श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ६९] चन्द्रवंश-वर्णनमें भगवान् श्रीकृष्णके अवतारकी कथा... 'कृष्णचरितका वर्णन | २९९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| येऽमृतत्वमनुप्राप्ता बभ्रोर्देवावृधादपि।<br>यज्वा दानमतिर्वीरो ब्रह्मण्यस्तु दृढव्रतः॥ ८<br>कीर्तिमांश्च महातेजाः सात्त्वतानां महारथः।<br>तस्यान्ववाये सम्भूता भोजा वै देवतोपमाः॥ ९ | श्रेष्ठ है। चौदह हजार पैंसठ [ऐसे] पुरुष थे, जिन्होंने देवावृधके पुत्र बभ्रुसे अमृतत्व प्राप्त किया था। वह यज्ञ करनेवाला, दानबुद्धिवाला, पराक्रमी, ब्राह्मणोंकी रक्षा करनेवाला, दृढव्रतसे युक्त, कीर्तिशाली, महातेजस्वी तथा सात्त्वतोंमें महारथी था। उसके वंशमें देवतुल्य भोजलोग उत्पन्न हुए॥ ४–९॥ |
| गान्धारी चैव माद्री च वृष्णिभार्ये बभूवतुः।<br>गान्धारी जनयामास सुमित्रं मित्रनन्दनम्॥ १०<br>माद्री लेभे च तं पुत्रं ततः सा देवमीढुषम्।<br>अनमित्रं शिनिं चैव तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ११ | गान्धारी तथा माद्री—ये वृष्णिकी भार्याएँ थीं। गान्धारीने सुमित्र तथा मित्रनन्दनको जन्म दिया। माद्रीने देवमीढुष नामक पुत्रको उत्पन्न किया, उसके बाद उसने अनमित्र तथा शिनि नामक पुत्रोंको उत्पन्न किया; वे दोनों उत्तम पुरुष थे॥ १०-११॥ |
| अनमित्रसुतो निघ्नो निघ्नस्य द्वौ बभूवतुः।<br>प्रसेनश्च महाभागः सत्राजिच्च सुतावुभौ ॥ १२<br>तस्य सत्राजितः सूर्यः सखा प्राणसमोऽभवत्।<br>स्यमन्तको नाम मणिर्दत्तस्तस्मै विवस्वता ॥ १३<br>पृथिव्यां सर्वरत्नानामसौ राजाभवन्मणिः।<br>कदाचिन्मृगयां यातः प्रसेनेन सहैव सः॥ १४<br>वधं प्राप्तोऽसहायश्च सिंहादेव सुदारुणात्। | अनमित्रका पुत्र निघ्न हुआ। निघ्नके दो पुत्र हुए—प्रसेन तथा महाभाग्यशाली सत्राजित्। सूर्य उस सत्राजित्का प्राणतुल्य मित्र था। सूर्यने उसे स्यमन्तक नामक मणि दी थी। वह मणि पृथिवीपर सभी रत्नोंमें श्रेष्ठ थी। किसी समय वह प्रसेन मणिसे युक्त होकर आखेटके लिये गया हुआ था; एक महाभयंकर सिंहने उसका वध कर दिया, उस समय वह असहाय था॥ १२–१४१/२॥ |
| अथ पुत्रः शिनेर्जज्ञे कनिष्ठाद् वृष्णिनन्दनात्॥ १५<br>सत्यवाक् सत्यसम्पन्नः सत्यकस्तस्य चात्मजः।<br>सात्यकिर्युयुधानस्तु शिनेर्नप्ता प्रतापवान् ॥ १६<br>असङ्गो युयुधानस्य कुणिस्तस्य सुतोऽभवत्।<br>कुणेर्युगन्धरः पुत्रः शैनेया इति कीर्तिताः॥ १७ | वृष्णिके कनिष्ठ पुत्र शिनिसे सत्यक नामक सत्यवादी तथा सत्यनिष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र युयुधान था; जो सात्यकि नामसे प्रसिद्ध था। वह शिनिका प्रतापशाली नप्ता (नाती) था। युयुधानका पुत्र असंग तथा उस [असंग]-का पुत्र कुणि हुआ। कुणिका पुत्र युगन्धर हुआ। ये शिनिके वंशज कहे गये हैं॥ १५–१७॥ |
| माद्र्याः सुतस्य संजज्ञे सुतो वार्ष्णिर्युधाजितः।<br>श्वफल्क इति विख्यातस्त्रैलोक्यहितकारकः॥ १८<br>श्वफल्कश्च महाराजो धर्मात्मा यत्र वर्तते।<br>नास्ति व्याधिभयं तत्र नावष्टिभयमप्युत ॥ १९<br>श्वफल्कः काशिराजस्य सुतां भार्यामवाप सः।<br>गान्दिनीं नाम काश्यो हि ददौ तस्मै स्वकन्यकाम्॥ २० | माद्री तथा वृष्णिसे पुत्र युधाजित् उत्पन्न हुआ; वह श्वफल्क नामसे विख्यात हुआ। वह तीनों लोकोंका हित करनेवाला था। धर्मात्मा महाराज श्वफल्क जहाँ रहते थे, वहाँ न व्याधिभय रहता था और न अनावृष्टिभय रहता था। उन श्वफल्कने काशिराजकी पुत्रीको भार्याके रूपमें प्राप्त किया था। काशिराजने अपनी गान्दिनी नामक कन्याको उन्हें प्रदान किया था॥ १८–२०॥ |
| सा मातुरुदरस्था वै बहून् वर्षगणान् किल।<br>वसन्ती न च संजज्ञे गर्भस्थां तां पिताब्रवीत्॥ २१ | वह अपनी माताके गर्भमें बहुत वर्षोंतक स्थित रही और जब वहाँ निवास करती हुई उसने जन्म नहीं लिया, |