श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| २२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| पुरं रुद्रपुरी नाम नानाप्रासादसङ्कुलम्।<br>तत्रापि शतधा कृत्वा ह्यात्मानं चाम्बया सह॥ २९<br>क्रीडते सगणः साम्बस्तच्छिवालयमुच्यते।<br>एवं शतसहस्राणि शर्वस्यायतनानि तु॥ ३०<br>प्रतिद्वीपे मुनिश्रेष्ठाः पर्वतेषु वनेषु च।<br>नदीनदतटाकानां तीरेष्वर्णवसन्धिषु॥ ३१ | महलोंसे युक्त रुद्रपुरी नामक नगर है। वहाँ भी शिवजी सैकड़ों रूप धारण करके उमा तथा गणोंके साथ क्रीड़ा करते हैं, उसे शिवालय कहा जाता है। इस प्रकार हे मुनिश्रेष्ठो! प्रत्येक द्वीपमें पर्वतोंपर, वनोंमें, नदी-नद-सरोवरोंके तटोंपर और समुद्रोंके संगमोंपर भगवान् शिवके सैकड़ों-हजारों निवासस्थान हैं॥ २८-३१॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे विविधद्वीपशोभावर्णनं नामैकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'विविधद्वीपशोभावर्णन' नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥
बावनवाँ अध्याय
विभिन्न द्वीपोंकी नदियोंका वर्णन, केतुमाल, कुरुवर्ष, भारतवर्ष, किम्पुरुष आदि वर्षोंमें रहनेवाले लोगों तथा उनकी लोकवृत्तिका वर्णन
| सूत उवाच<br>नद्यश्च बहवः प्रोक्ताः सदा बहुजलाः शुभाः।<br>सरोवरेभ्यः सम्भूतास्त्वसंख्याता द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>प्राङ्मुखा दक्षिणास्यास्तु चोत्तरप्रभवाः शुभाः।<br>पश्चिमाग्राः पवित्राश्च प्रतिवर्षं प्रकीर्तिताः॥ २<br><br>आकाशाम्भवनिधैर्योऽसौ सोम इत्यभिधीयते।<br>आधारः सर्वभूतानां देवानाममृताकरः॥ ३<br><br>अस्मात्प्रवृत्ता पुण्योदा नदी त्वाकाशगामिनी।<br>सप्तमेनानिलपथा प्रवृत्ता चामृतोदका॥ ४<br><br>सा ज्योतींष्यनुवर्तन्ती ज्योतिर्गणनिषेविता।<br>ताराकोटिसहस्राणां नभसश्च समायुता॥ ५<br><br>परिवर्तत्यहरहो यथा सोमस्तथैव सा।<br>चत्वार्यशीतिश्च तथा सहस्राणां समुच्छ्रितः॥ ६<br><br>योजनानां महामेरुः श्रीकण्ठाक्रीडकोमलः।<br>तत्रासीनो यतः शर्वः साम्बः सह गणेश्वरैः॥ ७<br><br>क्रीडते सुचिरं कालं तस्मात्पुण्यजला शिवा।<br>गिरिं मेरुं नदी पुण्या सा प्रयाति प्रदक्षिणम्॥ ८<br><br>विभज्यमानसलिला सा जवेनानिलेन च।<br>मेरोरन्तरकूटेषु निपपात चतुर्ष्वपि॥ ९ | सूतजी बोले—हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! प्रत्येक वर्षमें सदा विपुल जलसे भरी हुई बहुत-सी असंख्य पवित्र नदियाँ बतायी गयी हैं, वे सरोवरोंसे निकली हुई हैं। वे पवित्र नदियाँ पूर्वकी ओर, दक्षिणकी ओर, उत्तरकी ओर तथा पश्चिमकी ओर प्रवाहित होनेवाली कही गयी हैं॥ १-२॥<br><br>आकाशमें जो जलसागर है, उसे सोम कहा जाता है। वह सभी प्राणियोंका आधार तथा देवताओंके लिये अमृतका भण्डार है; इससे निकली हुई पुण्य जलवाली नदी आकाशमें बहती है। सातवें वायुमार्गसे प्रवृत्त यह अमृतमय जलवाली नदी ज्योतिरूप गणोंके बीच प्रवाहित होती है। यह आकाशके हजारों-करोड़ों ताराओंसे घिरी हुई है। यह चन्द्रमाकी भाँति प्रतिदिन चारों ओर प्रवाहित होती रहती है॥ ३-५ १/२॥<br><br>महामेरु चौरासी हजार योजन ऊँचा है, वह भगवान् श्रीकण्ठका कोमल क्रीड़ास्थल है। वहाँ शिवजी उमा तथा गणेश्वरोंके साथ विराजमान रहते हैं और दीर्घकालतक क्रीड़ा करते हैं, अतः वह पवित्र जलवाली तथा कल्याणकारिणी है। वह पुण्यदायिनी नदी मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करती है॥ ६-८॥<br><br>वायुके वेगके कारण विभाजित होते हुए जलवाली वह नदी मेरुके अन्तर्गत चारों कूटोंमें प्रवाहित होती है। सभी पर्वतोंको विभागपूर्वक सभी ओरसे लाँघकर वह |