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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

६९- चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन

२९८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कुरुवंशादनुस्तस्मात्पुरुत्वान् पुरुषोत्तमः ।<br>अंशुर्जज्ञे च वैदर्भ्यां भद्रवत्यां पुरुत्वतः ॥ ४८<br>ऐक्ष्वाकीमवहच्चांशुः सत्त्वस्तस्मादजायत ।<br>सत्त्वात्सर्वगुणोपेतः सात्त्वतः कुलवर्धनः ॥ ४९ | महायशस्वी तथा मधुवंशकी वृद्धि करनेवाला राजा हुआ। मधुसे कुरुवंश नामक पुत्र हुआ। कुरुवंशसे अनु हुआ और उस [अनु]-से पुरुषश्रेष्ठ पुरुत्वान् उत्पन्न हुआ। पुरुत्वान्‌से वैदर्भी भद्रवतीके गर्भसे अंशुने जन्म लिया। अंशुने ऐक्ष्वाकीसे विवाह किया; उस [अंशु]-से सत्त्व उत्पन्न हुआ। सत्त्वसे सात्त्वत उत्पन्न हुआ; वह समस्त गुणोंसे सम्पन्न तथा कुलकी वृद्धि करनेवाला था ॥ ४८-४९ ॥ | | ज्यामघस्य मया प्रोक्ता सृष्टिर्वै विस्तरेण वः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि निसृष्टिं ज्यामघस्य तु ॥ ५०<br>प्रजीवत्येति वै स्वर्गं राज्यं सौख्यं च विन्दति ॥ ५१ | [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंसे ज्यामघकी सृष्टिका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। जो [व्यक्ति] ज्यामघकी सृष्टिको पढ़ता अथवा सुनता है; वह दीर्घकालतक जीवित रहता है, राज्य तथा सुख प्राप्त करता है और [अन्तमें] स्वर्गकी प्राप्ति करता है ॥ ५०-५१ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वंशानुवर्णनं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वंशानुवर्णन' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥


उनहत्तरवाँ अध्याय

चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन

सूत उवाचसूतजी बोले—
सात्त्वतः सत्यसम्पन्नः प्रजज्ञे चतुरः सुतान् ।<br>भजनं भ्राजमानं च दिव्यं देवावृधं नृपम् ॥ १<br>अन्धकं च महाभागं वृष्णिं च यदुनन्दनम् ।<br>तेषां निसर्गाश्चतुरः शृणुध्वं विस्तरेण वै ॥ २[हे ऋषियो!] सत्यसम्पन्न सात्त्वतने तेजस्वी भजन, दिव्य राजा देवावृध, महाभाग्यशाली अन्धक तथा यदुनन्दन वृष्णि—इन चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। अब उनके चारों वंशोंको विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥
सृञ्जयां भजनाच्चैव भ्राजमानाद्विजज्ञिरे ।<br>अयुतायुः शतायुश्च बलवान् हर्षकृत्स्मृतः ॥ ३तेजस्वी भजनके द्वारा सृंजयीसे अयुतायु, शतायु तथा बलवान् हर्षकृत् उत्पन्न हुए बताये गये हैं ॥ ३ ॥
तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः ।<br>पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्मरन् ॥ ४<br>तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोको नृपोत्तमः ।<br>अनुवंशपुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् ॥ ५<br>गुणान् देवावृधस्याथ कीर्तयन्तो महात्मनः ।<br>यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात् ॥ ६<br>बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।<br>पुरुषाः पञ्चषष्टिस्तु षट् सहस्त्राणि चाष्ट च ॥ ७[सात्त्वतके] उन पुत्रोंमें राजा देवावृधने 'मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो'—ऐसा स्मरण करते हुए घोर तपस्या की। तब उसे बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पवित्र यशवाला उत्तम राजा था। वंशपरम्पराके प्राचीन ज्ञाता महान् आत्मावाले देवावृधके गुणोंकी प्रशंसा करते हुए यह गाथा गाते हैं—बभ्रुके विषयमें हमलोग जैसा दूरसे सुनते हैं, वैसा ही समीपसे देखते हैं। देवताओंके समान देवावृधकी तरह बभ्रु मनुष्योंमें

अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... 'कृष्णचरितका वर्णन | २९९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि।<br>यज्वा दानमतिर्वीरो ब्रह्मण्यस्तु दृढव्रतः॥ ८<br>कीर्तिमांश्च महातेजाः सात्त्वतानां महारथः।<br>तस्यान्ववाये सम्भूता भोजा वै देवतोपमाः॥ ९श्रेष्ठ है। चौदह हजार पैंसठ [ऐसे] पुरुष थे, जिन्होंने देवावृधके पुत्र बभ्रुसे अमृतत्व प्राप्त किया था। वह यज्ञ करनेवाला, दानबुद्धिवाला, पराक्रमी, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाला, दृढव्रतसे युक्त, कीर्तिशाली, महातेजस्वी तथा सात्त्वतोंमें महारथी था। उसके वंशमें देवतुल्य भोजलोग उत्पन्न हुए॥ ४–९॥
गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।<br>गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥ १०<br>माद्री लेभे च तं पुत्रं ततः सा देवमीढुषम्।<br>अनमित्रं शिनिं चैव तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ११गान्धारी तथा माद्री—ये वृष्णिकी भार्याएँ थीं। गान्धारीने सुमित्र तथा मित्रनन्दनको जन्म दिया। माद्रीने देवमीढुष नामक पुत्रको उत्पन्न किया, उसके बाद उसने अनमित्र तथा शिनि नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे दोनों उत्तम पुरुष थे॥ १०-११॥
अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।<br>प्रसेनश्च महाभागः सत्राजिच्च सुतावुभौ ॥ १२<br>तस्य सत्राजितः सूर्यः सखा प्राणसमोऽभवत्।<br>स्यमन्तको नाम मणिर्दत्तस्तस्मै विवस्वता ॥ १३<br>पृथिव्यां सर्वरत्नानामसौ राजाभवन्मणिः।<br>कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनेन सहैव सः॥ १४<br>वधं प्राप्तोऽसहायश्च सिंहादेव सुदारुणात्।अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके दो पुत्र हुए—प्रसेन तथा महाभाग्यशाली सत्राजित्। सूर्य उस सत्राजित्का प्राणतुल्य मित्र था। सूर्यने उसे स्यमन्तक नामक मणि दी थी। वह मणि पृथिवीपर सभी रत्नोंमें श्रेष्ठ थी। किसी समय वह प्रसेन मणिसे युक्त होकर आखेटके लिये गया हुआ था; एक महाभयंकर सिंहने उसका वध कर दिया, उस समय वह असहाय था॥ १२–१४१/२॥
अथ पुत्रः शिनेर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्॥ १५<br>सत्यवाक् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तस्य चात्मजः।<br>सात्यकिर्युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान् ॥ १६<br>असङ्गो युयुधानस्य कुणिस्तस्य सुतोऽभवत्।<br>कुणेर्युगन्धरः पुत्रः शैनेया इति कीर्तिताः॥ १७वृष्णिके कनिष्ठ पुत्र शिनिसे सत्यक नामक सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र युयुधान था; जो सात्यकि नामसे प्रसिद्ध था। वह शिनिका प्रतापशाली नप्ता (नाती) था। युयुधानका पुत्र असंग तथा उस [असंग]-का पुत्र कुणि हुआ। कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। ये शिनिके वंशज कहे गये हैं॥ १५–१७॥
माद्र्याः सुतस्य संजज्ञे सुतो वार्ष्णिर्युधाजितः।<br>श्वफल्क इति विख्यातस्त्रैलोक्यहितकारकः॥ १८<br>श्वफल्कश्च महाराजो धर्मात्मा यत्र वर्तते।<br>नास्ति व्याधिभयं तत्र नावष्टिभयमप्युत ॥ १९<br>श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामवाप सः।<br>गान्दिनीं नाम काश्यो हि ददौ तस्मै स्वकन्यकाम्॥ २०माद्री तथा वृष्णिसे पुत्र युधाजित् उत्पन्न हुआ; वह श्वफल्क नामसे विख्यात हुआ। वह तीनों लोकोंका हित करनेवाला था। धर्मात्मा महाराज श्वफल्क जहाँ रहते थे, वहाँ न व्याधिभय रहता था और न अनावृष्टिभय रहता था। उन श्वफल्कने काशिराजकी पुत्रीको भार्याके रूपमें प्राप्त किया था। काशिराजने अपनी गान्दिनी नामक कन्याको उन्हें प्रदान किया था॥ १८–२०॥
सा मातुरुदरस्था वै बहून् वर्षगणान् किल।<br>वसन्ती न च संजज्ञे गर्भस्थां तां पिताब्रवीत्॥ २१वह अपनी माताके गर्भमें बहुत वर्षोंतक स्थित रही और जब वहाँ निवास करती हुई उसने जन्म नहीं लिया,
३००श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
जायस्व शीघ्रं भद्रं ते किमर्थं चाधितिष्ठसि।<br>प्रोवाच चैनं गर्भस्था सा कन्या गान्दिनी तदा॥ २२<br>वर्षत्रयं प्रतिदिनं गामेकां ब्राह्मणाय तु।<br>यदि दद्यास्ततः कुक्षेर्निर्गमिष्याम्यहं पितः॥ २३<br>तथेत्युवाच तस्या वै पिता काममपूरयत्।<br>दाता शूरश्च यज्वा च श्रुतवानतिथिप्रियः॥ २४<br>तस्याः पुत्रः स्मृतोऽक्रूरः श्वफल्काद्भूरिदक्षिणः।<br>रत्ना कन्या च शैवस्य ह्यक्रूरस्तामवाप्तवान्॥ २५<br>अस्यामुत्पादयामास तनयांस्तान्निबोधत।<br>उपमन्युस्तथा मागुर्वृतस्तु जनमेजयः॥ २६<br>गिरिरक्षस्तथोपेश्र्वः शत्रुघ्नो योऽरिमर्दनः।<br>धर्मभृद् दृष्टधर्मा च गोधनोऽथ वरस्तथा॥ २७<br>आवाहप्रतिवाहौ च सुधारा च वराङ्गना।<br>अक्रूरस्योग्रसेन्यां तु पुत्रौ द्वौ कुलन्दनौ॥ २८<br>देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसम्मतौ।तब पिताने गर्भमें विद्यमान उस [कन्या]-से कहा था—'तुम शीघ्र जन्म ग्रहण करो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम [गर्भमें ही] क्यों रुकी हुई हो?' तब गर्भमें स्थित उस कन्या गान्दिनीने उनसे कहा—'हे पितः! यदि आप तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक गाय ब्राह्मणको दानमें दें, तब मैं गर्भसे बाहर निकलूँगी।' इसपर पिताने कहा—'वैसा ही होगा।' इसके बाद पिताने उसकी कामना पूर्ण की। उसी कन्यासे श्वफल्कके द्वारा अक्रूर उत्पन्न कहा गया है, जो दानी, पराक्रमी, यज्ञ करनेवाला, विद्वान्, अतिथिप्रिय तथा विपुल दक्षिणा देनेवाला था। शैवकी रत्ना नामक कन्या थी, उसीको अक्रूरने [भार्यारूपमें] प्राप्त किया था। [हे ऋषियो!] उसने इस [कन्या]-से जिन पुत्रोंको उत्पन्न किया, उन्हें आप सुनिये—वे उपमन्यु, मागु, वृत, जनमेजय, गिरिरक्ष, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मभृत्, दृष्टधर्मा, गोधन, वर, आवाह तथा प्रतिवाह [नामवाले] थे और सुधारा नामक एक सुन्दर कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अक्रूरको उग्रसेनकी कन्यासे देववान् तथा उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले एवं देवतुल्य थे॥ २१—२८ १/२ ॥
सुमित्रस्य सुतो जज्ञे चित्रकश्च महायशाः॥ २९<br>चित्रकस्याभवन् पुत्रा विपृथुः पृथुरेव च।<br>अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुधासूकगवेक्षणौ॥ ३०<br>अरिष्टनेमिरश्वश्च धर्मो धर्मभृदेव च।<br>सुभूमिर्बहुभूमिश्च श्रविष्ठाश्रवणे स्त्रियौ॥ ३१<br>अन्धकात्काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।<br>कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलबर्हिषम्॥ ३२<br>कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णोः शूरस्ततोऽभवत्।<br>कपोतरोमातिबलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥ ३३<br>तस्यासीत्तुम्बुरुसखो विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते स सुनाम्ना तु चन्दनानकदुन्दुभिः॥ ३४सुमित्रको चित्रक नामक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। चित्रकके विपृथु, पृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुधासूक, गवेक्षण, अरिष्टनेमि, अश्व, धर्म, धर्मभृत्, सुभूमि, बहुभूमि [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए और श्रविष्ठ तथा श्रवणा [नामक] दो कन्याएँ उत्पन्न हुईं। काशिराजकी पुत्रीने अन्धकसे कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हि नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और उस वृष्णिसे शूर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र कपोतरोमा हुआ; वह महाबलवान् था। उस [कपोतरोमा]-का पुत्र विलोमक हुआ। उसका पुत्र नल हुआ; वह तुम्बुरु (गन्धर्व)-का मित्र और विद्वान् था। वह चन्दनानकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ २९—३४॥
तस्मादप्यभिजित्पुत्र उत्पन्नोऽस्य पुनर्वसुः।<br>अश्वमेधं स पुत्रार्थमाजहार नरोत्तमः॥ ३५<br>तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सदोमध्यात्समुत्थितः।<br>ततस्तु विद्वान् सर्वज्ञो दाता यज्वा पुनर्वसुः॥ ३६उससे अभिजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस [अभिजित्]-का पुत्र पुनर्वसु हुआ। उस श्रेष्ठ राजाने पुत्रके लिये अश्वमेधयज्ञ किया था। उस यज्ञमें जब मन्त्रोंका उच्चारण हो रहा था, तब पूजनकर्ताओंके मध्य

अध्याय ६९ ] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा कृष्णचरितका वर्णन ३०१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्यापि पुत्रमिथुनं बभूवाभिजितः किल।<br>आहुकश्चाहुकी चैव ख्यातौ कीर्तिमतां वरौ॥ ३७<br>आहुकात्काश्यदुहितुर्द्वौ पुत्रौ सम्बभूवतुः।<br>देवकश्चोग्रसेनश्च देवगर्भसमावुभौ॥ ३८<br>देवकस्य सुता राज्ञो जज्ञिरे त्रिदशोपमाः।<br>देववानुपदेवश्च सुदेवो देवरक्षितः॥ ३९<br>तेषां स्वसारः सप्तासन् वसुदेवाय ता ददौ।<br>वृषदेवोपदेवा च तथान्या देवरक्षिता॥ ४०<br>श्रीदेवा शान्तिदेवा च सहदेवा तथापरा।<br>देवकी चापि तासां च वरिष्ठाऽभूत्सुमध्यमा॥ ४१पुनर्वसुने जन्म लिया था। वह विद्वान्, सर्वज्ञ, दानी तथा यज्ञ करनेवाला हुआ। उस अभिजित्‌के जुड़वाँ पुत्र भी उत्पन्न हुए; कीर्तिमानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों आहुक तथा आहुकि नामवाले कहे गये हैं। आहुकसे काश्यकी पुत्रीको देवक एवं उग्रसेन नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे दोनों देवताओंके पुत्रोंके समान थे। राजा देवकके देववान्, उपदेव, सुदेव तथा देवरक्षित—ये देवतुल्य पुत्र उत्पन्न हुए। उनकी सात बहनें थीं। राजाने उन्हें वसुदेवको दे दिया। वे वृषदेवा, उपदेवा, देवरक्षिता, श्रीदेवा, शान्तिदेवा, सहदेवा तथा देवकी [नामवाली] थीं। उनमें देवकी वरिष्ठ एवं परम सुन्दरी थी॥ ३५—४१॥
नवोग्रसेनस्य सुतास्तेषां कंसस्तु पूर्वजः।<br>तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च शतशोऽथ सहस्रशः॥ ४२<br>देवकस्य सुता पत्नी वसुदेवस्य धीमतः।<br>बभूव वन्द्या पूज्या च देवैरपि पतिव्रता॥ ४३<br>रोहिणी च महाभागा पत्नी चानकदुन्दुभेः।<br>पौरवी बाह्निकसुता सम्पूज्यासीत्सुरैरपि॥ ४४उग्रसेनके नौ पुत्र थे; कंस उनमें ज्येष्ठ था। उन सबके सैकड़ों-हजारों पुत्र तथा पौत्र थे। देवककी पुत्री [देवकी] बुद्धिमान् वसुदेवकी भार्या हुई; वह देवताओंकी भी वन्दनीया तथा पूजनीया और पतिव्रता थी। बाह्निकपुत्री पौरवी महाभाग्यशालिनी रोहिणी भी आनकदुन्दुभि (वसुदेव)-की पत्नी थी; वह देवताओंके द्वारा भी पूजाके योग्य थी॥ ४२—४४॥
असूत रोहिणी रामं बलश्रेष्ठं हलायुधम्।<br>आश्रितं कंसभीत्या च स्वात्मानं शान्ततेजसम्॥ ४५<br>जाते रामेऽथ निहते षड्गर्भे चातिदक्षिणे।<br><br>वसुदेवो हरिं धीमान् देवक्यामुदपादयत्॥ ४६<br>स एव परमात्मासौ देवदेवो जनार्दनः।<br>हलायुधश्च भगवाननन्तो रजतप्रभः॥४७<br>भृगुशापच्छलेनैव मानयन् मानुषीं तनुम्।<br>बभूव तस्यां देवक्यां वासुदेवो जनार्दनः॥४८कंसके भयसे [स्वयं देवकीके गर्भसे निकलकर] रोहिणीके गर्भका आश्रय लेनेवाले, बलशालियोंमें श्रेष्ठ, हलका आयुध धारण करनेवाले तथा शान्त तेजवाले बलरामको रोहिणीने उत्पन्न किया; परम सुन्दर छः गर्भोंके [कंसद्वारा] वध कर दिये जानेके बाद और बलरामके जन्म लेनेके बाद बुद्धिमान् वसुदेवने देवकीसे श्रीकृष्णको उत्पन्न किया। वे ही परमात्मा, देवदेव तथा जनार्दन हैं और रजत (चाँदी)-के समान कान्तिवाले हलायुध (बलराम) भगवान् अनन्त (शेष) हैं। वे जनार्दन (श्रीविष्णु) भृगुके शापके बहाने मानवशरीर धारण करना स्वीकार करते हुए उस देवकीसे वसुदेवके पुत्ररूपमें उत्पन्न हुए थे॥ ४५—४८॥
उमादेहसमुद्भूता योगनिद्रा च कौशिकी।<br>नियोगाद्देवदेवस्य यशोदातनया ह्यभूत्॥ ४९<br>सा चैव प्रकृतिः साक्षात्सर्वदेवनमस्कृता।<br>पुरुषो भगवान् कृष्णो धर्ममोक्षफलप्रदः॥ ५०उसी समय देवदेव [श्रीविष्णु]-की आज्ञासे उमाके देहसे उत्पन्न योगनिद्रा [भगवती] कौशिकीने यशोदाकी पुत्रीके रूपमें जन्म लिया था। वे ही सभी देवताओंसे नमस्कृत साक्षात् प्रकृति हैं और धर्म तथा मोक्षका फल देनेवाले भगवान् कृष्ण पुरुष हैं॥ ४९-५०॥
३०२श्रीलिङ्गमहापुराण[पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तां कन्यां जगृहे रक्षन् कंसात्स्वात्यात्मजं तदा।<br>चतुर्भुजं विशालाक्षं श्रीवत्सकृतलाञ्छनम् ॥ ५१<br>शङ्खचक्रगदापद्मं धारयन्तं जनार्दनम्।<br>यशोदायै प्रदत्त्वा तु वसुदेवश्च बुद्धिमान् ॥ ५२<br>दत्त्वैनं नन्दगोपस्य रक्षतामिति चाब्रवीत्।<br>रक्षकं जगतां विष्णुं स्वेच्छया धृतविग्रहम् ॥ ५३<br>प्रसादाच्चैव देवस्य शिवस्यामिततेजसः।<br>रामेण सार्धं तं दत्त्वा वरदं परमेश्वरम् ॥ ५४<br>भूभारनिग्रहार्थं च ह्यवतीर्णं जगद्गुरुम्।<br>अतो वै सर्वकल्याणं यादवानां भविष्यति ॥ ५५उस समय कंससे अपने पुत्रकी रक्षा करते हुए बुद्धिमान् वसुदेवने चार भुजाओंवाले, विशाल नेत्रोंवाले श्रीवत्सके चिह्नसे युक्त, शंख-चक्र-गदा-पद्म धारण करनेवाले जनार्दनको यशोदाको देकर उस कन्याको ले लिया। लोकोंके रक्षक तथा अपनी इच्छासे शरीर धारण करनेवाले इन विष्णुको देकर उन्होंने नन्दगोपसे कहा—'इसकी रक्षा कीजिये।' अमित तेजवाले देवदेव शिवकी कृपासे बलरामके साथ उन वरदायक, परमेश्वर, पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये अवतीर्ण तथा जगत्के गुरु [श्रीकृष्ण]-को प्रदान करके कहा था—'इससे यादवोंका सब प्रकारका कल्याण होगा। यह देवकीका वही पुत्र है, जो हम लोगोंके कष्टोंको दूर करेगा'॥ ५१—५५ ½ ॥
अयं स गर्भो देवक्या यो नः क्लेशान् हरिष्यति।<br>उग्रसेनात्मजायाथ कंसायानकदुन्दुभिः ॥ ५६<br>निवेदयामास तदा जातां कन्यां सुलक्षणाम्।<br>अस्यास्तवाष्टमो गर्भो देवक्याः कंस सुव्रत ॥ ५७<br>मृत्युरेव न सन्देह इति वाणी पुरातनी।<br>ततस्तां हन्तुमारेभे कंसः सोल्लङ्घ्य चाम्बरम् ॥ ५८<br><br>उवाचाष्टभुजा देवी मेघगम्भीरया गिरा।<br>रक्षस्व तत्स्वकं देहमायातो मृत्युरेव ते ॥ ५९<br>रक्षमाणस्य देहस्य मायावी कंसरूपिणः।<br>किं कृतं दुष्कृतं मूर्ख जातः खलु तवान्तकृत् ॥ ६०उसके बाद वसुदेवने उग्रसेनपुत्र कंससे सुन्दर लक्षणोंवाली उस उत्पन्न हुई कन्याके विषयमें बताया—हे कंस! हे सुव्रत! यह देवकीका आठवाँ गर्भ ही तुम्हारा मृत्युरूप होगा; इसमें सन्देह नहीं—यह पुरातन वाणी है। तब कंसने उसे मारना आरम्भ किया। किंतु [उसके हाथसे छूटकर] आकाशमें जाकर उस अष्टभुजा देवीने मेघके समान गम्भीर वाणीमें कहा—'[हे कंस!] अब तुम अपने देहकी रक्षा करो। मायावी कंसके स्वरूपमें रहनेवाले इस देहकी रक्षा करते हुए तुम्हारी मृत्यु आ गयी है; अरे, मूर्ख! तुमने कैसा अपराध कर डाला, तुम्हारा अन्त करनेवाला तो उत्पन्न हो चुका है'॥ ५६—६०॥
देवक्याः स भयात्कंसो जघानैवाष्टमं त्विति।<br>स्मरन्ति विहितो मृत्युर्देवक्यास्तनयोऽष्टमः ॥ ६१<br>यस्तत्प्रतिकृतौ यत्नो भोजस्यासीद् वृथा हरेः।<br>प्रभावान्मुनिशार्दूलास्तया चैव जडीकृतः ॥ ६२<br>कंसोऽपि निहतस्तेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>निहता बहवश्चान्ये देवब्राह्मणघातिनः ॥ ६३उस कंसने भयसे देवकीके आठवें गर्भको मार डालनेका प्रयत्न किया था; क्योंकि उसने स्मरण कर रखा था कि जिससे उसकी मृत्यु निर्धारित है, वह देवकीका आठवाँ पुत्र है। हे श्रेष्ठ मुनियो! प्रतीकार करनेमें कंसका जो भी प्रयास था, वह व्यर्थ हो गया और [भगवान्] श्रीहरिके प्रभावसे उस वाणीके द्वारा वह कंस जड़ कर दिया गया था। [अन्तमें] अक्लिष्ट कर्म करनेवाले उन श्रीकृष्णने कंसको भी मार डाला और देवताओं तथा ब्राह्मणोंका वध करनेवाले अन्य बहुत-से दुष्टोंको भी मार डाला॥ ६१—६३॥

अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... श्रीकृष्णचरितका वर्णन ३०३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्य कृष्णस्य तनयाः प्रद्युम्नप्रमुखास्तथा।<br>बहवः परिसंख्याताः सर्वे युद्धविशारदाः॥ ६४<br>कृष्णपुत्राः समाख्याताः कृष्णेन सदृशाः सुताः।<br>पुत्रेष्वेतेषु सर्वेषु चारुदेष्णादयो हरेः॥ ६५<br>विशिष्टा बलवन्तश्च रौक्मिणेयारिसूदनाः।<br>षोडशस्त्रीसहस्त्राणि शतमकं तथाधिकम्॥ ६६<br>कृष्णस्य तासु सर्वासु प्रिया ज्येष्ठा च रुक्मिणी।<br>तया द्वादशवर्षाणि कृष्णोनाक्लिष्टकर्मणा ॥ ६७<br>उष्यता वायुभक्षेण पुत्रार्थं पूजितो हरः।<br>चारुदेष्णः सुचारुश्च चारुवेषो यशोधरः ॥ ६८<br>चारुश्रवाश्चारुयशाः प्रद्युम्नः साम्ब एव च।<br>एते लब्धास्तु कृष्णेन शूलपाणिप्रसादतः ॥ ६९उन श्रीकृष्णके प्रद्युम्न आदि बहुत-से पुत्र बताये गये हैं; वे सब युद्धमें प्रवीण थे। कृष्णके पुत्र कृष्णके ही समान थे। श्रीकृष्णके इन सभी पुत्रोंमें चारुदेष्ण आदि पुत्र विशिष्ट तथा बलवान् थे; वे रुक्मिणीके पुत्र शत्रुओंका विनाश करनेवाले थे। कृष्णकी सोलह हजार एक सौ भार्याएँ थीं; उन सबमें रुक्मिणी [उनकी] ज्येष्ठ पत्नी थी। अक्लिष्ट कर्म करनेवाले श्रीकृष्णने उस [रुक्मिणी]-के साथ बारह वर्षोंतक उपवास करते हुए [केवल] वायुभक्षणसे पुत्रहेतु [भगवान्] शिवका पूजन किया था। [परिणामस्वरूप] श्रीकृष्णने शूलपाणि (शिव)-की कृपासे चारुदेष्ण, सुचारु, चारुवेष, यशोधर, चारुश्रवा, चारुयश, प्रद्युम्न तथा साम्ब—इन पुत्रोंको प्राप्त किया था॥ ६४–६९॥
तान् दृष्ट्वा तनयान् वीरान् रौक्मिणेयांश्च रुक्मिणीम्।<br>जाम्बवत्यब्रवीत्कृष्णं भार्या कृष्णस्य धीमतः ॥ ७०<br>मम त्वं पुण्डरीकाक्ष विशिष्टं गुणवत्तरम्।<br>सुरेशसम्मितं पुत्रं प्रसन्नो दातुमर्हसि ॥ ७१<br>जाम्बवत्या वचः श्रुत्वा जगन्नाथस्ततो हरिः।<br>तपस्तप्तुं समारेभे तपोनिधिरनिन्दितः ॥ ७२रुक्मिणीके उन वीर पुत्रोंको तथा रुक्मिणीको देखकर बुद्धिमान् कृष्णकी पत्नी जाम्बवतीने कृष्णसे कहा—'हे कमलनयन! आप प्रसन्न होकर मुझे विशिष्ट, महान् गुणी तथा शिवजीको प्रिय पुत्र प्रदान कीजिये। तदनन्तर जाम्बवतीका वचन सुनकर अनिन्द्य एवं तपोनिधि जगन्नाथ श्रीहरिने तप करना प्रारम्भ किया॥ ७०–७२॥
सोऽथ नारायणः कृष्णः शङ्खचक्रगदाधरः।<br>व्याघ्रपादस्य च मुनेर्गत्वा चैवाश्रमोत्तमम् ॥ ७३<br>ऋषिं दृष्ट्वा त्वङ्गिरसं प्रणिपत्य जनार्दनः।<br>दिव्यं पाशुपतं योगं लब्ध्वांस्तस्य चाज्ञया ॥ ७४शंख, चक्र तथा गदा धारण करनेवाले उन जनार्दन नारायण श्रीकृष्णने मुनि व्याघ्रपादके श्रेष्ठ आश्रममें जाकर उन अंगिरागोत्रीय ऋषिको देखकर उन्हें प्रणाम करके उनकी आज्ञासे दिव्य पाशुपतयोग प्राप्त किया॥ ७३–७४॥
प्रलुप्तश्मश्रुकेशश्च घृताक्तो मुञ्जमेखली।<br>दीक्षितो भगवान् कृष्णस्तताप च परंतपः ॥ ७५<br>ऊर्ध्वबाहुर्निरालम्बः पादाङ्गुष्ठाग्रधिष्ठितः।<br>फलाम्ब्वनिलभोजी च ऋतुत्रयमधोक्षजः ॥ ७६दाढ़ी तथा सिरको मुण्डित कराकर, शरीरको घृतसे अनुलिप्तकर तथा मूँजकी मेखला धारण करके [व्रतमें] दीक्षित होकर परंतप भगवान् श्रीकृष्ण तपस्या करने लगे। उन श्रीकृष्णने हाथोंको ऊपर उठाकर, आश्रयरहित होकर तथा पैरके अँगूठेके अग्रभागपर स्थित होकर क्रमशः फल, जल एवं वायुका आहार ग्रहण करते हुए तीन ऋतुओं तक तपस्या की॥ ७५–७६॥
तपसा तस्य सन्तुष्टो ददौ रुद्रो बहून् वरान्।<br>साम्बं जाम्बवतीपुत्रं कृष्णाय च महात्मने ॥ ७७<br>तथा जाम्बवती चैव साम्बं भार्या हरेः सुतम्।<br>प्रहर्षमतुलं लेभे लब्ध्वादित्यं यथादितिः ॥ ७८उनकी तपस्यासे सन्तुष्ट होकर [भगवान्] रुद्रने महात्मा कृष्णको अनेक वर प्रदान किया तथा जाम्बवतीसे साम्ब नामक पुत्र प्राप्त होनेका वर प्रदान किया। तब श्रीकृष्णकी भार्या जाम्बवती पुत्र साम्बको प्राप्त करके
३०४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
उसी प्रकार परम हर्षित हुई, जैसे अदिति आदित्यको प्राप्त करके हर्षित हुई थीं॥ ७७-७८॥
बाणस्य च तदा तेन च्छेदितं मुनिपुङ्गवाः।<br>भुजानां चैव साहस्त्रं शापाद्रुद्रस्य धीमतः॥ ७९<br>अथ दैत्यवधं चक्रे हलायुधसहायवान्।<br>तथा दुष्टक्षितीशानां लीलयैव रणाजिरे॥ ८०हे मुनिश्रेष्ठो! उन श्रीकृष्णने बुद्धिमान् रुद्रके शापके कारण बाणासुरकी हजार भुजाओंको काट डाला था। इसके बाद बलरामको सहायक बनाकर उन्होंने युद्धक्षेत्रमें लीलापूर्वक [अनेक] दैत्योंका तथा दुष्ट राजाओंका वध किया॥ ७९-८०॥
स हत्वा देवसम्भूतं नरकं दैत्यपुङ्गवम्।<br>ब्राह्मणस्योर्ध्वचक्रस्य वरदानान्महात्मनः॥ ८१<br>स्वोपभोग्यानि कन्यानां षोडशातुलविक्रमः।<br>शताधिकानि जग्राह सहस्त्राणि महाबलः॥ ८२यज्ञवराहसे उत्पन्न दैत्यश्रेष्ठ नरकासुरका वध करके अतुलनीय पराक्रमवाले तथा महाबली उन श्रीकृष्णने ऊर्ध्वचक्रवाले वायुदेव तथा ब्रह्मापुत्र महात्मा नारदके वरदानसे अपने उपभोगके योग्य सोलह हजार एक सौ कन्याओंको ग्रहण किया था॥ ८१-८२॥
शापव्याजेन विप्राणामुपसंहृतवान् कुलम्।<br>संहृत्य तत्कुलं चैव प्रभासेऽतिष्ठदच्युतः॥ ८३<br>तदा तस्यैव तु गतं वर्षाणामधिकं शतम्।<br>कृष्णस्य द्वारकायां वै जराक्लेशापहारिणः॥ ८४उन्होंने विप्रोंके शापके बहाने अपने कुलका संहार कर डाला और उस कुलका संहरण करके वे अच्युत (श्रीकृष्ण) प्रभासक्षेत्रमें रहने लगे। तदनन्तर वृद्धावस्थाके कष्टका हरण करनेवाले उन श्रीकृष्णका द्वारकामें रहते हुए सौ वर्षसे अधिक समय व्यतीत हुआ॥ ८३-८४॥
विश्वामित्रस्य कण्वस्य नारदस्य च धीमतः।<br>शापं पिण्डारकेऽरक्षद्वच्यो दुर्वाससतस्तदा॥ ८५<br>त्यक्त्वा च मानुषं रूपं जरकास्त्रच्छलेन तु।<br>अनुगृह्य च कृष्णोऽपि लुब्धकं प्रययौ दिवम्॥ ८६उन्होंने [द्वारकाके समीपवर्ती] पिण्डारकक्षेत्रमें निवास करनेवाले विश्वामित्र, कण्व, बुद्धिमान् नारद तथा दुर्वासाके शाप तथा वचनकी रक्षा की। [व्याधके द्वारा बनाये गये] जरकास्त्रके बहाने अपने मानवशरीरका परित्याग करके उस व्याधपर कृपा* करके वे श्रीकृष्ण द्युलोक [अपने धाम]-को चले गये॥ ८५-८६॥
अष्टावक्रस्य शापेन भार्याः कृष्णस्य धीमतः।<br>चौरैश्चापहृताः सर्वास्तस्य मायाबलेन च॥ ८७<br>बलभद्रोऽपि सन्त्यज्य नागो भूत्वा जगाम च।<br>महिष्यस्तस्य कृष्णस्य रुक्मिणीप्रमुखाः शुभाः॥ ८८<br>सहाग्निं विविशुः सर्वाः कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा।<br>रेवती च तथा देवी बलभद्रेण धीमता॥ ८९<br>प्रविष्टा पावकं विप्राः सा च भर्तृपथं गता।<br>प्रेतकार्यं हरेः कृत्वा पार्थः परमवीर्यवान्॥ ९०अष्टावक्रमुनिके शापसे बुद्धिमान् श्रीकृष्णकी सभी भार्याएँ उनकी मायाके प्रभावसे चोरोंद्वारा अपहृत कर ली गयीं। बलराम भी अपने शरीरका त्याग करके शेषनागका रूप धारणकर [अपने लोक] चले गये। उन श्रीकृष्णकी रुक्मिणी आदि प्रमुख कल्याणमयी सभी पटरानियाँ अक्लिष्ट कर्मवाले श्रीकृष्णके साथ अग्निमें प्रविष्ट हो गयीं। हे विप्रो! देवी रेवतीने भी बुद्धिमान् बलभद्रजीके साथ अग्निमें प्रवेश किया और उन्होंने अपने पतिके मार्गका अनुगमन किया॥ ८७-८९ १/२॥

* मा भैर्जै त्वमुत्तिष्ठ काम एष कृतो हि मे। याहि त्वं मदनुज्ञातः स्वर्गं सुकृतिनां पदम्॥ (श्रीमद्भा० ११।३०।३९)
[भगवान् श्रीकृष्णने कहा—] हे जेरे! तू डर मत, उठ-उठ! यह तो तूने मेरे मनका काम किया है। जा, मेरी आज्ञासे तू उस स्वर्गमें निवास कर, जिसकी प्राप्ति बड़े-बड़े पुण्यवानोंको होती है।

७०- महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविध-सर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव३०५
रामस्य च तथान्येषां वृष्णीनामपि सुव्रतः।<br>कन्दमूलफलैस्तस्य बलिकार्यं चकार सः॥ ९१<br><br>द्रव्याभावात्स्वयं पार्थो भ्रातृभिश्च दिवं गतः।<br>एवं सङ्क्षेपतः प्रोक्तः कृष्णस्याक्लिष्टकर्मणः॥ ९२तत्पश्चात् महाशक्तिशाली तथा उत्तम व्रतवाले उन अर्जुनने श्रीकृष्ण, बलराम तथा अन्य वृष्णिवंशियोंका और्ध्वदेहिक कृत्य करके द्रव्योंके अभावके कारण कन्द-मूल-फलोंके द्वारा बलि-कार्य (पिण्डदानादि श्राद्धकार्य) किया; इसके बाद वे अर्जुन अपने भाइयोंके साथ स्वयं स्वर्गलोक चले गये॥ ९०-९१ १/२॥
प्रभावो विलयश्चैव स्वेच्छयैव महात्मनः।<br>इत्येतत्सोमवंशानां नृपाणां चरितं द्विजाः॥ ९३<br><br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मणान् श्रावयेदपि।<br>स याति वैष्णवं लोकं नात्र कार्या विचारणा॥ ९४इस प्रकार मैंने अक्लिष्ट कर्मवाले महात्मा श्रीकृष्णके प्रभाव तथा अपनी इच्छासे उनके तिरोधानका वर्णन संक्षेपमें कर दिया। हे द्विजो! जो [मनुष्य] सोमवंशीय राजाओंके इस चरित्रको पढ़ता है या सुनता है अथवा ब्राह्मणोंको सुनाता है, वह विष्णुलोक प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ९२-९४॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सोमवंशानुकीर्तनं नामैकोनसप्ततितमोऽध्यायः॥ ६९॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सोमवंशानुकीर्तन' नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ६९॥


सत्तरवाँ अध्याय

महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप, नवविधसर्गवर्णन एवं प्राजापत्यसर्गनिरूपण तथा भगवती सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव

ऋषय ऊचुः<br>आदिसर्गस्त्वया सूत सूचितो न प्रकाशितः।<br>साम्प्रतं विस्तरेणैव वक्तुमर्हसि सुव्रत॥ १**ऋषिगण बोले—**हे सूतजी! हे सुव्रत! आपने आदिसृष्टिका परिचयमात्र दिया, उसपर प्रकाश नहीं डाला; अब आप [इसे] विस्तारसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १॥
सूत उवाच<br>महेश्वरो महादेवः प्रकृतेः पुरुषस्य च।<br>परत्वे संस्थितो देवः परमात्मा मुनीश्वराः॥ २<br><br>अव्यक्तं चेश्वरात्तस्माद्भवत्कारणं परम्।<br>प्रधानं प्रकृतिश्चेति यदाहुस्तत्त्वचिन्तकाः॥ ३<br><br>गन्धवर्णरसैर्हीनं शब्दस्पर्शविवर्जितम्।<br>अजरं ध्रुवमक्षय्यं नित्यं स्वात्मन्यवस्थितम्॥ ४<br><br>जगद्योनिं महाभूतं परं ब्रह्म सनातनम्।<br>विग्रहः सर्वभूतानामीश्वराज्ञाप्रचोदितम्॥ ५<br><br>अनाद्यन्तमजं सूक्ष्मं त्रिगुणं प्रभावव्ययम्।<br>अप्रकाशमविज्ञेयं ब्रह्माग्रे समवर्तत॥ ६<br><br>अस्यात्मना सर्वमिदं व्याप्तं त्वासीच्छिवेच्छया।<br>गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभागे तमोमये॥ ७**सूतजी बोले—**हे मुनीश्वरो! परमात्मा देव महेश्वर महादेव प्रकृति तथा पुरुषसे परे हैं। उन्हीं ईश्वरसे परम कारणस्वरूप अव्यक्त उत्पन्न हुआ, जिसे तत्त्वचिन्तक प्रधान तथा प्रकृति कहते हैं। यह गन्ध-वर्ण-रससे हीन, शब्द-स्पर्शसे रहित, अजर, स्थिर, अविनाशी, शाश्वत, अपनी आत्मामें स्थित, जगत्की उत्पत्तिका स्रोत, महाभूत, सनातन, परब्रह्म, सभी प्राणियोंका विग्रह (शरीर), ईश्वरकी आज्ञासे प्रेरित, आदि-अन्तसे रहित, अजन्मा, सूक्ष्म, तीनों गुणोंसे युक्त, उत्पत्तिका स्रोत तथा अव्यय है; सर्गके आदि कालमें अव्यक्त तथा अविज्ञेय यह ब्रह्मरूप ही था। उस समय तमोमय अविभागके रहनेपर एवं गुणोंके समभावमें रहनेपर शिवकी इच्छासे इस
३०६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
[अव्यक्त]-के स्वरूपसे यह सम्पूर्ण [उत्पद्यमान] जगत् व्याप्त था॥ २-७॥
सर्गकाले प्रधानस्य क्षेत्रज्ञाधिष्ठितस्य वै।<br>गुणभावाद् व्यज्यमानो महान् प्रादुर्बभूव ह॥ ८<br><br>सूक्ष्मेण महता चाथ अव्यक्तेन समावृतम्।<br>सत्त्वोद्रिक्तो महानग्रे सत्तामात्रप्रकाशकः॥ ९<br><br>मनो महांस्तु विज्ञेयमेकं तत्कारणं स्मृतम्।<br>समुत्पन्नं लिङ्गमात्रं क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं हि तत्॥ १०सृष्टिकालमें क्षेत्रज्ञ (पुरुष)-के द्वारा अधिष्ठित प्रधानके गुणभावसे प्रेरित होता हुआ महत्तत्त्व उत्पन्न हुआ। पहले यह जगत् सूक्ष्म तथा महान् अव्यक्तसे आच्छादित था। इसके बाद सत्तामात्रका प्रकाशक सत्त्वगुण-प्रधान महत्तत्त्व प्रकट हुआ। महत्तत्त्वको मनके रूपमें जानना चाहिये; यह सृष्टिका कारण कहा गया है। लिङ्ग-मात्र यह [महत्तत्त्व] जीवोंसे अधिष्ठित होकर उत्पन्न हुआ॥ ८-१०॥
धर्मादीनि च रूपाणि लोकतत्त्वार्थहेतवः।<br>महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया॥ ११यह महान् (महत्तत्त्व) सृष्टिकी इच्छासे ईश्वरके द्वारा प्रेरित होकर सृष्टिको तथा सृष्ट जीवोंके परमार्थ कारणभूत वेदों, धर्म आदि रूपोंको विस्तारित करता है॥ ११॥
मनो महान् मतिर्ब्रह्म पूर्बुद्धिः ख्यातिरीश्वरः।<br>प्रज्ञा चितिः स्मृतिः संविद्विश्वेशश्चेति स स्मृतः॥ १२वे महेश्वर ही मन, महान्, मति, ब्रह्म, पूः, बुद्धि, ख्याति, ईश्वर, प्रज्ञा, चिति, स्मृति, संविद् तथा विश्वेश कहे गये हैं॥ १२॥
मनुते सर्वभूतानां यस्माच्चेष्टा फलं ततः।<br>सौक्ष्म्यात्तेन विभक्तं तु येन तन्मन उच्यते॥ १३वे समस्त जीवोंका कर्मफल जानते हैं और इस मनके द्वारा सूक्ष्मताके कारण उस कर्मफलसे जगत् विभक्त है, इसलिये इन्हें ‘मन’ कहा जाता है॥ १३॥
तत्त्वानांमग्रजो यस्मान्महांश्च परिमाणतः।<br>विशेषेभ्यो गुणेभ्योऽपि महानिति ततः स्मृतः॥ १४ये सभी तत्त्वोंसे पहले उत्पन्न हुए हैं और परिमाणमें सत्त्व आदि गुणोंसे भी अधिक महान् हैं, इसलिये वे ‘महान्’ कहे गये हैं॥ १४॥
बिभर्ति मानं मनुते विभागं मन्यतेऽपि च।<br>पुरुषो भोगसम्बन्धात्तेन चासौ मतिः स्मृतः॥ १५वे पुरुष [ईश्वर] भोगसम्बन्धके कारण सबका पोषण करते हैं, सम्पूर्ण प्रमाणको जानते हैं तथा समस्त भेद मानते हैं, इसलिये वे ‘मति’ कहे गये हैं॥ १५॥
बृहत्त्वाद्बृंहणत्वाच्च भावानां सकलाश्रयात्।<br>यस्माद्धारयते भावान् ब्रह्म तेन निरुच्यते॥ १६वे [महेश्वर] बृहत् होने, सबके पोषक होने तथा भावोंका सम्पूर्ण आश्रय होनेके कारण [समस्त] भावोंको धारण करते हैं, इसलिये उन्हें ‘ब्रह्म’ कहा जाता है॥ १६॥
यः पूरयति यस्माच्च कृत्स्नान् देवाननुग्रहैः।<br>नयते तत्त्वभावं च तेन पूरिति चोच्यते॥ १७वे [महेश्वर] सभी देवताओंको [अपने] अनुग्रहोंसे परिपूर्ण करते हैं तथा उन्हें तत्त्वभाव प्राप्त कराते हैं, इसलिये वे ‘पूः’ कहे जाते हैं॥ १७॥
बुध्यते पुरुषश्चात्र सर्वान् भावान् हितं तथा।<br>यस्माद् बोधयते चैव बुद्धिस्तेन निरुच्यते॥ १८वे ईश्वर इस ब्रह्माण्डमें समस्त भावों तथा हित (धर्म)-को [स्वयं] जानते हैं एवं [जीवोंको] बोध

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... 'सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०७

कराते हैं, इसलिये उन्हें 'बुद्धि' कहा जाता है॥ १८॥
ख्यातिः प्रत्युपभोगश्च यस्मात्संवर्तते ततः।<br>भोगस्य ज्ञाननिष्ठत्वात्तेन ख्यातिरिति स्मृतः॥ १९<br><br>ख्यायते तद्गुणैर्वापि ज्ञानादिभिरनेकंशः।<br>तस्माच्च महतः संज्ञा ख्यातिरितृत्यभिधीयते॥ २०ज्ञाननिष्ठाके कारण [विषय-सम्बन्धी] सुखकी ख्याति (प्रशंसा) तथा भोगकी प्राप्ति उन्हीं ईश्वरसे प्रवर्तित होती है, इसलिये वे 'ख्याति' कहे गये हैं। [आकाश आदिके शब्द आदि] गुणोंके द्वारा तथा ज्ञान आदिके द्वारा सत्पुरुष उनकी प्रशंसा करते हैं, इसलिये भी उन महान् (पूज्य) ईश्वरका नाम 'ख्याति' कहा जाता है॥ १९-२०॥
साक्षात्सर्वं विजानाति महात्मा तेन चेश्वरः।<br>यस्माज्ज्ञानानुगश्चैव प्रज्ञा तेन स उच्यते॥ २१वे महात्मा शिव सम्पूर्ण जगत्‌को प्रत्यक्ष रूपसे जानते हैं, इसलिये 'ईश्वर' कहे जाते हैं और [स्वयं] ज्ञानरूप हैं, इसलिये 'प्रज्ञा' कहे जाते हैं॥ २१॥
ज्ञानादीनि च रूपाणि बहुकर्मफलानि च।<br>चिनोति यस्माद्भोगार्थं तेनासौ चितिरुच्यते॥ २२वे [जीवोंको] भोगोंकी प्राप्तिके लिये ज्ञान आदि रूपों तथा अनेकविध कर्मफलोंका विस्तार करते हैं, इसलिये वे 'चिति' कहे जाते हैं॥ २२॥
वर्तमानव्यतीतानि तथैवानागतान्यपि।<br>स्मरते सर्वकार्याणि तेनासौ स्मृतिरुच्यते॥ २३वे [महेश्वर] वर्तमान, भूत तथा भविष्यके भी समस्त कार्योंका स्मरण करते हैं अर्थात् उनका ज्ञान रखते हैं, इसलिये वे 'स्मृति' कहे जाते हैं॥ २३॥
कृत्स्नं च विन्दते ज्ञानं यस्मान्माहात्म्यमुत्तमम्।<br>तस्माद्विन्देर्विदेश्चैव संविदित्युभिधीयते॥ २४<br><br>विद्यतेऽपि च सर्वत्र तस्मिन् सर्वं च विन्दति।<br>तस्मात्संविदिति प्रोक्तो महद्भिर्मु निसत्तमाः॥ २५वे सम्पूर्ण ज्ञान तथा उत्तम माहात्म्यको जानते हैं, इसलिये वे 'विन्द्' तथा 'विद्' धातुसे व्युत्पन्न 'संविद्' रूप भी कहे जाते हैं। हे श्रेष्ठ मुनियो! वे सर्वत्र विद्यमान हैं और भक्त उन [शिव]-में ही सब कुछ प्राप्त करता है, इसलिये वे महात्माओं‌द्वारा 'संविद्' कहे गये हैं॥ २४-२५॥
जानातेर्ज्ञानमित्याहुर्भगवान् ज्ञानसन्निधिः।<br>बन्धनादिपरीभावादीश्वरः प्रोच्यते बुधैः॥ २६'ज्ञा' धातुसे 'ज्ञान' शब्द कहा गया है। ज्ञानसमुद्र भगवान् शिव बन्धन आदिका तिरस्कार करनेके कारण विद्वानोंद्वारा 'ईश्वर' कहे गये हैं॥ २६॥
पर्यायवाचकैः शब्दैस्तत्त्वमाद्यमनुत्तमम्।<br>व्याख्यातं तत्त्वभावज्ञैर्देवस्सद्भावचिन्तकैः॥ २७इस प्रकार महेश्वरके उत्तम भावोंका चिन्तन करनेवाले तत्त्ववेत्ताओंने अनेक अर्थोंका प्रतिपादन करनेवाले शब्दोंके द्वारा आदि (सबसे पहले उत्पन्न) सर्वोत्तम 'शिव' नामक तत्त्वका वर्णन किया है॥ २७॥
महान् सृष्टिं विकुरुते चोद्यमानः सिसृक्षया।<br>सङ्कल्पोऽध्यवसायश्च तस्य वृत्तिद्वयं स्मृतम्॥ २८सृष्टि करनेकी इच्छासे प्रेरित होकर 'महत्' सृष्टिकार्यको विस्तारित करता है। संकल्प तथा अध्यवसाय—ये उसकी दो वृत्तियाँ कही गयी हैं॥ २८॥
त्रिगुणाद्रजसोद्रिक्तादहङ्कारस्ततोऽभवत् ।<br>महता च वृतः सर्गो भूतादिर्बाह्यतस्तु सः॥ २९रजोगुणप्रधान त्रिगुणके कारण वह [उत्पद्यमान] सर्ग, भूत आदि तथा अहंकार महत्के द्वारा बाहरसे ढके
३०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मादेव तमोद्रिक्तादहङ्कारादजायत।<br>भूततन्मात्रसर्गस्तु भूतादिस्तामसस्तु सः॥ ३०<br><br>भूतादिस्तु विकुर्वाणः शब्दमात्रं ससर्ज ह।<br>आकाशं सुशिरं तस्मादुत्पन्नं शब्दलक्षणम्॥ ३१<br><br>आकाशं शब्दमात्रं तु स्पर्शमात्रं समावृणोत्।<br>वायुश्चापि विकुर्वाणो रूपमात्रं ससर्ज ह॥ ३२<br><br>ज्योतिरुपद्यते वायोस्तद्रूपगुणमुच्यते।<br>स्पर्शमात्रस्तु वै वायू रूपमात्रं समावृणोत्॥ ३३<br><br>ज्योतिश्चापि विकुर्वाणं रसमात्रं ससर्ज ह।<br>सम्भवन्ति ततो ह्यापस्ता वै सर्वरसात्मिकाः॥ ३४<br><br>रसमात्रास्तु ता ह्यापो रूपमात्रोऽग्निरावृणोत्।<br>आपश्चापि विकुर्वत्यो गन्धमात्रं ससर्जिरे॥ ३५<br><br>सङ्घातो जायते तस्मात्तस्य गन्धो गुणो मतः।<br>तस्मिंस्तस्मिंश्च तन्मात्रं तेन तन्मात्रता स्मृता॥ ३६हुए थे। उसी तमोगुणप्रधान अहंकारसे शब्द-स्पर्श आदि तन्मात्राओंका आकाश आदि तामस सर्ग हुआ। सृष्टिका विस्तार करते हुए भूतादिने शब्दमात्र आकाशका सृजन किया; उससे शब्दलक्षणवाला सुषिर (पुष्कर नामक) आकाश उत्पन्न हुआ। शब्दतन्मात्रावाले आकाशने स्पर्शतन्मात्रावाले वायुको आच्छादित किया। सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए वायुने रूपतन्मात्रावाले अग्निको उत्पन्न किया। वायुसे जो ज्योति [अग्नि] उत्पन्न होती है, वह वायुके ही रूप तथा गुणवाली कही जाती है। इस प्रकार स्पर्शतन्मात्रावाले वायुने रूपतन्मात्रावाली अग्निको आच्छादित किया। सृष्टिको विस्तारित करती हुई ज्योति [अग्नि]ने रसतन्मात्राको उत्पन्न किया; उससे सर्वरसमय जल उत्पन्न हुआ। रूपतन्मात्रावाली अग्निने उस रसतन्मात्रात्मक जलको आच्छादित किया। पुनः सृष्टिको आगे बढ़ाते हुए जलने गन्धतन्मात्राका सृजन किया, उससे पृथिवी उत्पन्न हुई; उसका गुण गन्ध माना गया है। वे शब्द आदि गुण अपने-अपने धर्मियोंमात्रमें ही स्थित रहते हैं। अतः उनमें तन्मात्रता कही गयी है॥ २९-३६॥
अविशेषवाचकत्वादविशेषास्ततस्तु ते।<br>प्रशान्तघोरमूढत्वादविशेषास्ततः पुनः॥ ३७<br><br>भूततन्मात्रसर्गोऽयं विज्ञेयस्तु परस्परम्।<br>वैकारिकादहङ्कारात्सत्त्वोद्रिक्तात्तु सात्त्विकात्॥ ३८वे [शब्द आदि] अविशेषके वाचक होनेके कारण तन्मात्र शब्दका प्रतिपादक होनेके कारण तथा प्रशान्त (सात्त्विक), घोर (राजस) और मूढ़ (तामस) होनेके कारण अविशेष कहे गये हैं। इसे परस्पर (पंच) भूतोंकी तन्मात्राओंका सर्ग (सृष्टि) जानना चाहिये। वैकारिक [राजस] अहंकारसे और सत्त्वप्रधान सात्त्विक अहंकारसे वह वैकारिक सर्ग एक साथ प्रवर्तित होता है॥ ३७-३८ १/२॥
वैकारिकः स सर्गस्तु युगपत्सम्प्रवर्तते।<br>बुद्धीन्द्रियाणि पञ्चैव पञ्चकर्मेन्द्रियाणि च॥ ३९<br><br>साधकानीन्द्रियाणि स्युर्देवा वैकारिका दश।<br>एकादशं मनस्तत्र स्वगुणेनोभयात्मकम्॥ ४०<br><br>श्रोत्रं त्वक् चक्षुषी जिह्वा नासिका चैव पञ्चमी।<br>शब्दादीनामवाप्त्यर्थं बुद्धियुक्तानि तानि वै॥ ४१<br><br>पादौ पायुरुपस्थश्च हस्तौ वाग्दशमी भवेत्।<br>गतिर्विसर्गो ह्यानन्दः शिल्पं वाक्यं च कर्म तत्॥ ४२पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा पाँच कर्मेन्द्रियाँ—ये इन्द्रियाँ साधनस्वरूप हैं और उनके दस राजस अधिष्ठाता देवता हैं। जो ग्यारहवाँ मन है, वह अपने गुणसे उभयात्मक (ज्ञान-कर्मेन्द्रियात्मक) है। कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा तथा पाँचवीं नासिका—ये इन्द्रियाँ शब्द आदिकी प्राप्तिके लिये ज्ञानयुक्त होती हैं। दोनों पैर, गुदा, जननेन्द्रिय, दोनों हाथ तथा दसवीं वाणी है; क्रमशः गति, विसर्ग (मलत्याग), आनन्द, शिल्प तथा बोलना उनका कार्य है॥ ३९-४२॥

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३०९

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
आकाशं शब्दमात्रं च स्पर्शमात्रं समाविशत्।<br>द्विगुणस्तु ततो वायुः शब्दस्पर्शात्मकोऽभवत्॥ ४३<br>रूपं तथैव विशतः शब्दस्पर्शगुणावुभौ।<br>त्रिगुणस्तु ततस्त्वग्निः सशब्दस्पर्शरूपवान्॥ ४४<br>सशब्दस्पर्शरूपं च रसमात्रं समाविशत्।<br>तस्माच्चतुर्गुणा आपो विज्ञेयास्तु रसात्मिकाः॥ ४५<br>शब्दस्पर्शं च रूपं च रसो वै गन्धमाविशत्।<br>सङ्गता गन्धमात्रेण आविशन्तो महीमिमाम्॥ ४६<br>तस्मात्पञ्चगुणा भूमिः स्थूला भूतेषु शस्यते।<br>शान्ता घोराश्च मूढाश्च विशेषास्तेन ते स्मृताः॥ ४७<br>परस्परानुपवेशाद्धारयन्ति परस्परम्।<br>भूमेरन्तस्त्विदं सर्वं लोकालोकाचलावृतम्॥ ४८शब्दतन्मात्रावाला आकाश स्पर्शतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, अतः वायु शब्द तथा स्पर्शरूप दो गुणवाला हुआ। शब्द एवं स्पर्श—ये दोनों ही गुण रूपतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए, अतः शब्द-स्पर्श-रूपयुक्त वह अग्नि तीन गुणोंवाला हुआ। शब्द-स्पर्श-रूपसहित अग्नि रसतन्मात्रामें प्रविष्ट हुआ, इसलिये रसमय जलको चार गुणोंवाला जानना चाहिये। शब्द, स्पर्श, रूप तथा रस—ये गन्धतन्मात्रामें प्रविष्ट हुए। अतः गन्धतन्मात्राके साथ इस पृथ्वीमें इनके प्रवेश करनेपर पृथ्वी पाँच गुणोंवाली हुई, इसलिये यह स्थूलरूपा भूमि [पाँचों] भूतोंमें श्रेष्ठ कही जाती है। अतः [अधिक गुणके कारण] वे शब्द आदि गुण शान्त, घोर तथा मूढ़ तीन गुणवाले हैं; इसी कारणसे वे विशेष कहे गये हैं। परस्पर प्रवेश करनेके कारण वे एक-दूसरेको धारण करते हैं। भूमिके भीतर यह सब लोकालोकपर्वतसे आवृत है॥ ४३-४८॥
विशेषाश्चेन्द्रियग्राह्या नियतत्वाच्च ते स्मृताः।<br>गुणं पूर्वस्य सर्गस्य प्राप्नुवन्त्युत्तरोत्तराः॥ ४९<br>तेषां यावच्च तद्यच्च यच्च तावद् गुणं स्मृतम्।<br>उपलभ्याप्सु वै गन्धं केचिद् ब्रूयुरपां गुणम्॥ ५०<br>पृथिव्यामेव तं विद्यादपां वायोश्च संश्रयात्।<br>एते सप्त महात्मानो ह्यन्योन्यस्य समाश्रयात्॥ ५१<br>पुरुषाधिष्ठितत्वाच्च अव्यक्तानुग्रहेण च।<br>महादयो विशेषान्ता ह्याण्डमुत्पादयन्ति ते॥ ५२वे विशेष (शब्द आदि) नियतत्वके कारण इन्द्रिय-ग्राह्य कहे गये हैं। पूर्व सर्ग (आकाश आदि)-के गुणको उत्तरोत्तर वायु आदि प्राप्त करते हैं। उन शब्द आदिमें जितनी मात्रामें जो गुण होता है, उतनी ही मात्रामें उसे कहा गया है। जलमें गन्धका अनुभव होनेपर कुछ लोग कहते हैं कि यह जलका गुण है। पृथ्वीमें उस गन्धको जल तथा वायुके संयोगसे जानना चाहिये। महान् आत्मावाले ये सातों [महत्तत्त्व, अहंकार, शब्द आदि पाँच गुण] एक-दूसरेके आश्रयसे रहते हैं। महत्तत्त्वसे लेकर [शब्द आदि] विशेषतक पुरुषसे अधिष्ठित होनेके कारण तथा अव्यक्त [परमेश्वर]-के अनुग्रहसे ब्रह्माण्डको उत्पन्न करते हैं॥ ४९-५२॥
एककालसमुत्पन्नं जलबुद्बुदवच्च तत्।<br>विशेषेभ्योऽण्डमभवन्महत्तदुदकेशयम् ॥५३<br>अद्भिर्दशगुणाभिस्तु बाह्यतोऽण्डं समावृतम्।<br>आपो दशगुणेनैतास्तेजसा बाह्यतो वृताः॥ ५४<br>तेजो दशगुणेनैव वायुना बाह्यतो वृतम्।<br>वायुर्दशगुणेनैव बाह्यतो नभसा वृतः॥ ५५<br>आकाशेनावृतो वायुः खं तु भूतादिनावृतम्।<br>भूतादिर्महता चापि अव्यक्तेनावृतो महान्॥ ५६जलमें बुलबुलेकी भाँति एक विशाल अण्ड उन विशेषों (शब्द आदि)-से एक ही बारमें उत्पन्न हुआ; वह जलमें स्थित था। वह अण्ड [अपनेसे] दस गुना विस्तारवाले जलसे बाहरसे घिरा था; यह जल दस गुना विस्तारवाले तेज (अग्नि)-से बाहरसे घिरा था, तेज दस गुना विस्तारवाले वायुसे बाहरसे घिरा था और वायु भी दस गुना विस्तारवाले आकाशसे बाहरसे घिरा था, जिस आकाशसे वायु आवृत था, वह आकाश
३१०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोकअर्थ
भूत आदिसे घिरा था। भूत आदि महत्तत्त्वसे घिरे थे और महत्तत्त्व [उस] अव्यक्तसे घिरा था॥ ५३-५६॥
शर्वश्चाण्डकपालस्थो भवश्चाम्भसि सुव्रताः ।<br>रुद्रोऽग्निमध्ये भगवानुग्रो वायौ पुनः स्मृतः ॥ ५७<br><br>भीमश्चावनिमध्यस्थो ह्यहङ्कारे महेश्वरः ।<br>बुद्धौ च भगवानीशः सर्वतः परमेश्वरः ॥ ५८हे सुव्रतो! शर्व [उस] अण्डके कपालपर स्थित हैं और भव जलमें स्थित हैं; रुद्र अग्निमें तथा भगवान् उग्र वायुमें [स्थित] कहे गये हैं; भीम पृथ्वीके मध्यमें स्थित हैं, महेश्वर अहंकारमें स्थित हैं, भगवान् ईश बुद्धिमें स्थित हैं और परमेश्वर सर्वत्र स्थित हैं॥ ५७-५८॥
एतैरावरणैरण्डं सप्तभिः प्राकृतैर्वृतम् ।<br>एता आवृत्य चान्योन्यमष्टौ प्रकृतयः स्थिताः ॥ ५९<br><br>प्रसर्गकाले स्थित्वा तु ग्रसन्त्येताः परस्परम् ।<br>एवं परस्परोत्पन्ना धारयन्ति परस्परम् ॥ ६०<br><br>आधाराधेयभावेन विकारास्ते विकारिषु ।<br>महेश्वरः परोऽव्यक्तादण्डमव्यक्तसम्भवम् ॥ ६१<br><br>अण्डाज्जज्ञे स एवेशः पुरुषोऽर्कसमप्रभः ।<br>तस्मिन् कार्यस्य करणं संसिद्धं स्वेच्छयैव तु ॥ ६२<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते ।<br>तस्य वामाङ्गजो विष्णुः सर्वदेवनमस्कृतः ॥ ६३<br><br>लक्ष्म्‍या देव्या ह्याभूद्देव इच्छया परमेष्ठिनः ।<br>दक्षिणाङ्गोद्भवो ब्रह्मा सरस्वत्या जगद्गुरुः ॥ ६४अण्ड इन सात प्राकृत आवरणोंसे आवृत है और एक-दूसरेको आवृत करके ये आठ प्रकृतियाँ (मूर्तियाँ) स्थित हैं। इस प्रकार स्थित होकर ये प्रसर्गकालमें एक-दूसरेको ग्रसती हैं और सृष्टिकालमें साथ-साथ उत्पन्न होकर एक-दूसरेको धारण करती हैं। वे विकार आधार-आधेयभावसे विकारियोंमें रहते हैं। महेश्वर अव्यक्तसे परे हैं। अण्ड अव्यक्तसे उत्पन्न हुआ है। सूर्यके समान प्रभाववाले वे पुरुष परमेश्वर ही अण्डसे उत्पन्न हुए; उन पुरुषमें [उत्पद्यमान] सृष्टिका उत्पादन अपनी इच्छासे हुआ। वे ही प्रथम शरीरधारी और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। सभी देवताओंसे नमस्कृत [भगवान्] विष्णु देवी लक्ष्मीके साथ शिवकी इच्छासे उनके बायें अंगसे उत्पन्न हुए और जगद्गुरु ब्रह्मा सरस्वतीके साथ [उनके] दाहिने अंगसे उत्पन्न हुए॥ ५९-६४॥
तस्मिन्नण्डे इमे लोका अन्तर्विश्वमिदं जगत् ।<br>चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ सग्रहौ सह वायुना ॥ ६५<br><br>लोकालोकद्वयं किञ्चिदण्डे ह्यस्मिन् समर्पितम् ।<br>यत्तु सृष्टौ प्रसंख्यातं मया कालान्तरं द्विजाः ॥ ६६<br><br>एतत्कालान्तरं ज्ञेयमहर्वै पारमेश्वरम् ।<br>रात्रिश्चैतावती ज्ञेया परमेशस्य कृत्स्नशः ॥ ६७<br><br>अहस्तस्य तु या सृष्टिः रात्रिश्च प्रलयः स्मृतः ।<br>नाहस्तु विद्यते तस्य न रात्रिरीति धारयेत् ॥ ६८<br><br>उपचारस्तु क्रियते लोकानां हितकाम्यया ।उस अण्डमें ये लोक और यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। नक्षत्रों, ग्रहों तथा वायुसहित सूर्य-चन्द्रमा भी इसीमें हैं। दोनों लोकालोक [पर्वत] तथा सब कुछ इस अण्डमें स्थित है। हे द्विजो! अब मैं सृष्टिमें कहे गये कालान्तरको बताता हूँ। इस कालान्तरको परमेश्वरका दिन जानना चाहिये और [उन] परमेश्वरकी पूर्णरूपसे उतने ही कालकी रात जाननी चाहिये। जो सृष्टि है, वही उनका दिन है और प्रलयकालको उनकी रात कहा गया है। ऐसा मानना चाहिये कि न तो उनका दिन है और न उनकी रात; [केवल] लोकोंके हितकी कामनासे [उनके द्वारा] रात-दिनका ऐसा उपचार किया जाता है॥ ६५-६८ १/२॥
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्च महाभूतानि पञ्च च ॥ ६९इन्द्रियाँ, इन्द्रियोंके विषय, पाँच महाभूत, सभी

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३११

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तस्मात्सर्वाणि भूतानि बुद्धिश्च सह दैवतैः।<br>अहस्तिष्ठन्ति सर्वाणि परमेशस्य धीमतः॥ ७०<br><br>अहरन्ते प्रलीयन्ते रात्र्यन्ते विश्वसम्भवः।<br>स्वात्मन्यवस्थिते व्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते॥ ७१<br><br>साधर्म्येणावतिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ।<br>तमःसत्त्वरजोपेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ॥ ७२<br><br>अनुपृक्तावभूतान्तावोतप्रोतौ परस्परम्।<br>गुणसाम्ये लयो ज्ञेयो वैषम्ये सृष्टिरुच्यते॥ ७३<br><br>तिले यथा भवेत्तैलं घृतं पयसि वा स्थितम्।<br>तथा तमसि सत्त्वे च रजस्यनुसृतं जगत्॥ ७४प्राणी तथा बुद्धि—ये सब देवताओंके साथ बुद्धिमान् परमेश्वरके दिनके समय विद्यमान रहते हैं और दिनके अन्तमें विलीन हो जाते हैं। रात्रिका अन्त होनेपर पुनः विश्वकी उत्पत्ति होती है। उस समय व्यक्तके अपनी आत्मामें स्थित होनेपर तथा विकारके विलीन हो जानेपर प्रधान एवं पुरुष अपने लक्षणोंके साथ स्थित होते हैं। तम, सत्त्व तथा रजसे युक्त वे दोनों समत्वसे व्यवस्थित होकर एक-दूसरेमें मिलकर ओत-प्रोत हो जाते हैं। गुणोंकी साम्यास्थितिमें लयको जानना चाहिये और वैषम्यकी स्थितिमें सृष्टि कही जाती है। जैसे तिलमें तेल तथा दूधमें घी स्थित होता है, उसी प्रकार तम-सत्त्व-रजमें जगत् स्थित रहता है॥ ६९—७४॥
उपास्य रजनीं कृत्स्नां परां माहेश्वरीं तथा।<br>अहर्मुखे प्रवृत्तश्च परः प्रकृतिसम्भवः॥ ७५<br><br>क्षोभयामास योगेन परेण परमेश्वरः।<br>प्रधानं पुरुषञ्चैव प्रविश्य स महेश्वरः॥ ७६<br><br>महेश्वरात् त्रयो देवा जज्ञिरे जगदीशवरात्।<br>शाश्वताः परमा गुह्याः सर्वात्मानः शरीरिणः॥ ७७पूरी रात परात्पर माहेश्वरीकी उपासना करके दिनका आरम्भ होनेपर प्रकृतिसे उत्पन्न परमेश्वर सृष्टिके लिये प्रवृत्त होते हैं। वे परमेश्वर महेश्वर (शिव) प्रधान तथा पुरुषमें प्रवेश करके श्रेष्ठ योगके द्वारा क्षोभ उत्पन्न करते हैं। तब शाश्वत, परम गुह्य, सर्वात्मा तथा शरीर-धारी तीन देवता [उन] जगदीश महेश्वरसे उत्पन्न होते हैं॥ ७५—७७॥
एत एव त्रयो देवा एत एव त्रयो गुणाः।<br>एत एव त्रयो लोका एत एव त्रयोऽग्नयः॥ ७८<br><br>परस्पराश्रिता ह्येते परस्परमनुव्रताः।<br>परस्परेण वर्तन्ते धारयन्ति परस्परम्॥ ७९<br><br>अन्योन्यमिथुना ह्येते अन्योन्यमुपजीविनः।<br>क्षणं वियोगो न ह्येषां न त्यजन्ति परस्परम्॥ ८०ये ही तीनों [ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर] देवता, ये ही तीनों गुण, ये ही तीनों लोक तथा ये ही तीनों अग्नयाँ हैं। ये देवता एक-दूसरेका आश्रय लेकर एक-दूसरेका अनुसरण करते हुए एक-दूसरेसे व्यवहार करते हैं और एक-दूसरेको धारण करते हैं। ये परस्पर संयोग करते हैं तथा एक-दूसरेके उपजीवी हैं; क्षणभरके लिये इनका वियोग नहीं होता है, ये एक-दूसरेका त्याग [कभी] नहीं करते हैं॥ ७८—८०॥
ईश्वरस्तु परो देवो विष्णुश्च महतः परः।<br>ब्रह्मा च रजसा युक्तः सर्गादौ हि प्रवर्तते॥ ८१<br><br>परः स पुरुषो ज्ञेयः प्रकृतिः सा परा स्मृता॥ ८२महेश्वर सर्वश्रेष्ठ देवता हैं, विष्णु महत्से परे हैं और ब्रह्मा रजोगुणसे युक्त होकर सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होते हैं। उस पुरुषको 'पर' जानना चाहिये और वह प्रकृति 'परा' कही गयी है॥ ८१-८२॥
अधिष्ठिता सा हि महेश्वरेण<br>प्रवर्तते चोद्यमाने समन्तात्।<br>अनुप्रवृत्तस्तु महांस्तदेनां<br>चिरस्थिरत्वाद्विषयं श्रियः स्वयम्॥ ८३महेश्वरके द्वारा अधिष्ठित वह प्रकृति सभी ओरसे सृष्टिकार्यमें प्रवृत्त होती है और उस समय चिरस्थायी होनेके कारण महत्तत्त्व ऐश्वर्यके विषयको स्वयं धारणकर इस प्रकृतिका अनुगमन करता है॥ ८३॥

३१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग

मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रधानगुणवैषम्यात्सर्गकालः प्रवर्तते।<br>ईश्वराधिष्ठितात्पूर्वं तस्मात्सदसदात्मकात्॥ ८४<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे रुद्रश्चाग्रे ह्यवर्तत।<br>तेजसाप्रतिमो धीमानव्यक्तः सम्प्रकाशकः॥ ८५<br><br>स वै शरीरी प्रथमः स वै पुरुष उच्यते।<br>ब्रह्मा च भगवांस्तस्माच्चतुर्वक्त्रः प्रजापतिः॥ ८६<br><br>संसिद्धः कार्यकारणे तथा वै समवर्तत।<br>एक एव महादेवस्त्रिधैव स व्यवस्थितः॥ ८७<br><br>अप्रतीपेन ज्ञानेन ऐश्वर्येण समन्वितः।<br>धर्मेण चाप्रतीपेन वैराग्येण च तेऽन्विताः॥ ८८सबसे पहले ईश्वरसे अधिष्ठित तथा सत्-असत्स्वरूप उस प्राकृत गुणवैषम्यके कारण सृष्टिका काल प्रवर्तित होता है। अपने तेजसे अनुपम, बुद्धिमान्, अव्यक्त तथा सम्यक् प्रकाश करनेवाले रुद्र सबसे पहले कार्य करनेमें तत्पर हुए। वे ही प्रथम शरीरधारी हैं और वे ही पुरुष कहे जाते हैं। चार मुखवाले तथा प्रजाओंके स्वामी भगवान् ब्रह्मा उन्हींसे उत्पन्न हुए और सृष्टिकार्य करनेमें समर्थ हुए। इस प्रकार वे एक ही महादेव तीन रूपोंमें व्यवस्थित हैं। वे [महादेव] अनुकूल ज्ञान तथा ऐश्वर्यसे युक्त हैं और वे तीनों देवता भी अनुकूल धर्म तथा वैराग्यसे युक्त हैं॥ ८४-८८॥
अव्यक्ताज्जायते तेषां मनसा यद्यदीहितम्।<br>वशीकृतत्वात्त्रैगुण्यं सापेक्षत्वात्स्वभावतः॥ ८९वशीभूत होने तथा सापेक्ष होनेके कारण उन देवताओंके मनमें जो-जो त्रिगुणात्मक सृष्टिविषयकी अभिलाषा थी, वह स्वभावसे ही अव्यक्तसे उत्पन्न हुई॥ ८९॥
चतुर्मुखस्तु ब्रह्मत्वे कालत्वे चान्तकः स्मृतः।<br>सहस्रमूर्धा पुरुषस्तिस्रोऽवस्थाः स्वयम्भुवः॥ ९०<br><br>ब्रह्मत्वे सृजते लोकान् कालत्वे सङ्क्षिपत्यपि।<br>पुरुषत्वे ह्युदासीनस्तिस्रोऽवस्थाः प्रजापतेः॥ ९१<br><br>ब्रह्मा कमलगर्भाभो रुद्रः कालाग्निसन्निभः।<br>पुरुषः पुण्डरीकाक्षो रूपं तत्परमात्मनः॥ ९२वे परमेश्वर ही ब्रह्माके रूपमें चार मुखवाले तथा कालके रूपमें संहार करनेवाले कहे गये हैं। वे ही हजार सिरोंवाले पुरुष विष्णु भी हैं। इस प्रकार स्वयम्भू [परमेश्वर]-की तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्माके रूपमें वे लोकोंका सृजन करते हैं, कालके रूपमें उनका संहार भी करते हैं और पुरुषके रूपमें उदासीन रहते हैं; उन प्रजापतिकी तीन अवस्थाएँ हैं। ब्रह्मा कमलगर्भकी आभावाले हैं, रुद्र कालाग्निके समान हैं तथा पुरुष [विष्णु] कमलके समान नेत्रवाले हैं—यह उन परमात्माका रूप है॥ ९०-९२॥
एकधा स द्विधा चैव त्रिधा च बहुधा पुनः।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९३<br><br>नानाकृतिक्रियारूपनामवन्ति स्वलीलया।<br>महेश्वरः शरीराणि करोति विकरोति च॥ ९४वे महेश्वर एक, दो, तीन तथा अनेक प्रकारके शरीर धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं। वे महेश्वर अपनी लीलासे अनेक आकृति, क्रिया, रूप तथा नामवाले शरीरोंको धारण करते हैं और उन्हें नष्ट भी कर देते हैं॥ ९३-९४॥
त्रिधा यद्वर्तते लोके तस्मात्त्रिगुण उच्यते।<br>चतुर्धा प्रविभक्तत्वाच्चतुर्व्यूहः प्रकीर्तितः॥ ९५वे [परमेश्वर] लोकमें तीन रूपोंमें विद्यमान हैं, इसलिये वे तीन गुणोंवाले कहे जाते हैं और चार भागोंमें विभक्त होनेके कारण 'चतुर्व्यूह' कहे गये हैं॥ ९५॥
यदाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानयम्।<br>यच्चास्य सततं भावस्तस्मादात्मा निरुच्यते॥ ९६ये विषयोंको प्राप्त करते हैं, ग्रहण करते हैं और उनका भक्षण कर जाते हैं; ऐसा इनका शाश्वत भाव

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... ...सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
है, इसलिये ये 'आत्मा' कहे जाते हैं ॥ ९६ ॥
ऋषिः सर्वगतत्वाच्च शरीरी सोऽस्य यत्प्रभुः ।<br>स्वामित्वमस्य यत्सर्वं विष्णुः सर्वप्रवेशनात् ॥ ९७सर्वत्र गमन करनेके कारण ये ऋषि हैं; वे परमेश्वर इस शरीरके प्रभु हैं तथा इसपर उनका पूर्ण स्वामित्व है; अतः वे शरीरी हैं और सर्वत्र प्रवेश करनेके कारण वे विष्णु हैं ॥ ९७ ॥
भगवान् भगवद्भावान्निर्मलत्वाच्छिवः स्मृतः ।<br>परमः सम्प्रकृष्टत्वादवनादोमिति स्मृतः ॥ ९८<br><br>सर्वज्ञः सर्वविज्ञानात्सर्वः सर्वमयो यतः ।<br>त्रिधा विभज्य चात्मानं त्रैलोक्यं सम्प्रवर्तते ॥ ९९<br><br>सृजते ग्रसते चैव रक्षते च त्रिभिः स्वयम् ।<br>आदित्वादादिदेवोऽसावजातत्वादजः स्मृतः ॥ १००<br><br>पाति यस्मात्प्रजाः सर्वाः प्रजापतिरिति स्मृतः ।<br>देवेषु च महान् देवो महादेवस्ततः स्मृतः ॥ १०१<br><br>सर्वगत्वाच्च देवानामवश्यत्वाच्च ईश्वरः ।<br>बृहत्त्वाच्च स्मृतो ब्रह्मा भूतत्वाद्भूत उच्यते ॥ १०२<br><br>क्षेत्रज्ञः क्षेत्रविज्ञानादेकत्वात्केवलः स्मृतः ।<br>यस्मात्पुर्यां स शेते च तस्मात्पूरुष उच्यते ॥ १०३<br><br>अनादित्वाच्च पूर्वत्वात्स्वयम्भूरिति संस्मृतः ।<br>याज्यत्वादुच्यते यज्ञः कविर्विक्रान्तदर्शनात् ॥ १०४वे ऐश्वर्यमय भावसे युक्त होनेके कारण 'भगवान्' तथा निर्मल होनेके कारण 'शिव' कहे गये हैं। वे विशिष्ट होनेके कारण 'परम' तथा रक्षा करनेके कारण 'ओम्' कहे गये हैं। वे सब कुछ सम्यक् जाननेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं तथा सर्वमय होनेके कारण 'सर्व' हैं; वे अपनेको तीन रूपोंमें विभक्त करके तीनों लोकोंका संचालन करते हैं; वे तीन रूपोंसे स्वयं [जगतका] सृजन करते हैं, पालन करते हैं तथा संहार करते हैं ॥ ९८-९९ १/२ ॥<br><br>वे आदि (प्रारम्भ)-में प्रकट होनेके कारण 'आदिदेव' तथा अजन्मा होनेके कारण 'अज' कहे गये हैं। वे समस्त प्रजाओंकी रक्षा करते हैं, इसलिये 'प्रजापति' कहे गये हैं। वे देवताओंमें [सबसे] महान् देवता हैं, इसलिये 'महादेव' कहे गये हैं। वे सर्वव्यापी होने तथा किसीके वशमें न होनेके कारण देवताओंके भी 'ईश्वर', बृहत् होनेके कारण 'ब्रह्मा' तथा अपने भूतत्व (अस्तित्व)-के कारण 'भूत' कहे जाते हैं। वे क्षेत्रोंका ज्ञान रखनेके कारण 'क्षेत्रज्ञ' तथा एकमात्र होनेके कारण 'केवल' कहे गये हैं। चूँकि वे पुरी (शरीर)-में शयन करते हैं, इसलिये 'पुरुष' कहे जाते हैं। वे अनादि होने तथा [सबसे] पहले होनेके कारण 'स्वयम्भू' कहे गये हैं। वे यजनके योग्य होनेके कारण 'यज्ञ' तथा इन्द्रियोंसे न दिखायी देनेवाली वस्तुओंको भी देखनेके कारण 'कवि' कहे जाते हैं ॥ १००-१०४ ॥
क्रमणः क्रमणीयत्वात्पालकश्चापि पालनात् ।<br>आदित्यसंज्ञः कपिलो ह्यग्रजोऽग्निरिति स्मृतः ॥ १०५वे क्रमणीय (पहुँचनेके योग्य) होनेके कारण 'क्रमण', [सबका] पालन करनेके कारण 'पालक', कपिलवर्ण होनेके कारण 'आदित्य' और सबसे पहले उत्पन्न होनेके कारण 'अग्नि' कहे गये हैं ॥ १०५ ॥
हिरण्यमस्य गर्भोऽभूद्धिरण्मयस्यापि गर्भजः ।<br>तस्माद्धिरण्मयगर्भत्वं पुराणेऽस्मिन्निरुच्यते ॥ १०६हिरण्यमय अण्ड इनसे उत्पन्न हुआ और ये भी हिरण्यमय अण्डसे उत्पन्न हुए, अतः इस पुराणमें उन्हें
३१४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल संस्कृत (श्लोक)हिन्दी अनुवाद
'हिरण्यगर्भ' कहा जाता है॥१०६॥
स्वयम्भुवोऽपि वृत्तस्य कालो विश्वात्मनस्तु यः।<br>न शक्यः परिसंख्यातुमपि वर्षशतैरपि ॥ १०७<br>कालसंख्याविवृत्तस्य परार्धो ब्रह्मणः स्मृतः।<br>तावच्छेषोऽस्य कालोऽन्यस्तस्यान्ते प्रतिसृज्यते ॥ १०८अतीत विश्वात्मा स्वयम्भूका जो काल है, उसकी गणना सौ वर्षोंमें भी नहीं की जा सकती है। वर्तमान ब्रह्माकी कालसंख्याको परार्ध कहा गया है। उतने ही परिमाणवाला इनका काल [द्वितीय परार्ध] शेष रहता है; उसके अन्तमें जगत्का संहार हो जाता है। कल्पोंके हजारों करोड़ जो दिन व्यतीत हो गये हैं, उतने ही दूसरे अभी शेष हैं॥१०७-१०८ १/२॥
कोटिकोटिसहस्राणि अहर्भूतानि यानि वै।<br>समतीतानि कल्पानां तावच्छेषाः परे तु ये।<br>यस्त्वयं वर्तते कल्पो वाराहस्तं निबोधत ॥ १०९<br>प्रथमः साम्प्रतस्तेषां कल्पोऽयं वर्तते द्विजाः।<br>यस्मिन् स्वायम्भुवाद्यास्तु मनवस्ते चतुर्दश ॥ ११०<br>अतीता वर्तमानाश्च भविष्या ये च वै पुनः।<br>तैरियं पृथिवी सर्वा सप्तद्वीपा सपर्वता ॥ १११<br>पूर्णं युगसहस्त्रं वै परिपाल्या महेश्वरैः।<br>प्रजाभिस्तपसा चैव तेषां शृणुत विस्तरम् ॥ ११२जो यह वाराहकल्प चल रहा है, उसके विषयमें सुनिये। हे द्विजो! यह वर्तमान कल्प उनमें प्रथम [कल्प] है, जिसमें स्वायम्भुव आदि चौदह मनु व्यवस्थित हैं। बीत चुके, वर्तमान तथा अभी होनेवाले जो मनु हैं, उन महेश्वर मनुओंद्वारा अपनी तपस्यासे प्रजाओंके साथ सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन पूरे हजार वर्षोंतक किया जाता है; अब उनका विस्तृत वर्णन सुनिये॥१०९-११२॥
मन्वन्तरेण चैकेन सर्वाण्येवान्तराणि च।<br>कथितानि भविष्यन्ति कल्पः कल्पेन चैव हि ॥ ११३<br>अतीतानि च कल्पानि सोदर्काणि सहानुवैः।<br>अनागतेषु तद्वच्च तर्कः कार्यो विजानता ॥ ११४[हे ऋषियो!] एक मन्वन्तरके वर्णनसे सभी मन्वन्तरोंका तथा एक कल्पके वर्णनसे दूसरे कल्पका भी वर्णन हो जायगा। अपने वंशके राजाओंके साथ बीते हुए कल्प जिस रूपमें होते हैं, विद्वान्‌को वैसा ही तर्क (अनुमान) अनागत (भविष्य) कल्पोंके विषयमें भी कर लेना चाहिये॥११३-११४॥
आपो ह्यग्रे समभवन्नष्टे च पृथिवीतले।<br>शान्ततारैकनीरेऽस्मिन् प्राजायत किञ्चन ॥ ११५<br>एकार्णवे तदा तस्मिन्नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>तदा भवति वै ब्रह्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ ११६<br>सहस्रशीर्षा पुरुषो रुक्मवर्णस्त्वतीन्द्रियः।<br>ब्रह्मा नारायणाख्यस्तु सुषुवाप सलिले तदा ॥ ११७<br>सत्त्वोद्रेकात्प्रबुद्धस्तु शून्यं लोकमुदैक्षत।<br>इमं चोदाहरन्त्यत्र श्लोकं नारायणं प्रति ॥ ११८<br>आपो नाराश्च सूनव इत्यपां नाम शुश्रुमः।<br>आपूर्य ताभिरयनं कृतवानात्मनो यतः ॥ ११९<br>अप्सु शेते यतस्तस्मात्ततो नारायणः स्मृतः।<br>चतुर्युगसहस्रस्य नैशं कालमुपास्यतः ॥ १२०पृथ्वीतलके नष्ट हो जानेपर सबसे पहले जल प्रादुर्भूत हुआ; विनष्ट नक्षत्रोंसे युक्त तथा उस विस्तृत जलमय ब्रह्माण्डमें कुछ भी नहीं मालूम पड़ता था। उस एकार्णव (प्रलयसागर)-में [समस्त] स्थावर-जंगमके विनष्ट हो जानेपर हजार नेत्रोंवाले, हजार पैरवाले, हजार सिरवाले तथा स्वर्णिम रंगवाले अतीन्द्रिय ब्रह्मा पुरुषरूपमें प्रकट हुए। उस समय नारायणसंज्ञक वे ब्रह्मा जलमें सोये हुए थे। पुनः सत्त्वगुणके उद्रेकके कारण जगे हुए उन ब्रह्माने लोकको शून्य देखा। लोग उन नारायणके प्रति इस श्लोकको उदाहृत करते हैं-जलका अर्थ है 'नार' तथा 'सूनु'-हमलोग जलके ये दो नाम सुनते हैं। उस जलसे पूरित करके उन्होंने अपना 'अयन' (निवासस्थान) बनाया और वे जलमें सोते हैं, इसलिये
अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप… सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव३१५
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
'नारायण' कहे गये हैं॥ ११५-११९ १/२॥
शार्वर्यन्ते प्रकुरुते ब्रह्मत्वं सर्गकारणात्।<br>ब्रह्मा तु सलिले तस्मिन् वायुर्भूत्वा समाचरत्॥ १२१<br><br>निशायामिव खद्योतः प्रावृट्काले ततस्तु सः।<br>ततस्तु सलिले तस्मिन् विज्ञायान्तर्गतां महीम्॥ १२२<br><br>अनुमानादसम्मूढो भूमेरुद्धरणं पुनः।<br>अकरोत्स तनूमन्यां कल्पादिषु यथा पुरा॥ १२३<br><br>ततो महात्मा भगवान् दिव्यरूपमचिन्तयत्।<br>सलिलेनाप्लुतां भूमिं दृष्ट्वा स तु समन्ततः॥ १२४हजार चतुर्युगीतक जलमें निवास करनेके पश्चात् रात्रिके अन्तमें उन्होंने सृष्टि करनेके उद्देश्यसे ब्रह्माका रूप धारण किया। ब्रह्माजी वायु होकर उस जलमें विचरण करने लगे, जैसे कि वर्षाऋतुमें रात्रिमें खद्योत विचरण करता है। तदनन्तर ज्ञानसम्पन्न उन ब्रह्माने अनुमानपूर्वक पृथ्वीको जलके भीतर गयी हुई जानकर पहलेके कल्पोंमें जैसा रूप धारण किया था, उस अन्य रूपको धारणकर पृथ्वीका उद्धार करनेका निश्चय किया। तत्पश्चात् महात्मा भगवान् [ब्रह्मा] उस दिव्य रूपका चिन्तन करने लगे। सभी ओरसे जलसे व्याप्त पृथ्वीको देखकर उन्होंने सोचा कि मैं कौन-सा रूप धारण करके इस पृथ्वीका उद्धार करूँ॥ १२०-१२४ १/२॥
किन्नु रूपमहं कृत्वा उद्धरेयं महीमिमाम्।<br>जलक्रीडानुसदृशं वाराहं रूपमाविशत्॥ १२५<br><br>अधृष्यं सर्वभूतानां वाङ्मयं ब्रह्मसंज्ञितम्।<br>पृथिव्युद्धरणार्थाय प्रविवेश रसातलम्॥ १२६<br><br>अद्भिः सञ्छादितां भूमिं स तामाशु प्रजापतिः।<br>उपगम्योज्जहारैनामापश्चापि समाविशत्॥ १२७<br><br>सामुद्रा वै समुद्रेषु नादेयाश्च नदीषु च।<br>रसातलतले मग्नां रसातलपुटे गताम्॥ १२८<br><br>प्रभुर्लोकहितार्थाय दंष्ट्रयाभ्युज्जहार गाम्।<br>ततः स्वस्थानमानीय पृथिवीं पृथिवीधरः॥ १२९<br><br>मुमोच पूर्ववदसौ धारयित्वा धराधरः।<br>तस्योपरि जलौघस्य महती नौरिव स्थिता॥ १३०उन्होंने जलक्रीड़ाके अनुरूप, सभी प्राणियोंसे अजेय, वेदमय तथा ब्रह्मसंज्ञक वाराहरूप धारण किया और पृथ्वीका उद्धार करनेके लिये रसातलमें प्रवेश किया। उन [वाराहरूपधारी] प्रजापतिने जलसे घिरी हुई पृथ्वीके पास पहुँचकर उसे उठा लिया और समुद्रके जलको समुद्रोंमें तथा नदियोंके जलको नदियोंमें समाविष्ट कर दिया। इस प्रकार उन प्रभुने लोक-कल्याणके लिये रसातलमें गयी हुई तथा समुद्रतलमें डूबी हुई पृथ्वीको अपने दंष्ट्रापर उठा लिया। इसके बाद उन धरणीधरने पृथ्वीको उसके [मूल] स्थानमें लाकरके पूर्वकी भाँति रखकर छोड़ दिया। वह पृथ्वी उस जलराशिके ऊपर विशाल नौकाकी भाँति स्थित हो गयी और उसीके समान विशाल देह होनेके कारण पृथ्वी [पुनः] डूब न सकी॥ १२५-१३० १/२॥
तत्समा ह्युरुदेहत्वान्न मही याति सम्प्लवम्।<br>तत उत्क्षिप्य तां देवो जगतः स्थापनेच्छया॥ १३१<br><br>पृथिव्याः प्रविभागाय मनश्चक्रेऽम्बुजेक्षणः।<br>पृथिवीं च समां कृत्वा पृथिव्यां सोऽचिनोद् गिरीन्॥ १३२<br><br>प्राक्सर्गे दह्यमाने तु तदा संवर्तकाग्निना।<br>तेनाग्निना विशीर्णास्ते पर्वता भूरि विस्तराः॥ १३३<br><br>शैत्यादेकार्णवे तस्मिन् वायुना तेन संहताः।<br>निक्षिप्ता यत्र यत्रासंस्तत्र तत्राचलाभवन्॥ १३४तत्पश्चात् कमलके समान नेत्रवाले भगवान्ने उसे उठा करके जगत्‌की स्थापनाकी इच्छासे पृथ्वीका विभाग करनेके लिये मनमें निश्चय किया। उन्होंने पृथ्वीको समतल करके पृथ्वीपर पर्वतोंको संग्रहीत किया। संवर्तक अग्निद्वारा पूर्व सृष्टिके दग्ध कर दिये जानेपर उस समय बहुत विस्तारवाले वे पर्वत उस अग्निसे विशीर्ण हो गये थे। उस एकार्णवमें वायुप्रवाहके द्वारा एकत्रित होकर शीतके कारण वे जहाँ-जहाँ जम
३१६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| तदाचलत्वादचलाः पर्वभिः पर्वताः स्मृताः ।<br>गिरयो हि निगीर्णत्वाच्छयानत्वाच्छिलोच्चयाः ॥ १३५<br><br>ततस्तेषु विकीर्णेषु कोटिशो हि गिरिश्वथ ।<br>विश्वकर्मा विभजते कल्पादिषु पुनः पुनः ॥ १३६ | गये, वहाँ-वहाँ पर्वत बन गये। वे चलायमान न होनेके कारण 'अचल', पर्वोंसे युक्त होनेके कारण 'पर्वत', निगीर्ण होनेके कारण 'गिरि' तथा [भूमिपर] शयन करनेके कारण 'शिलोच्चय' कहे गये हैं। इस प्रकार [भगवान्] विश्वकर्मा प्रत्येक कल्पमें उन करोड़ों पर्वतोंके [इधर-उधर] बिखर जानेपर बार-बार उनका विभाग करते हैं॥ १३१—१३६॥ | | ससमुद्रामिमां पृथ्वीं सप्तद्वीपां सपर्वताम् ।<br>भूराद्यांश्चतुरो लोकान् पुनः सोऽथ व्यकल्पयत् ॥ १३७<br><br>लोकान् प्रकल्पयित्वाथ प्रजासर्गं ससर्ज ह ।<br>ब्रह्मा स्वयम्भूभगवान् सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः ॥ १३८<br><br>ससर्ज सृष्टिं तद्रूपां कल्पादिषु यथा पुरा ।<br>तस्याभिध्यायतः सर्गं तदा वै बुद्धिपूर्वकम् ॥ १३९<br><br>बुद्ध्याश्च समकाले वै प्रादुर्भूतस्तमोमयः ।<br>तमो मोहो महामोहस्तामिस्रश्चान्धसंज्ञितः ॥ १४०<br><br>अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः ।<br>पञ्चधावस्थितः सर्गो ध्यायतः सोऽभिमानिनः ॥ १४१<br><br>संवृतस्तमसा चैव बीजाङ्कुरवदावृतः ।<br>बहिरन्तश्चाप्रकाशास्तब्धो निःसंज्ञ एव च ॥ १४२ | तदनन्तर उन्होंने समुद्रों, सातों द्वीपों तथा पर्वतोंसहित पृथ्वीको, भूः आदि चारों लोकोंको बनाया। इसके बाद लोकोंकी रचना करके उन्होंने प्रजासर्गकी रचना की, विविध प्रजाओंकी सृष्टि करनेकी इच्छावाले स्वयम्भू भगवान् [ब्रह्मा]-ने उसी प्रकारकी सृष्टिकी रचना की, जैसा उन्होंने पहलेके कल्पोंमें किया था। सृष्टिके समय बुद्धिपूर्वक सर्गका चिन्तन करते हुए उन ब्रह्माकी बुद्धिसे तमोमय [अविद्यात्मक] सर्ग उत्पन्न हुआ; वह तम, मोह, महामोह, तामिस्र तथा अन्ध—इन नामोंवाला है। इस प्रकार पाँच पर्वोंवाली यह अविद्या उन महात्मासे उत्पन्न हुई। ध्यान करते हुए अभिमानी ब्रह्माका वह सर्ग पाँच प्रकारसे अवस्थित हुआ। वह तमसे आवृत, बीजांकुरकी भाँति ढका हुआ, बाहर तथा भीतरसे प्रकाशरहित, स्तब्ध तथा निःसंज्ञ (चेतनाशून्य) था॥ १३७—१४२॥ | | यस्मात्तेषां वृता बुद्धिर्दुःखानि करणानि च ।<br>तस्मात्ते संवृतात्मानो नगा मुख्याः प्रकीर्तिताः ॥ १४३ | उन [पर्वतों]-की बुद्धि ढँकी हुई थी और उनके दुःख तथा क्रिया-कलाप भी ढँके हुए थे, अतः संवृतात्मा (आवृत आत्मावाले) वे नग (पर्वत) प्रथम उत्पन्न (मुख्य) कहे गये हैं॥ १४३॥ | | मुख्यसर्गं तथाभूतं दृष्ट्वा ब्रह्मा ह्यसाधकम् ।<br>अप्रसन्नमनाः सोऽथ ततोऽन्यं सो ह्यमन्यत ॥ १४४<br><br>तस्याभिध्यायताश्चैव तिर्यक्स्रोता ह्यवर्तत ।<br>यस्मात्तिर्यक्प्रवृत्तः स तिर्यक्स्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४५<br><br>पश्वादयस्ते विख्याता उत्पथग्राहिणो द्विजाः ।<br>तस्याभिध्यायतोऽन्यं वै सात्त्विकः समवर्तत ॥ १४६<br><br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयस्तु स वै चोर्ध्वं व्यवस्थितः ।<br>यस्मात्प्रवर्तते चोर्ध्वमूर्ध्वस्रोतास्ततः स्मृतः ॥ १४७ | उस प्रकारके प्रथम सर्गको कार्यहेतु व्यर्थ समझकर वे ब्रह्मा अप्रसन्नचित्त हो गये। तब वे अन्य सर्गका विचार करने लगे। ऐसा चिन्तन करते हुए उन ब्रह्मासे तिर्यक्स्रोत (बहिर्मुख इन्द्रियप्रवाहवाला)-सर्ग उत्पन्न हुआ। वह [सर्ग] तिर्यक् प्रवृत्तिवाला था, इसलिये उसे तिर्यक्स्रोत कहा गया है। हे द्विजो! वे उत्पथग्राही पशु-पक्षी आदिके रूपमें प्रसिद्ध हुए। इसके बाद अन्य सर्गका ध्यान करते हुए उन ब्रह्मासे ऊर्ध्वस्रोत (ऊर्ध्व इन्द्रियप्रवाहवाला) तीसरा सात्त्विक सर्ग उत्पन्न हुआ; |

अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप... सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३१७


श्लोकअर्थ
ते सुखप्रीतिबहुला बहिरन्तश्च संवृताः।<br>प्रकाशा बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोभवाः स्मृताः ॥ १४८<br><br>ते सत्त्वस्य च योगेन सृष्टाः सत्त्वोद्भवाः स्मृताः।<br>ऊर्ध्वस्रोतास्तृतीयो वै देवसर्गस्तु स स्मृतः ॥ १४९<br><br>प्रकाशाद्बहिरन्तश्च ऊर्ध्वस्रोतोद्भवाः स्मृताः।<br>ते ऊर्ध्वस्रोतसो ज्ञेयास्तुष्टात्मानो बुधैः स्मृताः ॥ १५०वह ऊर्ध्वरूपसे व्यवस्थित था। चूँकि यह ऊर्ध्वभावसे कार्य करता था, अतः यह [सर्ग] ऊर्ध्वस्रोत कहा गया है। वे सुख-प्रीतिकी अधिक प्रवृत्तिवाले, बाहर तथा भीतरसे संवृत और बाहर तथा भीतरसे प्रकाशमय थे, इसलिये वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। वे सत्त्वगुणके योगसे सृजित किये गये, इसलिये वे सत्त्वोद्भव कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोत नामक वह तीसरा सर्ग देवसर्ग कहा गया है। बाहर तथा भीतर प्रकाशसे युक्त रहनेके कारण वे ऊर्ध्वस्रोतसे उत्पन्न कहे गये हैं। ऊर्ध्वस्रोतके रूपमें ज्ञेय वे लोग विद्वानोंके द्वारा सन्तुष्ट आत्मावाले कहे गये हैं॥ १४८-१५०॥
ऊर्ध्वस्रोतस्सु सृष्टेषु देवेषु वरदः प्रभुः।<br>प्रीतिमानभवद् ब्रह्मा ततोऽन्यं सोऽभ्यमन्यत ॥ १५१<br><br>ससर्ज सर्गमन्यं हि साधकं प्रभुरीश्वरः।<br>ततोऽभिध्याय तस्तस्य सत्याभिध्यायिनस्तदा ॥ १५२<br><br>प्रादुरासीत्तदा व्यक्तादर्वाक्स्रोतास्तु साधकः।<br>यस्मादर्वाक् न्यवर्तन्त ततोऽर्वाक्स्रोतसस्तु ते ॥ १५३<br><br>ते च प्रकाशबहुलास्तमःपृक्ता रजोऽधिकाः।<br>तस्मात्ते दुःखबहुला भूयोभूयश्च कारिणः ॥ १५४<br><br>संवृता बहिरन्तश्च मनुष्याः साधकाश्च ते।<br>लक्षणैस्तारकाद्यैस्ते ह्यष्टधा तु व्यवस्थिताः ॥ १५५<br><br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्ते गन्धर्वसहधर्मिणः।<br>इत्येष तैजसः सर्गो ह्यर्वाक्स्रोतः प्रकीर्तितः ॥ १५६ऊर्ध्वस्रोतवाले देवताओंके सृष्ट हो जानेपर वर प्रदान करनेवाले प्रभु भगवान् ब्रह्मा प्रसन्न हो गये और उसके बाद वे दूसरी सृष्टिका विचार करने लगे। तब प्रभु ब्रह्माने अन्य साधक सर्गका सृजन किया। उस समय ध्यान करते हुए उन सत्यके अभिध्यायी व्यक्त ब्रह्मासे अर्वाक्स्रोत (बाहर तथा भीतरसे इन्द्रियप्रवाहवाला) साधक सर्ग उत्पन्न हुआ। इस सृष्टिके लोग अर्वाक्रूपसे कार्यमें प्रवृत्त हुए, इसलिये वे अर्वाक्स्रोता कहे गये हैं। वे प्रकाशबाहुल्यवाले, तमोगुणसे युक्त तथा रजोगुणकी अधिकतावाले थे, इसलिये वे बहुत दुःखसे युक्त थे तथा बार-बार कर्म करनेवाले थे। बाहर तथा भीतरसे संवृत वे लोग साधक (कार्यसाधनमें तत्पर) मनुष्य थे; वे तारक आदि लक्षणोंके द्वारा आठ प्रकारसे व्यवस्थित हुए। सिद्ध आत्मावाले वे मनुष्य गन्धर्वोंके समान गुणधर्मवाले थे। इस अर्वाक्स्रोत सृष्टिको ‘तैजस' सर्ग कहा गया है॥ १५१-१५६॥
पञ्चमोऽनुग्रहः सर्गश्चतुर्धा तु व्यवस्थितः।<br>विपर्ययेण शक्त्या च सिद्ध्या तुष्ट्या तथैव च ॥ १५७<br><br>स्थावरेषु विपर्यासस्तिर्यग्योनिषु शक्तिः।<br>सिद्धात्मानो मनुष्यास्तु ऋषिदेवेषु कृत्स्नशः ॥ १५८<br><br>इत्येष प्राकृतः सर्गो वैकृतोऽनवमः स्मृतः।<br>भूतादिकानां भूतानां षष्ठः सर्गः स उच्यते ॥ १५९पाँचवाँ सर्ग ‘अनुग्रह' है; यह विपर्यय, शक्ति, सिद्धि तथा तुष्टिके द्वारा चार प्रकारसे व्यवस्थित है। स्थावरों (वृक्ष आदि)-में विस्तारके कारण भेद होता है, पशु आदिमें सामर्थ्यसे होता है, मनुष्य प्रारब्धजन्य सिद्धिसे युक्त होते हैं और ऋषियों तथा देवताओंमें सम्पूर्ण तुष्टिके द्वारा चतुर्थ भेद होता है। चार प्रकारवाला यह प्राकृत (प्रकृतिनिरूपण विषयवाला) तथा विकारको प्राप्त अनुग्रह [नामक] सर्ग श्रेष्ठ कहा गया है॥ १५७-१५८ १/२॥