श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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इक्यावनवाँ अध्याय
दिव्य भूतवनमें महादेवके निवासस्थानका वर्णन, कैलास तथा वहाँकी पवित्र नदियोंका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| देवकूटे गिरौ मध्ये महाकूटे सुशोभने।<br>हेमवैदूर्यमाणिक्यनीलगोमेदकान्तिभिः ॥ १<br>तथान्यैर्मणिमुख्यैश्च निर्मिते निर्मले शुभे।<br>शाखाशतसहस्राढ्ये सर्वद्रुमविभूषिते ॥ २<br>चम्पकाशोकपुन्नागबकुलासनमण्डिते ।<br>पारिजातकसम्पूर्णे नानापक्षिगणान्विते ॥ ३<br>नैकधा तु शतैश्चित्रे विचित्रकुसुमाकुले।<br>नितम्बपुष्पसालम्बे नैकसत्त्वगणान्विते ॥ ४<br>विमलस्वादुपानीये नैकप्रस्रवणैर्युते।<br>निर्झरैः कुसुमाकीर्णैरनेकैश्र्च विभूषिते ॥ ५<br>पुष्पोडुपवहाभिश्च स्रवन्तीभिरलङ्कृते।<br>स्निग्धवर्णं महामूलमनेकस्कन्धपादपम्॥ ६<br>रम्यं ह्यविरलच्छायं दशयोजनमण्डलम्।<br>तत्र भूतवनं नाम नानाभूतगणालयम्॥ ७ | बड़ी-बड़ी चोटियोंवाले, अत्यन्त सुन्दर, स्वर्ण-वैदूर्य, माणिक्य-नीलम-गोमेद तथा अन्य बहुमूल्य मणियोंसे निर्मित, स्वच्छ, पवित्र, सौ हजार शाखाओंसे युक्त, सभी प्रकारके वृक्षोंसे मण्डित, चम्पक-अशोक-पुन्नाग-बकुल तथा असनसे विभूषित, पारिजातसे परिपूर्ण, अनेक प्रकारके पक्षियोंसे भरे हुए, सैकड़ों प्रकारके धातुओंसे चित्रित, अद्भुत पुष्पोंसे युक्त, नीचेतक लटकती हुई पुष्प-शाखाओंसे युक्त नितम्बवाले, नानाविध पशु-समूहोंसे भरे हुए, अनेक धाराओंसे युक्त, स्वच्छ तथा स्वादिष्ट जलवाले, अनेकविध पुष्पोंसे भरे हुए निर्झरोंसे विभूषित और बहती हुई धाराओं तथा उनमें तैरते हुए पुष्पगुच्छोंसे सुशोभित देवकूट पर्वतपर उसके मध्यमें मनोहर वर्णवाला, गहरी जड़ों तथा अनेक स्कन्धोंसे युक्त वृक्षोंवाला, मनोहर, घनी छायावाला, दस योजन मण्डल (परिधि)-वाला तथा अनेक भूतगणोंके निवासस्थानोंसे समन्वित भूतवन नामक वन है॥ १—७॥ |
| महादेवस्य देवस्य शङ्करस्य महात्मनः।<br>दीप्तमायतनं तत्र महामणिविभूषितम् ॥ ८<br>हेमप्राकारसंयुक्तं मणितोरणमण्डितम्।<br>स्फाटिकैश्च विचित्रैश्च गोपुरैश्च समन्वितम् ॥ ९<br>सिंहासनैर्मणिमयैः शुभास्तरणसंयुतैः।<br>क्षितावितस्ततः सम्यक् शर्वेणाधिष्ठितैः शुभैः ॥ १०<br>अम्लानमालानिचितैर्नानावर्णैर्गृहोत्तमैः ।<br>मण्डपैः सुविचित्रैस्तु स्फाटिकस्तम्भसंयुतैः ॥ ११<br>संयुतं सर्वभूतैन्द्रैर्ब्रह्मेन्द्रोपेन्द्रपूजितैः।<br>वराहगजसिंहर्क्षशार्दूलकरभाननैः ॥ १२<br>गृध्रोलूकमुलैश्चान्यैर्मृगोष्ट्राजमुखैरपि ।<br>प्रमथैर्विविधैः स्थूलैर्गिरिकूटोपमैः शुभैः ॥ १३<br>करालैर्हरिकेशैश्च रोमशैश्च महाभुजैः।<br>नानावर्णाकृतिधरैर्नानासंस्थानसंस्थितैः ॥ १४ | वहाँ महादेव महात्मा भगवान् शंकरका कान्तिमान् निवासस्थान है। वह महामणियोंसे विभूषित; स्वर्णकी चहारदीवारीसे युक्त; मणिमय तोरणोंसे मण्डित; स्फटिकके बने हुए विचित्र गोपुरोंसे युक्त; भूमिपर इधर-उधर शुभ आस्तरणोंसे ढके हुए, शिवजीके द्वारा अधिष्ठित, सुन्दर तथा मणिमय सिंहासनोंसे युक्त; कभी न मुरझानेवाले अनेक रंगके फूलोंसे विभूषित उत्तम भवनोंसे युक्त; स्फटिकके स्तम्भोंवाले अत्यन्त विचित्र मण्डपोंसे समन्वित; ब्रह्मा, इन्द्र तथा उपेन्द्रके द्वारा पूजित सभी भूतगणोंसे संयुक्त; वराह-गज-सिंह-ऋक्ष-शार्दूल, करभ, गीध, उल्लू-मृग-उष्ट्र तथा अजके समान मुखवाले, पर्वतके शिखरके समान स्थूल, सुन्दर, भयानक सिंहके समान केशों तथा रोमोंवाले, बड़ी भुजाओंवाले, अनेक वर्ण |