श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ५४] ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन २२९
चौवनवाँ अध्याय
ज्योतिःसन्निवेशवर्णनमें लोकपालोंकी पुरियोंका वर्णन, सूर्यकी स्थिति तथा उसकी गतिसे होनेवाले अयन एवं ऋतुओंकी स्थिति, ध्रुवस्थान तथा मेघोंका स्वरूप और वृष्टिका प्रादुर्भाव
| सूत उवाच | |
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| सूत उवाच<br>ज्योतिर्गणप्रचारं वै सङ्क्षिप्याण्डे ब्रवीम्यहम्।<br>देवक्षेत्राणि चालोक्य ग्रहचारप्रसिद्धये ॥ १ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] देवक्षेत्रोंको देखकर मैं ग्रहोंकी गतिके ज्ञानके लिये अण्डमें ज्योतिर्गणों (ग्रहों)-की गतिका संक्षेपमें वर्णन करता हूँ ॥ १ ॥ |
| मानसोपरि माहेन्द्री प्राच्यां मेरोः पुरी स्थिता।<br>दक्षिणे भानुपुत्रस्य वरुणस्य च वारुणी ॥ २<br><br>सौम्ये सोमस्य विपुला तासु दिग्देवताः स्थिताः।<br>अमरावती संयमनी सुखा चैव विभा क्रमात् ॥ ३ | मेरुके पूर्वमें मानस पर्वतपर महेन्द्रकी पुरी स्थित है। दक्षिणमें सूर्यपुत्र यमकी, पश्चिममें वरुणकी और उत्तरमें सोमकी विशाल पुरी है। उनमें दिग्पाल रहते हैं। वे पुरियाँ क्रमसे अमरावती, संयमनी, सुखा तथा विभा [नामवाली] हैं ॥ २-३ ॥ |
| लोकपालोपरिष्टात्तु सर्वतो दक्षिणायने।<br>काष्ठां गतस्य सूर्यस्य गतिर्या तां निबोधत ॥ ४<br><br>दक्षिणप्रक्रमे भानुः क्षिप्तेषुरिव धावति।<br>ज्योतिषां चक्रमादाय सततं परिगच्छति ॥ ५ | लोकपालोंकी पुरियोंके ऊपर सभी ओर दक्षिणायनमें बाणके समान गतिवाले सूर्यकी जो गति है, उसे [आपलोग] जानिये। दक्षिणायनमें सूर्य बाणकी तरह गमन करते हैं, वे नक्षत्रचक्रको साथ लेकर निरन्तर परिभ्रमण करते हैं ॥ ४-५ ॥ |
| पुरान्तगो यदा भानुः शक्रस्य भवति प्रभुः।<br>सर्वैः सायमनेः सौरो ह्युदयो दृश्यते द्विजाः ॥ ६<br><br>स एव सुखवत्यां तु निशान्तस्थः प्रदृश्यते।<br>अस्तमेति पुनः सूर्यो विभायां विश्वदृग्विभुः ॥ ७ | हे द्विजो! जब प्रभु सूर्य इन्द्रकी पुरीमें प्रवेश करते हैं, तब संयमनीपुरीके सभी लोग सूर्यका उदय देखते हैं; जब वे सूर्य संयमनीपुरीमें होते हैं, तब [पश्चिममें] सुखावतीपुरीमें प्रातःकाल होता है। उस समय विश्वके नेत्रतुल्य भगवान् सूर्य विभापुरीमें अस्त होते हैं ॥ ६-७ ॥ |
| मया प्रोक्तोऽमरावत्यां यथासौ वारितस्करः।<br>तथा संयमनीं प्राप्य सुखां चैव विभां खगः ॥ ८ | जिस प्रकार मैंने अमरावतीमें सूर्यकी गतिको कहा है, उसी प्रकार ये सूर्य संयमनीको पाकर 'सुखा' तथा 'विभा'को भी प्राप्त करते हैं ॥ ८ ॥ |
| यदापराह्लस्त्वाग्नेय्यां पूर्वाह्नो नैर्ऋते द्विजाः।<br>तदा त्वपररात्रश्च वायुभागे सुदारुणः ॥ ९<br><br>ईशान्यां पूर्वरात्रस्तु गतिरेषा च सर्वतः।<br>एवं पुष्करमध्ये तु यदा सर्पति वारिपः ॥ १०<br><br>त्रिंशांशकं तु मेदिन्यां मुहूर्तेनैव गच्छति।<br>योजनानां मुहूर्तस्य इमां सङ्ख्यां निबोधत ॥ ११ | हे द्विजो! जब आग्नेय (दक्षिण-पूर्व) भागमें अपराह्न होता है, तब नैर्ऋत (दक्षिण-पश्चिम) भागमें पूर्वाह्न, उस समय वायव्य (उत्तर-पश्चिम) भागमें भयानक रात्रिका उत्तरार्ध और उत्तर-पूर्व भागमें रात्रिका प्रथम काल होता है। सब प्रकारसे यही गति होती है। इसी प्रकार जब जलको सोखनेवाले सूर्य आकाशके मध्यमें संचरण करते हैं, तब वे एक मुहूर्तमें पृथ्वीपर तीस अंश चलते हैं। एक मुहूर्तमें सूर्यके द्वारा पार की गयी दूरीको योजनपरिमाणमें सुनिये ॥ ९-११ ॥ |