श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २९८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| कुरुवंशादनुस्तस्मात्पुरुत्वान् पुरुषोत्तमः ।<br>अंशुर्जज्ञे च वैदर्भ्यां भद्रवत्यां पुरुत्वतः ॥ ४८<br>ऐक्ष्वाकीमवहच्चांशुः सत्त्वस्तस्मादजायत ।<br>सत्त्वात्सर्वगुणोपेतः सात्त्वतः कुलवर्धनः ॥ ४९ | महायशस्वी तथा मधुवंशकी वृद्धि करनेवाला राजा हुआ। मधुसे कुरुवंश नामक पुत्र हुआ। कुरुवंशसे अनु हुआ और उस [अनु]-से पुरुषश्रेष्ठ पुरुत्वान् उत्पन्न हुआ। पुरुत्वान्से वैदर्भी भद्रवतीके गर्भसे अंशुने जन्म लिया। अंशुने ऐक्ष्वाकीसे विवाह किया; उस [अंशु]-से सत्त्व उत्पन्न हुआ। सत्त्वसे सात्त्वत उत्पन्न हुआ; वह समस्त गुणोंसे सम्पन्न तथा कुलकी वृद्धि करनेवाला था ॥ ४८-४९ ॥ | | ज्यामघस्य मया प्रोक्ता सृष्टिर्वै विस्तरेण वः ।<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि निसृष्टिं ज्यामघस्य तु ॥ ५०<br>प्रजीवत्येति वै स्वर्गं राज्यं सौख्यं च विन्दति ॥ ५१ | [हे ऋषियो!] मैंने आपलोगोंसे ज्यामघकी सृष्टिका विस्तारपूर्वक वर्णन कर दिया। जो [व्यक्ति] ज्यामघकी सृष्टिको पढ़ता अथवा सुनता है; वह दीर्घकालतक जीवित रहता है, राज्य तथा सुख प्राप्त करता है और [अन्तमें] स्वर्गकी प्राप्ति करता है ॥ ५०-५१ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे वंशानुवर्णनं नामाष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'वंशानुवर्णन' नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय
चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा तथा संक्षेपमें कृष्णचरितका वर्णन
| सूत उवाच | सूतजी बोले— |
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| सात्त्वतः सत्यसम्पन्नः प्रजज्ञे चतुरः सुतान् ।<br>भजनं भ्राजमानं च दिव्यं देवावृधं नृपम् ॥ १<br>अन्धकं च महाभागं वृष्णिं च यदुनन्दनम् ।<br>तेषां निसर्गाश्चतुरः शृणुध्वं विस्तरेण वै ॥ २ | [हे ऋषियो!] सत्यसम्पन्न सात्त्वतने तेजस्वी भजन, दिव्य राजा देवावृध, महाभाग्यशाली अन्धक तथा यदुनन्दन वृष्णि—इन चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। अब उनके चारों वंशोंको विस्तारपूर्वक सुनिये ॥ १-२ ॥ |
| सृञ्जयां भजनाच्चैव भ्राजमानाद्विजज्ञिरे ।<br>अयुतायुः शतायुश्च बलवान् हर्षकृत्स्मृतः ॥ ३ | तेजस्वी भजनके द्वारा सृंजयीसे अयुतायु, शतायु तथा बलवान् हर्षकृत् उत्पन्न हुए बताये गये हैं ॥ ३ ॥ |
| तेषां देवावृधो राजा चचार परमं तपः ।<br>पुत्रः सर्वगुणोपेतो मम भूयादिति स्मरन् ॥ ४<br>तस्य बभ्रुरिति ख्यातः पुण्यश्लोको नृपोत्तमः ।<br>अनुवंशपुराणज्ञा गायन्तीति परिश्रुतम् ॥ ५<br>गुणान् देवावृधस्याथ कीर्तयन्तो महात्मनः ।<br>यथैव शृणुमो दूरात् सम्पश्यामस्तथान्तिकात् ॥ ६<br>बभ्रुः श्रेष्ठो मनुष्याणां देवैर्देवावृधः समः ।<br>पुरुषाः पञ्चषष्टिस्तु षट् सहस्त्राणि चाष्ट च ॥ ७ | [सात्त्वतके] उन पुत्रोंमें राजा देवावृधने 'मेरे सर्वगुणसम्पन्न पुत्र उत्पन्न हो'—ऐसा स्मरण करते हुए घोर तपस्या की। तब उसे बभ्रु नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पवित्र यशवाला उत्तम राजा था। वंशपरम्पराके प्राचीन ज्ञाता महान् आत्मावाले देवावृधके गुणोंकी प्रशंसा करते हुए यह गाथा गाते हैं—बभ्रुके विषयमें हमलोग जैसा दूरसे सुनते हैं, वैसा ही समीपसे देखते हैं। देवताओंके समान देवावृधकी तरह बभ्रु मनुष्योंमें |