भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ५०] भुवनविन्यासमें विभिन्न कुलाचल पर्वतोंपर रहनेवाली देवयोनियों आदिका वर्णन २१७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आदित्याश्च तथा रुद्राः कृतावासास्तथाश्विनौ ।<br>अशीतिर्देवपुर्यस्तु हेमकक्षे नगोत्तमे ॥ ८<br>सुनीले रक्षसां वासाः पञ्चकोटिशतानि च ।<br>पञ्चकूटे पुराण्यासन् पञ्चकोटिप्रमाणतः ॥ ९<br>शतशृङ्गे पुरशतं यक्षाणाममितौजसाम् ।<br>ताम्राभे काद्रवेयाणां विशाखे तु गुहस्य वै ॥ १०रहते हैं। पर्वतोंमें उत्तम हेमकक्ष पर्वतपर अस्सी देवपुरियाँ हैं, वहाँ आदित्यगण, रुद्रगण तथा दोनों अश्विनीकुमार निवास करते हैं ॥ ७-८॥<br>सुनील पर्वतपर राक्षसोंके पाँच सौ करोड़ निवासस्थान हैं। पंचकूटपर पाँच करोड़ पुर हैं। शतशृंगपर अमित तेजस्वी यक्षोंके सौ पुर हैं। ताम्राभ पर्वतपर काद्रवेयोंका और विशाख पर्वतपर गुहका निवासस्थान है ॥ ९-१०॥
श्वेतोदरे मुनिश्रेष्ठाः सुपर्णस्य महात्मनः ।<br>पिशाचके कुबेरस्य हरिकूटे हरेर्गृहम् ॥ ११हे श्रेष्ठ मुनियो ! श्वेतोदर पर्वतपर महात्मा सुपर्णका, पिशाचकपर कुबेरका और हरिकूटपर विष्णुका आवास है ॥ ११ ॥
कुमुदे किन्नरावासस्त्वञ्जने चारणालयः ।<br>कृष्णे गन्धर्वनिलयः पाण्डुरे पुरसप्तकम् ॥ १२<br>विद्याधराणां विप्रेन्द्रा विश्वभोगसमन्वितम् ।<br>सहस्रशिखरे शैले दैत्यानामुग्रकर्मणाम् ॥ १३<br>पुराणां तु सहस्राणि सप्तशक्रारिणां द्विजाः ।<br>मुकुटे पन्नगावासः पुष्पकेतौ मुनीश्वराः ॥ १४<br>वैवस्वतस्य सोमस्य वायोर्नागाधिपस्य च ।<br>तक्षकै चैव शैलेन्द्रे चत्वार्यायतनानि च ॥ १५कुमुद पर्वतपर किन्नरोंका आवास है। अंजन पर्वतपर चारणोंका निवासस्थान है। कृष्णपर्वतपर गन्धर्वोंका निवासस्थान है। हे श्रेष्ठ विप्रो ! पाण्डुर पर्वतपर विद्याधरोंके सात पुर हैं, जो सभी प्रकारके भोगोंसे युक्त हैं। हे द्विजो ! सहस्रशिखर पर्वतपर भयानक कर्मवाले इन्द्रशत्रु दैत्योंके सात हजार पुर हैं। हे मुनीश्वरो ! पुष्पकेतु मुकुट पर्वतपर पन्नगोंका आवास है। वैवस्वत, सोम, वायु और नागाधिपतिके चार निवासस्थान शैलराज तक्षकपर हैं ॥ १२-१५ ॥
ब्रह्मेन्द्रविष्णुरुद्राणां गुहस्य च महात्मनः ।<br>कुबेरस्य च सोमस्य तथान्येषां महात्मनाम् ॥ १६<br>सन्त्यायतनमुख्यानि मर्यादापर्वतेष्वपि ।<br>श्रीकण्ठाद्रिगुहावासी सर्वावासः सहोमया ॥ १७<br>श्रीकण्ठस्याधिपत्यं वै सर्वदेवेश्वरस्य च ।<br>अण्डस्यास्य प्रवृत्तिस्तु श्रीकण्ठेन न संशयः ॥ १८ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र, महात्मा गुह, कुबेर, सोम तथा अन्य महात्माओंके मुख्य निवासस्थान मर्यादा-पर्वतोंपर हैं। सर्वव्यापी शिव [भगवती] उमाके साथ श्रीकण्ठपर्वतकी गुफामें निवास करते हैं। सभी देवताओंके ईश्वर शिवका आधिपत्य श्रीकण्ठ पर्वतपर है। इस ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति श्रीकण्ठसे ही हुई है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६-१८ ॥
अनन्तेशादयस्त्वेवं प्रत्येकं चाण्डपालकाः ।<br>चक्रवर्तिन इत्युक्तास्ततो विघ्नेश्वरास्त्विह ॥ १९<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितान्यत्र स्थानानि च समासतः ।<br>मर्यादापर्वतेष्वद्य शृण्वन्तु प्रवदाम्यहम् ॥ २०<br>श्रीकण्ठाधिष्ठितं विश्वं चराचरमिदं जगत् ।<br>कालाग्निशिवपर्यन्तं कथं वक्ष्ये सविस्तरम् ॥ २१अनन्त, ईश आदि इनमेंसे प्रत्येक देवता ब्रह्माण्ड रक्षक हैं, अतः वे चक्रवर्ती तथा विघ्नेश्वर कहे गये हैं। अब मैं मर्यादापर्वतोंपर श्रीकण्ठसे अधिष्ठित स्थानोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ, आपलोग सुनिये। मैं श्रीकण्ठसे अधिष्ठित कालाग्निशिवपर्यन्त इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌का विस्तारपूर्वक वर्णन कैसे कर सकता हूँ ? ॥ १९-२१ ॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णनं नाम पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनविन्यासोद्देशस्थानवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥