श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ५२] विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन २२१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| समन्तात्समतिक्रम्य सर्वान्द्रीन् प्रविभागशः।<br>नियोगाद्देवदेवस्य प्रविष्टा सा महार्णवम्॥ १०<br>अस्या विनिर्गता नद्यः शतशोऽथ सहस्रशः।<br>सर्वद्वीपद्रिवर्षेषु बहवः परिकीर्तिताः॥ ११<br>क्षुद्रनद्यस्त्वसंख्याता गङ्गा यद्गां गताम्बरात्। | देवदेव शिवके आदेशसे महासागरमें प्रवेश करती है। इससे निकली हुई सैकड़ों-हजारों अनेक नदियाँ कही गयी हैं, जो सभी द्वीपों, पर्वतों तथा देशोंमें हैं। छोटी नदियाँ तो असंख्य हैं; गंगा आकाशसे पृथ्वीपर आयी हुई हैं, इसलिये वे गंगा कहलाती हैं॥ ९—११ १/२॥ |
| केतुमाले नराः कालाः सर्वे पनसभोजनाः॥ १२<br>स्त्रियश्चोत्पलवर्णाभा जीवितं चायुतं स्मृतम्।<br>भद्राश्वे शुक्लवर्णाश्च स्त्रियश्चन्द्रांशुसन्निभाः॥ १३<br>कालााम्रभोजनाः सर्वे निरातङ्का रतिप्रियाः।<br>दशवर्षसहस्राणि जीवन्ति शिवभाविताः॥ १४<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितचेतसः। | केतुमालवर्षमें मनुष्य कृष्णवर्णवाले हैं, वे सब कटहलका आहार ग्रहण करते हैं। वहाँकी स्त्रियाँ उत्पलके वर्णवाली हैं। वहाँके लोगोंकी आयु दस हजार वर्ष कही गयी है। भद्राश्ववर्षमें स्त्रियाँ चन्द्रमाकी किरणोंके समान शुक्ल वर्णकी हैं। वहाँके सभी लोग कालााम्रका भोजन करनेवाले, भयरहित तथा रतिप्रिय हैं। शिवका ध्यान करनेवाले वे लोग दस हजार वर्षतक जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोगोंके समान वे भी मनको ईश्वरमें लगाये रखते हैं॥ १२—१४ १/२॥ |
| तथा रमणके जीवा न्यग्रोधफलभोजनाः॥ १५<br>दशवर्षसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति शुक्लास्ते सर्वे शिवध्यानपरायणाः॥ १६<br>हैरण्मया महाभागा हिरण्मयवनाश्रयाः।<br>एकादशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च॥ १७<br>वर्षाणां तत्र जीवन्ति अश्वत्थाशनजीवनाः।<br>हिरण्मया इवात्यर्थमीश्वरार्पितमानसाः॥ १८ | रमणकवर्षमें लोग बरगदका फल ग्रहण करते हैं। वे ग्यारह हजार पाँच सौ वर्ष जीवित रहते हैं। वे सब शुक्लवर्णके होते हैं और शिवके ध्यानमें लगे रहते हैं। हिरण्मयवनका आश्रय लेकर महाभाग्यशाली हिरण्मय लोग रहते हैं। वे वहाँपर बारह हजार पाँच सौ वर्ष जीते हैं और अश्वत्थ (पीपल)-के आहारपर जीवित रहते हैं। हिरण्मयवर्षके लोग अपने मनको शिवमें लगाये रखते हैं॥ १५—१८॥ |
| कुरुवर्षे तु कुरवः स्वर्गलोकात्परिच्युताः।<br>सर्वे मैथुनजाताश्च क्षीरिणः क्षीरभोजनाः॥ १९<br>अन्योन्यमनुरक्ताश्च चक्रवाकसधर्मिणः।<br>अनामया ह्याशोकाश्च नित्यं सुखनिषेविणः॥ २०<br>त्रयोदशसहस्राणि शतानि दशपञ्च च।<br>जीवन्ति ते महावीर्या न चान्यस्त्रीनिषेविणः॥ २१<br>सहैव मरणं तेषां कुरूणां स्वर्गवासिनाम्।<br>हृष्टानां सुप्रवृद्धानां सर्वान्नामृतभोजिनाम्॥ २२<br>सदा तु चन्द्रकान्तानां सदा यौवनशालिनाम्।<br>श्यामाङ्गानां सदा सर्वभूषणास्पददेहिनाम्॥ २३<br>जम्बूद्वीपे तु तत्रापि कुरुवर्षं सुशोभनम्।<br>तत्र चन्द्रप्रभं शम्भोर्विमानं चन्द्रमौलिनः॥ २४ | कुरुवर्षमें कुरुलोग स्वर्गसे गिरे हुए हैं। वे सभी मैथुनक्रियासे उत्पन्न हुए हैं। वे दुग्धका पान तथा भोजन करते हैं। वे एक-दूसरेसे प्रेम करनेवाले, चक्रवाक पक्षीके समान गुण-धर्मवाले, रोगरहित, शोकमुक्त एवं सदा सुखोंका भोग करनेवाले हैं। वे चौदह हजार पाँच सौ वर्षतक जीते हैं। वे महातेजस्वी हैं और अन्य स्त्रीका सेवन नहीं करते हैं। हृष्ट-पुष्ट, अत्यन्त प्रबुद्ध, सभी प्रकारके अन्न तथा अमृतके आहारवाले, सदा चन्द्रमाके समान कान्तिमान्, सदा यौवनशाली, श्याम वर्णके शरीरवाले एवं सर्वदा सभी प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित शरीरवाले उन स्वर्गवासी कुरुओंका मरण साथ-साथ होता है। वहाँ जम्बूद्वीपमें भी अत्यन्त सुन्दर कुरुवर्ष है। चन्द्रशेखर शिवका चन्द्रमाकी प्रभाके समान एक विमान वहाँपर विद्यमान है॥ १९—२४॥ |