भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२३० | श्रीलिङ्गमहापुराणं | [ पूर्वभाग


| पूर्णा शतसहस्राणामेकत्रिंशत्तु सा स्मृता।<br>पञ्चाशच्च तथान्यानि सहस्राण्यधिकानि तु॥ १२<br>मौहूर्तकी गतिर्ह्येषा भास्करस्य महात्मनः।<br>एतेन गतियोगेन यदा काष्ठां तु दक्षिणाम्॥ १३<br>पर्यपृच्छेत्पतङ्गोऽपि सौम्याशां चोत्तरेऽहनि।<br>मध्ये तु पुष्करस्याथ भ्रमते दक्षिणायने॥ १४<br>मानसोत्तरशैले तु महातेजा विभावसुः।<br>मण्डलानां शतं पूर्णं तदशीत्यधिकं विभुः॥ १५<br>बाह्यं चाभ्यन्तरं प्रोक्तमुत्तरायणदक्षिणे।<br>प्रत्यहं चरते तानि सूर्यो वै मण्डलानि तु॥ १६<br>कुलालचक्रपर्यन्तो यथा शीघ्रं प्रवर्तते।<br>दक्षिणप्रक्रमे देवस्तथा शीघ्रं प्रवर्तते॥ १७<br>तस्मात्प्रकृष्टं भूमिं तु कालेनाल्पेन गच्छति।<br>सूर्यो द्वादशभिः शीघ्रं मुहूर्तैर्दक्षिणायने॥ १८<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणामह्ना तु चरते रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि नक्तमष्टादशैश्चरन्॥ १९ | वह संख्या इकतीस लाख पचास हजार योजन कही गयी है। यह महात्मा भास्करकी एक मुहूर्तकी गति है। जब सूर्य इस गतिसे दक्षिण दिशाकी ओर जाते हैं, तब [वहाँ छः माह भ्रमण करनेके बाद] पुनः उत्तरायणकालमें उत्तर दिशाकी ओर लौटते हैं। दक्षिणायनके समय महातेजस्वी सूर्य मानसोत्तर पर्वतपर पुष्करके मध्य भ्रमण करते हैं। वे सूर्य एक सौ अस्सी मण्डलसे गुजरते हैं। उत्तरायण तथा दक्षिणायनको बाह्य एवं आभ्यन्तर कहा गया है। सूर्य प्रतिदिन उन्हीं मण्डलोंपर भ्रमण करते हैं। जैसे कुम्हारके चाकका बाहरी भाग शीघ्रतापूर्वक चारों ओर घूमता है, वैसे ही सूर्यदेव दक्षिणायनमें तेजीसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे थोड़े समयमें ही [अपेक्षाकृत] अधिक भूमिपर पहुँचते हैं। दक्षिणायनमें सूर्य मात्र बारह मुहूर्तोंमें शीघ्रतापूर्वक दिनमें साढ़े तेरह नक्षत्र चलते हैं, जबकि रात्रिमें अठारह मुहूर्तोंमें उतनी ही नक्षत्रकी दूरीको तय करते हैं॥ १२–१९॥ | | कुलालचक्रमध्यं तु यथा मन्दं प्रसर्पति।<br>तथोदगयने सूर्यः सर्पते मन्दविक्रमः॥ २०<br>तस्माद्दीर्घेण कालेन भूमिमल्पां तु गच्छति।<br>स रथोऽधिष्ठितो भानोरादित्यैर्मुनिभिस्तथा॥ २१<br>गन्धर्वैरप्सरोभिश्च ग्रामणीसर्पराक्षसैः।<br>प्रदीपयन् सहस्रांशुरग्रतः पृष्ठतोऽप्यधः॥ २२<br>ऊर्ध्वतश्च करं त्यक्त्वा सभां ब्राह्मीमनुत्तमाम्।<br>अम्भोभिर्मुनिभिस्त्यक्तैः सन्ध्यायां तु निशाचरान्॥ २३<br>हत्वा हत्वा तु सम्प्राप्तान् ब्राह्मणैश्चरते रविः।<br>अष्टादश मुहूर्तं तु उत्तरायणपश्चिमम्॥ २४ | जैसे कुम्हारके चाकका मध्यभाग मन्द गतिसे चलता है, उसी प्रकार सूर्य उत्तरायणमें मन्दगतिसे भ्रमण करते हैं। इसलिये वे अधिक समयमें थोड़ी भूमिपर पहुँचते हैं। सूर्यका वह रथ आदित्यों, मुनियों, गन्धर्वों, अप्सराओं, ग्रामणियों, सर्पों तथा राक्षसोंसे अधिष्ठित रहता है। हजार किरणोंवाले वे सूर्य आगेसे, पीछेसे, नीचेसे तथा ऊपरसे किरण छोड़कर ब्रह्माकी अत्युत्तम सभाको प्रकाशित करते हुए सन्ध्या-वन्दनके समय मुनियों तथा ब्राह्मणोंके द्वारा [अर्घ्यहेतु] छोड़े गये जलसे पास आनेवाले राक्षसोंको मार-मारकर आगे बढ़ते रहते हैं॥ २०–२३ १/२॥ | | अहर्भवति तच्चापि चरते मन्दविक्रमः।<br>त्रयोदशार्धमृक्षाणि नक्तं द्वादशभी रविः।<br>मुहूर्तैस्तावदृक्षाणि दिवाष्टादशभिश्चरन्॥ २५ | उत्तरायणके पश्चिम भागमें दिन अठारह मुहूर्तका होता है, उस समय सूर्य मन्दगतिवाले होकर चलते हैं। सूर्य रातमें बारह मुहूर्तमें साढ़े तेरह नक्षत्रदूरीको तय करते हैं और दिनमें चलते हुए वे उतनी ही नक्षत्रकी दूरी अठारह मुहूर्तोंमें तय करते हैं॥ २४-२५॥ | | ततो मन्दतरं नाभ्यां चक्रं भ्रमति वै यथा।<br>मृत्पिण्ड इव मध्यस्थो ध्रुवो भ्रमति वै तथा॥ २६ | जिस प्रकार नाभिमें चक्र अधिक मन्द गतिसे घूमता है, उसी प्रकार [चक्रके मध्यस्थित] मिट्टीके |