श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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२३२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यज्ञधूमोद्भवं चापि द्विजानां हितकृत्सदा।<br>दावाग्निधूमसम्भूतमभ्रं वनहितं स्मृतम्॥ ४०<br><br>मृतधूमोद्भवं त्वभ्रमशुभाय भविष्यति।<br>अभिचाराग्निधूमोत्थं भूतनाशाय वै द्विजाः॥ ४१<br><br>एवं धूमविशेषेण जगतां वै हिताहितम्।<br>तस्मादाच्छादयेद्धूममभिचारकृतं नरः॥ ४२<br><br>अनाच्छाद्य द्विजः कुर्याद्धूमं यश्चाभिचारिकम्।<br>एवमुद्दिश्य लोकस्य क्षयकृच्च भविष्यति॥ ४३ | यज्ञके धुएँसे उत्पन्न अभ्र (मेघ) सदा द्विजोंका हित करनेवाला होता है और दावानलके धूमसे उत्पन्न अभ्र वनके लिये हितकर कहा गया है। मृत प्राणियोंके जलानेपर उठे हुए धूमसे उत्पन्न अभ्र अशुभके लिये होता है और हे द्विजो! अभिचाराग्निके धूमसे उत्पन्न अभ्र प्राणियोंके नाशके लिये होता है। इस प्रकार अलग-अलग धूमोंसे संसारका हित तथा अहित होता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि अभिचारकर्मसे उत्पन्न धूमको ढँक दे। यदि कोई द्विज धूमको ढँके बिना अभिचारकर्म करता है, तो यह संसारके विनाशका कारण हो जाता है॥ ४०—४३॥ |
| अपां निधानं जीमूताः षण्मासानिह सुव्रताः।<br>वर्षन्त्येव जगतां हिताय पवनाज्ञया॥ ४४ | हे सुव्रतो! जलके भण्डारस्वरूप मेघ वायुकी आज्ञासे जगत्के हितके लिये इस लोकमें छः महीने वृष्टि करते हैं। |
| स्तनितं चेह वायव्यं वैद्युतं पावकोद्भवम्।<br>त्रिधा तेषामिहोत्पत्तिरभ्राणां मुनिपुङ्गवाः॥ ४५ | मेघका गर्जन वायुके द्वारा, विद्युत्के द्वारा तथा अग्निके द्वारा होता है। हे मुनिश्रेष्ठो! उन मेघोंकी उत्पत्ति तीन प्रकारसे होती है। |
| न भ्रश्यन्ति यतोऽभ्राणि मेहनान्मेघ उच्यते।<br>काष्ठा वाह्याश्च वैरिञ्च्याः पक्षाश्चैव पृथग्विधाः॥ ४६ | 'अभ्र' शब्दका अर्थ है 'जो नष्ट नहीं होता है।' 'मेहन' शब्दसे 'मेघ' व्युत्पन्न कहा गया है। काष्ठ, वाहन, वैरिञ्च्य तथा पक्ष—ये विभिन्न प्रकारके मेघ होते हैं। |
| आज्यानां काष्ठसंयोगादग्नेर्धूमः प्रवर्तितः।<br>द्वितीयानां च सम्भूतिर्विरिञ्चोच्छ्वास वायुना॥ ४७ | घृतका काष्ठसे संयोग होनेपर अग्निसे जो धूम निकलता है, उससे प्रथम प्रकारका मेघ बनता है। दूसरे प्रकारके मेघकी उत्पत्ति ब्रह्माकी श्वासवायुसे होती है। |
| भूभृतां त्वथ पक्षैस्तु मघवच्छेदितैस्ततः।<br>वाह्येयास्त्वथ जीमूतास्ताववहस्थानगाः शुभाः॥ ४८ | इन्द्रके द्वारा पर्वतोंके काटे गये पक्षोंसे तीसरे प्रकारके मेघ उत्पन्न होते हैं। अग्निसे उत्पन्न मेघ शुभ होते हैं और वे आवह नामक वायुके स्थानमें जाते हैं। |
| विरिञ्चोच्छ्वासजाः सर्वे प्रवहस्कन्धजास्ततः।<br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्॥ ४९ | ब्रह्माके श्वाससे उत्पन्न सभी मेघ प्रवह नामक वायुके स्कन्धपर रहते हैं। पुष्कर आदि मेघ पक्षसे उत्पन्न होते हैं। ये जब बरसते हैं, |
| मूकाः सशब्ददुष्टाशास्त्वेतैः कृत्यं यथाक्रमम्॥<br>क्षामवृष्टिप्रदा दीर्घकालं शीतसमीरिणः॥ ५० | तब क्रमसे शान्त, ध्वनि करनेवाले तथा विनाशकारी होते हैं; इनके द्वारा यथाक्रम यह कृत्य होता है। कुछ मेघ अल्प वृष्टि करनेवाले होते हैं और कुछ मेघ दीर्घ कालतक शीतल वायुवाले होते हैं। |
| जीवकाश्च तथा क्षीणा विद्युद्ध्वनिविवर्जिताः।<br>तिष्ठन्त्याक्रोशमात्रं तु धरापृष्ठादितस्ततः॥ ५१ | कुछ मेघ जीवक होते हैं। कुछ मेघ क्षीण होते हैं और वे विद्युत् तथा ध्वनिसे रहित होते हैं। कुछ मेघ पृथ्वीतलसे एक कोसके भीतर आकाशमें इधर-उधर रहते हैं। |
| अर्धक्रोशे तु सर्वे वै जीमूता गिरिवासिनः।<br>मेघा योजनमात्रं तु साध्यत्वाद्वहुतोयदाः॥ ५२ | पर्वतपर रहनेवाले सभी मेघ आधे कोसकी दूरीमें होते हैं। |