भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 233, कुल 834 में से

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पृष्ठ 233
अध्याय ५४ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन२३१
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
त्रिंशन्मुहूर्तैरेवाहुरहोरात्रं पुराविदः।<br>उभयोः काष्ठयोर्मध्ये भ्रमतो मण्डलानि तु॥ २७<br><br>कुलालचक्रनाभिस्तु यथा तत्रैव वर्तते।<br>औत्तानपादो भ्रमति ग्रहैः सार्धं ग्रहाग्रणीः॥ २८<br><br>गणो मुनिज्योतिषां तु मनसा तस्य सर्पति।<br>अधिष्ठितः पुनस्तेन भानुस्तवादाय तिष्ठति॥ २९<br><br>किरणैः सर्वतस्तोयं देवो वै ससमीरणः।<br>औत्तानपादस्य सदा ध्रुवत्वं वै प्रसादतः॥ ३०<br><br>विष्णोरौत्तानपादेन चाप्तं तातस्य हेतुना।<br>आपः पीतास्तु सूर्येण क्रमन्ते शशिनः क्रमात्॥ ३१पिण्डकी भाँति मध्यमें स्थित ध्रुव घूमता है। प्राचीन विद्याके वेत्ता कहते हैं कि दिन और रात [मिलकर] तीस मुहूर्तके बराबर होते हैं। दोनों दिशाओंके बीचमें मण्डलोंमें सूर्य घूमता है। जैसे कुलालचक्रकी नाभि उसी स्थानपर रहती है और घूमती है, उसी प्रकार ग्रहोंमें श्रेष्ठ ध्रुव भी ग्रहोंके साथ घूमते हैं। मुनियों तथा नक्षत्रोंका समूह उसीके मनके अनुसार चलता है। उसी [ध्रुव]-के द्वारा अधिष्ठित सूर्यदेव वायुके साथ सभी ओरसे अपनी किरणोंके द्वारा जल ग्रहण करते हैं। उत्तानपादके पुत्रको ध्रुवपद भगवान् विष्णुकी कृपासे सुलभ हुआ और ध्रुवने इसे अपने पिताके कारण प्राप्त किया था॥ २६—३० १/२॥
निशाकरान्निस्स्रवन्ते जीमूतान् प्रत्यपः क्रमात्।<br>वृन्दं जलमुचां चैव श्वसनेनाभिताडितम्॥ ३२<br><br>क्ष्मायां वृष्टिं विसृजतेऽभासयत्तेन भास्करः।<br>तोयस्य नास्ति वै नाशः तदैव परिवर्तते॥ ३३<br><br>हिताय सर्वजन्तूनां गतिः शर्वेण निर्मिता।<br>भूर्भुवः स्वस्तथा ह्यापो ह्यन्नं चामृतमेव च॥ ३४<br><br>प्राणा वै जगतामापो भूतानि भुवनानि च।<br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्॥ ३५<br><br>अपां शिवस्य भगवानाधिपत्ये व्यवस्थितः।<br>अपां त्वधिपतिर्देवो भव इत्येव कीर्तितः॥ ३६<br><br>भवात्मकं जगत्सर्वमिति किं चेह चाद्भुतम्।<br>नारायणत्वं देवस्य हरेश्चाद्भिः कृतं विभोः।<br>जगतामालयो विष्णुस्त्वापस्तस्यालयानि तु॥ ३७सूर्यके द्वारा ग्रहण किया गया वह जल क्रमसे चन्द्रमाको प्राप्त होता है और पुनः वह जल चन्द्रमासे मेघोंको प्राप्त होता है। इसके बाद वायुद्वारा आघात करनेपर मेघोंका समूह पृथ्वीपर वृष्टि करता है। सूर्य सबको भासित करते हैं, इसलिये वे भास्कर [नामवाले] हैं। जलका कभी नाश नहीं होता, वही जल पुनः परिवर्तित हो जाता है। भगवान् शिवने सभी प्राणियोंके कल्याणके लिये जलकी इस गतिका निर्माण किया है। जल ही भूः, भुवः, स्वः, अन्न तथा अमृत है। जल सभी लोकोंका प्राण है। अधिक कहनेसे क्या लाभ—सभी प्राणी, समस्त भुवन एवं यह चराचर जगत् जलसे बना हुआ है। भगवान् भी शिवरूपी जलके आधिपत्यमें व्यवस्थित हैं। भगवान् शिव जलके अधिपति कहे गये हैं। यह सम्पूर्ण जगत् शिवमय है—इसमें आश्चर्य क्या है? सर्वव्यापी विष्णुदेवको नारायणपद जलसे ही प्राप्त हुआ है। विष्णु सम्पूर्ण जगत्के निवासस्थान हैं और जल उनका निवासस्थान है॥ ३१—३७॥
दन्दह्यमानेषु चराचरेषु<br>गोधूमभूतास्त्वथ निष्क्रमन्ति।<br>या या ऊर्ध्वं मारुतेनेरिता वै<br>तास्तास्त्वभ्राण्यग्निना वायुना च॥ ३८<br><br>अतो धूमाग्निवातानां संयोगस्त्वभ्रमुच्यते।<br>वारीणि वर्षतीत्यभ्रमभ्रस्येशः सहस्रदृक्॥ ३९चराचर समस्त प्राणियोंके वायुद्वारा उत्तेजित अग्निसे जल जानेपर धुएँके रूपमें जो-जो निकलता है और वायुद्वारा ऊपर ले जाया जाता है, उन्हींको अभ्र कहा गया है। अतः धूम, अग्नि तथा वायुके संयोगको अभ्र कहा जाता है। जो जलकी वर्षा करता है, वह अभ्र है। हजार नेत्रोंवाले इन्द्र अभ्रके स्वामी हैं॥ ३८-३९॥
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