिरयः प्रोक्ताः प्लक्षद्वीपे विशेषतः॥ ४
सप्त वै शाल्मलिद्वीपे तांस्तु वक्ष्याम्यनुक्रमात्।<br>कुमुदश्चोत्तमश्चैव पर्वतश्च बलाहकः॥ ५शाल्मलिद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, मैं क्रमसे उन्हें बताऊँगा। कुमुद, उत्तम, बलाहक, द्रोण, कंक, महिष और सातवाँ ककुद्मान् कहा गया है। कुशद्वीपमें भी सात उपद्वीप और कुलपर्वत हैं। मैं केवल नामसे ही संक्षेपमें उन्हें बताऊँगा। पहला विद्रुम तथा दूसरा हेमपर्वत कहा गया है। तीसरा द्युतिमान् एवं चौथा पुष्पित नामवाला बताया गया है। पाँचवाँ कुशेशय तथा छठा हरिगिरि [नामवाला] कहा गया है। सातवाँ पर्वत शोभासम्पन्न मन्दर है, यह महादेवजीका निवासस्थान है। जलोंका नाम मन्दा है; इसीलिये जलोंको धारण करनेसे इसका नाम मन्दर है॥ ५–९॥
द्रोणः कङ्कश्च महिषः ककुद्मान् सप्तमः स्मृतः।<br>कुशद्वीपे तु सप्तैव द्वीपाश्च कुलपर्वताः॥ ६
तांस्तु सङ्क्षेपतो वक्ष्ये नाममात्रेण वै क्रमात्।<br>विद्रुमः प्रथमः प्रोक्तो द्वितीयो हेमपर्वतः॥ ७
तृतीयो द्युतिमान्नाम चतुर्थः पुष्पितः स्मृतः।<br>कुशेशयः पञ्चमस्तु षष्ठो हरिगिरिः स्मृतः॥ ८
सप्तमो मन्दरः श्रीमान् महादेव‌निकेतनम्।<br>मन्दा इति ह्यपां नाम मन्दरो धारणादपाम्॥ ९
तत्र साक्षाद् वृषाङ्कस्तु विश्वेशो विमलः शिवः।<br>सोमः सनन्दी भगवानास्ते हेमगृहोत्तमे॥ १०साक्षात् भगवान् वृषभध्वज विश्वेश्वर अमलात्मा शिव वहाँ उत्तम सुवर्णगृहमें पार्वती तथा नन्दीके साथ रहते हैं। पूर्वकालमें मन्दरने महाक्षेत्र अविमुक्तमें [अपनी] तपस्यासे महेश्वरको प्रसन्न किया था और उनसे महावरदान प्राप्त किया था॥ १०-११॥
तपसा तोषितः पूर्वं मन्दरेण महेश्वरः।<br>अविमुक्ते महाक्षेत्रे लेभे स परं वरम्॥ ११
प्रार्थितश्च महादेवो निवासार्थं सहाम्बया।<br>अविमुक्तादुपागम्य चक्रे वासं स मन्दरे॥ १२उसने महादेवजीसे उमाके साथ वहाँ निवास करनेके लिये प्रार्थना की, तब वे [शिव] अविमुक्तक्षेत्रसे आकर नन्दी, अपने गणों तथा उमाके साथ मन्दर [पर्वत]-पर निवास करने लगे, इसीलिये वे उस पर्वतको नहीं छोड़ते हैं॥ १२ १/२॥
सनन्दी सगणः सोमस्तेनासौ तन्न मुञ्चति।<br>क्रौञ्चद्वीपे तु सप्तेह क्रौञ्चाद्याः कुलपर्वताः॥ १३

अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौञ्चद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
क्रौञ्चो वामनकः पश्चात्तुतीयश्चान्धकारकः।<br>अन्धकारात्परश्चापि दिवावृन्नाम पर्वतः॥ १४<br><br>दिवावृतः परश्चापि विविन्दो गिरिरुच्यते।<br>विविन्दात्परतश्चापि पुण्डरीको महागिरिः॥ १५<br><br>पुण्डरीकात्परश्चापि प्रोच्यते दुन्दुभिस्वनः।<br>एते रत्नमयाः सप्त क्रौञ्चद्वीपस्य पर्वताः॥ १६क्रौञ्चद्वीपमें भी क्रौञ्च आदि सात कुलपर्वत हैं। [पहला] क्रौञ्च, [दूसरा] वामन तथा तीसरा अन्धकारक पर्वत है। अन्धकारकके बाद दिवावृत् नामक पर्वत है। दिवावृत्‌के बाद विविन्द पर्वत कहा जाता है। विविन्दके बाद पुण्डरीक नामक महान् पर्वत है और पुण्डरीकके बाद दुन्दुभिस्वन पर्वत कहा जाता है। क्रौञ्चद्वीपके ये सातों पर्वत रत्नमय हैं॥ १३-१६॥
शाकद्वीपे च गिरयः सप्त तांस्तु निबोधत।<br>उदयो रैवतश्चापि श्यामको मुनिसत्तमाः॥ १७<br><br>राजतश्च गिरिः श्रीमानाम्बिकेयः सुशोभनः।<br>आम्बिकेयात्परो रम्यः सर्वौषधिसमन्वितः॥ १८<br><br>तथैव केसरीत्युक्तो यतो वायुः प्रजायते।शाकद्वीपमें भी सात पर्वत हैं, उन्हें जानिये। हे श्रेष्ठ मुनियो! उदय, रैवत, श्यामक, शोभासम्पन्न राजतपर्वत तथा अत्यन्त सुन्दर आम्बिकेय पर्वत हैं। आम्बिकेयके बाद सभी प्रकारकी औषधियोंसे युक्त रम्य नामक पर्वत है। उसके बाद केसरीपर्वत कहा गया है, जहाँसे वायु उत्पन्न होती है॥ १७-१८ १/२॥
पुष्करे पर्वतः श्रीमान्नेक एव महाशिलः॥ १९<br><br>चित्रैर्मणिमयैः कूटैः शिलाजालैः समुच्छ्रितैः।<br>द्वीपस्य तस्य पूर्वार्धे चित्रसानुस्थितो महान्॥ २०<br><br>योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>अधश्चैव चतुस्त्रिंशत्सहस्त्राणि महाचलः॥ २१<br><br>द्वीपस्यार्धे परिक्षिप्तः पर्वतो मानसोत्तरः।<br>स्थितो वेलासमीपे तु नवचन्द्र इवोदितः॥ २२पुष्करद्वीपमें महाशिल नामक एक ही शोभासम्पन्न पर्वत है; यह अद्भुत मणियोंवाले शिखरोंसे तथा शिलासमूहोंसे युक्त है। यह महान् पर्वत उस द्वीपके आधे पूर्वी भागमें अनेक रंगोंके किनारोंके साथ पचास हजार योजन ऊँचा उठा हुआ है। यह महान् पर्वत [भूतलसे] चौंतीस हजार योजन नीचेतक गया है। यह पर्वत द्वीपके आधे भागमें उत्तरकी ओर मानसशृंखलाके ऊपर फैला हुआ है। समुद्रके समीप स्थित यह पर्वत उगे हुए नवीन चन्द्रमाके समान प्रतीत होता है॥ १९-२२॥
योजनानां सहस्त्राणि ऊर्ध्वं पञ्चाशदुच्छ्रितः।<br>तावदेव तु विस्तीर्णः पार्श्वतः परिमण्डलः॥ २३<br><br>स एव द्वीपपश्चार्धे मानसः पृथिवीधरः।<br>एक एव महासानुः सन्निवेशाद् द्विधा कृतः॥ २४यह पचास हजार योजन ऊपरकी ओर उठा हुआ है। इसकी चौड़ाई तथा चारों ओरका घेरा भी उतना ही विस्तृत है। द्वीपके पश्चिमी आधे भागमें यही पर्वत मानस नामसे प्रतिष्ठित है। यह महापर्वत एक होता हुआ भी सन्निवेशके कारण दो भागोंमें विभक्त हो गया है॥ २३-२४॥
तस्मिन् द्वीपे स्मृतौ द्वौ तु पुण्यौ जनपदौ शुभौ।<br>राजतौ मानसस्याथ पर्वतस्यानुमण्डलौ॥ २५<br><br>महावीतं तु यद्वर्षं बाह्यतो मानसस्य तु।<br>तस्यैवाभ्यन्तरो यस्तु धातकीखण्ड उच्यते॥ २६उस द्वीपमें चाँदीके समान प्रभाववाले दो पुण्यमय तथा शुभ जनपद बताये गये हैं, जो इस मानस पर्वतको घेरे हुए हैं। मानसके बाहर जो महावीत नामक वर्ष है, उसके भीतर जो जनपद है, उसे धातकीखण्ड कहा जाता है॥ २५-२६॥
स्वादूदकेनोदधिना पुष्करः परिवारितः।<br>पुष्करद्वीपविस्तारविस्तीर्णोऽसौ समन्ततः॥ २७<br><br>विस्तारान्मण्डलाच्चैव पुष्करस्य समेन तु।<br>एवं द्वीपाः समुद्रैस्तु सप्तसप्तभिरावृताः॥ २८पुष्करद्वीप स्वादिष्ट जलवाले सागरसे घिरा हुआ है। यह [सागर] सभी ओर पुष्करद्वीपके विस्तारके बराबर विस्तीर्ण है। यह विस्तारमें तथा घेरेमें पुष्कर द्वीपके ही समान है। इस प्रकार सातों द्वीप सात समुद्रोंसे घिरे हुए
२२६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
द्वीपस्यानन्तरो यस्तु समुद्रः सप्तमस्तु वै।<br>एवं द्वीपसमुद्राणां वृद्धिर्ज्ञेया परस्परम्॥ २९हैं। द्वीपके अनन्तर जो समुद्र है, वह सातवाँ समुद्र है। इस प्रकार द्वीपों तथा समुद्रोंकी परस्पर वृद्धिको जानना चाहिये॥ २७-२९॥
परेण पुष्करस्याथ अनुवृत्य स्थितो महान्।<br>स्वादूदकसमुद्रस्तु समन्तात्परिवेष्ट्य च॥ ३०<br>परेण तस्य महती दृश्यते लोकसंस्थितिः।<br>काञ्चनी द्विगुणा भूमिः सर्वा चैकशिलोपमा॥ ३१<br>तस्याः परेण शैलस्तु मर्यादापारमण्डलः।<br>प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोकः स उच्यते॥ ३२<br>दृश्यादृश्यगिरिर्यावत्तावदेषा धरा द्विजाः।<br>योजनानां सहस्त्राणि दश तस्योच्छ्रयः स्मृतः॥ ३३<br>तावांश्च विस्तरस्तस्य लोकालोकमहागिरेः।<br>अर्वाचीने तु तस्यार्धे चरन्ति रविरश्मयः॥ ३४<br>परार्धे तु तमो नित्यं लोकालोकस्ततः स्मृतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तो भूर्लोकस्य च विस्तरः॥ ३५पुष्करके बाहर उसे चारों ओरसे घेरकर स्वादिष्ट जलसे युक्त महान् समुद्र स्थित है। उसके बाहर महती लोकस्थिति दिखायी देती है, वहाँकी भूमि स्वर्णमयी है और विस्तारमें दुगुनी है। सम्पूर्ण भूमि एक शिलाके तुल्य है। उसके परे मर्यादामण्डलस्वरूप एक पर्वत है। इसका कुछ भाग प्रकाशमय तथा कुछ भाग अन्धकारमय रहता है, इसे लोकालोक [पर्वत] कहा जाता है। हे द्विजो! जितना यह दृश्य-अदृश्य पर्वत है, उतनी ही यह धरा है। उसकी (पर्वतकी) ऊँचाई दस हजार योजन कही गयी है। उस लोकालोक [नामक] महापर्वतका विस्तार भी उतना ही है। उसके आधे भागमें सूर्यकी किरणें पहुँचती हैं और दूसरे आधे भागमें सदा अन्धकार रहता है, इसलिये इसे लोकालोक कहा गया है। [हे द्विजो!] इस प्रकार मैंने संक्षेपमें भूलोकके विस्तारका वर्णन किया॥ ३०-३५॥
आभानोर्वै भुवः स्वस्तु आध्रुवान्मुनिसत्तमाः।<br>आवहाद्या निविष्टास्तु वायोर्वै सप्त नेमयः॥ ३६<br>आवहः प्रवहश्चैव ततश्चानुवहस्तथा।<br>संवहो विवहश्चाथ ततश्चोर्ध्वं परावहः॥ ३७<br>द्विजाः परिवहश्चेति वायोर्वै सप्त नेमयः।<br>बलाहकास्तथा भानुश्चन्द्रो नक्षत्रराशयः॥ ३८<br>ग्रहाणि ऋषयः सप्त ध्रुवो विप्राः क्रमादिह।हे श्रेष्ठ मुनियो! भूर्लोक सूर्यतक है और स्वर्लोक ध्रुवतक है। आवह आदि वायुकी सात नेमियाँ कही गयी हैं। हे द्विजो! आवह, प्रवह, अनुवह, संवह, विवह, परावह और परिवह—ये वायुकी सात नेमियाँ हैं। हे विप्रो! मेघ, सूर्य, चन्द्रमा, तारागण, राशियाँ, ग्रह सप्तर्षि और ध्रुव—ये क्रमसे व्यवस्थित हैं॥ ३६-३८१/२॥
योजनानां महीपृष्ठादूर्ध्वं पञ्चदशाध्रुवात्॥ ३९<br>नियुतान्येकनियुतं भूपृष्ठाद्भानुमण्डलम्।<br>रथः षोडशसाहस्रो भास्करस्य तथोपरि॥ ४०<br>चतुराशीतिसाहस्रो मेरुश्चोपरि भूतलात्।<br>कोटियोजनमाक्रम्य महर्लोको ध्रुवाद् ध्रुवः॥ ४१<br>जनलोको महर्लोकात्तथा कोटिद्वयं द्विजाः।<br>जनलोकात्तपोलोकश्चतस्त्रः कोटयो मतः॥ ४२<br>प्राजापत्याद् ब्रह्मलोकः कोटिषट्कं विसृज्य तु।<br>पुण्यलोकास्तु सप्तैते ह्याण्डेऽस्मिन् कथिता द्विजाः॥ ४३पृथ्वीतलसे ऊपर ध्रुवलोकपर्यन्त पन्द्रह नियुत योजनकी दूरी है। भूपृष्ठसे भानुमण्डल एक नियुत योजन दूर है। उसके ऊपर सूर्यका रथ सोलह हजार योजन है। मेरु पर्वत पृथ्वीतलसे चौरासी हजार योजनपर है। ध्रुवसे एक करोड़ योजनके बाद महर्लोक है। हे द्विजो! महर्लोकसे दो करोड़ योजनकी दूरीपर जनलोक है। जनलोकसे चार करोड़ योजनकी दूरीपर तपोलोक कहा गया है। प्राजापत्यलोक (तपोलोक)-से छः करोड़ योजनकी दूरी छोड़कर ब्रह्मलोक स्थित है। हे ब्राह्मणो! इस प्रकार इस ब्रह्माण्डमें इन सात पुण्यलोकोंको मैंने बता दिया॥ ३९-४३॥
अधः सप्ततलानां तु नरकाणां हि कोटयः।<br>मायान्ताश्चैव घोराद्या अष्टाविंशतिरेव तु॥ ४४<br>पापिनस्तेषु पच्यन्ते स्वस्वकर्मानुरूपतः।<br>अवीच्यन्तानि सर्वाणि रौरवाद्यानि तेषु च॥ ४५सात तलोंके नीचे घोरसे लेकर मायात क अट्ठाईस कोटिके नरक हैं; पापीलोग उनमें अपने-अपने कर्मोंके अनुरूप दुःख भोगते हैं। उनमेंसे प्रत्येकमें रौरवसे लेकर

अध्याय ५३] भुवनकोशवर्णनमें प्लक्ष, शाल्मलि, क्रौंचद्वीपोंके महापर्वतोंका वर्णन २२७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रत्येकं पञ्चकान्याहुर्नैरकाणि विशेषतः।<br>अण्डमादौ मया प्रोक्तमण्डस्यावरणानि च॥ ४६<br><br>हिरण्यगर्भसर्गश्च प्रसङ्गाद्बहुविस्तरात्।<br>अण्डानामीदृशानां तु कोट्यो ज्ञेयाः सहस्रशः॥ ४७अवीचितक सभी विशेष रूपसे पाँच नरक कहे गये हैं। मैंने आदिमें अण्डका वर्णन किया और अण्डके आवरणोंका भी वर्णन किया एवं प्रसंगवश ब्रह्माकी सृष्टिका भी विस्तारसे वर्णन किया। इस प्रकारके हजारों-करोड़ों ब्रह्माण्डोंको जानना चाहिये॥ ४४—४७॥
सर्वगत्वात्प्रधानस्य तिर्यगूर्ध्वमधस्तथा।<br>अण्डेष्वेतेषु सर्वेषु भुवनानि चतुर्दश॥ ४८<br><br>प्रत्यण्डं द्विजशार्दूलास्तेषां हेतुर्महेश्वरः।<br>अण्डेषु चाण्डबाह्येषु तथाण्डावरणेषु च॥ ४९<br><br>तमोऽन्ते च तमःपारे चाष्टमूर्तिर्व्यवस्थितः।<br>अस्यात्मनो महेशस्य महादेवस्य धीमतः॥ ५०<br><br>अदेहिनस्त्वहो देहमखिलं परमात्मनः।<br>अस्याष्टमूर्तेः शर्वस्य शिवस्य गृहमेधिनः॥ ५१<br><br>गृहिणी प्रकृतिर्दिव्या प्रजाश्च महदादयः।<br>पशवः किङ्करास्तस्य सर्वे देहाभिमानिनः॥ ५२प्रधानके सर्वगामी होनेके कारण इन अण्डोंमें तिर्यक्, ऊपर तथा नीचे [सभी ओर] चौदह भुवन हैं। हे श्रेष्ठ द्विजो! उनमें प्रत्येक अण्डके हेतु महेश्वर हैं। अष्टमूर्ति [शिव] अण्डोंमें, अण्डोंके बाहर, अण्डोंके आवरणोंमें, अन्धकारके भीतर तथा अन्धकारके परे भी विद्यमान हैं। सम्पूर्ण जगत् इन महेश्वर, महादेव, धीमान्, देहरहित परमात्माका शरीर है। गृहस्थरूप इन अष्टमूर्ति शर्व शिवकी गृहिणी दिव्य प्रकृति है, महत् आदि इनकी सन्तानें हैं और सभी देहाभिमानी पशु इनके सेवक हैं॥ ४८—५२॥
आद्यन्तहीनो भगवाननन्तः<br>पुमान् प्रधानप्रमुखश्च सप्त।<br>प्रधानमूर्तिस्त्वथ षोडशाङ्गो<br>महेश्वरश्चाष्टतनुः स एव॥ ५३<br><br>आज्ञाबलात्तस्य धरा स्थितेह<br>धराधरा वारिधराः समुद्राः।<br>ज्योतिर्गणः शक्रमुखाः सुराश्च<br>वैमानिकाः स्थावरजङ्गमाश्च॥ ५४वे [शिव] ही आदि-अन्तसे रहित, भगवान् अनन्त, पुरुष, प्रधान आदि (बुद्धि, अहंकार आदि) सात तत्त्व, प्रधान मूर्तिवाले, सोलह अंगोंवाले (पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ, मन), अष्टमूर्ति तथा महेश्वर हैं। उन्हींकी आज्ञाके प्रभावसे पृथ्वी, पर्वत, मेघ, समुद्र, तारागण, इन्द्र आदि देवता, वैमानिक तथा स्थावर-जंगम सभी प्राणी स्थित हैं॥ ५३-५४॥
दृष्ट्वा यक्षं लक्षणैर्हीनमीशं<br>दृष्ट्वा सेन्द्रास्ते किमेतत्विहेति।<br>यक्षं गत्वा निश्चयात्पावकाद्याः<br>शक्तिक्षीणाश्चाभवन्यत्ततोऽपि ॥ ५५लक्षणोंसे रहित यक्षरूपी शिवको देखकर इन्द्रसहित अग्नि आदि वे देवता 'यहाँ यह क्या है?'—ऐसा

२२८ श्रीलिङ्गमहापुराण · [पूर्वभाग


सोचकर अनिश्चयकी दशामें यक्षके समीप जाकर वे शक्तिहीन हो गये॥ ५५॥
दग्धुं तृणं वापि समक्षमस्य<br>यक्षस्य वह्निर्न शशाक विप्राः।<br>वायुस्तृणं चालयितुं तथान्ये<br>स्वान् स्वान् प्रभावान् सकलामरेन्द्राः॥ ५६<br><br>तदा स्वयं वृत्ररिपुः सुरेन्द्रैः<br>सुरेश्वरः सर्वसमृद्धिहेतुः।<br>सुरेश्वरं यक्षमुवाच को वा<br>भवानितीत्थं सकुतूहलात्मा॥ ५७हे विप्रो! अग्निदेव उस यक्षके सामने तिनका भी नहीं जला सके, पवन उस तृणको उड़ानेमें समर्थ नहीं हुए, उसी प्रकार अन्य समस्त श्रेष्ठ देवता भी अपने-अपने प्रभाव प्रदर्शित करनेमें समर्थ नहीं हुए। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके साथ समस्त समृद्धियोंके कारणभूत वृत्रशत्रु उन देवेन्द्रने कुतूहलचित्त होकर यक्षरूप सुरेश्वरसे इस प्रकार कहा—आप कौन हैं?॥ ५६-५७॥
तदा हृद्यदृश्यं गत एव यक्ष-<br>स्तदाम्बिका हैमवती शुभास्या।<br>उमा शुभैराभरणैरनेकौः<br>सुशोभमाना त्वनु चाविरासीत्॥ ५८उसी समय यक्ष अदृश्य हो गये। तब सुन्दर मुखवाली तथा अनेक शुभ आभरणोंसे अत्यन्त शोभित होती हुई हैमवती अम्बिका उमा प्रकट हो गयीं॥ ५८॥
तां शक्रमुख्या बहुशोभमाना-<br>मुमामजां हैमवतीमपृच्छन्।<br>किमेतदीशे बहुशोभमाने<br>को वाम्बिके यक्षवपुश्चकास्ति॥ ५९इन्द्र आदिने सुशोभित होती हुई उन हैमवती अजा उमासे पूछा—हे ईशे! हे परम शोभायमान अम्बिके! यह यक्षदेहधारी कौन है?॥ ५९॥
निशम्य तद्यक्षमुमाम्बिकाह<br>त्वगोचरश्चेति सुराः सशक्राः।<br>प्रणेमुरेनां मृगराजगामिनी-<br>मुमामजां लोहितशुक्लकृष्णाम्॥ ६०यह सुनकर उमा अम्बिकाने कहा—यह अगोचर है; तब इन्द्रसहित सभी देवताओंने उस यक्षको तथा सिंहगामिनी और लोहित-शुक्ल-कृष्णवर्णवाली इन अजा उमाको प्रणाम किया॥ ६०॥
सम्भाविता सा सकलामरेन्द्रैः<br>सर्वप्रवृत्तिस्तु सुरासुराणाम्।<br>अहं पुरासं प्रकृतिश्च पुंसो<br>यक्षस्य चाज्ञावशगेत्यथाह॥ ६१सभी श्रेष्ठ देवताओंसे सत्कृत होकर देवताओं तथा दानवोंकी समस्त प्रवृत्तिरूपा उन देवीने कहा—मैं पूर्वकालमें इस यक्षरूप [परम] पुरुषकी आज्ञाके अधीन रहनेवाली प्रकृति थी*॥ ६१॥
तस्माद् द्विजाः सर्वमजस्य तस्य<br>नियोगतश्चाण्डमभूदजाद्वै ।<br>अजश्च अण्डादखिलं च तस्मात्<br>ज्योतिर्गणैर्लोक मजात्मकं तत्॥ ६२अतः हे द्विजो! उन्हीं अज (शिव)-के नियोगसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए, उन ब्रह्मासे अण्ड उत्पन्न हुआ और अण्डसे ज्योतिर्गणोंसहित समग्र विश्व उत्पन्न हुआ; इस प्रकार सब कुछ शिवात्मक है॥ ६२॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशविन्यासनिर्णयो नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशविन्यासनिर्णय' नामक तिरपनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५३॥


* परम पुरुषकी सर्वोत्कृष्टताको बतानेवाला यह 'हैमवती-आख्यान' मूलरूपसे सामवेदके तलवकारब्राह्मणके अन्तर्गत प्राप्त होनेवाले केनोपनिषद्में उपलब्ध होता है।

५४- ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव

अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २२९


चौवनवाँ अध्याय

ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव

सूत उवाच
सूत उवाच<br>ज्योतिर्गणप्रचारं वै सङ्क्षिप्याण्डे ब्रवीम्यहम्।<br>देवक्षेत्राणि चालोक्य ग्रहचारप्रसिद्धये ॥ १सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवक्षेत्रोंको देखकर मैं ग्रहोंकी गतिके ज्ञानके लिये अण्डमें ज्योतिर्गणों (ग्रहों)-की गतिका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥
मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां मेरोः पुरी स्थिता।<br>दक्षिणे भानुपुत्रस्य वरुणस्य च वारुणी ॥ २<br><br>सौम्ये सोमस्य विपुला तासु दिग्देवताः स्थिताः।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात् ॥ ३मेरुके पूर्वमें मानस पर्वतपर महेन्द्रकी पुरी स्थित है। दक्षिणमें सूर्यपुत्र यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें सोमकी विशाल पुरी है। उनमें दिग्पाल रहते हैं। वे पुरियाँ क्रमसे अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा [नामवाली] हैं ॥ २-३ ॥
लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतो दक्षिणायने।<br>काष्ठां गतस्य सूर्यस्य गतिर्या तां निबोधत ॥ ४<br><br>दक्षिणप्रक्रमे भानुः क्षिप्तेषुरिव धावति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति ॥ ५लोकपालोंकी पुरियोंके ऊपर सभी ओर दक्षिणायनमें बाणके समान गतिवाले सूर्यकी जो गति है, उसे [आपलोग] जानिये। दक्षिणायनमें सूर्य बाणकी तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्रचक्रको साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥
पुरान्तगो यदा भानुः शक्रस्य भवति प्रभुः।<br>सर्वैः सायमनेः सौरो ह्युदयो दृश्यते द्विजाः ॥ ६<br><br>स एव सुखवत्यां तु निशान्तस्थः प्रदृश्यते।<br>अस्तमेति पुनः सूर्यो विभायां विश्वदृग्विभुः ॥ ७हे द्विजो! जब प्रभु सूर्य इन्द्रकी पुरीमें प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरीके सभी लोग सूर्यका उदय देखते हैं; जब वे सूर्य संयमनीपुरीमें होते हैं, तब [पश्चिममें] सुखावतीपुरीमें प्रातःकाल होता है। उस समय विश्वके नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरीमें अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥
मया प्रोक्तोऽमरावत्यां यथासौ वारितस्करः।<br>तथा संयमनीं प्राप्य सुखां चैव विभां खगः ॥ ८जिस प्रकार मैंने अमरावतीमें सूर्यकी गतिको कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनीको पाकर 'सुखा' तथा 'विभा'को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥
यदापराह्लस्त्वाग्नेय्यां पूर्वाह्नो नैर्ऋते द्विजाः।<br>तदा त्वपररात्रश्च वायुभागे सुदारुणः ॥ ९<br><br>ईशान्यां पूर्वरात्रस्तु गतिरेषा च सर्वतः।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा सर्पति वारिपः ॥ १०<br><br>त्रिंशांशकं तु मेदिन्यां मुहूर्तेनैव गच्छति।<br>योजनानां मुहूर्तस्य इमां सङ्ख्यां निबोधत ॥ ११हे द्विजो! जब आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम) भागमें पूर्वाह्न, उस समय वायव्य (उत्तर-पश्चिम) भागमें भयानक रात्रिका उत्तरार्ध और उत्तर-पूर्व भागमें रात्रिका प्रथम काल होता है। सब प्रकारसे यही गति होती है। इसी प्रकार जब जलको सोखनेवाले सूर्य आकाशके मध्यमें संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्तमें पृथ्वीपर तीस अंश चलते हैं। एक मुहूर्तमें सूर्यके द्वारा पार की गयी दूरीको योजनपरिमाणमें सुनिये ॥ ९-११ ॥

२३० | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग


| पूर्णा शतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु॥ १२<br>मौहूर्तकी गतिर्ह्येषा भास्करस्य महात्मनः।<br>एतेन गतियोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ १३<br>पर्यपृच्छेत्पतङ्गोऽपि सौम्याशां चोत्तरेऽहनि।<br>मध्ये तु पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ १४<br>मानसोत्तरशैले तु महातेजा विभावसुः।<br>मण्डलानां शतं पूर्णं तदशीत्यधिकं विभुः॥ १५<br>बाह्यं चाभ्यन्तरं प्रोक्तमुत्तरायणदक्षिणे।<br>प्रत्यहं चरते तानि सूर्यो वै मण्डलानि तु॥ १६<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्तते।<br>दक्षिणप्रक्रमे देवस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते॥ १७<br>तस्मात्प्रकृष्टं भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति।<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने॥ १८<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणामह्ना तु चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥ १९ | वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन कही गयी है। यह महात्मा भास्करकी एक मुहूर्तकी गति है। जब सूर्य इस गतिसे दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं, तब [वहाँ छः माह भ्रमण करनेके बाद] पुनः उत्तरायणकालमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वतपर पुष्करके मध्य भ्रमण करते हैं। वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलसे गुजरते हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायनको बाह्य एवं आभ्यन्तर कहा गया है। सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलोंपर भ्रमण करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकका बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायनमें तेजीसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे थोड़े समयमें ही [अपेक्षाकृत] अधिक भूमिपर पहुँचते हैं। दक्षिणायनमें सूर्य मात्र बारह मुहूर्तोंमें शीघ्रतापूर्वक दिनमें साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि रात्रिमें अठारह मुहूर्तोंमें उतनी ही नक्षत्रकी दूरीको तय करते हैं॥ १२–१९॥ | | कुलालचक्रमध्यं तु यथा मन्दं प्रसर्पति।<br>तथोदगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः॥ २०<br>तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति।<br>स रथोऽधिष्ठितो भानोरादित्यैर्मुनिभिस्तथा॥ २१<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>प्रदीपयन् सहस्रांशुरग्रतः पृष्ठतोऽप्यधः॥ २२<br>ऊर्ध्वतश्च करं त्यक्त्वा सभां ब्राह्मीमनुत्तमाम्।<br>अम्भोभिर्मुनिभिस्त्यक्तैः सन्ध्यायां तु निशाचरान्॥ २३<br>हत्वा हत्वा तु सम्प्राप्तान् ब्राह्मणैश्चरते रविः।<br>अष्टादश मुहूर्तं तु उत्तरायणपश्चिमम्॥ २४ | जैसे कुम्हारके चाकका मध्यभाग मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायणमें मन्दगतिसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे अधिक समयमें थोड़ी भूमिपर पहुँचते हैं। सूर्यका वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित रहता है। हजार किरणोंवाले वे सूर्य आगेसे, पीछेसे, नीचेसे तथा ऊपरसे किरण छोड़कर ब्रह्माकी अत्युत्तम सभाको प्रकाशित करते हुए सन्ध्या-वन्दनके समय मुनियों तथा ब्राह्मणोंके द्वारा [अर्घ्यहेतु] छोड़े गये जलसे पास आनेवाले राक्षसोंको मार-मारकर आगे बढ़ते रहते हैं॥ २०–२३ १/२॥ | | अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणि नक्तं द्वादशभी रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि दिवाष्टादशभिश्चरन्॥ २५ | उत्तरायणके पश्चिम भागमें दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस समय सूर्य मन्दगतिवाले होकर चलते हैं। सूर्य रातमें बारह मुहूर्तमें साढ़े तेरह नक्षत्रदूरीको तय करते हैं और दिनमें चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्रकी दूरी अठारह मुहूर्तोंमें तय करते हैं॥ २४-२५॥ | | ततो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा॥ २६ | जिस प्रकार नाभिमें चक्र अधिक मन्द गतिसे घूमता है, उसी प्रकार [चक्रके मध्यस्थित] मिट्टीके |

अध्याय ५४ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन२३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रिंशन्मुहूर्तैरेवाहुरहोरात्रं पुराविदः।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु॥ २७<br><br>कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>औत्तानपादो भ्रमति ग्रहैः सार्धं ग्रहाग्रणीः॥ २८<br><br>गणो मुनिज्योतिषां तु मनसा तस्य सर्पति।<br>अधिष्ठितः पुनस्तेन भानुस्तवादाय तिष्ठति॥ २९<br><br>किरणैः सर्वतस्तोयं देवो वै ससमीरणः।<br>औत्तानपादस्य सदा ध्रुवत्वं वै प्रसादतः॥ ३०<br><br>विष्णोरौत्तानपादेन चाप्तं तातस्य हेतुना।<br>आपः पीतास्तु सूर्येण क्रमन्ते शशिनः क्रमात्॥ ३१पिण्डकी भाँति मध्यमें स्थित ध्रुव घूमता है। प्राचीन विद्याके वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [मिलकर] तीस मुहूर्तके बराबर होते हैं। दोनों दिशाओंके बीचमें मण्डलोंमें सूर्य घूमता है। जैसे कुलालचक्रकी नाभि उसी स्थानपर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहोंके साथ घूमते हैं। मुनियों तथा नक्षत्रोंका समूह उसीके मनके अनुसार चलता है। उसी [ध्रुव]-के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायुके साथ सभी ओरसे अपनी किरणोंके द्वारा जल ग्रहण करते हैं। उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपद भगवान् विष्णुकी कृपासे सुलभ हुआ और ध्रुवने इसे अपने पिताके कारण प्राप्त किया था॥ २६—३० १/२॥
निशाकरान्निस्स्रवन्ते जीमूतान् प्रत्यपः क्रमात्।<br>वृन्दं जलमुचां चैव श्वसनेनाभिताडितम्॥ ३२<br><br>क्ष्मायां वृष्टिं विसृजतेऽभासयत्तेन भास्करः।<br>तोयस्य नास्ति वै नाशः तदैव परिवर्तते॥ ३३<br><br>हिताय सर्वजन्तूनां गतिः शर्वेण निर्मिता।<br>भूर्भुवः स्वस्तथा ह्यापो ह्यन्नं चामृतमेव च॥ ३४<br><br>प्राणा वै जगतामापो भूतानि भुवनानि च।<br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्॥ ३५<br><br>अपां शिवस्य भगवानाधिपत्ये व्यवस्थितः।<br>अपां त्वधिपतिर्देवो भव इत्येव कीर्तितः॥ ३६<br><br>भवात्मकं जगत्सर्वमिति किं चेह चाद्भुतम्।<br>नारायणत्वं देवस्य हरेश्चाद्भिः कृतं विभोः।<br>जगतामालयो विष्णुस्त्वापस्तस्यालयानि तु॥ ३७सूर्यके द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रमसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमासे मेघोंको प्राप्त होता है। इसके बाद वायुद्वारा आघात करनेपर मेघोंका समूह पृथ्वीपर वृष्टि करता है। सूर्य सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [नामवाले] हैं। जलका कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है। भगवान् शिवने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये जलकी इस गतिका निर्माण किया है। जल ही भूः, भुवः, स्वः, अन्न तथा अमृत है। जल सभी लोकोंका प्राण है। अधिक कहनेसे क्या लाभ—सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जलसे बना हुआ है। भगवान् भी शिवरूपी जलके आधिपत्यमें व्यवस्थित हैं। भगवान् शिव जलके अधिपति कहे गये हैं। यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है—इसमें आश्चर्य क्या है? सर्वव्यापी विष्णुदेवको नारायणपद जलसे ही प्राप्त हुआ है। विष्णु सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं और जल उनका निवासस्थान है॥ ३१—३७॥
दन्दह्यमानेषु चराचरेषु<br>गोधूमभूतास्त्वथ निष्क्रमन्ति।<br>या या ऊर्ध्वं मारुतेनेरिता वै<br>तास्तास्त्वभ्राण्यग्निना वायुना च॥ ३८<br><br>अतो धूमाग्निवातानां संयोगस्त्वभ्रमुच्यते।<br>वारीणि वर्षतीत्यभ्रमभ्रस्येशः सहस्रदृक्॥ ३९चराचर समस्त प्राणियोंके वायुद्वारा उत्तेजित अग्निसे जल जानेपर धुएँके रूपमें जो-जो निकलता है और वायुद्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हींको अभ्र कहा गया है। अतः धूम, अग्नि तथा वायुके संयोगको अभ्र कहा जाता है। जो जलकी वर्षा करता है, वह अभ्र है। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अभ्रके स्वामी हैं॥ ३८-३९॥

२३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
यज्ञधूमोद्भवं चापि द्विजानां हितकृत्सदा।<br>दावाग्निधूमसम्भूतमभ्रं वनहितं स्मृतम्॥ ४०<br><br>मृतधूमोद्भवं त्वभ्रमशुभाय भविष्यति।<br>अभिचाराग्निधूमोत्थं भूतनाशाय वै द्विजाः॥ ४१<br><br>एवं धूमविशेषेण जगतां वै हिताहितम्।<br>तस्मादाच्छादयेद्धूममभिचारकृतं नरः॥ ४२<br><br>अनाच्छाद्य द्विजः कुर्याद्धूमं यश्चाभिचारिकम्।<br>एवमुद्दिश्य लोकस्य क्षयकृच्च भविष्यति॥ ४३यज्ञके धुएँसे उत्पन्न अभ्र (मेघ) सदा द्विजोंका हित करनेवाला होता है और दावानलके धूमसे उत्पन्न अभ्र वनके लिये हितकर कहा गया है। मृत प्राणियोंके जलानेपर उठे हुए धूमसे उत्पन्न अभ्र अशुभके लिये होता है और हे द्विजो! अभिचाराग्निके धूमसे उत्पन्न अभ्र प्राणियोंके नाशके लिये होता है। इस प्रकार अलग-अलग धूमोंसे संसारका हित तथा अहित होता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि अभिचारकर्मसे उत्पन्न धूमको ढँक दे। यदि कोई द्विज धूमको ढँके बिना अभिचारकर्म करता है, तो यह संसारके विनाशका कारण हो जाता है॥ ४०—४३॥
अपां निधानं जीमूताः षण्मासानिह सुव्रताः।<br>वर्षन्त्येव जगतां हिताय पवनाज्ञया॥ ४४हे सुव्रतो! जलके भण्डारस्वरूप मेघ वायुकी आज्ञासे जगत्‌के हितके लिये इस लोकमें छः महीने वृष्टि करते हैं।
स्तनितं चेह वायव्यं वैद्युतं पावकोद्भवम्।<br>त्रिधा तेषामिहोत्पत्तिरभ्राणां मुनिपुङ्गवाः॥ ४५मेघका गर्जन वायुके द्वारा, विद्युत्‌के द्वारा तथा अग्निके द्वारा होता है। हे मुनिश्रेष्ठो! उन मेघोंकी उत्पत्ति तीन प्रकारसे होती है।
न भ्रश्यन्ति यतोऽभ्राणि मेहनान्मेघ उच्यते।<br>काष्ठा वाह्याश्च वैरिञ्च्याः पक्षाश्चैव पृथग्विधाः॥ ४६'अभ्र' शब्दका अर्थ है 'जो नष्ट नहीं होता है।' 'मेहन' शब्दसे 'मेघ' व्युत्पन्न कहा गया है। काष्ठ, वाहन, वैरिञ्च्य तथा पक्ष—ये विभिन्न प्रकारके मेघ होते हैं।
आज्यानां काष्ठसंयोगादग्नेर्धूमः प्रवर्तितः।<br>द्वितीयानां च सम्भूतिर्विरिञ्चोच्छ्वास वायुना॥ ४७घृतका काष्ठसे संयोग होनेपर अग्निसे जो धूम निकलता है, उससे प्रथम प्रकारका मेघ बनता है। दूसरे प्रकारके मेघकी उत्पत्ति ब्रह्माकी श्वासवायुसे होती है।
भूभृतां त्वथ पक्षैस्तु मघवच्छेदितैस्ततः।<br>वाह्येयास्त्वथ जीमूतास्ताववहस्थानगाः शुभाः॥ ४८इन्द्रके द्वारा पर्वतोंके काटे गये पक्षोंसे तीसरे प्रकारके मेघ उत्पन्न होते हैं। अग्निसे उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक वायुके स्थानमें जाते हैं।
विरिञ्चोच्छ्वासजाः सर्वे प्रवहस्कन्धजास्ततः।<br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्॥ ४९ब्रह्माके श्वाससे उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायुके स्कन्धपर रहते हैं। पुष्कर आदि मेघ पक्षसे उत्पन्न होते हैं। ये जब बरसते हैं,
मूकाः सशब्ददुष्टाशास्त्वेतैः कृत्यं यथाक्रमम्॥<br>क्षामवृष्टिप्रदा दीर्घकालं शीतसमीरिणः॥ ५०तब क्रमसे शान्त, ध्वनि करनेवाले तथा विनाशकारी होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है। कुछ मेघ अल्प वृष्टि करनेवाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ कालतक शीतल वायुवाले होते हैं।
जीवकाश्च तथा क्षीणा विद्युद्ध्वनिविवर्जिताः।<br>तिष्ठन्त्याक्रोशमात्रं तु धरापृष्ठादितस्ततः॥ ५१कुछ मेघ जीवक होते हैं। कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनिसे रहित होते हैं। कुछ मेघ पृथ्वीतलसे एक कोसके भीतर आकाशमें इधर-उधर रहते हैं।
अर्धक्रोशे तु सर्वे वै जीमूता गिरिवासिनः।<br>मेघा योजनमात्रं तु साध्यत्वाद्वहुतोयदाः॥ ५२पर्वतपर रहनेवाले सभी मेघ आधे कोसकी दूरीमें होते हैं।

अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३३


श्लोकअर्थ
धरापृष्ठाद् द्विजाः क्ष्मायां विद्युद्गुणसमन्विताः।<br>तेषां तेषां वृष्टिसर्गं त्रेधा कथितमत्र तु॥ ५३हे द्विजो! पृथ्वीतलसे योजन-मात्रकी दूरीवाले विद्युत्-युक्त मेघ साध्य होनेके कारण पृथ्वीपर अधिक जल-वृष्टि करनेवाले होते हैं। उन मेघोंका तीन प्रकारका वृष्टिसर्ग बता दिया गया॥ ४४-५३॥
पक्षजाः कल्पजाः सर्वे पर्वतानां महत्त्माः।<br>कल्पान्ते ते च वर्षन्ति रात्रौ नाशाय शारदाः॥ ५४<br><br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्।<br>तदार्णवमभूत्सर्वं तत्र शेते निशीश्वरः॥ ५५<br><br>आग्नेयानां श्वासजानां पक्षजानां द्विजर्षभाः।<br>जलदानां सदा धूमो ह्याप्यायन इति स्मृतः॥ ५६पर्वतोंके [कटे हुए] पक्षोंसे उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं। वे कल्पके अन्तमें विनाशके लिये रात्रिमें बरसते हैं। पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रातमें शयन करते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अग्निसे उत्पन्न, [ब्रह्माके] श्वाससे उत्पन्न तथा [कटे हुए पर्वतोंके] पक्षसे उत्पन्न मेघोंका धूम सदा आप्यायन कहा गया है॥ ५४-५६॥
पौण्ड्रास्तु वृष्टयः सर्वा विद्युताः शीतसस्यदाः।<br>पुण्ड्रदेशेषु पतिता नागानां शीकरा हिमाः॥ ५७<br><br>गाङ्गा गङ्गाम्बुसम्भूता पर्जन्येन परावहैः।<br>नगानां च नदीनां च दिग्गजानां समाकुलम्॥ ५८<br><br>मेघानां च पृथग्भूतं जलं प्रायादगादगम्।<br>परावहो यः श्वसनश्चानयत्यम्बिकागुरुम्॥ ५९<br><br>मेनापतिमतिक्रम्य वृष्टिशेषं द्विजाः परम्।<br>अभ्येति भारते वर्षे त्वपरान्तविवृद्धये॥ ६०समस्त पौण्ड्र (पुण्ड्र देशमें होनेवाली) वृष्टि विद्युतन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करनेवाली होती है। पुण्ड्र देशके मेघ बर्फके समान शीतल होते हैं और वे हाथीके सूँड़से गिरते हुए जलके छिड़कावकी भाँति प्रतीत होते हैं। गांग नामक मेघ गंगाके जलसे उत्पन्न होते हैं। ये परावहसंज्ञक वायुद्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजोंको व्याकुल कर देते हैं। मेघोंसे अलग हुआ जल एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर पहुँचता है। परावह नामक जो वायु है, वह मेघोंको हिमालय (अम्बिकागुरु) पर्वतकी ओर ले जाती है। हे द्विजो! पुनः मेनापति हिमालयसे आगे बढ़कर ये मेघ समुद्रके मध्य देशोंकी वृद्धिके लिये भारतवर्षमें भारी वर्षा करते हैं॥ ५७-६०॥
वृष्टयः कथिता ह्यद्य द्विधा वस्तुविवृद्धये।<br>सस्यद्वयस्य सङ्क्षेपात्प्रब्रवीमि यथामति॥ ६१<br><br>स्रष्टा भानुर्महातेजा वृष्टीनां विश्वदृग्विभुः।<br>सोऽपि साक्षाद् द्विजश्रेष्ठाश्चेशानः परमः शिवः॥ ६२<br><br>स एव तेजस्त्वोजस्तु बलं विप्रा यशः स्वयम्।<br>चक्षुः श्रोत्रं मनो मृत्युरात्मा मन्युर्विदिशोद्दिशः॥ ६३<br><br>सत्यं ऋतं तथा वायुरम्बरं खचरश्च सः।<br>लोकपालो हरिर्ब्रह्मा रुद्रः साक्षान्महेश्वरः॥ ६४<br><br>सहस्रकिरणः श्रीमानष्टहस्तः सुमङ्गलः।<br>अर्धनारीवपुः साक्षात्त्रिनेत्रस्त्रिदशाधिपः॥ ६५वस्तुओंकी वृद्धिके लिये होनेवाली वृष्टियाँ दो प्रकारकी कही गयी हैं। मैं बुद्धिके अनुसार उन दोनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। संसारके नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियोंका सृजन करनेवाले हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं। हे विप्रो! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु (क्रोध), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं। वे हजार किरणोंवाले, श्रीमान्, आठ भुजाओंवाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, तीन नेत्रोंवाले तथा देवताओंके अधिपति हैं॥ ६१-६५॥

५५- शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन

२३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
अस्यैवेह प्रसादात्तु वृष्टिर्नानाभवद् द्विजाः।<br>सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते किरणैर्जलम् ॥ ६६<br><br>जलस्य नाशो वृद्धिर्वा नास्त्येवास्य विचारतः।<br>ध्रुवेणाधिष्ठितो वायुर्वृष्टिं संहरते पुनः ॥ ६७<br><br>ग्रहान्निःसृत्य सूर्यात्तु कृत्स्ने नक्षत्रमण्डले।<br>चारस्यान्ते विशत्यर्कं ध्रुवेण समधिष्ठिता ॥ ६८हे द्विजो! इन्हींकी कृपासे नाना प्रकारकी वृष्टि होती है। ये हजार गुना जल देनेके लिये अपनी किरणोंसे जल ग्रहण करते हैं। विचारपूर्वक देखा जाय तो इस जलका नाश अथवा वृद्धि होती ही नहीं। ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित वायु वृष्टिका पुनः हरण कर लेती है। तदनन्तर यह सूर्यग्रहसे निकलकर सम्पूर्ण नक्षत्रमण्डलमें फैलती है। उसके बाद ध्रुवके द्वारा अधिष्ठित यह वृष्टि पुनः सूर्यमें प्रवेश करती है॥ ६६–६८॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ज्योतिषचक्रे सूर्यगत्यादिकथनं नाम चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ज्योतिषचक्रमें सूर्यगत्यादिकथन' नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥


पचपनवाँ अध्याय

शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ तथा चैत्रादि बारह मासोंमें रथके साथ भ्रमण करनेवाले देवता, मुनि, नाग, गन्धर्व आदिका वर्णन

सूत उवाच<br>सौरं सङ्क्षेपतो वक्ष्ये रथं शशिन एव च।<br>ग्रहाणामितरेषां च यथा गच्छति चाम्बुपः ॥ १सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] मैं संक्षेपमें सूर्यके रथ और चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहोंके विषयमें बताऊँगा और जिस प्रकार जलका शोषण करनेवाले सूर्य गति करते हैं, उसका भी वर्णन करूँगा॥ १॥
सौरस्तु ब्रह्मणा सृष्टो रथस्त्वर्थवशेन सः।<br>संवत्सरस्यावयवैः कल्पितश्च द्विजर्षभाः ॥ २<br><br>त्रिनाभिना तु चक्रेण पञ्चारेण समन्वितः।<br>सौवर्णः सर्वदेवानामावासो भास्करस्य तु ॥ ३<br><br>नवयोजनसाहस्रो विस्तारायामतः स्मृतः।<br>द्विगुणोऽपि रथोपस्थादीषादण्डः प्रमाणतः ॥ ४<br><br>असङ्गैस्तु हयैर्युक्तो यतश्चक्रं ततः स्थितैः।<br>वाजिनस्तस्य वै सप्त छन्दोभिर्निर्मितास्तु ते ॥ ५<br><br>चक्रपक्षे निबद्धास्तु ध्रुवे चाक्षः समर्पितः।<br>सहाश्वचक्रो भ्रमते सहाक्षो भ्रमते ध्रुवः ॥ ६हे श्रेष्ठ द्विजो! ब्रह्माके द्वारा विशेष प्रयोजनके लिये निर्मित वह सूर्यरथ संवत्सरके अवयवोंसे कल्पित किया गया है। तीन नाभि तथा पाँच अरोंवाले चक्रसे युक्त यह सूर्यरथ सुवर्णमय है और सभी देवताओंका निवासस्थान है। यह लम्बाई तथा चौड़ाईमें नौ हजार योजनवाला कहा गया है। इसका ईषादण्ड प्रमाण (माप)-में रथोपस्थसे दुगुना है। जहाँ चक्र है, वहाँ स्थित अन्तरिक्षगामी घोड़ोंसे वह युक्त (जुता हुआ) है। उसके सातों घोड़े वेदके सात छन्दों [गायत्री, बृहती, उष्णिक्, जगती, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् और पंक्ति]-से निर्मित हैं। वे चक्रके बगलमें बँधे हुए हैं। ध्रुवमें [रथका] अक्ष लगा हुआ है। वह रथ घोड़ों तथा चक्रसहित घूमता है और ध्रुव अक्षके साथ घूमता है॥ २–६॥
अध्याय ५५ ]शिवस्वरूप भगवान् सूर्यके रथ आदिका वर्णन२३५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अक्षः सहैकचक्रेण भ्रमतेऽसौ ध्रुवेरितः।<br>प्रेरको ज्योतिषां धीमान् ध्रुवो वै वातरश्मिभिः॥ ७<br><br>युगाक्षकोटिसम्बद्धौ द्वौ रश्मी स्यन्दनस्य तु।<br>ध्रुवेण भ्रमते रश्मिनिबद्धः स युगाक्षयोः॥ ८वह अक्ष ध्रुवसे प्रेरित होकर एक ही चक्रके साथ घूमता है। बुद्धिमान् ध्रुव वायुकिरणोंके द्वारा ज्योतिर्गणों (ग्रह, नक्षत्र आदि)-को प्रेरित करता है। दो रश्मियाँ (किरणें) रथके जुए तथा अक्षके अग्रभागमें बँधी हुई हैं और [उन] जुए तथा अक्षमें रश्मियोंसे निबद्ध वह सूर्यरथ ध्रुवके द्वारा भ्रमण करता है॥ ७-८॥
भ्रमतो मण्डलानि स्युः खेचरस्य रथस्य तु।<br>युगाक्षकोटी ते तस्य दक्षिणे स्यन्दनस्य हि॥ ९<br><br>ध्रुवेण प्रगृहीते वै विचक्राश्वे च रज्जुभिः।<br>भ्रमन्तमनुगच्छन्ति ध्रुवं रश्मी च तावुभौ॥ १०इस प्रकार भ्रमण करते हुए आकाशमें विचरण करनेवाले रथके अनेक मण्डल होते हैं। वे [रश्मिनिबद्ध] जुए तथा अक्षकी कोटियाँ उस रथके दाहिनी ओर होती हैं। रज्जुओके द्वारा ध्रुवसे प्रगृहीत अरुण, चक्र तथा घोड़े और वे दोनों रश्मियाँ घूमते हुए ध्रुवका अनुगमन करते हैं॥ ९-१०॥
युगाक्षकोटिस्त्वेतस्य वातोर्मिस्यन्दनस्य तु।<br>कीले सक्ता यथा रज्जुर्भ्रमते सर्वतोदिशम्॥ ११<br><br>भ्राम्यतस्तस्य रश्मी तु मण्डलेषूत्तरायणे।<br>वर्धेते दक्षिणे चैव भ्रमतो मण्डलानि तु॥ १२<br><br>आकृष्येते यदा ते वै ध्रुवेणाधिष्ठिते तदा।<br>आभ्यन्तरस्थः सूर्योऽथ भ्रमते मण्डलानि तु॥ १३इस रथकी वायुलहरीरूपा युगाक्षकोटि (जुए तथा अक्षकी कोटि) कीलमें बँधी हुई रस्सीकी भाँति सभी दिशाओंमें घूमती है। उत्तरायणमें मण्डलोंमें घूमते हुए उस सूर्यकी दोनों रश्मियाँ बढ़ जाती हैं और दक्षिणायनमें मण्डलोंमें घूमते हुए सूर्यके द्वारा वे रश्मियाँ खिंच जाती हैं। जब वे [रश्मियाँ] ध्रुवके द्वारा प्रेरित की जाती हैं, तब [रथके] भीतर स्थित सूर्य मण्डलोंमें घूमता है। उस समय सूर्य दोनों दिशाओंके एक सौ अस्सी मण्डलोंका चक्कर लगाता है॥ ११-१३ १/२॥
अशीतिमण्डलशतं काष्ठयोरन्तरं द्वयोः।<br>ध्रुवेण मुच्यमानाभ्यां रश्मिभ्यां पुनरेव तु॥ १४<br><br>तथैव बाह्यतः सूर्यो भ्रमते मण्डलानि तु।<br>उद्वेष्टयन् स वेगेन मण्डलानि तु गच्छति॥ १५पुनः ध्रुवके द्वारा किरणोंके छोड़े जानेपर उसी भाँति सूर्य मण्डलोंके बाहर भ्रमण करता है; वह मण्डलोंको घेरते हुए वेगपूर्वक चलता है॥ १४-१५॥
देवाश्चैव तथा नित्यं मुनयश्च दिवानिशम्।<br>यजन्ति सततं देवं भास्करं भवमीश्वरम्॥ १६<br><br>स रथोऽधिष्ठितो देवैरादित्यैर्मुनिभिस्तथा।<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः॥ १७<br><br>एते वसन्ति वै सूर्ये द्वौ द्वौ मासौ क्रमेण तु।<br>आप्याययन्ति चादित्यं तेजोभिर्भास्करं शिवम्॥ १८देवता तथा मुनिगण नित्य दिन-रात भवस्वरूप ईश्वर सूर्यदेवका निरन्तर पूजन करते हैं। वह रथ देवताओं, आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंके द्वारा अधिष्ठित है। ये लोग सूर्यमें दो-दो महीने क्रमसे निवास करते हैं और कल्याणकारी आदित्य भास्करको अपने तेजोंसे तृप्त करते हैं॥ १६-१८॥
ग्रथितैः स्वैर्वचोभिस्तु स्तुवन्ति मुनयो रविम्।<br>गन्धर्वाप्सरसश्चैव नृत्यगेयैरुपासते॥ १९<br><br>ग्रामणीयक्षभूतानि कुर्वतेऽभीषसङ्ग्रहम्।<br>सर्पा वहन्ति वै सूर्यं यातुधानानुयान्ति च॥ २०मुनिगण अपने वचनोंसे ग्रथित स्तुतियोंके द्वारा सूर्यका स्तवन करते हैं; गन्धर्व तथा अप्सराएँ गान एवं नृत्यके द्वारा उनकी उपासना करते हैं; ग्रामणी, यक्ष तथा भूतगण किरणोंका संग्रह करते हैं; सर्पगण सूर्यका वहन