भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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| २२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| वर्षे तु भारते मर्त्याः पुण्याः कर्मवशायुषः।<br>शतायुषः समाख्याता नानावर्णाल्पदेहिनः॥ २५<br><br>नानादेवार्चने युक्ता नानाकर्मफलाशिनः।<br>नानाज्ञानार्थसम्पन्ना दुर्बलाश्चाल्पभोगिनः॥ २६ | भारतवर्षमें मनुष्य पुण्यशाली, कर्मके अधीन आयुवाले, [प्रायः] सौ वर्षकी आयुवाले, अनेक रंगवाले, छोटे शरीरवाले, अनेक देवताओंकी पूजामें परायण, नानाविध कर्मोंका फल भोगनेवाले, अनेक ज्ञानके अर्थोंसे सम्पन्न, दुर्बल तथा अल्प सुखको भोगनेवाले कहे गये हैं॥ २५-२६॥ | | इन्द्रद्वीपे तथा केचित्तथैव च कसेरुके।<br>ताम्रद्वीपं गताः केचित्केचिद्देशं गभस्तिमत्॥ २७<br><br>नागद्वीपं तथा सौम्यं गान्धर्वं वारुणं गताः।<br>केचिन्म्लेच्छाः पुलिन्दाश्च नानाजातिसमुद्भवाः॥ २८<br><br>पूर्वे किरातास्तस्यान्ते पश्चिमे यवनाः स्मृताः।<br>ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मध्ये शूद्राश्च सर्वशः॥ २९<br><br>इज्ज्यायुद्धवणिज्याभिर्वर्तयन्तो व्यवस्थिताः।<br>तेषां संव्यवहारोऽयं वर्ततेऽत्र परस्परम्॥ ३०<br><br>धर्मार्थकामसंयुक्तो वर्णानां तु स्वकर्मसु।<br>सङ्कल्पश्चाभिमानश्च आश्रमाणां यथाविधि॥ ३१<br><br>इह स्वर्गापवर्गार्थं प्रवृत्तिर्यत्र मानुषी।<br>तेषां च युगकर्माणि नान्यत्र मुनिपुङ्गवाः॥ ३२ | उनमेंसे कुछ इन्द्रद्वीपमें, कुछ कसेरुकद्वीपमें, कुछ ताम्रद्वीपमें और कुछ गभस्तिमान् देशमें चले गये। कुछ नागद्वीपमें, कुछ सोमद्वीपमें, कुछ गन्धर्वद्वीपमें तथा कुछ वरुणद्वीपमें चले गये। कुछ लोग विविध जातियोंसे उत्पन्न म्लेच्छ और पुलिन्द हैं। उस द्वीपके पूर्वी भागमें किरात तथा पश्चिमी भागमें यवन बताये गये हैं। उसके मध्यभागमें सर्वत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र हैं। वे पूजन, युद्ध, वाणिज्य आदिके द्वारा जीविका चलाते हुए वहाँ व्यवस्थित हैं। उन वर्णोंका अपने-अपने कर्मोंमें परस्पर यह व्यवहार धर्म, अर्थ तथा कामसे सम्बन्धित है। उनमें संकल्प एवं अभिमान [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रमोंमें उचित रूपमें विद्यमान है। वहाँपर स्वर्ग तथा मोक्षके लिये मनुष्योंकी जो प्रवृत्ति है और उनके जो युगकर्म हैं, हे मुनिश्रेष्ठो! वैसा अन्यत्र नहीं है॥ २७-३२॥ | | दशवर्षसहस्राणि स्थितिः किम्पुरुषे नृणाम्।<br>सुवर्णवर्णाश्च नराः स्त्रियश्चाप्सरसोपमाः॥ ३३<br><br>अनामया ह्यशोकाश्च सर्वे ते शिवभाविताः।<br>शुद्धसत्त्वाश्च हेमाभाः सदाराः प्लक्षभोजनाः॥ ३४ | किम्पुरुषवर्षमें मनुष्योंकी स्थिति दस हजार वर्षतक रहती है। वहाँके पुरुष सुवर्णके रंगवाले होते हैं और स्त्रियाँ अप्सराओंके समान होती हैं। वे सब रोगरहित, शोकरहित, शिवभक्तिसे युक्त, विशुद्ध सत्त्वगुणसे सम्पन्न, स्वर्णके समान आभावाले, अपनी पत्नियोंके साथ रहनेवाले तथा गूलरका भोजन करनेवाले होते हैं॥ ३३-३४॥ | | महारजतसङ्काशा हरिवर्षेऽपि मानवाः।<br>देवलोकाच्च्युताः सर्वे देवाकाराश्च सर्वशः॥ ३५<br><br>हरं यजन्ति सर्वेशं पिबन्तीक्षुरसं शुभम्।<br>न जरा बाधते तेन न च जीर्यन्ति ते नराः॥ ३६<br><br>दशवर्षसहस्राणि तत्र जीवन्ति मानवाः।<br>मध्यमं यन्मया प्रोक्तं नाम्ना वर्षमिलावृतम्॥ ३७ | हरिवर्षमें भी मनुष्य महारजतके समान वर्णवाले होते हैं। वे सब देवलोकसे च्युत हुए हैं और हर प्रकारसे देवताओंके आकारके होते हैं। वे सर्वेश्वर शिवका पूजन करते हैं और पवित्र इक्षुरसका पान करते हैं, अतः उन्हें बुढ़ापा बाधित नहीं करता और वे लोग वृद्ध नहीं होते। वहाँ मनुष्य दस हजार वर्ष जीवित रहते हैं॥ ३५-३६ १/२॥ | | न तत्र सूर्यस्तपति न ते जीर्यन्ति मानवाः।<br>चन्द्रसूर्यो न नक्षत्रं न प्रकाशमिलावृते॥ ३८ | मध्यमें स्थित जो इलावृत नामक वर्ष कहा गया है, वहाँ सूर्य नहीं तपता है और वहाँ मनुष्य बूढ़े नहीं होते। इलावृतवर्षमें न सूर्य-चन्द्रमा हैं, न तारे हैं और |