श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ५२ ] | विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन | २२३ |
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| पद्मप्रभाः पद्ममुखाः पद्मपत्रनिभेक्षणाः।<br>पद्मपत्रसुगन्धाश्च जायन्ते भवभाविताः॥ ३९<br><br>जम्बूफलरसाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।<br>देवलोकागतास्तत्र जायन्ते ह्यजरामराः॥ ४०<br><br>त्रयोदशसहस्त्राणि वर्षाणां ते नरोत्तमाः।<br>आयुःप्रमाणं जीवन्ति वर्षे दिव्ये त्विलावृते॥ ४१<br><br>जम्बूफलरसं पीत्वा न जरा बाधते त्विमान्।<br>न क्षुधा न क्लमश्चापि न जनो मृत्युमांस्तथा॥ ४२<br><br>तत्र जाम्बूनदं नाम कनकं देवभूषणम्।<br>इन्द्रगोपप्रतीकाशं जायते भास्वरं तु तत्॥ ४३ | न तो प्रकाश ही है। वहाँके लोग कमलके समान प्रभाववाले, कमलके समान मुखवाले, कमलके पत्रके समान नेत्रोंवाले और कमलपत्रकी सुगन्धिसे युक्त होते हैं। वे शिवमें ध्यानपरायण रहते हैं। वे जामुनके फलके रसका आहार करनेवाले, धूपके प्रभावसे रहित तथा सुगन्धमय होते हैं। देवलोकसे आये हुए वे लोग अजर-अमर होते हैं। उस दिव्य इलावृतवर्षमें वे श्रेष्ठ मनुष्य तेरह हजार वर्षतक अपनी पूरी आयुभर जीवित रहते हैं। जामुनके फलका रस पीनेसे इन्हें न बुढ़ापा बाधित करता है, न भूख लगती है और न थकावट होती है। वहाँके लोग [समयसे पूर्व] मरते नहीं हैं। वहाँ जाम्बूनद नामक स्वर्ण होता है; वह देवताओंका आभूषण है तथा इन्द्रगोप (कीटविशेष)-के समान प्रकाशमान रहता है॥ ३७-४३॥ |
| एवं मया समाख्याता नववर्षानुवर्तिनः।<br>वर्णायुर्भोजनाद्यानि सङ्क्षिप्य न तु विस्तरात्॥ ४४ | इस प्रकार मैंने नौ वर्षोंके निवासियोंका वर्णन कर दिया। मैंने उनके वर्ण, आयु, भोजन आदिके विषयमें विस्तारसे नहीं बल्कि संक्षेपमें कहा है॥ ४४॥ |
| हेमकूटे तु गन्धर्वा विज्ञेयाश्चाप्सरोगणाः।<br>सर्वे नागाश्च निषधे शेषवासुकितक्षकाः॥ ४५<br><br>महाबलास्त्रयस्त्रिंशद्रमन्ते याज्ञिकाः सुराः।<br>नीले तु वैडूर्यमये सिद्धा ब्रह्मर्षयोऽमलाः॥ ४६ | हेमकूटपर्वतपर गन्धर्वों तथा अप्सराओंको रहनेवाला जानना चाहिये। शेष, वासुकि, तक्षक और सभी नाग निषधपर रहते हैं। तैंतीस महाबली याज्ञिक देवता, सिद्धगण तथा विशुद्धात्मा ब्रह्मर्षि वैदूर्य मणिवाले नीलपर्वतपर रहते हैं॥ ४५-४६॥ |
| दैत्यानां दानवानां च श्वेतः पर्वत उच्यते।<br>शृङ्गवान् पर्वतश्चैव पितॄणां निलयः सदा॥ ४७<br><br>हिमवान् यक्षमुख्यानां भूतानामीश्वरस्य च।<br>सर्वाद्रिषु महादेवो हरिणा ब्रह्मणाम्बया॥ ४८<br><br>नन्दिना च गणैश्चैव वर्षेषु च वनेषु च।<br>नीलश्वेतत्रिशृङ्गे च भगवान्नीललोहितः॥ ४९<br><br>सिद्धैर्देवैश्च पितृभिर्दृष्टो नित्यं विशेषतः।<br>नीलश्च वैडूर्यमयः श्वेतः शुक्लो हिरण्मयः॥ ५०<br><br>मयूरबर्हवर्णस्तु शातकुम्भस्त्रिशृङ्गवान्।<br>एते पर्वतराजानो जम्बूद्वीपे व्यवस्थिताः॥ ५१ | दैत्यों एवं दानवोंका निवासस्थान श्वेतपर्वत कहा जाता है। शृंगवान्पर्वत [सभी] पितरोंका निवासस्थान है। हिमवान् सभी यक्षों, भूतों तथा शिवका निवास है। महादेवजी श्रीविष्णु, ब्रह्मा, उमा, नन्दी और [अपने] गणोंके साथ सभी पर्वतों, वर्षों तथा वनोंमें निवास करते हैं। भगवान् नीललोहित नील, श्वेत एवं त्रिशृंग पर्वतोंपर विशेष रूपसे सिद्धों, देवताओं तथा पितरोंके साथ सदा दिखायी पड़ते हैं। नीलपर्वत वैदूर्यमय, श्वेतपर्वत शुक्लवर्णवाला, हिरण्यमयपर्वत मोरपंखके वर्णका और शृंगवान्पर्वत सुनहरे वर्णका है। ये सभी पर्वतराज जम्बूद्वीपमें स्थित हैं॥ ४७-५१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे भुवनकोशस्वभाववर्णनं नाम द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः॥ ५२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'भुवनकोशस्वभाववर्णन' नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ५२॥