श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३०० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| जायस्व शीघ्रं भद्रं ते किमर्थं चाधितिष्ठसि।<br>प्रोवाच चैनं गर्भस्था सा कन्या गान्दिनी तदा॥ २२<br>वर्षत्रयं प्रतिदिनं गामेकां ब्राह्मणाय तु।<br>यदि दद्यास्ततः कुक्षेर्निर्गमिष्याम्यहं पितः॥ २३<br>तथेत्युवाच तस्या वै पिता काममपूरयत्।<br>दाता शूरश्च यज्वा च श्रुतवानतिथिप्रियः॥ २४<br>तस्याः पुत्रः स्मृतोऽक्रूरः श्वफल्काद्भूरिदक्षिणः।<br>रत्ना कन्या च शैवस्य ह्यक्रूरस्तामवाप्तवान्॥ २५<br>अस्यामुत्पादयामास तनयांस्तान्निबोधत।<br>उपमन्युस्तथा मागुर्वृतस्तु जनमेजयः॥ २६<br>गिरिरक्षस्तथोपेश्र्वः शत्रुघ्नो योऽरिमर्दनः।<br>धर्मभृद् दृष्टधर्मा च गोधनोऽथ वरस्तथा॥ २७<br>आवाहप्रतिवाहौ च सुधारा च वराङ्गना।<br>अक्रूरस्योग्रसेन्यां तु पुत्रौ द्वौ कुलन्दनौ॥ २८<br>देववानुपदेवश्च जज्ञाते देवसम्मतौ। | तब पिताने गर्भमें विद्यमान उस [कन्या]-से कहा था—'तुम शीघ्र जन्म ग्रहण करो, तुम्हारा कल्याण हो, तुम [गर्भमें ही] क्यों रुकी हुई हो?' तब गर्भमें स्थित उस कन्या गान्दिनीने उनसे कहा—'हे पितः! यदि आप तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक गाय ब्राह्मणको दानमें दें, तब मैं गर्भसे बाहर निकलूँगी।' इसपर पिताने कहा—'वैसा ही होगा।' इसके बाद पिताने उसकी कामना पूर्ण की। उसी कन्यासे श्वफल्कके द्वारा अक्रूर उत्पन्न कहा गया है, जो दानी, पराक्रमी, यज्ञ करनेवाला, विद्वान्, अतिथिप्रिय तथा विपुल दक्षिणा देनेवाला था। शैवकी रत्ना नामक कन्या थी, उसीको अक्रूरने [भार्यारूपमें] प्राप्त किया था। [हे ऋषियो!] उसने इस [कन्या]-से जिन पुत्रोंको उत्पन्न किया, उन्हें आप सुनिये—वे उपमन्यु, मागु, वृत, जनमेजय, गिरिरक्ष, उपेक्ष, शत्रुघ्न, अरिमर्दन, धर्मभृत्, दृष्टधर्मा, गोधन, वर, आवाह तथा प्रतिवाह [नामवाले] थे और सुधारा नामक एक सुन्दर कन्या भी उत्पन्न हुई थी। अक्रूरको उग्रसेनकी कन्यासे देववान् तथा उपदेव नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए; वे कुलको आनन्द प्रदान करनेवाले एवं देवतुल्य थे॥ २१—२८ १/२ ॥ |
| सुमित्रस्य सुतो जज्ञे चित्रकश्च महायशाः॥ २९<br>चित्रकस्याभवन् पुत्रा विपृथुः पृथुरेव च।<br>अश्वग्रीवः सुबाहुश्च सुधासूकगवेक्षणौ॥ ३०<br>अरिष्टनेमिरश्वश्च धर्मो धर्मभृदेव च।<br>सुभूमिर्बहुभूमिश्च श्रविष्ठाश्रवणे स्त्रियौ॥ ३१<br>अन्धकात्काश्यदुहिता लेभे च चतुरः सुतान्।<br>कुकुरं भजमानं च शुचिं कम्बलबर्हिषम्॥ ३२<br>कुकुरस्य सुतो वृष्णिर्वृष्णोः शूरस्ततोऽभवत्।<br>कपोतरोमातिबलस्तस्य पुत्रो विलोमकः॥ ३३<br>तस्यासीत्तुम्बुरुसखो विद्वान् पुत्रो नलः किल।<br>ख्यायते स सुनाम्ना तु चन्दनानकदुन्दुभिः॥ ३४ | सुमित्रको चित्रक नामक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। चित्रकके विपृथु, पृथु, अश्वग्रीव, सुबाहु, सुधासूक, गवेक्षण, अरिष्टनेमि, अश्व, धर्म, धर्मभृत्, सुभूमि, बहुभूमि [नामक] पुत्र उत्पन्न हुए और श्रविष्ठ तथा श्रवणा [नामक] दो कन्याएँ उत्पन्न हुईं। काशिराजकी पुत्रीने अन्धकसे कुकुर, भजमान, शुचि तथा कम्बलबर्हि नामक चार पुत्रोंको उत्पन्न किया। कुकुरका पुत्र वृष्णि हुआ और उस वृष्णिसे शूर नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका पुत्र कपोतरोमा हुआ; वह महाबलवान् था। उस [कपोतरोमा]-का पुत्र विलोमक हुआ। उसका पुत्र नल हुआ; वह तुम्बुरु (गन्धर्व)-का मित्र और विद्वान् था। वह चन्दनानकदुन्दुभि नामसे प्रसिद्ध हुआ॥ २९—३४॥ |
| तस्मादप्यभिजित्पुत्र उत्पन्नोऽस्य पुनर्वसुः।<br>अश्वमेधं स पुत्रार्थमाजहार नरोत्तमः॥ ३५<br>तस्य मध्येऽतिरात्रस्य सदोमध्यात्समुत्थितः।<br>ततस्तु विद्वान् सर्वज्ञो दाता यज्वा पुनर्वसुः॥ ३६ | उससे अभिजित् नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। उस [अभिजित्]-का पुत्र पुनर्वसु हुआ। उस श्रेष्ठ राजाने पुत्रके लिये अश्वमेधयज्ञ किया था। उस यज्ञमें जब मन्त्रोंका उच्चारण हो रहा था, तब पूजनकर्ताओंके मध्य |