भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २३३


श्लोकअर्थ
धरापृष्ठाद् द्विजाः क्ष्मायां विद्युद्गुणसमन्विताः।<br>तेषां तेषां वृष्टिसर्गं त्रेधा कथितमत्र तु॥ ५३हे द्विजो! पृथ्वीतलसे योजन-मात्रकी दूरीवाले विद्युत्-युक्त मेघ साध्य होनेके कारण पृथ्वीपर अधिक जल-वृष्टि करनेवाले होते हैं। उन मेघोंका तीन प्रकारका वृष्टिसर्ग बता दिया गया॥ ४४-५३॥
पक्षजाः कल्पजाः सर्वे पर्वतानां महत्त्माः।<br>कल्पान्ते ते च वर्षन्ति रात्रौ नाशाय शारदाः॥ ५४<br><br>पक्षजाः पुष्कराद्याश्च वर्षन्ति च यदा जलम्।<br>तदार्णवमभूत्सर्वं तत्र शेते निशीश्वरः॥ ५५<br><br>आग्नेयानां श्वासजानां पक्षजानां द्विजर्षभाः।<br>जलदानां सदा धूमो ह्याप्यायन इति स्मृतः॥ ५६पर्वतोंके [कटे हुए] पक्षोंसे उत्पन्न मेघ कल्पज होते हैं और वे अति महान् होते हैं। वे कल्पके अन्तमें विनाशके लिये रात्रिमें बरसते हैं। पुष्कर आदि पक्षजनित मेघ जब बरसते हैं, तब सम्पूर्ण जगत् सागरमय हो जाता है और उसमें भगवान् रातमें शयन करते हैं। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! अग्निसे उत्पन्न, [ब्रह्माके] श्वाससे उत्पन्न तथा [कटे हुए पर्वतोंके] पक्षसे उत्पन्न मेघोंका धूम सदा आप्यायन कहा गया है॥ ५४-५६॥
पौण्ड्रास्तु वृष्टयः सर्वा विद्युताः शीतसस्यदाः।<br>पुण्ड्रदेशेषु पतिता नागानां शीकरा हिमाः॥ ५७<br><br>गाङ्गा गङ्गाम्बुसम्भूता पर्जन्येन परावहैः।<br>नगानां च नदीनां च दिग्गजानां समाकुलम्॥ ५८<br><br>मेघानां च पृथग्भूतं जलं प्रायादगादगम्।<br>परावहो यः श्वसनश्चानयत्यम्बिकागुरुम्॥ ५९<br><br>मेनापतिमतिक्रम्य वृष्टिशेषं द्विजाः परम्।<br>अभ्येति भारते वर्षे त्वपरान्तविवृद्धये॥ ६०समस्त पौण्ड्र (पुण्ड्र देशमें होनेवाली) वृष्टि विद्युतन्मय, शीतल तथा अन्न प्रदान करनेवाली होती है। पुण्ड्र देशके मेघ बर्फके समान शीतल होते हैं और वे हाथीके सूँड़से गिरते हुए जलके छिड़कावकी भाँति प्रतीत होते हैं। गांग नामक मेघ गंगाके जलसे उत्पन्न होते हैं। ये परावहसंज्ञक वायुद्वारा पर्वतों, नदियों और दिग्गजोंको व्याकुल कर देते हैं। मेघोंसे अलग हुआ जल एक पर्वतसे दूसरे पर्वतपर पहुँचता है। परावह नामक जो वायु है, वह मेघोंको हिमालय (अम्बिकागुरु) पर्वतकी ओर ले जाती है। हे द्विजो! पुनः मेनापति हिमालयसे आगे बढ़कर ये मेघ समुद्रके मध्य देशोंकी वृद्धिके लिये भारतवर्षमें भारी वर्षा करते हैं॥ ५७-६०॥
वृष्टयः कथिता ह्यद्य द्विधा वस्तुविवृद्धये।<br>सस्यद्वयस्य सङ्क्षेपात्प्रब्रवीमि यथामति॥ ६१<br><br>स्रष्टा भानुर्महातेजा वृष्टीनां विश्वदृग्विभुः।<br>सोऽपि साक्षाद् द्विजश्रेष्ठाश्चेशानः परमः शिवः॥ ६२<br><br>स एव तेजस्त्वोजस्तु बलं विप्रा यशः स्वयम्।<br>चक्षुः श्रोत्रं मनो मृत्युरात्मा मन्युर्विदिशोद्दिशः॥ ६३<br><br>सत्यं ऋतं तथा वायुरम्बरं खचरश्च सः।<br>लोकपालो हरिर्ब्रह्मा रुद्रः साक्षान्महेश्वरः॥ ६४<br><br>सहस्रकिरणः श्रीमानष्टहस्तः सुमङ्गलः।<br>अर्धनारीवपुः साक्षात्त्रिनेत्रस्त्रिदशाधिपः॥ ६५वस्तुओंकी वृद्धिके लिये होनेवाली वृष्टियाँ दो प्रकारकी कही गयी हैं। मैं बुद्धिके अनुसार उन दोनोंका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ। संसारके नेत्रस्वरूप महातेजस्वी भगवान् सूर्य वृष्टियोंका सृजन करनेवाले हैं। हे द्विजश्रेष्ठो! वे भी साक्षात् ईशान परमेश्वर शिव ही हैं। हे विप्रो! वे ही तेज, ओज, बल, यश, नेत्र, श्रोत्र, मन, मृत्यु, आत्मा, मन्यु (क्रोध), दिशाएँ और विदिशाएँ हैं। वे ही सत्य, ऋत, वायु, आकाश, ग्रह, लोकपाल, विष्णु, ब्रह्मा, रुद्र तथा साक्षात् महेश्वर हैं। वे हजार किरणोंवाले, श्रीमान्, आठ भुजाओंवाले, परम कल्याणकारी, अर्धनारीश्वर, तीन नेत्रोंवाले तथा देवताओंके अधिपति हैं॥ ६१-६५॥